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कोरोना के तनाव को हल्का कर देंगी उम्मीद भरी ये आठ कहानियां

कहते हैं कि अगर किसी के जनाज़े में 40 लोग हों तो उसे जन्नत नसीब होती है. फिर मुहम्मद रफ़ी के जनाज़े में तो इतने लोग थे कि, एक जाने माने संगीतकार के अनुसार महात्मा गांधी के बाद शायद सबसे ज़्यादा भीड़ उनकी ही अंतिम यात्रा में थी. लोग क़ब्रिस्तान की दीवारों को कूद-कूद कर पहुंच रहे थे उनकी कब्र तक. एक मुट्ठी मिट्टी डालने के वास्ते. दीवार के ऊपर लगी नुकीली कांच से रगड़ खाए इन लोगों के जिस्म लहूलुहान थे. क्या ये सिर्फ़ इसलिए था क्यूंकि मुहम्मद रफ़ी एक उम्दा गायक थे? एक सेलिब्रेटी थे? जी नहीं.

कहा जाता है कि उनकी मौत के बाद उनके घर में ढेरों चिट्ठियां आने लगीं थीं. कई में उनके लिए शुक्रिया था कि “रफ़ी साब आपने तब-तब, ऐसे-ऐसे हमारी मदद की थी, ईश्वर आपकी आत्मा को शांति दे.” मग़र कुछ चिट्ठियां, शिकायती भी थीं, कि, “आपने महीने का खर्चा देना बंद क्यूं कर दिया?” शायद इन शिकायती चिट्ठियों के लिखने वालों को तब तक इल्म न था कि उनका मसीहा अब इस फ़ानी जहान को अलविदा कह चुका. बहरहाल, ये चिट्ठियां न आतीं तो लोगों को रफ़ी के ‘गुप्त दानों’ के बारे में कभी पता नहीं चलता.

Mohammed Rafi
गायक रफी को नहीं, बल्कि इंसान रफी को जानिए.

कैलाश खेर से लेकर उदित नारायण तक कहते हैं कि रफ़ी सा गायक दोबारा होना असंभव है. लेकिन हम आज दूसरा सवाल पूछ रहे हैं, क्या उनसा इंसान होना संभव है? शायद ये संभव है. और आज ‘उम्मीद की ये आठ बातें’ हमें रफ़ी सा इंसान बनने को प्रेरित कर सकें. बातें विभिन्न संगठनों, लोगों, घटनाओं, मुहिमों की. आइए शुरू करें

#1. पहली उम्मीद की बात आंध्रप्रदेश के विजयवाड़ा से. जहां, पुलिस की सूझबूझ और कोऑर्डिनेशन के चलते 400 से ज़्यादा जिंदगियां बच गईं. विजयवाड़ा के गवर्नमेंट जर्नल हॉस्पिटल (GGH) में ऑक्सीजन ख़त्म होने वाली थी. हॉस्पिटल में 400 के क़रीब ऐसे कोविड मरीज़़ थे जिनके लिए ये बात ज़िंदगी मौत का सवाल बन गई. लेकिन राहत की बात ये थी कि उड़िसा के अंगुल से GGH के लिए ऑक्सीजन टैंकर रवाना हो चुका था.

टैंकर में GPS ट्रेकिंग सिस्टम लगा हुआ था जिससे अधिकारियों को पता लग रहा था कि टैंकर अभी कहां है. लेकिन आधी रात के क़रीब ट्रक की लोकेशन मिलना बंद हो गई. हड़बड़ाए अधिकारियों ने ये जानकरी विजयवाड़ा सिटी कमिश्नर को दी, जिन्होंने ये सूचना फ़ील्ड में मौजूद सभी अधिकारियों और रास्ते में पड़ने वाले ज़िलों के SP को फ़ॉरवर्ड कर दी. काफ़ी खोजबीन के बात पता चला कि ड्राइवर दिनभर ट्रक चलाने के चलते थक गया था और अभी पूर्वी गोदावरी ज़िले के एक ढाबे में सोया हुआ था.

