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90 वर्षीय जिन्होंने दो बार कोरोना को हराया से लेकर कोरोना मुक्त गांव, दिल खुश कर देने वाली 6 कहानियां

कृष्ण कल्पित लिखते हैं-

वबा महामारी पैंडेमिक, सब की सब क्षय होगी

जीवन की जय होगी!

यह माना कि कठिन काल है, समय बहुत है भारी

जीवन कभी नहीं हारा है, मृत्यु हमेशा हारी

फिर आएगी शाम सुहानी, प्यालों में मय होगी

जीवन की जय होगी!

आपको बताएंगे उन व्यक्तियों, संस्थाओं और कार्यों के बारे में जिनके चलते कोरोना की इस भीषण महामारी में भी उम्मीद बनी हुई है.

#1. पहली उम्मीद की बात ‘छात्र संसद’ की. ‘छात्र संसद’, ‘जीरो आवर फाउंडेशन’ की एक पहल है. युवाओं को ‘बदलाव लाने’ के वास्ते एक मंच प्रदान करती है.  वडोदरा बेस्ड ये ऑर्गनाइज़ेशन गुजरात के 11 जिलों में कार्यरत है. इनका सबसे हालिया इनिशिएटिव सामुदायिक रसोई का निर्माण करना है. इस रसोई में 1,000 से अधिक स्वयंसेवक, रोज़ाना 7,000 से अधिक लोगों को भोजन परोसते हैं. इस रसोई का लाभ फ्रंटलाइन वॉरियर्स, COVID-19 मरीज़ों और उनके परिवार वालों, अस्पताल के सहायक कर्मचारियों जैसे चौकीदारों और कस्टोडियनों और श्मशान में काम करने वाले लोगों को मिल रहा है.

Chhatra Sangathan Distributing Food During Corona Pandemic
रोज़ाना 7,000 लोगों को खाना परोसा जाता है.

इसके अलावा इस संस्था ने COVID-19 रोगियों की सहायता के लिए ‘प्लाज्मा डोनेट करो ना!’ नाम का प्लाज्मा डोनेशन अभियान भी शुरू किया हुआ है. ‘छात्र संसद’ अब तक 200 से अधिक रक्तदान शिविरों का भी आयोजन कर चुका है और साथ में इन्होंने एक ‘आर्थिक दान अभियान’ भी चलाया हुआ है जिससे गरीब और निचले तबके के परिवारों को उनके मेडिकल बिल में 50% तक की वित्तीय सहायता उपलब्ध करवा सकें. इन्होंने हेल्पलाइन भी बनाई हुई है, जहां वडोदरा के नागरिकों को महमारी से जुड़ी आवश्यक जानकारी दी जा सके. जैसे वैक्सीन की उपलब्धता, अस्पतालों में बेड की उपलब्धता, दवाओं की उपलब्धता वग़ैरह.  ‘छात्र संसद’ 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों के लिए बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान आयोजित करने के लिए अधिकारियों के साथ काम कर रही है.  इन्होंने स्वयंसेवकों का एक नेटवर्क भी बनाया है जो वडोदरा के बुजुर्ग नागरिकों की दैनिक जरूरतों को पूरा करने में उनकी मदद करते हैं, जैसे किराने का सामान खरीदना या उनके लिए दवाइयां डिलिवर करना.

# 2 दूसरी उम्मीद की बात मध्य-प्रदेश के धार ज़िले से. यहां के इंजीनियर अजीज खान ने कबाड़ और अपने इंजीनियरिंग के अनुभवों से दो एंबुलेंस बना डालीं. इन एंबुलेंस को किसी भी बाइक से जोड़कर मरीजों को अस्पताल तक ले जाया जा सकता है. एंबुलेंस को बनाने का खर्च आया है सिर्फ़ 20 से 25 हज़ार रुपए. एंबुलेंस में एक पलंग और एक ऑक्सीजन सिलेंडर भी लगाया गया है. और इसमें जीवन रक्षक दवाएं भी रखी जा सकती हैं.

