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लॉकडाउन के चलते रेलवे के कर्मचारियों पर क्या गुजरी, कैसे रहे उनके हाल-चाल?

भारतीय रेलवे. देश की लाइफलाइन. इसकी पटरियां पूरे देश में इस तरह फैली हैं, जैसे हमारे शरीर में खून ले जाने वाली नसें होती हैं. कोरोना वायरस के चलते लॉकडाउन लगा. इससे पैसेंजर ट्रेनों के पहिए थम गए. लेकिन रेलवे का काम नहीं. एक कोने से दूसरे कोने तक अनाज, दूध, सब्जियां, दवाएं, पेट्रोल-डीजल और गैस ले जाने का काम जारी है. मालगाड़ियों के पहिए पहले की तरह ही दौड़ते रहे. फिर पार्सल ट्रेनें भी चलीं. इन्होंने कई जरूरतमंदों की मदद की. जैसे मुंबई में एक बच्चे के लिए ऊंटनी के दूध पहुंचाना. या फिर अहमदाबाद के एक गांव में कैंसर की दवाएं मुहैया कराना.

इन सबके पीछे था रेलवे का स्टाफ. जिसमें गैंगमैन, ट्रेकमैन, स्टेशन मास्टर, गार्ड, लोको पायलट, कंट्रोल रूम स्टाफ, रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स आता है. इनमें से कुछ लोगों से The Lallantop ने बात की. उनसे जाना कि लॉकडाउन से उन पर या उनके काम क्या असर पड़ा. वे काम कैसे कर रहे हैं? और उनकी सेफ्टी के इंतजाम कैसे हैं?

सुरक्षा कारणों के चलते इनके नाम नहीं छाप रहे हैं. ऐसे में बदले हुए नामों से इनकी आपबीती बता रहे हैं-

‘बुरा लगता है पर मालगाड़ी में चढ़े मजदूरों को उतारना पड़ता है’

मुकेश कुमार, रेलवे अधिकारी, उत्तर प्रदेश

उन्होंने कहा कि कोरोना के चलते सेफ्टी सबसे बड़ा इश्यू है. लेकिन घर से तो निकलना ही पड़ता है. साथ ही ऊपर के लेवल पर होने पर जिम्मेदारी बढ़ जाती है. अगर डरकर पीछ हट जाएंगे, तो खराब मैसेज जाएगा. कोरोना का मामला आया था, तो कुछ कर्मचारी डर गए थे. उन्होंने कह दिया कि वे नहीं आ सकते. नियम के हिसाब से तो यह ठीक नहीं. पर उनके डर की वजह भी समझ आती है. तो उन्हें छुट्टी दे दी गई. ऐसे समय में डिसिप्लिनरी एक्शन लेना ठीक नहीं लगता. बाद में वे खुद से ही काम पर आने लग गए.

लॉकडाउन के चलते सामान सप्लाई की बड़ी जिम्मेदारी मालगाड़ियां पर आ गई है. (Photo: PTI)
लॉकडाउन के चलते सामान सप्लाई की बड़ी जिम्मेदारी मालगाड़ियां पर आ गई है. (Photo: PTI)

उन्होंने आगे कहा कि लॉकडाउन के बाद से जरूरी सामान की सप्लाई के लिए गुड्स ट्रेन (मालगाड़ी) की जरूरत बढ़ी. ऐसे में स्क्रूटनी भी बढ़ गई. कहीं पर भी सामान की कमी होती, तो दोष रेलवे पर ही मढ़ा जाता. सामान्य हालात में मालगाड़ी की स्पीड कम रहती है. मगर लॉकडाउन में इनकी स्पीड बढ़ाने की चुनौती भी है. क्योंकि सामान जल्द से जल्द पहुंचाना था. ऐसे में कोई भी दिक्कत होती है तो ऑफिस भागना पड़ा. कई बार ऐसा हुआ कि ड्यूटी कर रात 10 बजे घर गए. रात में ही 12-1 बजे फिर से दफ्तर आना पड़ता था.

