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कोरोना को हराने वाले अवनीश चौधरी ने बताया- डर से नहीं, डटकर निपटें कोरोना से

नामः अवनीश चौधरी
कामः रिपोर्टर
जगहः दिल्ली


चूंकि मैं क्राइम रिपोर्टर हूं, ऐसे में फील्ड में गए बिना मेरा काम नहीं चल सकता. मैं कई बार कंटेनमेंट जोन और उन पुलिस स्टेशन पर भी गया, जहां कई लोगों को कोरोना होने की खबरें आ रही थीं. अपनी तरफ से मास्क-ग्लवस, सेनिटाइजर, सभी से लैस रहता था. लेकिन पता नहीं चला कि कब वायरस ने शरीर में एंट्री कर ली. शरीर में कुछ भारीपन सा लगातार महसूस हो रहा था. ऐसे ही एक रात बेचैनी में नींद नहीं आ रही थी. लगा कि कहीं कोरोना तो नहीं. अगले ही दिन टेस्ट कराने की ठानी.

इसी के साथ दूसरे कमरे में सारा सामान शिफ्ट किया. पत्नी और बच्चों को एहतियातन नीचे के फ्लोर पर शिफ्ट कर दिया, जहां मेरी पत्नी के भाई-भाभी रहते हैं. हेल्पलाइन नंबर पर फोन घुमाया, लेकिन वहां किसी ने फोन नहीं उठाया, तो खुद ही टेस्ट कराने निकल पड़ा. टेस्ट करवाकर घर आया, तो बुखार महसूस हो रहा था. थर्मामीटर से बुखार नापा, तो 100 डिग्री फॉरेनहाइट के करीब था. मन में शंका तो आ ही गई थी कि कुछ गड़बड़ है. मैंने अपनी फिक्र किए बगैर फरमान जारी कर दिया कि मेरे कमरे की तरफ कोई न आए और जो भी दवा या खाना देना हो, वह बाहर रख कर चला जाए.

रिपोर्ट आने के साथ ही बढ़ी घबराहट

मीडिया रिपोर्ट्स पढ़कर मन मजूबत था कि कोरोना के ज्यादातर पेशेंट ठीक हो रहे हैं. ऐसे में जब तीन दिन बाद रिपोर्ट कलेक्ट करने का दिन आया, तो मैं बेझिझक लैब पहुंचा. जैसे ही रिपोर्ट हाथ में आई और पता चला कि मैं पॉजिटिव हूं, तो मन में अजीब-सा डर पैदा होने लगा. घर तक वापस आते-आते मन टूटने लगा. एक खयाल मन में घर बनाने लगा था कि कहीं मुझे कुछ हो न जाए. कोई कुछ भी कहे, डर जाना लाजिमी है.

मैं काफी देर अपने कमरे में बैठकर खुद के न रहने पर परिवार के भविष्य के बारे में सोचता रहा. मन डूब सा रहा था, काफी थकान भी महसूस हो रही थी. मैं लेट गया. शायद झपकी आ गई थी, लेकिन कुछ घंटों बाद सांस लेने में तकलीफ महसूस होने पर नींद खुली. मैं जान गया कि परेशानी बढ़ रही है. मैंने कोरोना पेशंट्स के लिए तय डॉक्टर को फोन किया. डॉक्टर ने फौरन ऑक्सीमीटर से ऑक्सीजन लेवल नापने की सलाह दी. फोन करके ऑक्सीमीटर मंगाया. जब जांचा, तो पता चला कि ऑक्सीजन के लेवल में कोई खास कमी तो नहीं है. ऐसे में मैंने डॉक्टर से सांस फूलने का कारण पूछा. उसने बताया कि मन में पैदा हुए डर से लोग घबरा जाते हैं, ऐसे में सांस फूलती है. डर इस बीमारी का सबसे बड़ा दुश्मन है. अगर इससे जीतना है, तो डरना नहीं है. ज्यादातर लोग डरने की वजह से ही हॉस्पिटल आ रहे हैं. डॉक्टर की बात सुनकर मैंने राहत की सांस ली. हालांकि सामान्य दिनों के मुकाबले सांस लेने में दिक्कत महसूस होती रही.