Bike Ambulance
आपदा में आविष्कार का अप्रतिम उदाहरण.

# 3 तीसरी उम्मीद की बात, इच्छाशक्ति की. जिजीविषा की. महाराष्ट्र के बीड जिले की केज तहसली में रहनेवाले 90 वर्षीय पांडुरंग आगलावे ने दो बार कोरोना को हरा डाला है. बुजुर्ग पहली बार 13 नवंबर, 2020 को कोरोना से  संक्रमित हुए थे और दूसरी बार 30 मार्च, 2021 को.  लेकिन दूसरी बार भी उन्हें  हॉस्पिटल से छुट्टी दे दी गई है, और वो अभी स्वस्थ हैं. पांडुरंग आगलावे कहते हैं कि मेरे इम्यून सिस्टम के अच्छा होने का कारण ये है कि मेरी दैनिक दिनचर्या में सुबह जल्दी उठना, व्यायाम करना और पेपर पढ़ना शामिल है. आज के ज़्यादातर युवा नशा करते हैं, जिसके चलते उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो रही है.

Pandurang Aghlave
90 वर्षीय पांडुरंग दो बार कोरोना से जंग जीत चुके हैं.

महाराष्ट्र के पांडुरंग आगलावे सरीखी दास्तां नॉएडा की एक बुजुर्ग महिला कैलाशपति की भी है. नवभारत टाइम्स के अनुसार 90 साल की कैलाशपति ने कोरोना वायरस को आठ दिनों में ही मात दे दी. पता चला है कि उन्हें कोरोना का कोई साइड इफेक्ट भी नहीं हुआ. इन दो जीवट बुजुर्गों की दास्तान सुनकर थोड़ा सा ही सही, पर कोविड महामारी का डर कम हो जाता है. है न?

# 4. चौथी उम्मीद की बात हमें भेजी है MP के आगर मालवा से टीवी टुडे नेटवर्क के संवाददाता प्रमोद कारपेंटर ने. बात है इस क्षेत्र के आधा दर्जन से अधिक गांवों की. ये ऐसे गांव है जहां आजतक कोई भी व्यक्ति कोरोना पॉज़िटिव  नहीं पाया गया है. ऐसा कैसे? कई नियमों और व्यवस्थाओं के चलते. जैसे,   इन गांवों के घरों के सामने पानी की बाल्टियां और साबुन रखे हुए हैं, ताकि परिवार का कोई भी व्यक्ति अपने खेत-खलिहानों या गांव शहर से घर के भीतर प्रवेश करता है तो पहले अपने हाथ और पैरों को धोए.

Madhya Pradesh Village During Covid 19
गांव में हर घर के सामने पानी की बाल्टी और साबुन रखा रहता है.

कुछ गांवों में तो हर घर के बाहर सेनेटाइजर की बोतल भी रखी मिल जाती है. इन गांव के युवाओं ने अपनी एक टोली बनाई हुई है. जिसका काम है, हर बाहरी व्यक्ति को गांव के प्रवेश करवाने से पहले उसकी अच्छे से पूछताछ करना. उसे अच्छे से सेनेटाइज़ करना.

# 5. भारत की सेना, फिर चाहे वो नेवी हो, एयरफ़ोर्स या थल सेना, कोविड महमारी के दौरान हर जगह आपको हेल्प करती दिख जाएगी. बात इंडियन नेवी की. जिन्होंने अपने स्पेशल हॉस्पिटल्स सिविलियंस के लिए खोल डाले हैं. पश्चिमी नौसेना कमान (WNC) के तीन नौसेना अस्पतालों, INSH गोवा, INSH पतंजलि, करवर और INSH संधानी, मुंबई ने नागरिक प्रशासन के उपयोग के वास्ते कुछ ऑक्सीजन बेड भी तैयार रखे हैं.