श्रमिकों के पैदल जाने पर उन्होंने कहा,

कई बार श्रमिक किसी स्टेशन पर रुकी हुई मालगाड़ी में चढ़ जाते हैं. वे भी मजबूर है. लेकिन हम भी उन्हें जाने नहीं दे सकते. मन में बुरा तो लगता है. पर उन्हें उतारकर सिविल अधिकारियों को सौंपना पड़ता है. एक बार तो ऐसा हुआ कि कोयला ले जाने वाली मालगाड़ी में कुछ मजदूर सवार हो गए. गार्ड और ड्राइवर को रास्ते में पता लगा. उन्होंने अगले स्टेशन पर उन्हें उतरवाया. स्टाफ को मजदूरों पर दया तो आई, पर वे ज्यादा कुछ नहीं कर सकते.

वे कहते हैं कि रेलवे कर्मचारी अपनी ड्यूटी की सीमाओं से आगे जाकर भी काम कर रहे हैं. ऐसा ही एक वाकया उन्होंने बताया कि एक बच्चा मालगाड़ी में सवार हो गया. स्टाफ ने उसे देखा. उससे शहर और घर के बारे में पूछा. इसके बाद उसके घर के पास वाले स्टेशन पर उसे उतार दिया और पुलिस को जानकारी दी.

कोरोना मरीजों पर लोगों के बर्ताव पर भी उन्होंने नाराजगी जाहिर की. उन्होंने एक घटना बताई,

लॉकडाउन से एक-दो दिन पहले की बात है. एक व्यक्ति के हाथ पर घर में क्वारंटीन की मुहर लगी थी. लोगों ने उसे देखा तो रेलवे को बताया. रेलवे स्टाफ उसे अलग बैठाकर तय स्टेशन तक ले गया. स्टेशन पर भी रेलवे स्टाफ उसके साथ रहा. लेकिन इस दौरान स्टेशन पर लोगों ने उसे घेर लिया. उसका वीडियो बनाने लगे. फोटो खींचने लगे. लोग ऐसे व्यवहार कर रहे थे, जैसे वह कोई सर्कस का जानवर हो.

रेलवे कोच को उपयोग से पहले सैनेटाइज करते रेल कर्मचारी. (Photo: PTI)
रेलवे कोच को उपयोग से पहले सैनेटाइज करते रेल कर्मचारी. (Photo: PTI)

ड्यूटी का टाइम अभी फिक्स नहीं

देवराज सिंह, टिकट कलेक्टर, गुजरात

अभी मेल-पैसेंजर ट्रेन तो चल नहीं रही. पर श्रमिक स्पेशल ट्रेन का ही काम है. इसमें मजदूरों को मैनेज करते हैं. उन्हें सोशल डिस्टेंसिंग रखते हुए सैनेटाइज करने और ट्रेन में बैठाने का जिम्मा होता है. होता क्या है कि कई मजदूर परिवार के साथ घर जा रहे होते हैं. वे साथ बैठकर जाना चाहते हैं. पर इसकी अनुमति नहीं है. कोशिश रहती है कि ट्रेन के रवाना होने तक तो वे कम से कम दूरी बनाकर ही बैठे. वे कहते हैं कि आम दिनों में एक दिन पहले ही ड्यूटी का पता चल जाता था. लेकिन अभी ऐसा नहीं है. उनका कहना है,

अभी ट्रेन चलने का फिक्स नहीं है. ऐसे में कभी-कभी तो 2-3 घंटे पहले ही काम पर आने को बोला जाता है. मान लीजिए रात 10 बजे मजदूरों को लेकर ट्रेन जानी है. इसके बारे में हमें ही शाम को 4 बजे बता चलता है. फिर ट्रेन की तैयारी की जाती है.

श्रमिक स्पेशल ट्रेन के जरिए अपने घरों को लौटते मजदूर. (Photo: PTI)
श्रमिक स्पेशल ट्रेन के जरिए अपने घरों को लौटते मजदूर. (Photo: PTI)

सेफ्टी का पूरा ध्यान रखने का आदेश है

बलदेव सिंह, स्टेशन मास्टर, राजस्थान

इन्होंने बताया कि उनकी ड्यूटी जिस स्टेशन पर है. वह गुड्स ट्रेन के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है. ऐसे में लॉकडाउन से भी उनके काम पर खास फर्क नहीं पड़ा है, बल्कि अब तो मालगाड़ियों का परिचालन ज्यादा बढ़ गया है. हालांकि रेलवे ने पूरा ध्यान रखा है. पूरे स्टाफ को स्टेशन पर ही सरकारी क्वार्टर दे दिए, जिससे बाहर आने-जाने की समस्या दूर हो गई. वे कहते हैं,

ऊपर से साफ आदेश है कि सेफ्टी में किसी तरह की कमी न रहे. इसके लिए अपने स्तर पर जरूरी सामान खरीदने की छूट भी दे रखी है. सामान खरीदने के लिए फंड भी पहले से जारी हैं.

