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बार-बार लॉकडाउन बढ़ाने के बावजूद भारत में इतने कैसे बढ़ गए कोरोना के मामले?

नरेंद्र मोदी जी ने कहा था कि 21 दिन में कोरोना की लड़ाई जीती जाएगी. चार लॉकडाउन हो गए, तकरीबन 60 दिन हो गए….ये बात क्लियर है कि हिन्दुस्तान का लॉकडाउन फेल हुआ है. जो लक्ष्य था, पूरा नहीं हुआ.

26 मई को कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने ये बयान दिया. कहा कि लॉकडाउन से कोई फायदा नहीं हुआ.

देश में 25 मार्च को पहला लॉकडाउन लगा था. 31 मई तक इसका चौथा चरण चला. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि लॉकडाउन के बाद भी इंडिया में कोरोना के मामले 1.90 लाख तक क्यों पहुंच गए? कहां चूक हुई. दूसरे देशों ने लॉकडाउन से क्या हासिल किया? इस बारे में विस्तार से बात करेंगे.

पहले जान लेते हैं कि लॉकडाउन के साथ कोरोना के केस कैसे बढ़ते चले गए?

Covid Case

1,90,535 में से 91,819 लोग ठीक हो चुके हैं. ये 31 मई तक के आंकड़े हैं. जिस दिन लॉकडाउन-4 खत्म हुआ.

लॉकडाउन से पहले कोरोना के मामले 657 थे. लेकिन चौथे चरण के लॉकडाउन के साथ मामले हो गए हैं 1.90 लाख के पार. तो चूक कहां हुई? ये जानने से पहले न्यूज़ीलैंड की बात कर लेते हैं, जहां लॉकडाउन भारत के साथ ही शुरू हुआ था.

न्यूज़ीलैंड ने क्या तीर मारा?

28 मई, 2020. खबर आई कि न्यूज़ीलैंड में लगातार पांच दिन से कोई नया केस नहीं आया. कोरोना का एक भी मरीज अस्पताल में भर्ती नहीं है. सब ठीक होकर घर जा चुके हैं. इस देश में कुल 1504 लोग कोरोना की चपेट में आए. 22 लोगों की मौत हुई. जिस तरह से न्यूज़ीलैंड ने कोरोना को खत्म किया, दुनिया उसकी मिसाल दे रही है.

28 फरवरी को कोराना का पहला केस सामने आया था. न्यूज़ीलैंड ने तुरंत ईरान और चीन पर यात्रा प्रतिबंध लगा दिया. 19 मार्च को न्यूज़ीलैंड ने किसी भी विदेशी के अपने यहां आने पर रोक लगा दी. 102 केस आने के बाद पूरे देश में लॉकडाउन लगा दिया. 25 मार्च की आधी रात से न्यूज़ीलैंड में कोरोना लॉकडाउन शुरू हो गया. ये वही रात है, जब भारत में भी लॉकडाउन शुरू हुआ. इस दिन तक न्यजीलैंड में 205 मामले सामने आए थे. भारत में 657. लॉकडाउन से पहले न्यूजीलैंड ने तैयारी के लिए 48 घंटे का समय दिया. वहीं भारत में सिर्फ चार घंटे का वक्त जनता को मिला. भारत की तरह न्यूज़ीलैंड ने भी समय-समय पर लॉकडाउन बढ़ाया.

New Zealand Prime Minister Ardern
न्यूज़ीलैंड की पीएम जसिंडा ऐडर्न (फोटो: रॉयटर्स)

न्यूजीलैंड की पीएम जसिंडा ऐडर्न ने बिना समय गंवाए ज़रूरी कदम उठाए. जनता को लगातार अपडेट करती रहीं. मीडिया के सवालों का जवाब देती रहीं. जहां सख़्ती दिखानी थी, दिखाई. जरूरत पड़ी, तो लोगों को मुस्कुरा कर हौसला बढ़ाया. अब ये देश कोरोना से मुक्त हो गया है.

न्यूज़ीलैंड से क्या तुलना सही है? 

न्यूजीलैंड की आबादी 50 लाख से भी कम है. शिक्षा, स्वास्थ्य, नागरिक अधिकार जैसे मामलों में दुनिया के सबसे अच्छे मुल्कों में है. भारत 130 करोड़ की विशाल आबादी वाला देश, जो हर मामले में उससे अलग है. दोनों की तुलना नहीं हो सकती. लेकिन हम न्यूज़ीलैंड से कुछ तो सीख ही सकते थे.

चूक कहां हुई?

कोरोना रोकने के लिए भारत ने साउथ कोरिया की जगह चीन का मॉडल अपनाया. अधिकांश देशों की तरह. लॉकडाउन का मॉडल. वहीं साउथ कोरिया ने  बड़े पैमाने पर लोगों के टेस्ट किए. लॉकडाउन का हिसाब-किताब कम रखा. संक्रमित लोगों को क्वारंटीन में रखा. उनके संपर्क में आए लोगों की सोशल ट्रेसिंग की. इन तरीकों से दक्षिण कोरिया ने अपने यहां कोरोना पर काबू पाया.

