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पॉज़िटिव होते हुए सेवा कर रहे डॉक्टर्स और ड्यूटी कर रही प्रेगनेंट नर्स, पढ़िए उम्मीद की ये 7 कहानियां

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था. व्यक्ति को मैं नहीं जानता था, हताशा को जानता था. इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया. मैंने हाथ बढ़ाया. मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ. मुझे वह नहीं जानता था, मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था. हम दोनों साथ चले. दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे, साथ चलने को जानते थे.

इस कोरोनाकाल में उम्मीद की कहानियां जैसे-जैसे सामनें आ रही हैं, वैसे ही विनोद कुमार शुक्ल की इस कविता के मायने और ज़्यादा स्पष्ट होते जा रहे हैं. ‘एक दूसरे को जाने या बिना जाने’, साथ चलने की बात करेंगे. बात करेंगे उम्मीद की, करुणा की, कलेक्टिव कॉन्शियसनेस की और पढ़ते जाएंगे कुछ कविताएं.

# 1) पहली उम्मीद की ख़बर गुजरात के सूरत से. यहां के अलथान इलाके में स्थित सूरत महानगर पालिका के कम्यूनिटी हॉल में कोविड केयर सेंटर शुरू किया गया है. फ़िलहाल इस कोविड सेंटर में करीब 105 कोरोना पॉज़िटिव लोगों का इलाज चल रहा है. मरीज इतने ज़्यादा हैं कि यहां डॉक्टर्स और नर्स 24 घंटे कार्यरत रहते हैं. इन्हीं में से एक हैं सिस्टर नेंसी आइजन. चार महीने की प्रेग्नेंट. नर्स, जो इस कोविड सेंटर की शुरुआत से वहां पर ड्यूटी कर रही हैं. 29 वर्षीय नेंसी कोरोना से बिना डरे लगातार अपनी सेवाएं दे रही हैं. ऊपर से रोजे भी रख रही हैं. मानती हैं कि रमजान के पावन महीने में सेवा करने से अल्लाह नेकी प्रदान करेंगे.

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सिस्टर नेंसी आइजन कोरोना से बिना डरे और घबराए अपनी सेवाएं दे रही हैं. (फोटो-ANI)

प्रेग्नेंसी में नेंसी की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर भी असर पड़ रहा है. उनकी साथी नर्स ग्रीशमा सोलंकी के मुताबिक नेंसी को अभी संक्रमण होने का खतरा है. बावजूद इसके वो पूरी तरह अपनी ड्यूटी के प्रति समर्पित हैं. प्रेग्नेंसी की वजह से उन्हें पीपीई किट पहनने में दिक्कत आती है. इसलिए गाउन पहनकर काम करती हैं.

अशोक वाजपेयी लिखते हैं:

उम्मीद के पास कम से कम एक घर तो होना चाहिए. हमारे अंधेरे के मुहल्ले में न हो, चकाचौंध की दमकती कॉलोनी में भी न सही. कहीं तो…

# 2) दूसरी ख़बर का कोई उनवान होता तो वो होता, ‘चिरंजीवी भव!’. आपने फ़िल्म इंडस्ट्री की चकाचौंध तो बेशक देखी होगी, लेकिन याद रखिए हर माहीम के बग़ल में एक धारावी और हर साउथ एक्स के पीछे एक कोटला-मुबारकपुर बसता है. कहने का मतलब ये कि फ़िल्म इंडस्ट्री की इस चकाचौंध के पीछे भी हज़ारों एक्सप्लॉईटेशन, हज़ारों दर्द, हज़ारों पीड़ाएं छुपी हुई हैं. स्पॉट-बॉइज़ की, डेली वेज वर्कर्स की, एक्स्ट्राज़ की, साइड कास्ट की. इन मार्जिनलाइज्ड लोगों के बारे में अगर कोई कुछ सोचता है, कुछ करता है तो उसे आशीर्वाद देने का मन करता है: चिरंजीवी भव!