मुंबई में, बुनियादी सुविधाओं को प्रदान करने के लिए नौसेना परिसर के अंदर नागरिकों के लिए कुछ सुविधाओं की व्यवस्था की गई है ताकि प्रवासी मजदूरों को अपने गृह नगरों की ओर न लौटना पड़े. लगभग 1,500 प्रवासी मजदूरों के वास्ते आवश्यक वस्तुओं, राशन और बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं की आपूर्ति के लिए INHS पतंजलि, करवर के नौसेना अधिकारियों ने भी कुछ ऐसी ही व्यवस्था की है. INHS पतंजलि, पिछले साल कोविड-19 से पीड़ित सिविलियंस का इलाज करने वाला पहला आर्मी हॉस्पिटल बना था.

Indian Navy Opens Covid 19 Hospitals For Migrants
प्रवासी मजदूरों के लिए इंडियन नेवी ने हॉस्पिटल खोल दिया.

इसके अलावा गोवा की नौसेना टीम ने कोविड की फ़र्स्ट वेव के दौरान सामुदायिक रसोई का निर्माण कर लोगों की सहायता की थी. अबकी भी वो आवश्यकता पड़ने पर ऐसी ही मदद करने को तैयार हैं. INHS जीवन्ती, गोवा में सिविलियंस के लिए कुछ COVID ऑक्सीजन बिस्तरों को चिह्नित किया गया है. गुजरात में भी नेवी कई तरह से नागरिकों की सहायता कर रही है.

#6. ये स्टोरी उम्मीद की बात तो है लेकिन थोड़ी भावुक भी करती है. एक महिला हैं, मधुलिका सक्सेना. कोविड के चलते पिछले एक हफ्ते के दौरान मधुलिका के पति और इकलौते बेटे की मौत हो गई. मधुलिका खुद भी कोरोना से संक्रमित हैं. और इनकी जान को भी खतरा है. ऐसे में जिस अस्पताल में वो भर्ती थीं उसने भी उनको एक कमरे में ऐसे ही छोड़ दिया. लेकिन फिर मधुलिका की तरफ़ मदद का हाथ बढ़ाया उनकी मित्र, ज्योत्सना सिंह और मित्र के पति आर बी सिंह ने.

Jyotsana And Rb Singh In Lucknow
इंसानियत में भरोसा जगाती है ज्योत्सना और आर बी सिंह द्वारा दी गई ये मिसाल.

ये दंपत्ति लखनऊ विश्वविद्यालय में फिजिक्स के प्रोफेसर हैं और लखनऊ के त्रिवेणी नगर इलाके में रहते हैं. ये दोनों मधुलिका को अपने घर ले आए. ताकि मधुलिका को शारीरिक और मानसिक रूप से रिकवर करने में मदद मिल सके. इन्होंने न केवल मधुलिका को अपने घर में रखा है बल्कि उनका पूरी तरह से ध्यान भी रख रहे हैं.

संतोष कुमार चतुर्वेदी लिखते हैं,

ज्योतिषियों की भविष्यवाणियों को धत्ता बताते हुए

हम चलते रहेंगे नदियों की धाराओं के साथ-साथ युगों-युगों तक

विनाश के हैकरों को अँगूठा दिखाते हुए

धरती जैसे ख़ूबसूरत से अपने घर को

किसी भी अनहोनी से बचाते हुए

मूसलाधार बारिश की टपकन मुसीबतों से बचने के लिए

आसमान की खपरैल को छाते हुए

नरिया को बिल्कुल उसकी जगह पर जमाते हुए

हम चलते रहेंगे जीवन के इस छोर से उस छोर तलक

क्योंकि उम्मीद हमारा पासवर्ड है

जी! इस विनाश के हैकरों को छकाने के वास्ते, उम्मीद ही हमारा पासवर्ड है. जिसे हमें 3 महीने में चेंज करने की भी ज़रूरत नहीं. इसे बनाए रखिए.


वीडियो: बोकारो से नोएडा ऑक्सीजन पहुंचाकर इस शख्स ने अपने दोस्त की जान बचाई

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