Oxygen Supply
पुलिस की सतर्कता से समय रहते ऑक्सीजन हॉस्पिटल तक पहुंच गया. फोटो – आज तक

उसने पुलिस वालों को अपनी मजबूरी बताई. इसके बाद पुलिस ने इस टैंकर के लिए एक ग्रीन कॉरिडोर का निर्माण किया और टैंकर को GGH तक एस्कॉर्ट करवाया. इसके अलावा ड्राइवर को कंपनी देने के लिए एक होम गार्ड भी उसके साथ में बैठाया गया. अंततः 07 मई की सुबह टैंकर सुरक्षित GGH पहुंच गया और ऑक्सीजन रीफ़िल करके मरीज़ों की जान बचा ली गई.


#2. दूसरी उम्मीद की बात नोएडा से. यहां होम आइसोलेशन में रह रहे कोविड पेशेंट्स के लिए दवाइयों की होम डिलीवरी की सुविधा शुरू की गई है. गौतमबुद्ध नगर जिला प्रशासन द्वारा शुरू किए गए ‘मिशन संजीवनी’ के अंतर्गत जोमैटो के डिलीवरी बॉयज इस ज़िले में घरों में आइसोलेटेड कोरोना संक्रिमत मरीज़ों को दवाइयों की होम डिलीवरी करेंगे. ज़िले के स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी भी ‘मिशन संजीवनी’ को सफल बनाने में जोमैटो के डिलीवरी बॉयज का पूरा सहयोग देंगे.

Zomato
जोमैटो डिलीवरी बॉयज़ के जरिए कोरोना मरीजों तक खाना पहुंचाया जा रहा है. फोटो – इंडिया टुडे

इसके अलावा ज़िला प्रशासन ‘मिशन शक्ति’ लॉन्च करने की भी तैयारी कर रहा है. जिसके तहत होम आइसोलेशन में रह रहे मरीज़ों को ऑक्सीजन की होम डिलीवरी की जाएगी. इसके लिए जिला प्रशासन एयर फोर्स की मदद से ऑक्सिजन टैंकर मंगवा रहा है.


#3. तीसरी ख़बर बिहार के मुंगेर ज़िले से. यहां का सशक्त फाउंडेशन 50 ऑक्सीजन सिलेंडर्स और दो एम्बुलेंस के साथ कोरोना संक्रमित मरीज़ों की मदद के लिए सामने आया है. सशक्त फाउंडेशन ये ऑक्सीजन सेवा नि:शुल्क उपलब्ध करवा रहा है. और इनकी ये सेवा मुंगेर के साथ-साथ जमालपुर डिस्ट्रिक के लिए भी उपलब्ध है. जरूरत पड़ने पर फाउंडेशन द्वारा मरीज़ के घरों तक ऑक्सीजन सिलेंडर भेजने की व्यवस्था भी की गयी है. मरीज़ व उनके परिजनों को सिर्फ़ ऑटो का किराया देना पड़ रहा है.

Setu Sashakt Foundation
सशक्त फाउंडेशन के अध्यक्ष, सेतु. फोटो – आज तक

सशक्त फाउंडेशन ने कोरोना के प्रथम फेज में भी कई हजार लोगों को फ़ूड बास्केट के अलावा अन्य सामान निःशुल्क मुहैया करवाया था. फाउंडेशन पिछले दो वर्षों से लगातार नि:शुल्क एंबुलेंस सेवा भी प्रदान कर रही है.


#4. चौथी उम्मीद की बात रांची के युवक रोमित नारायण सिंह की. रोमित ने कोरोना संक्रमण की गंभीर स्थिति को देखते हुए होम आइसोलेशन में रहने वाले परिवारों को दवा और विटामिन की गोली मुफ्त में देने का निर्णय लिया है. रोमित हर दिन दवा के ऐसे सैकड़ों पैकेट लोगों तक पहुंचा रहे हैं. इस काम में उन्हें अपने घरवालों का भी पूरा साथ मिल रहा है.

Romit
दवा के सैंकड़ों पैकेट पहुंचा रहे हैं रोमित. फोटो – आज तक

रोमित के भाई बताते हैं कि मुसीबत के वक्त में कई लोग अपने स्तर से दूसरों को मदद पहुंचाने का काम कर रहे हैं. और इन सब से प्रेरणा लेते हुए हम भी दवाओं का वितरण कर रहे हैं. रोमित द्वारा शुरू की गई इस पहल से कई लोग लाभान्वित हो रहे हैं और रोगियों की सेहत में भी सुधार हो रहा है.