और यही हमने भी किया एक वीडियो को देखकर, एक ट्वीट पढ़कर. ट्वीट किया है, साउथ, ख़ासतौर पर तेलुगु फ़िल्म इंडस्ट्री, के सुपरस्टार चिरंजीवी ने. ट्वीट में वो लिखते हैं:

तेलुगु फिल्म इंडस्ट्री के फिल्म कर्मियों और फिल्म पत्रकारों को कोरोना के चंगुल से बचाने के लिए हम ‘अपोलो 24/7’ के सहयोग से बनी कोरोना क्राइसिस चैरिटी (CCC) की ओर से एक मुफ्त टीकाकरण सुविधा शुरू कर रहे हैं. आइए हम सभी की सुरक्षा सुनिश्चित करें. वैक्सीन लगवाएं, मास्क पहनें, सुरक्षित रहें.

ये फ़्री वैक्सीन ड्राइव 22 अप्रैल से शुरू हो चुकी है और एक महीने के लिए चलेगी. इसमें 45 साल से अधिक उम्र वाले सिने वर्कर्स और जर्नलिस्ट टीकाकरण करवा सकते हैं. ये भी बता दें कि ‘कोरोना क्राइसिस चैरिटी (CCC) एसोसिएशन’ चिरंजीवी द्वारा तेलुगु इंडस्ट्री के डेली वेज वर्कर्स की सहायता के लिए स्थापित की गई थी. चिरंजीवी ने अपने वीडियो में कहा,

22 अप्रैल से फ्री वैक्सीन ड्राइव शुरू होगी. मैं 45 साल से अधिक उम्र के सिने वर्कर्स और जर्नलिस्टों से आग्रह करता हूं कि वे आगे आएं और वैक्सीन लगवाएं. अगर आपके लाइफ पार्टनर भी इस उम्र की लिस्ट में आते हैं, तो उन्हें भी वैक्सीन लगवाने के लिए लेकर आएं. ये वैक्सीन ड्राइव एक महीने तक चलेगी.

#3) उड़ीसा. यहां से तीन अच्छी खबरें आईं हैं. पहली, नवीन पटनायक ने 22 अप्रैल को प्रधानमंत्री मोदी से बात की और बाकी राज्यों की सहायता करने की बात की. इसी बाबत उड़ीसा के CM ऑफ़िस ने एक ट्वीट किया है. जिससे पता चलता है कि पटनायक ने कहा है कि-

कोविड-19 की दूसरी वेव एक युद्ध जैसे स्थिति है और ओडिशा कोविड से लड़ाई के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर सभी सहयोग करेगा. इसके अंतर्गत ऑक्सीजन का उत्पादन बढ़ाना भी शामिल है ताकि इन आपातकालीन हालातों में अन्य राज्यों की मदद की जा सके.

 

गुरुवार को ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के निर्देश के बाद, ओडिशा पुलिस ने एडीजी (लॉ एंड ऑर्डर) वाई के जेठवा के तत्वावधान में एक विशेष अधिकारी को नोडल अधिकारी नियुक्त किया है. अन्य राज्यों की ज़रूरतों के लिए ऑक्सीजन से भरे वाहनों के सुगम आवागमन को सुनिश्चित करने के वास्ते. अब ये बड़ी और प्यारी ख़बर इसलिए हो जाती है, क्यूंकि यहां के सत्तासीन दल का किसी अन्य राज्य या राष्ट्रीय राजनीति में इतना बड़ा दख़ल नहीं है कि इस सहायता के बाद वो किसी रिटर्न की उम्मीद करे. ये भी गौरतलाब है कि भारत से सबसे ग़रीब राज्यों में से एक है उड़ीसा. याद कीजिए वो किस्सा, जब यीशु को गिफ़्ट में मिला ब्रेड का एक टुकड़ा, बाकी सभी क़ीमती गिफ़्ट्स से बढ़कर लगा था. क्यूंकि उसे दान करने वाले ने दरअसल अपना सर्वस्व दान कर दिया था.

