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कोरोना पर चीन के झूठ में सबसे बड़ा मददगार कौन?

कई बार आपदाएं संकेत देकर आती हैं. जैसे, मिज़ोरम के घने जंगलों में पाई जाने वाली बांस की एक ख़ास किस्म- मौतम. स्थानीय भाषा में इसका मतलब होता है अकाल. हर आधी सदी बाद ये बांस के जंगल फूलों से लद जाते हैं. उन फूलों के प्रोटीन से भरे बीज चूहों को बड़े स्वादिष्ट लगते हैं. उनकी आबादी बेपनाह बढ़ जाती है. फिर जब फूल गिर जाते हैं, तो भूखे चूहे फसलें खा जाते हैं. कुछ नहीं छोड़ते. ज़िंदा चूहों से अकाल फैलता है. इस पैटर्न को समझने से सबक मिला. इसका नतीजा ये कि जब 2004 में बांस फूले, तो योजनाएं तैयार थीं.

कहने का मतलब ये कि आपदाएं सबक सिखाती हैं. कोरोना भी कई सबक देकर जाएगा. एक ज़रूरी सबक ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ से भी जुड़ा होगा. क्योंकि शायद चीन के साथ-साथ कोरोना का एक दोषी WHO भी है. कैसे, आगे पढ़िए.

दिसंबर में ही WHO को वॉर्निंग मिल गई थी 
एक द्वीप है- ताइवान. जो ख़ुद को स्वतंत्र देश कहता है. मगर चीन के मुताबिक, वो उनका ही हिस्सा है. 31 दिसंबर, 2019 की तारीख़. ताइवान ने WHO को आगाह किया. वॉर्निंग थी चीन में फैल रही एक रहस्यमय बीमारी को लेकर. ताइवान का कहना था कि ये बीमारी संक्रामक है और उसके पास इसका सबूत है. मगर, WHO ने इस चेतावनी पर कुछ नहीं किया. इसके करीब एक पखवाड़े बाद, 14 जनवरी को WHO ने ट्वीट किया. लिखा, चीन द्वारा की गई शुरुआती जांच में इस बीमारी के इंसानों से इंसानों में फैलने का कोई साफ साक्ष्य नहीं मिला है. 20 जनवरी तक चीन के बाहर तीन देशों में कोरोना मरीज़ मिल चुके थे. थाइलैंड में दो. जापान में एक. दक्षिण कोरिया में एक. आख़िरकार 22 जनवरी को WHO का एक ट्वीट आया. इसमें जापान, दक्षिण कोरिया और थाइलैंड वाली बात बताई गई थी. WHO ने मान लिया था कि ये बीमारी इंसानों से इंसानों में फैलती है. 23 जनवरी को चीन ने वुहान प्रांत में लॉकडाउन लागू किया. मगर इस वक़्त तक वहां से करीब 50 लाख लोग बाहर निकल चुके थे.

WHO के डायरेक्टर जनरल चीन की तारीफ़ कर रहे थे
22-23 जनवरी की ही बात है. कोरोना के संक्रामक होने वाली जानकारी मिलने के बाद WHO की एक इमरजेंसी मीटिंग हुई. बहस हुई कि कोरोना को अंतरराष्ट्रीय चिंता की स्वास्थ्य आपदा घोषित किया जाए कि नहीं. ऐसा होने पर बाकी देश सचेत होते. तैयारी करते. मगर ये ऐलान नहीं हुआ. इसके पांच दिन बाद WHO के मुखिया टेड्रोस एडेनम गेब्रियेसिस चीन में थे. 28 जनवरी को उन्होंने राष्ट्रपति शी चिनपिंग के साथ बैठकर दुनिया के सामने उनकी ख़ूब प्रशंसा की. कहा, चीन ने पूरी दुनिया की सुरक्षा के लिए जो कदम उठाए हैं, उसकी तारीफ़ होनी चाहिए. टेड्रोस ने चीन के सिस्टम की भी तारीफ़ की. कहा, उन्हें पारदर्शिता के प्रति चीन की प्रतिबद्धता पर कोई संशय नहीं है. इसके दो रोज़ बाद, 30 जनवरी को WHO ने कोरोना पर अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल का ऐलान कर दिया. मगर इसके बाद भी WHO यात्रा प्रतिबंध न करने की सलाह दे रहा था देशों को.