रेलवे ने 12 मई से स्पेशल पैसेंजर ट्रेनें शुरू की हैं. इसी तरह की एक ट्रेन में सवार गार्ड रवानगी पर हरी झंडी दिखाते हुए. (Photo: PTI)
रेलवे ने 12 मई से स्पेशल पैसेंजर ट्रेनें शुरू की हैं. इसी तरह की एक ट्रेन में सवार गार्ड रवानगी पर हरी झंडी दिखाते हुए. (Photo: PTI)

काम सीखने का टाइम था, पर अभी घर पर ही हैं

सुनील कुमार, लोको पायलट, उत्तर प्रदेश

कुछ महीनों पहले ही उनकी नौकरी लगी है. अभी उनकी ड्यूटी मालगाड़ी में है, बता दें कि रेलवे में ड्राइवर को लोको पायलट कहा जाता है. उन्होंने बताया कि उन्होंने कहा कि अभी काम सीखने का वक्त था. लेकिन लॉकडाउन के चलते मालगाड़ियां भी सीमित ही चल रही है. 10 दिन में एक दिन ड्यूटी लग रही है. ऐसे में ज्यादा समय घर ही गुजर रहा है. सुरक्षा के बारे में उन्होंने कहा,

 स्टेशन पर घुसने से पहले स्क्रीनिंग होती है. हैंड सैनेटाइज कराए जाते हैं. इंजन को भी सैनेटाइज करते हैं. लोको पायलट की ड्यूटी बदलने पर भी पूरा इंजन सैनेटाइज किया जाता है. रेलवे ने कोरोना सेफ्टी किट दी है. इसमें मास्क, टिश्यू पेपर, साबुन, सैनेटाइजर जैसे सामान थे. ड्यूटी के दौरान मास्क लगाकर रखना पड़ता है. यह भी ध्यान रखा जा रहा है कि किसी लोको पायलट और गार्ड को बाहर के स्टेशन पर न रहना पड़े. इसलिए उन्हें उनके हेडक्वार्टर वापस भेजने पर पूरा ध्यान रहता है. 

रेलवे कर्मचारियों ने बताया कि सेफ्टी और सैनेटाइजेशन को लेकर कोई कोताही नहीं बरती जा रही है. (Photo: PTI)
रेलवे कर्मचारियों ने बताया कि सेफ्टी और सैनेटाइजेशन को लेकर कोई कोताही नहीं बरती जा रही है. (Photo: PTI)

कोरोना के चलते लिखित मैसेज बंद हो गए

किशोरी लाल, ट्रेन परिचालन अधिकारी, उत्तर प्रदेश

उन्होंने कहा कि कोरोना के चलते डर रहता है. साथ घर से काम या काम से घर जाते वक्त पुलिस के रोके जाने का जोखिम होता है. हालांकि कभी रोका नहीं है. बाकी स्टाफ का भी यही हाल है. कई बार तो ऐसा होता है कि गांवों या शहरों से बाहर के स्टेशनों का स्टाफ रात में ड्यूटी पूरी होने पर घर नहीं आता. वह सुबह का इंतजार करता है. रात में स्टेशन पर ही ठहर जाता है. लॉकडाउन के चलते पूरा स्टाफ भी काम पर नहीं है. 10 की जगह 4-5 आदमी ही ड्यूटी कर रहे हैं. यह नया अनुभव है. उनके अनुसार,

कोरोना के चलते अब से लिखित मेमो जारी होने बंद हो गए हैं. इससे एक कागज बहुत से लोगों के बीच से जाता था. लेकिन अब ऑनलाइन या कॉल के जरिए ही मैसेज या आदेश आ रहे हैं. एक दूसरे के ऑफिस में आना-जाना भी बंद हो गया है.