#5. पांचवी ख़बर मिली है मध्यप्रदेश के छोटे से ज़िले बालाघाट से. टीवी टुडे नेटवर्क के संवाददाता अतुल वैद्य के अनुसार इस वक़्त ज़िले में न तो ऑक्सीजन सपोर्ट की कमी है और न ही बेड की. और इसका श्रेय जाता है यहां के युवा डीएम दीपक आर्य को. जिनकी दूरदर्शिता के चलते काफ़ी पहले से यहां ऑक्सीजन सपोर्ट वाले बेड बढ़ाने की तैयारी शुरू कर दी गई थी. मार्च 2021 तक 40 बेड की क्षमता वाले इस ज़िले में अब 500 से अधिक ऑक्सीजन सपोर्ट के बेड हैं. यहां के स्पोर्ट्स कॉन्प्लेक्सेज़ से लेकर छात्रावासों तक को अस्पताल में तब्दील कर दिया गया है. इसके अलावा 200 बिस्तर का एक नया अस्पताल भी बनकर तैयार है. स्टाफ़ की कमी न हो इसके चलते मौजूदा स्टाफ के साथ आयुष्य चिकित्सकों को भी जोड़ा गया है. साथ ही सरकारी अस्पतालों में निजी चिकित्सकों की सेवाएं भी ली जा रही हैं.

Deepak Arya Balaghat Dm
बालाघाट के डीएम दीपक आर्या जिनकी दूरदर्शिता की वजह से पहले ही ऑक्सीजन की व्यवस्था कर ली गई. फोटो – आज तक

हालांकि स्वास्थ सुविधाओं और अमले की कमी, दोनों ही इस वक़्त हमरी बड़ी चुनौतियां हैं लेकिन इसके बाद भी इंफ्रास्ट्रक्चर बन जाने से कोरोना से जंग में बालाघाट पूरी तरह तैयार दिखता है.


#6. छठी उम्मीद की बात राजस्थान के कोटा शहर से. ट्रांसपोर्ट-टैक्सी का काम करने वाले यहां के कुछ युवकों का लॉकडाउन के चलते काम बंद हुआ तो इन्होंने अपनी कार में ही ऑक्सीजन और बेड लगाकर उसे मिनी अस्पताल बना डाला. चंद्रेश गेहीजा का कोटा में गाड़ियों का छोटा सा सर्विस सेंटर है. इन्होंने अपने दोस्तों के साथ मिलकर पहले तीन कारों को मरीज़ों की सेवा के लिए तैयार किया. लेकिन फिर इस काम के लिए कई और लोग भी आगे आए और अब इनके पास ऐसी 6 कारें हो चुकी हैं. हालांकि गाड़ियां तो और लोग भी देने को तैयार हैं लेकिन दिक्कत ऑक्सीजन की है.

Kota Mini Hospital
गाड़ियों को मिनी हॉस्पिटल बना डाला. फोटो – आज तक

जिनको अस्पताल में जगह नहीं मिल पाती या जिनके लिए ऑक्सीजन की व्यवस्था नहीं हो पाती ऐसे गंभीर मरीज़ जब इन युवाओं से संपर्क करते हैं तो ये लोग उन्हें अपनी गाड़ी में तुरंत ऑक्सीजन सपोर्ट देते हैं और उनको अस्पताल ले जाते हैं. एक हॉस्पिटल में जगह न मिले तो दूसरे में, और अगर कहीं भी बेड ख़ाली न मिले तो ये लोग अपनी गाड़ी में ही मरीज़ को तब तक ऑक्सीजन देते हैं, जब तक कि बेड की व्यवस्था न हो जाए. कोटा के ये युवक अब तक 25 से 30 मरीज़ों को अपनी निःशुल्क सेवाएं दे चुके हैं.


#7. सातवीं उम्मीद की बात झारखंड के डालटनगंज से. यहां रहते हैं सिविल सर्जन डॉ. अनिल कुमार श्रीवास्तव. मेदिनीराय मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में काम करते हैं. इन्होंने जरूरतमंद कोविड पॉजिटिव रोगियों को ऑक्सीजन उपलब्ध करवाने के लिए एक होममेड आविष्कार कर डाला है.