चीन के झूठ में WHO ने मदद की?
आज तारीख़ है 6 अप्रैल. दुनियाभर में कोरोना के मामले पौने 13 लाख पार हो गए हैं. करीब 70 हज़ार लोगों की मौत हो चुकी है. ‘यूनिवर्सिटी ऑफ साउथेम्टन’ की एक रिसर्च कहती है कि अगर चीन ने कोरोना पर तीन हफ़्ते पहले कदम उठाया होता, तो ये मामले 95 फीसद तक घटाए जा सकते थे. अब पूरी दुनिया जानती है कि चीन ने कोरोना पर दुनिया से झूठ बोला. इसमें उसे मदद मिली WHO से.

फरवरी में WHO की जांच टीम चीन गई
हमने आपको बताया कि 28 जनवरी को WHO चीफ टेड्रोस चीन गए थे. इस वक़्त तक चीन ने कोरोना की तफ़्तीश के लिए WHO के किसी अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ को अपने यहां नहीं आने दिया था. WHO जो भी बता रहा था दुनिया को, वो बस चीन से मिली ग़लत जानकारियां थीं. 10 फरवरी को आख़िरकार WHO के नेतृत्व में एक टीम चीन पहुंची. टीम में कौन-कौन से विशेषज्ञ होंगे, इसपर चीन की परमिशन ली गई. और ये अनुमति देने में चीन ने करीब दो हफ़्ते लिए. जब WHO की टीम चीन के लिए रवाना हुई, उस वक़्त तक कोरोना करीब दो दर्ज़न देशों में पहुंच चुका था. दुनियाभर में साढ़े 37 हज़ार मरीज़ हो चुके थे इसके. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, लौटने पर इस टीम के कुछ सदस्यों ने कहा कि वो चीन में बहुत कम ही बात कर सके लोगों से. ये बात भी सामने आई कि टीम के कई लोगों को चीन की भाषा नहीं आती थी. ऐसे में ये जांच कितनी सफल रही, इसमें शंका है. वैसे टीम ने अपनी रिपोर्ट में भी चीन के उठाए कदमों को ऐतिहासिक बताते हुए उसकी काफी तारीफ़ की थी.

चेतावनियों के बावजूद WHO लगातार चीन को फेस वैल्यू पर लेता रहा. 11 मार्च को जब आख़िरकार WHO ने कहा कि कोरोना वैश्विक महामारी है. तब तक चीन से निकलकर ये बीमारी दुनिया के एक बड़े हिस्से तक पहुंच चुकी थी.

चीन के डेटा से क्या ज़रूरी चीज गायब थी?
1948 में बने WHO का ध्येय है महामारी जैसी स्थितियों में दुनिया के अलग-अलग देशों के बीच सामंजस्य बनाना. उन्हें लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ी बातों में ईमानदारी से निर्देश देना. मगर कोरोना मामले में WHO अपना मिशन पूरा नहीं कर पाया. उसने किस तरह चीन के प्रपोगेंडा को आगे बढ़ाया, इसकी एक मिसाल देखिए. ख़बरें आ रही थीं कि चीन कोरोना पर आधा-अधूरा डेटा दे रहा है. इसके बचाव में WHO ने कहा कि कोरोना के मरीज़ पकड़ में न आए हों, ऐसा बहुत कम ही हुआ है. मगर चीन जिन लोगों की जांच कर रहा था, उनमें कोरोना का कम-से-कम एक लक्षण तो था ही. ज़्यादातर मामलों में ये लक्षण था बुखार. शोध बताते हैं कि करीब 25 से 50 फीसद मरीज़ों में कोरोना का कोई लक्षण नहीं होता. मगर चीन का बचाव करते हुए WHO से ये सारी ज़रूरी चीजें मिस हो गईं.

