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60 झुग्गी-झोपड़ी वालों की कोरोना से जान बचाने वाले NGO समेत उम्मीद भरी 7 कहानियां

ना हौसले ना इरादे बदल रहे हैं लोग,

थके-थके हैं मगर फिर भी चल रहे हैं लोग.

अल्ताफ़ रज़ा के 90s के एक गीत में किसी अनाम का लिखा ये शेर आज के दौर में पूरी तरह मौजूं है.

आस पास देखिए, आप समझ जाएंगे कि जैसे ‘दूर होना’ माने ‘जुदा होना’ नहीं होता, वैसे ही ‘थकना’ माने ‘हारना’ नहीं होता. कई दशकों में एक बार आने वाले इस तरह के मुश्किल समय में कितनी ही तो संस्थाएं और मुहिमें चल रही हैं देश भर में, जिनके हौसलों से हम सब मुतमईन हैं. कितने ही तो लोग और परिवार हैं, जिनके इरादों से हम सबको उम्मीदें मिल रही है. जो कोरोना के ख़िलाफ़ इस जंग को हारने को क़तई तैयार नहीं. आइए इनकी ही कुछ और स्टोरीज़ जानी जाए.

#1. उम्मीद की पहली स्टोरी हमें सोशल मीडिया के माध्यम से मिली. स्टोरी इंट्रेस्टिंग है इसलिए थोड़ी विस्तार से और उससे जुड़े सारे एसपेक्ट्स के साथ बताते हैं. ऋतुपर्णा चटर्जी, ‘द इंडिपेंडेंट’ में डेप्यूटी एशिया एडिटर हैं. दिल्ली में रहती हैं. कोरोना संक्रमण के चलते कुछ रोज़ पहले इनकी मां की तबियत बहुत ख़राब हो गई थी. हॉस्पिटल में बैड का इंतज़ाम तो कुछ दोस्तों ने कर दिया लेकिन एंबुलेंस की व्यवस्था न हो पाई. और जिस हॉस्पिटल में बैड का इंतज़ाम हुआ वो था भी 40 किलोमीटर दूर. कई एंबुलेंस-हेल्पलाइन्स पर कॉल करके भी जब कोई फ़ायदा न हुआ तो ऊबर बुक करने की सोची. कम से कम 4 ऊबर ड्राइवर्स ने या तो राइड कैंसिल कर दी या फिर जाने से इनकार कर दिया. अगली राइड बुक करते ही ऋतुपर्णा ने ड्राइवर को कॉल लगाया और बोलीं-

भैया राइड कैंसल करनी है तो तुरंत कर दो, क्यूंकि ये इमरजेंसी वाली स्थिति है. ऑक्सीजन सिलेंडर होने के बावज़ूद मेरी मां का ऑक्सीजन लेवल इस वक़्त 80 के क़रीब है और लगातार नीचे गिर रहा है. साथ ही ऑक्सीजन कभी भी ख़त्म हो सकती है. और यूं 15-20 मिनट की देरी भी उनकी ज़िंदगी के लिए भारी हो सकती है. ये भी बता दूं कि मैं और मेरी मां दोनों कोविड पॉज़िटिव हैं.

पूरी बात सुनकर ड्राइवर ने 3-4 मिनट के भीतर लोकेशन पर पहुंचने की बात कही. ड्राइवर का नाम उदित अग्रवाल. लोकेशन पर पहुंचने के बाद उदित ने ऋतुपर्णा की मां के भारी ऑक्सीजन सिलेंडर को गाड़ी में डालने में हेल्प की. गति सीमा के भीतर रहते हुए जितनी ज़ल्दी संभव हो सका ऋतुपर्णा को हॉस्पिटल पहुंचाया. उदित, ऋतुपर्णा की मां की ख़ातिर हॉस्पिटल गार्ड से भिड़ भी पड़े. उन्हें कुर्सी तक पहुंचाने और उसमें बिठाने में ऋतुपर्णा की मदद की.

उधर ऋतुपर्णा एडमिशन की फ़ॉर्मेलिटी पूरी कर रही थीं, इधर उदित उनकी मां के साथ बैठे हुए वेट कर रहे थे, उनको पानी पिला रहे थे. जब मां हॉस्पिटल में एडमिट हो गईं तो उदित ऋतुपर्णा घर भी छोड़कर आए. अगले दिन फिर ऋतुपर्णा को हॉस्पिटल लेकर गए वहां मां को डिस्चार्ज करवाते हुए वेट किया. फिर उनकी मां को ऋतुपर्णा के घर के नज़दीक स्थित एक हॉस्पिटल लेकर गए. और अंत में ऋतुपर्णा को वापस घर छोड़ा. इसके बाद सबसे प्यारी बात हुई. उदित क़रीब-क़रीब झगड़ने की हद तक ऋतुपर्णा से आरग्यूमेंट करने लगे. इस बात पर कि जो पैसे ऋतुपर्णा उन्हें दे रही हैं, वो उनके काम के हिसाब से बहुत ज़्यादा हैं.