बच्चों को दूर से ही देख लेता था

मेरा आठ साल का बेटा मुझसे काफी करीब है. उसकी समझ में नही आ रहा था कि आखिर पापा क्यों हमसे नहीं मिल रहे. वो बार-बार मेरे पास आने की जिद करने लगा. मुझे भी बहुत बुरा लग रहा था. मैंने उसकी जिद पर मिलने की बात मानी, लेकिन दूर से. वह मेरे फ्लोर पर आने वाली सीढ़ियों पर नीचे खड़ा हो गया. मैं ऊपर जाली के दरवाजे के पास आकर खड़ा हो गया. उसने नीचे से ही अपने सवाल दागने शुरू किए. जैसे- पापा आपको क्या हुआ है, मुझे अपने पास क्यों नहीं आने दे रहे हो, क्या आप मुझसे गुस्सा हो… और न जाने क्या-क्या. मैंने सबका जवाब दिया और कहा कि ठीक होते ही मिलते हैं.

हालांकि उसके बाद उसने रुटीन के तौर पर मुझसे ऐसे ही मिलने का सिलसिला शुरू कर दिया. भले ही वह मुझसे काफी दूर खड़ा रहता था, लेकिन मन फिर भी डरता था कि कहीं ड्रॉपलेट नीचे उस तक न पहुंच जाएं. ऐसे में उससे बात करते वक्त मास्क लगाए रहता था.

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अपने बेटे के साथ अवनीश.

दाल-चावल खाए, प्रभु के गुण गाए

एक बात मेरी समझ में आ गई थी कि शरीर को हेल्दी रखना है. मैंने कोई खास डाइट तो फॉलो नहीं की, लेकिन मन हो या न हो, नियमित रूप से दाल-चावल, रोटी-सब्जी, दही खाए. बुखार की वजह से डाइट कुछ कम हुई, लेकिन मैंने एक भी वक्त का खाना स्किप नहीं किया. डॉक्टर ने गुनगुने से कुछ गर्म पानी पीने को कहा था, तो वही लेता था. कभी भी ठंडा या रूम टेंपरेचर का पानी नहीं पिया. एहतियात के तौर पर मैंने मिनरल वॉटर की 20 लीटर की बोतल मंगा ली थी, वही पानी पीता रहा. मैं कच्ची हल्दी डालकर दूध भी लगातार पी रहा था. इस दौरान मैं सुबह एक्सरसाइज के तौर पर प्राणायाम करने की कोशिश करता. अनुलोम-विलोम ज्यादा करता था. करते वक्त सांस फूलती थी, लेकिन मैं रुक-रुककर करता रहता था. मैंने महसूस किया कि जिस दिन भी प्राणायाम नहीं कर पाया, उस दिन सांस लेने में मुझे ज्यादा परेशानी महसूस हुई. मुझे लगता है कि कोरोना पेशंट्स अगर प्राणायाम की बेसिक एक्सरसाइज करें, तो इसका बहुत फायदा होगा. मुझे तो बहुत हुआ.

उनींदे दिन, बेचैन रातें

छठे दिन तक आते-आते लगातार बुखार रहने और एक ही कमरे में होने से एक अलग तरह की बेचैनी रहने लगी. रात में नींद भी शायद 2-3 घंटे ही आती थी. मैं दिन में कमरे को खुद ही सेनिटाइज करता और बर्तन साफ करता. नहाना, कपड़े धोना आदि निपटाता, लेकिन फिर भी वक्त बच जाता. बोरियत अपने चरम पर पहुंच रही थी. पढ़ने में ज्यादा मुश्किल आती, ऐसे में ज्यादातर वक्त मोबाइल पर ही रहता. अब याद भी नहीं कि कितनी मूवीज और सीरीज देख डालीं. इस दौरान जिस शुभचिंतक को मेरी बीमारी के बारे में पता चला, उसने भी फोन मिलाना शुरू कर दिया. जितने लोग, उतनी बातें. सबके पास कोरोना के इलाज का एक नया नुस्खा होता. मैंने फोन उठाने भी बंद कर दिए.