अच्छा, ख़बर सिर्फ़ उड़ीसा के CM ऑफ़िस के इस ट्वीट से जुड़ी नहीं है. अब ज़रा इसके दूसरे भाग पर आते हैं. जिन राज्यों में ऑक्सीजन की कमी है, वहां आसानी से उड़ीसा ऑक्सीजन पहुंचा सके, इसके वास्ते उड़ीसा की पुलिस ग्रीन कॉरिडर का निर्माण कर रही है. ग्रीन कॉरिडर का मतलब यहां पर ये है कि ऑक्सीजन ले जाने वाले वाहनों के लिए एक डेडिकेटेड सड़क होगी और इन वाहनों को बीच में कहीं जाम या ट्रैफ़िक नहीं मिलेगा. यूं आवश्यक जगहों पर तेज़ी से ऑक्सीजन पहुंच पाएगी. 22 अप्रैल की शाम को उड़ीसा के अंगुल से 20 टन मेडिकल ऑक्सीजन का पहला कंसाइनमेंट विशाखापट्टनम के लिए रवाना हुआ. 23 अप्रैल की सुबह भी दो टैंकर अंगुल से विशाखापट्टनम के लिए रवाना हुए. उड़ीसा पुलिस के ट्विटर हेंडल के अनुसार,

ओडिशा पुलिस इस कार्य के लिए एक डेडिकेटेड कॉरिडोर इसलिए बना रहा है क्यूंकि हम ‘तेज़ परिवहन’ सुनिश्चित करने के प्रति प्रतिबद्ध हैं. ताकि हज़ारों जरूरतमंद मरीजों को बिना देरी के सेवा दी जा सके.

लेकिन रुकिए, इस स्टोरी का तीसरा और अंतिम पार्ट अभी बाकी है. ये जो अंगुल से विशाखापट्टनम ऑक्सीजन जा रही है जानते हैं उसे कौन प्रोवाइड करवा रहा है? जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड (JSPL). इसी के बारे में नवीन जिंदल ने ट्वीट के माध्यम से कहा है कि:

हमारे अंगुल संयंत्र में 500 टन से अधिक लिक्विड ऑक्सीजन तैयार पड़ी है. इसके अलावा, जिन सरकारों को ज़रूरत है, उन्हें हम प्रतिदिन 100 टन लिक्विड ऑक्सीजन उपलब्ध करवा सकते हैं. हमने 22 अप्रैल को 20 मीट्रिक टन लिक्विड ऑक्सीजन तेलंगाना भेजी है. 23 अप्रैल को फिर हम तेलंगाना और मध्य प्रदेश के साथ-साथ दिल्ली NCR के मेदांता, अरटेमिस और बत्रा हॉस्पिटल्स के लिए ऑक्सीजन भेजेंगे. हम इंतज़ार कर रहे हैं कि ज़रूरतमंद अपने टैंकर भेजें. हम पहले आओ पहले पाओ के आधार पर या स्टील मंत्रालय द्वारा तय की गई प्राथमिकता के अनुसार इन्हें भर सकते हैं.

अपने कोटे के ऑक्सीजन की शीघ्र आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए महाराष्ट्र और दिल्ली के मुख्यमंत्रियों ने नवीन पटनायक को धन्यवाद दिया है. लेकिन स्पष्ट है कि उड़ीसा, वहां की पुलिस और JSPL को देश भर से मिलने वाली शुभकामनाओं का दौर ज़ारी रहने वाला है.