वहीं चीन ने लॉकडाउन किया. सबकुछ बंद कर दिया. चीन ने ऐप और ड्रोन के जरिए निगरानी की. दवा, दूध जैसी चीजों की डिलिवरी की. पकड़कर लोगों को अस्पतालों तक पहुंचाया. बड़े पैमाने पर लोगों को क्वारंटीन किया. आइसोलेट किया. और एक तरह से कोरोना पर काबू पा लिया.

चीन में एक महिला के कोरोना टेस्ट के लिए सैंपल लेता स्वास्थ्यकर्मी. (Photo: Reuters)
चीन में एक महिला के कोरोना टेस्ट के लिए सैंपल लेता स्वास्थ्यकर्मी. (Photo: Reuters)

हालांकि साउथ कोरिया ने बड़े पैमाने पर रैपिड एंटीबॉडी टेस्ट किए. भारत में भी ICMR ने ये टेस्ट शुरू किया था. लेकिन बाद में फॉल्टी रिजल्ट आने की वजह से इसे रोक दिया गया. यानी जितने लोगों की टेस्टिंग होनी थी, नहीं हुई. कोरोना टेस्ट के लिए प्राइवेट लैब को भी शामिल किया गया, लेकिन टेस्टिंग में उनका योगदान सिर्फ 15 से 20 प्रतिशत है.

लॉकडाउन का कड़ाई से पालन नहीं हुआ?

21 दिनों के पहले लॉकडाउन में सरकार ने हर मामले में सख्ती दिखाई. सोशल डिस्टेंसिंग का लगभग पालन करवाया. लेकिन जैसे-जैसे लॉकडाउन बढ़ता गया सरकार ढील देती गई. यहां तक कि शराब की दुकानें खोलने की अनुमति दे दी गई. लोग सोशल डिस्टेंसिंग भूल गए. यात्रा प्रतिबंधों पर ढील के बाद कोरोना के केस बढ़े.

माइग्रेंट वर्कर्स की वजह से मामले बढ़े?

लॉकडाउन से सबसे ज्यादा दिक्कत गरीबों और प्रवासी मजदूरों को आईं.सरकार ने उनके लिए कोई खास इंतजाम नहीं किया. रहने-खाने का इंतजाम नहीं होने से मजदूर पैदल ही घरों की तरफ निकल दिए. दिल दहला देने वाले फोटो और वीडियो सामने आए.  फिर लॉकडाउन के लगभग 37-38 दिन बाद एक मई से सरकार ने प्रवासी मजदूरों को घर पहुंचाने के लिए ट्रेनें चलाईं. जैसे-जैसे लोग अपने गांव पहुंचे, मामले बढ़ने लगे. छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में जहां कोरोना के मामले न के बराबर थे, वहां भी प्रवासियों के पहुंचने के बाद मामले बढ़े हैं. सरकार ने अगर माइग्रेंट वर्कर्स की समस्या से सही से निपटा होता, तो शायद मामले इतने नहीं बढ़ते.

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन IMA के प्रेसिडेंट रहे के.के. अग्रवाल का कहना है कि अभी ये आंकड़ा और बढ़ेगा. उन्होंने कहा,

अभी दो लाख केस हैं, 15 दिन बाद चार लाख होंगे. सरकार नहीं रोक सकती. सिर्फ पब्लिक रोक सकती है. पर्सनल लॉकडाउन की जरूरत है. अगर आप घर में और बाहर मास्क नहीं पहनेंगे, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं करेंगे, तो ये 15 दिन में चार लाख हो जाएंगे. ए-सिंम्पटोमैटिक लोग घर में सबको इंफेक्शन दे सकते हैं. अभी जो आंकड़ा आया है, ये कम है. अभी इससे भी ज्यादा नंबर आएगा. अगर किसी घर में नौ लोगों को इंफेक्शन है, तो सभी  का टेस्ट नहीं हो रहा है. किसी एक का टेस्ट हो रहा है. ऐसे में सही संख्या का पता नहीं चल रहा है.

उन्होंने आगे कहा,

जब तक 20 प्रतिशत आबादी का टेस्ट नहीं हो जाएगा, जैसा कि न्यूयॉर्क में देखने को मिला, इटली में देखने को मिला, ये बीमारी खत्म होने वाली नहीं है. टेस्टिंग बहुत कम हो रही है. 1.50 लाख टेस्ट रोजाना हो रहे हैं, लेकिन शहरों के हिसाब से ये 5000 ही हुआ. केवल सिंम्पटोमैटिक वालों के टेस्ट हो रहे हैं. इससे बीमारी कम नहीं होने वाली. एंटीबॉडी टेस्ट भरोसेमंद नहीं है.

ICMR के डाटा के मुताबिक, भारत ने 29 मई तक कोरोना के 38,37,207 सैंपल टेस्ट किए थे. स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, भारत में एक्टिव केस की संख्या लगभग 93 हजार है. 91 हजार लोग ठीक हो चुके हैं. वहीं 5000 से ज्यादा मौतें हुई हैं.


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