बाद में ऋतुपर्णा की मां ने भी अपनी बेटी से मौज लेते हुए FB पर कमेंट किया,

हालांकि मैं तुमपर गर्व तो नहीं करना चाहती, पर तुम ऐसा करने पर मुझे मजबूर कर ही देती हो. बीमारी से बुरी तरह पस्त होने के बावज़ूद मुझे अब भी वो ‘ऊबर ड्राइवर’ याद है.

Rituparna Chatterjee Facebook
ऋतुपर्णा चैटर्जी का फेसबुक पोस्ट.

अंत में एक बात और. कुछ लोग इस पूरे घटनाक्रम में ‘ऊबर कैब्स’ की भी तारीफ़ कर रहे हैं. ऊबर ख़ुद भी इस स्टोरी को सैलीब्रेट कर रही है. लेकिन सोचिए, यदि ऊबर कंपनी के प्रथम चार ड्राइवर राईड कैंसल न करते तो इस स्टोरी का कोई अस्तित्व न होता. तो ऊबर को इस स्टोरी पर सैलीब्रेट नहीं करना चाहिए, उसे तो इस स्टोरी से सीख लेनी चाहिए, और अपने सिस्टम को दुरुस्त करना चाहिए. ताकि आइंदा मदद करने वाला पांचवां नहीं पहला ड्राइवर हो. वैसे ऊबर की ये ख़ुशी देखकर हरिशंकर परसाई की बात याद आ रही है: जब शर्म की बात गर्व की बात बन जाए, तब समझो कि जनतंत्र बढ़िया चल रहा है.


#2. दूसरी उम्मीद की बात इटावा, यूपी से. यहां के जिला अस्पताल में बने कोविड आइसोलेशन वार्ड के बाहर जनपद के कई समाजसेवी व्यापारियों द्वारा एक निःशुल्क खाद्य राहत सामग्री शिविर लगाया गया है. इस राहत सामग्री शिविर में चाय नाश्ते के साथ-साथ दोनों समय का भोजन भी निःशुल्क दिया जा रहा है. ये सुविधा कोविड आइसोलेशन वॉर्ड में भर्ती मरीजों एवं उनके तीमारदारों के लिए शुरू की गई है.

Rahat Samagri Shivir Up Itawa
समाजसेवी व्यापारियों ने निःशुल्क खाद्य राहत सामग्री शिविर शुरू किया. फोटो – आज तक

#3. तीसरी उम्मीद की बात फतेहपुर शेखावाटी से. स्टोरी बताने से पहले क्लियर कर दें कि ये फतेहपुर UP में नहीं राजस्थान में स्थित है. यहां की एसडीएम प्रतिभा सिंह ने एक इनिशिएटिव लिया है, जिसके तहत प्रशासन द्वारा फतेहपुर में ऑनलाइन टेलेंट हंट प्रतियोगिता 2021 का आयोजन किया जा रहा है. इस प्रतियोगिता में 6 से 18 वर्ष तक के बच्चे में भाग ले सकते हैं. प्रतियोगिता में प्रोत्साहन राशी भी रखी गई है और इसमें भाग लेने के लिए कोई एंट्री फ़ीस भी नहीं है. प्रतियोगिता में चित्रकला, नृत्य, गायन, स्लोगन जैसे सेगमेंट्स होंगे. और इसमें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए भाग लिया जा सकता है.

Fatehpur Sdm Pratibha Singh
फतेहपुर, राजस्थान की एसडीएम प्रतिभा सिंह. फोटो – आज तक

हालांकि सामन्य परिस्थियां होतीं तो अभी बच्चों की गर्मियों की छुट्टिया चल रही होतीं. लेकिन कोविड के चलते बच्चे तो पहले से ही घर में बैठे हैं. और छुट्टियों के बावज़ूद न दोस्तों से मिल पा रहे, न प्ले ग्राउंड या पार्क जा पा रहे, न नाना-नानी, दादा-दादी के गांव. तो, बच्चों को हो रही है बोरियत और उनके मात पिताओं को हो रहा है तनाव. ऐसे में प्रतिभा सिंह ने बड़े क्रिएटिव ढंग से कोरोना महामरी से जुड़े इस पहलू को भी छूने की कोशिश की है.