#4) चौथी ख़बर फिर से गुजरात के सूरत शहर से ही है. यहां कोरोना संक्रमित मरीज़ों की संख्या इस कदर बढ़ गई है कि अस्पतालों में बेड ही नहीं बचे हैं. इसके चलते सामाजिक और राजनैतिक लोगों ने कोविड सेंटर शुरू किए है जहां संक्रमित मरीज़ों का इलाज चल रहा है. ऐसा ही एक सेंटर यहां के अडाजन इलाक़े में पूर्व उप महापौर निरव शाह द्वारा शुरू किया गया है. इस कोविड सेंटर में 120 बेड की व्यवस्था की गई है. इस आइसोलेशन सेंटर में मरीज़ों को मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रखने के लिए योग, ध्यान और गरबा करवाए जाते हैं.

# 5) पांचवी ‘उम्मीद की बात’ दरअसल कोरोना वॉरियर्स की एक और समर्पण की कहानी है. और कहानी हमें मिली है भोपाल, मध्य प्रदेश से. भोपाल का हमीदिया हॉस्पिटल. हॉस्पिटल में ड्यूटी कर रहे डॉ. अनुभव अग्रवाल और डॉ. अनुराधा चौधरी कोरोना पॉज़िटिव पाए जाते हैं. दोनों को छुट्टी लेकर आराम करना चाहिए था. लेकिन ऐसा नहीं करते. बल्कि, अपनी ड्यूटी जारी रखते हैं. सिर्फ मरीजों का ध्यान ही नहीं रख रहे. उनका हौसला अफ़ज़ाई करने में भी जुटे हैं.

Dr. Anubhav
ड्यूटी पर डॉ. अनुभव.

डॉ. अनुभव अग्रवाल 16 अप्रैल को कोरोना पॉज़िटिव पाए गए थे. जिसके बाद से हमीदिया हॉस्पिटल के ए ब्लॉक में एडमिट हैं. कोरोना संक्रमित होने की खबर पाते ही डॉ. अनुभव को घबराहट भी हुई. लेकिन फिर अपने आसपास देखा. कोरोना से लड़ते, जूझते मरीजों को. दिल पसीज गया. खुद भी वहीं एडमिट हो गए. और जुट गए वार्ड के बाकी मरीजों का इलाज करने में. डॉ. अग्रवाल ने खुद ये बात आज तक को बताई. साथ ही बताया अपनी शपथ के बारे में. जो उन्होंने अपना पेशा चुनते समय ली थी. कि “किसी भी मरीज को कभी अकेला नहीं छोड़ेंगे.” अब डॉ. अग्रवाल वार्ड में रहकर मरीजों का चेकअप करते हैं. उनके हेल्थ चार्ट को मॉनिटर करने तक से लेकर बाकी तमाम जरूरी चीज़ों का ध्यान रखते हैं.

Dr. Anuradha
मरीज की पल्स चेक करती डॉ. अनुराधा.

दूसरी ओर, कोरोना पॉज़िटिव होने के बाद डॉ. अनुराधा भी हमीदिया हॉस्पिटल में ही एडमिट हो गईं. अब रोज़ाना अपने वार्ड में भर्ती करीब 20 मरीजों की देखभाल कर रही हैं. पेशे से डॉ. अनुराधा एक सर्जन हैं. लेकिन जरूरत पड़ने पर वो दूसरे डॉक्टर्स से परामर्श लेकर मरीजों को दवाइयां भी उपलब्ध करवा देती हैं.

किसी ऐसी ही ख़बर को सुनकर पंकज चतुर्वेदी ने लिखा होगा-

कुछ चीज़ें अब भी अच्छी हैं. न यात्रा अच्छी है, न ट्रेन के भीतर की परिस्थिति. लेकिन गाड़ी नंबर, गाड़ी के आने और जाने के समय की सूचना देती तुम्हारी आवाज़ अच्छी है. कुछ चीज़ें अब भी अच्छी हैं.