मेरी यही सलाह है कि लोगों की बातें न सुनें और अपने डॉक्टर को बिना बताए कोई भी नुस्खा न आजमाएं. इस तरह दिन तो कैसे भी कट जाता, लेकिन रात सबसे मुश्किल लगती. तरह-तरह की बातें दिमाग में आतीं. कई बार सोते-सोते रात में 3 बज जाते. जैसे ही सुबह 6 बजे सूरज खिड़की पर आता, नींद खुल जाती. दसवें दिन तक आते-आते हालत बेकाबू होने लगी.

Avnish
अवनीश चौधरी

दिक्कतें आईं, लेकिन डटकर मुकाबला किया

11 दिन बीतने के साथ एक नई समस्या ने मुझे आ घेरा. मैंने महसूस किया कि मुझे पॉटी के साथ खून आने लगा है. मन में डर समा गया. लगा बीमारी ज्यादा बढ़ गई है और अब अस्पताल जाना ही पड़ेगा. मैंने घबराहट में ही डॉक्टर को फोन मिलाया. डॉक्टर ने मुझसे पूछा कि कितनी बार टॉयलेट जाना पड़ रहा है. मैंने बताया कि टॉयलेट तो दो बार ही जा रहा हूं, लेकिन जब जा रहा हूं, पतले मोशन के साथ खून भी आ रहा है. डॉक्टर ने बताया कि यह भी शरीर को खुद को साफ करने का तरीका भर है. चिंता न करो, गरम पानी पीना बंद कर दें. मैंने ऐसा ही किया. रूम टेंपरेचर का पानी पीता रहा. अगले दिन परेशानी कम हो गई और धीरे-धीरे खत्म हो गई. तेरहवें दिन आते-आते टेंपरेचर में कमी आने लगी. शरीर भी कुछ हल्का महसूस होने लगा. चौदहवें दिन से नींद आना भी शुरू हो गई. मैंने डॉक्टर से कहा कि क्या फिर से टेस्ट कराना चाहिए. डॉक्टर ने कहा कि अभी 2-3 दिन और रुक जाऊं, क्योंकि फिर पॉजिटिव आने पर दोबारा प्रोटोकॉल फॉलो करना पड़ेगा. मैंने 19वें दिन फिर से टेस्ट कराया. इस बार रिपोर्ट निगेटिव आई. कोरोना शरीर से निकल चुका था. मैंने राहत की सांस ली.

कोरोना से जूझते वक्त जो सबक मुझे मिले-

– बीमारी को इग्नोर न करें. जितनी जल्दी इलाज शुरू करेंगे, उतनी जल्दी वायरस कंट्रोल में आएगा.
– हल्के और मध्यम लक्षण के वक्त घर पर इलाज करना ज्यादा फायदेमंद है, क्योंकि अस्पताल का माहौल ही डरावना होता है. वहां पर दूसरे पेशंट्स से वायरल लोड बढ़ने का भी खतरा रहता है. हालांकि जब डॉक्टर कहे, तो फौरन हॉस्पिटल जाएं.
– बिना डरे और पॉजिटिव एटीट्यूड के साथ बीमारी का इलाज करें.
– खाना-पीना अच्छा रखें. डॉक्टर की सलाह को पूरी तरह से मानें. नीम-हकीमी के चक्कर में न पड़ें.
– बीमारी में किसी भी तरह के नए लक्षण दिखें, तो फौरन डॉक्टर से सलाह लें.

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