Oxygen Sthethoscope
आपदा में आविष्कार का सटीक उदाहरण. फोटो – आज तक

आइए समझते हैं कैसे. एक स्टेथोस्कोप में तीन कोने होते हैं. एक, जिसे मरीज़ के सीने में लगाया जाता है और बाकी दो, जो डॉक्टर अपने कान में लगाता है. डॉ. अनिल ने हॉस्पिटल में ख़राब पड़े स्टेथोस्कोप्स में से इन तीनों कोनों के अंतिम सिरों को हटा दिया. बची केवल एक वी(V) शेप की पाइप लाइन. यूं ख़राब पड़े स्टेथोस्कोप्स न केवल ख़राब या खो चुकी सिलेंडर पाइप्स का विकल्प बन रहे हैं बल्कि इनके माध्यम से एक ऑक्सीजन सिलेंडर अब एक साथ दो लोगों को प्राणवायु देने के काम में आ रहा है. पेशेंट्स का कहना है कि उन्हें इस जुगाड़ के चलते किसी भी तरह की परेशानी नहीं हुई.


#8. आज की अंतिम उम्मीद की बात फरीदकोट, पंजाब में टीवी टुडे नेटवर्क के रिपोर्टर प्रेम पासी के जानिब से. यहां की एक संस्था भारत विकास परिषद सोसाइटी ने डेंटल डॉक्टर्स के साथ मिलकर ‘नर सेवा नारायण सेवा‘ मुहिम शुरू की है. इस मुहिम का उद्देश्य होम क्वेरंटाईन हुए मरीज़ों को दो वक्त का पौष्टिक आहार पहुंचाना है. इस टीम को ज़िला प्रशासन व्हाट्सऐप के माध्यम से मरीज़ों की जानकारी दे देता है, जिसके बाद ये उन मरीज़ों से संपर्क करके उनके घर में भोजन भिजवा देते हैं.

संस्था, डॉक्टर्स की देख-रेख में कोरोना गाइडलाइंस का पालन करते हुए भोजन का निर्माण करती है. इस मुहिम के तहत पहले दिन 50 मरीज़ों को खाना भेजा गया. लेकिन मुहिम से जुड़े एक डेंटल कॉलेज के प्रिंसिपल ने कहा कि अगर रोज़ हज़ार मरीज़ों को खाना देना पड़ेगा तो हम वो भी देंगे. हालांकि लल्लनटॉप प्रार्थना करता है कि मरीज़ों की संख्या 50 से हज़ार नहीं शून्य की ओर को अग्रसर हो. और तेज़ी से हो.

इन आठ कहानियों का अंत भी मुहम्मद रफ़ी के ही एक किस्से से. रफ़ी सा’ब पहली बार शो के वास्ते विदेश जा रहे थे. बेशक हिंदुस्तानियों के बीच विदेशी सामान का आज भी क्रेज़ है, लेकिन उन दिनों कुछ ज़्यादा ही था. तो दोस्तों रिश्तेदारों ने लंबी फ़ेहरिस्त पकड़ा दी उनको. हमारे लिए अलाना लाना, हमारे लिए ढिमका लाना. लेकिन मुहम्मद रफ़ी वापस आए, तो ख़ाली हाथ. मुंह फुलाए हुए दोस्तों-रिश्तेदारों से बोले, “आपके सामानों और गिफ़्ट्स के बैग मिसप्लेस हो गए.”

दरअसल रफ़ी सा’ब झूठ बोल रहे थे. उन्होंने किसी के लिए कोई गिफ़्ट ख़रीदा ही न था. उनका ये झूठ एक हफ़्ते के भीतर पकड़ में आ गया. विदेश से आई एक चिट्ठी से. चिट्ठी, जो उनके हाथ पड़ती तो उसे छुपा ले जाते, लेकिन वो उनके साले ने रिसीव की थी, जो उनके सेक्रेटरी भी थे. चिट्ठी का मजमून यूं था कि “हॉस्पिटल्स के लिए जो आपने इक्विपमेंट ख़रीदें है, उनकी इस-इस डेट को डिलीवरी की जाएगी, कृपया रिसिविंग सुनिश्चित कर लें.”

यूं लोगों को रफ़ी के साले सा’ब के माध्यम से पता लगा कि मुहम्मद रफ़ी, विदेशों में किए गए शोज़ से हुई कमाई को ही नहीं, बल्कि अपने खर्चे के लिए विदेश ले गए पैसों को भी देश के मुस्तकबिल पर इंवेस्ट कर चुके थे.


वीडियो: उम्मीद की बात: इन 3 इंजीनियरों ने जो किया उसे जानकर सलाम करने का मन करेगा

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