उम्मीद की बात में अतीत में हमने आपको कुछ ऐसी स्टोरीज़ बताई थीं, जिसमें लोग स्ट्रे एनिमल्स को फ़ीड कर रहे हैं. फिर कुछ दिनों पहले हमने आपको गुजरात की भी एक स्टोरी बताई थी, जहां कुछ युवाओं का दल बुजुर्गों को वैक्सीन सेंटर की ‘टू एंड फ़्रो’ राइड दे रहा है. ये सारे इनिशिएटिव प्रकाश में न आते तो हममें से कइयों को तो महामारी के कुछ बाय प्रोडक्ट्स का, कुछ कोलेट्रल डैमेज़ेस का पता ही न लगता. इसलिए ही फतेहपुर से आई इस स्टोरी जैसी ही कई स्टोरीज़ हमारी उम्मीद की बात का हिस्सा बनती आई हैं. ताकि कोविड हेल्प से जुड़ी जागरूकता के मामले में हम पहले से एक कदम और आगे बढ़ पाएं. ताकि हम जान पाएं कि समाज में उम्मीद की बात करने वाले लोग बच्चों, बुजुर्गों और बेज़ुबान जानवरों को भी भूले नही है.


#4. चौथी उम्मीद की बात भी राजस्थान से. यहां के दूसरे सबसे बड़े शहर जोधपुर में स्थित है उम्मेद हॉस्पिटल. इस हॉस्पिटल में एक प्रेगनेंट लेडी भर्ती थीं. दो रोज़ पहले बच्चा हुआ. मां और बच्चा दोनों स्वस्थ थे तो उम्मेद हॉस्पिटल से छुट्टी दे दी गई. हॉस्पिटल से बाहर निकलीं तो घर पहुंचाने के लिए कोई वाहन न मिला. महिला दो दिन के बच्चे को गोद में लिए तिमारदारी कर रही अपनी मां के साथ वाहन के लिए भटकती रहीं. लेकिन कोविड संक्रमण और जनता कर्फ़्यू के चलते सारा पब्लिक ट्रांसपोर्ट रोड से नदारद था. सिवांची गेट पर भटक रही इन महिला, उनकी मा और दुधमुंहे बच्चे पर पुलिस की नज़र पड़ी. थाना प्रभारी ने हाथों हाथ अपनी जीप से जच्चा-बच्चा को उम्मेद चौक स्थित उसके घर तक पहुंचाया. हालांकि थाना प्रभारी दिनेश लखावत ने बाद में ये भी कहा कि जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए पुलिस पूरी तरह से तैयार है लेकिन बेवजह सड़कों पर घूमने वालों को किसी प्रकार की रियायत नहीं दी जाएगी.


#5.  पांचवी बात नोएडा के एक NGO की. नाम है ‘वॉइस ऑफ़ स्लम’. ये NGO कुछ अन्य NGOs के साथ मिलकर ऑक्सीजन कंसंट्रेटर, ऑक्सीजन सिलेंडर और बाकी मेडिकल इक्विपमेंट्स की डोर स्टेप डिलीवरी कर रहा है. ये सारे इक्विपमेंट्स स्लम एरिया के ज़रूरतमंदों को किराए पर दिए जा रहे हैं. अब तक ये NGO अपने अभियान से झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले 60 से ज़्यादा लोगों की जिंदगियां बचा चुका है.
हालांकि इक्विपमेंट्स के वास्ते NGO चार्ज़ भी कर रही है. कितना? पूरे ‘एक रूपये’.

Noida Ngo
पूरे एक रुपए की राशि लेकर ऑक्सीजन सिलिंडर जैसी जरूरी चीजें मुहैया करा रहे हैं. फोटो – आज तक

जी! ये टोकन राशि दरअसल ज़रूरतमंदों के उस आत्मसम्मान के वास्ते ली जा रही है, जो मुफ़्त में मिलने वाली वस्तु को स्वीकार करने से हिचकती है. वैसे बता दें कि मार्केट में एक ऑक्सीजन कंसंट्रेटर का मूल्य क़रीब एक लाख रूपए और एक ऑक्सीजन सिलेंडर का मूल्य दस हज़ार रुपए के क़रीब है. इस NGO, को लोग ‘डोनेटकार्ट’ और अन्य क्राउडफ़ंडिंग प्लेटफ़ॉर्म्स के माध्यम से डोनेट कर सकते हैं.