# 6) छठी उम्मीद की बात हरियाणा के जींद से है. यहां के सिविल अस्पताल से 21 अप्रैल की रात करीब 12 बजे कोरोना की वैक्सीन कोवैक्सीन (covaxine) और कोविशील्ड (covishield) की कई सौ डोज़ चोरी हो गईं. लेकिन 22 अप्रैल को चोर सिविल लाइन थाने के बाहर एक चाय वाले को सारी वैक्सीन लौटा गया. पुलिस के अनुसार दिन में करीब 12 बजे एक बाइक सवार युवक सिविल लाइन के पास चाय के खोखे पर पहुंचा. उसने वहां बैठे बुजुर्ग को बैग थमाते हुए कहा कि ताऊ इस बैग में मुंशी का खाना है. इसे थाने में मुंशी को दे आना. बुजुर्ग ने उस बैग को मुंशी को दे दिया. जब बैग को खोला तो उसमें कोरोना वैक्सीन की चोरी हुई शीशियां थीं. कोविशील्ड की 182 वाइल और कोवैक्सीन की 440 वाइल. इन शीशियों के बीच में पर्ची पर लिखा था-

सॉरी, मुझे नहीं पता था कोरोना की दवाई है.

हालांकि चोर भले ही मानवता दिखाते हुए वैक्सीन वापस कर गया हो लेकिन अब शायद ही इनका इस्तेमाल हो सके. जानकारी के मुताबिक लगभग 12 घंटे तक फ्रिज से बाहर रहीं कोरोना की ये वैक्सीन और डोज अब इस्तेमाल के लायक नहीं हैं. फिर भी इस बारे में सिविल सर्जन ने मुख्यालय से गाइडलाइन मांगी हैं.

Jind Corona Vaccine Theft
हरियाणा के जींद में सरकारी अस्पताल से चोरों ने वैक्सीन चुराई लेकिन बाद में उसे वापस लौटा गए. साथ ही हाथ से लिखा एक नोट भी छोड़ गए. (फोटो-पीटीआई-आजतक)

ये भी एक उम्मीद की ख़बर है. अंगुलिमाल में बुद्ध की उम्मीद की ख़बर. महामूर्ख में, कालिदास की उम्मीद की ख़बर. अपराध में ग्लानि और चोरी में सॉरी की उम्मीद की ख़बर.

# 7) अगली ख़बर, कोरोना की ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहीं हमारी साथी स्वाति की तरफ़ से आई है. ख़बर है उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के विवेक खंड इलाक़े से. आशुतोष पांडे और उनकी पत्नी के डेली रूटीन का एक हिस्सा है, टिफन सर्विस. ये दोनों पति पत्नी कोरोना पीड़ित लोगों को टिफ़िन सर्विस पहुंचाते हैं. ऐसे कोरोना पेशेंट्स को जो आइसोलेशन में हैं. कोई अकेला रहता है. कहीं पूरा परिवार बीमरी से पीड़ित है. किसी घर में कोई खाना बनाने वाल या राशन-सब्ज़ी ख़रीदकर लाने वाला नहीं है. उन सब के लिए उम्मीद की चमकती किरण हैं आशुतोष और उनकी ये टिफ़िन सर्विस. एक बड़ी बात ये भी है कि जिन 65-70 कोविड पीड़ितों को आशुतोष और उनकी पत्नी खाना पहुंचाते हैं उसमें से ज़्यादातर लोगों के लिए ये सुविधा वो मुफ़्त में उपलब्ध करवा रहे हैं.

इन सभी उम्मीद भारी कहानियों का सार विमलेश त्रिपाठी की एक कविता में ढूंढने की कोशिश करते हैं:

रात से पूछता हूं, ‘कैसे सहती हो ये एकांत, अपनी छाती पर अकेले?’
रात हंसती है. मेरी देह पर एक शब्द लिखकर: ‘सुबह’


वीडियो: उम्मीद की बात: गुुजरात में चार महीने की ये प्रेग्नेंट नर्स लगातार कोरोना मरीजों की देखभाल कर रही हैं

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