क्या है चीन की सबसे बड़ी कामयाबी?
WHO के पक्षधर याद दिलाते हैं कि इस संस्था के पास ताकत नहीं है. वो अपने बजट तक के लिए अपने सदस्य देशों की कृपा पर निर्भर रहता है. ऊपर से देशों की आपसी गुटबाजी. तो वो इन देशों के बीच अपना बैलेंस बनाने में ही लगा रहता है. ये बातें एक हद तक सही हैं. ये भी सच है कि चीन द्वारा दी गई संख्याओं की पुष्टि के लिए शायद ज़रूरी ज़रिया नहीं था उसके पास. मगर कोरोना पर उसकी नाकामी इन संख्याओं से कहीं ज़्यादा है. वो इस आपदा में अपने सहारे चीन को राजनैतिक फ़ायदा दिलाता दिखा. तमाम आशंकाओं और सवालों के बावजूद उसने चीन के किए दावों का विज्ञापन किया. चीन की सबसे बड़ी कामयाबी ये नहीं कि उसने कोरोना पर बहुत हद तक काबू पा लिया है. उसके ब्लंडर्स के कारण दुनिया को जो नुकसान हो रहा है, उसके सामने चीन की सबसे बड़ी सफलता WHO से अपना PR करवाना है.

जापान ने कहा- WHO का नाम बदल दो
इन वजहों से WHO पर उंगलियां उठ रही हैं. जापान के उप प्रधानमंत्री तारो आसो ने उसे ‘चाइनीज़ हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन’ नाम दिया है. ताइवान ने WHO से अपील करते हुए कहा कि वो चीन के हाथों किडनैप न हो. निष्पक्ष बना रहे. अमेरिका में WHO पर जांच बिठाए जाने की मांग हो रही है. ताकि ये पता लगाया जा सके कि क्या चीन के दबाव ने WHO को प्रभावित किया. WHO पर ताकतवर देशों का प्रभाव पहले भी रहा है. कोल्ड वॉर के दिनों में अमेरिका हावी था उसपर. पिछले 20 सालों में स्थितियां बदली हैं. सदस्य देशों से मिलने वाली WHO की कुल फंडिंग में अब भी करीब 22 फीसद हिस्सेदारी के साथ अमेरिका टॉप पर है. चीन कुल फंड का करीब 12 पर्सेंट देता है. तब भी चीन का काफी प्रभाव है WHO पर. इसी प्रभाव के चलते ताइवान को WHO में शामिल नहीं किया जा रहा.

WHO पर उठ रहे सवालों का एक बड़ा फोकस उसके चीफ टेड्रोस एडेनम गेब्रियेसिस पर भी है. वो इथोपिया के रहने वाले हैं. राजनीतिक बैकग्राउंड के हैं. इथोपिया की तानाशाह सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे हैं. आलोचक कहते हैं, तानाशाही सिस्टम का ये बैकग्राउंड शायद उन्हें चीन के करीब लाता है.

WHO जैसी संस्थाओं की नाकामी और इसकी वजह से होने वाला नुकसान. ये दुनिया के लिए अलार्म होना चाहिए. कोरोना शायद इस तरह की आख़िरी महामारी न हो. ऐसे में ज़रूरत है ऐसी वैश्विक संस्था बनाने की, जिसका राजनैतिकरण न करें बड़े देश. जिससे पारदर्शिता और विश्वसनीयता की उम्मीद की जा सके. जिसके पास कुछ ठोस अधिकार भी हों और उसे फंड के लिए भी मुंह न जोहना पड़े.


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