#6. उम्मीद की अगली कहानी ले जाती है बालाघाट के एक मध्यमवर्गीय परिवार के पास. जिनकी आजकल दिनचर्या शुरू होती है कोविड मरीज़ों, उनके परिजनों और बाकी अंडरप्रिविलेज़्ड लोगों की भूख मिटाने की कोशिशों से. टीवी टुडे नेटवर्क के पत्रकर अतुल वैद्य के अनुसार घनश्याम अग्रवाल के परिवार में कुल 5 लोग हैं और ये सभी पिछले एक माह से रोज़ 50 से अधिक लोगों के लिए भोजन बनाने-परोसने के काम में जुटे हैं. हालांकि परिवार मुख्यतः दूर दराज़ के गांवों से इलाज करवाने आए मरीजों के परिजनों को निः शुल्क भोजन कराता है, लेकिन इनके दरवाज़े पर कोई भी आ जाए भूखे पेट नहीं जाने पाता. शहर के मुख्य मार्ग पर इन्होंने एक बैनर भी लगा रखा है. और इस बैनर में दो मोबाइल नंबर्स और के अलावा ऐसा और कुछ भी नहीं लिखा है, जिससे सिद्ध हो कि कोई प्रचार हो रहा है. इन नम्बर्स पर आने वाले कॉल के जरिए परिवार हर दिन दसियों लोगों का पेट भर रहा है. दूसरी तरफ़ पूरे बालाघाट में इनका ये बैनर भी चर्चा का विषय बना हुआ है.

Balaghat Banner
बैनर की मदद लेकर विज्ञापन करने की खबरें तो आम हैं, लेकिन यहां इसका सही इस्तेमाल हुआ है. फोटो – आज तक

#7. अंतिम सेग्मेंट में बात नोएडा पुलिस की. नोएडा पुलिस ने जनपद भर के उन लोगों को सम्मानित किया है जो प्लाज़्मा डोनेट करके लोगों की ज़िंदगी बचा रहे हैं. ये भी ऑब्वियस है कि हर प्लाज़्मा डोनर एक कोविड सर्वाइवर भी है. नोएडा पुलिस ने कुछ दिनों पहले एक प्लाज्मा बैंक की शुरुआत की थी. इस बैंक के माध्यम से पुलिस ने पिछले 15 दिनों 35 लोगों की जान बचाई है. कोविड के ख़िलाफ़ चल रहे इस युद्ध के दौरान न केवल उम्मीद की बात करने वाले, बल्कि उन्हें सम्मानित करने वाले, उन्हें मोटिवेट करने वाले भी प्रशंसनीय हैं

‘नून मीम राशिद’ लिखते हैं:

ज़िंदगी से डरते हो?
ज़िंदगी तो तुम भी हो, ज़िंदगी तो हम भी हैं!
ज़िंदगी से डरते हो?
लब अगर नहीं हिलते, हाथ जाग उठते हैं.
राह के निशाँ बन कर, नूर की ज़बां बन कर.
हाथ बोल उठते हैं, सुब्ह की अज़ां बन कर.
आदमी से डरते हो?
आदमी तो तुम भी हो, आदमी तो हम भी हैं.
आदमी से डरते हो?
पहले भी तो गुज़रे हैं,
दौर ना-रसाई के, बे-रिया ख़ुदाई के.
तुम अभी से डरते हो?
हाँ अभी तो तुम भी हो, हां अभी तो हम भी हैं.
तुम अभी से डरते हो?

‘ज़ाहिर’ तौर पर तो ये नज़्म डर से पार पाने की बात करती है, लेकिन गौर करें तो कहीं ‘बातिन’ में ये उम्मीद की ही बात करती दिखती है. कि, पहले भी तो ‘ना-रसाई’ यानी असफलताओं के दौर गुजरे हैं न. कभी, माज़ी में ढेरों नाकामियों के बाद मिली कामयाबी की बात करना, उम्मीद की बात करना है. तो कभी, मुस्तकबिल के ख़्वाबों की बात करना, उम्मीद की बात करना है. इसलिए ही लल्लनटॉप बेशक महामारी के इस भीषण दौर में ‘सरकारों और पदों की ज़िम्मेदारियों पर चेक्स लगा रहे’, ये सुनिश्चित कर रहा है. लोगों की पीड़ाओं को साझा कर रहा. लाइफ़ सेविंग जानकारियां इकट्ठा करके उसे एंप्लीफ़ाई कर रहा है. झूठे दावों और नुस्ख़ों की पड़ताल कर रहा है. लेकिन इस सब के दौरान ‘उम्मीद की बात’ करना भी नहीं छोड़ रहा है. आप भी न छोड़िएगा.


वीडियो: कोरोना संक्रमित मरीज की ऊबर ड्राइवर ने जिस तरह मदद की, उससे सीख लेनी चाहिए

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