श्रमिक स्पेशल ट्रेन में सवार मजदूरों की जानकारी दर्ज करती आरपीएफ की एक महिला कर्मचारी. (Photo: PTI)
श्रमिक स्पेशल ट्रेन में सवार मजदूरों की जानकारी दर्ज करती आरपीएफ की एक महिला कर्मचारी. (Photo: PTI)

मरीजों को बाहर रेफर नहीं कर सकते

परमेश्वर कुमार, रेलवे अस्पताल के सुपरवाइजर, बिहार

उनका कहना है कि कोरोना के चलते गंभीर बीमारियों के मरीजों को अब बाहर रेफर नहीं कर सकते. पहले तो मरीजों को दिल्ली या मुंबई रैफर कर देते थे. लेकिन अभी गाड़ियां चल नहीं रही. साथ ही बड़े अस्पताल कोरोना के चलते मरीजों को ले भी नहीं पा रहे. इसके अलावा दवा लाने में भी दिक्कत है. उनके यहां रेलवे मरीजों का ही इलाज होता है, तो पहले की तुलना में काम थोड़ा कम है. सुरक्षा को लेकर उन्होंने बताया,

अस्पताल में आने से पहले सभी की स्क्रीनिंग होती है. किसी का बुखार 98 से ऊपर होते ही उसे क्वारंटीन में भेज देते हैं. बाकी मास्क, सैनेटाइज का यूज पूरा होता है.

घर जाना छोड़ दिया

वीरमदेव सिंह, आरपीएफ जवान, राजस्थान

उन्होंने कहा कि पैसेंजर ट्रेन चल रही थीं, तब तक तो काम था. लेकिन लॉकडाउन में वे चल नहीं रही. ऐसे में स्टेशन पर ही ड्यूटी रहती है. चौकी भी स्टेशन पर ही है. चार लोगों का स्टाफ है. जिस शहर में ड्यूटी है, वहां कोरोना के मामले मिल चुके हैं तो डर है. कहते हैं,

पहले तो दो दिन का ऑफ मिलाकर घर चला जाया करता था. मालगाड़ी से जाता था. लेकिन जब से शहर में कोरोना का मामला सामने आया है, घरवालों को मना कर दिया. घर में दो छोटे बच्चे हैं. इसलिए उन्हें खतरे में डालने का क्या मतलब?

लॉकडाउन के दौरान पटरियों की मरम्मत में जुटे रेलवे कर्मचारी. (Photo: PTI)
लॉकडाउन के दौरान पटरियों की मरम्मत में जुटे रेलवे कर्मचारी. (Photo: PTI)

मजदूरों को समझाया, ट्रैक पर मत चलो

जिवराज, सुपरवाइजर, गैंगमैन और कीमैन, उत्तर प्रदेश

उन्होंने बताया कि शुरू में तो पुलिसवाले रोक लेते थे. पूछते थे कि कहां जा रहे हो. फिर आईडी कार्ड दिखाते और कहते कि रेलवे से हैं, तो वे जाने देते. बाद में तो वे पहचानने लग गए. उन्होंने आगे कहा कि कई ट्रेनें बंद हैं. इससे उनका काफी काम आसान हो गया. पहले ट्रेनों को रोकना पड़ता था. लेकिन इसकी जरूरत नहीं पड़ती है. लॉकडाउन एक तरह से मेंटेनेंस में मददगार रहा है.

काम के दौरान उन्हें कई बार मजदूर पटरियों के सहारे जाते दिखे. उन्होंने बताया,

कुछ मजदूर पटरियों के साथ जा रहे थे. तो उन्हें टोका गया. हमने कहा कि ट्रैक पर मत चलो. मालगाड़ियां चल रही हैं. हादसा हो सकता है, इसलिए सड़क से जाओ. उन्होंने कहा कि सड़क पर पुलिसवाले पकड़ते हैं, पीटते हैं. अब इस पर हम क्या कहते? वे भी हालात के मारे हैं. फिर भी उनसे कहा गया कि ट्रैक पर चले, तो आरपीएफ वाले पकड़ लेंगे. गैंगमैन से मजदूरों को ट्रैक से दूर रखने को कहा गया है.

भारत में कोरोना वायरस के मामलों का स्टेटस


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