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क्वांटम फिज़िक्स का ये एक्सपेरिमेंट कोरोना के दौर में उम्मीद की लौ रोशन कर देगा!

क्वांटम फ़िज़िक्स और जीवन में क्या समानताएं हैं? दोनों ही अभी तक हमारे लिए पहेली बने हुए हैं. दोनों ही हमें बहुत आकर्षित करते हैं और दोनों में ही ‘उम्मीद की बात’ गाहे-बगाहे आ ही जाती है. क्वांटम फ़िज़िक्स का डबल स्लिट एक्सपेरिमेंट गेम चेंजर रहा था. जिसका दार्शनिक इंटरपिटेशन ये है कि स्थूल स्तर पर हम, आप, बेशक अलग-अलग हों. लेकिन सूक्ष्म स्तर पर सब कुछ एक ही कॉस्मिक वेव का हिस्सा है. हमें लगता है कि हमारी इस ब्रह्मांड में स्थिति किसी पार्टिकल सी ‘स्टैंड अलोन’ है, लेकिन कलेक्टिवली हम सब जीवन का, जीवन की उम्मीद का, एक वेव पैटर्न बनाते हैं.

कोविड महामारी के इस भीषण दौर से जूझते हुए अबकी बार भी हमें उम्मीद की कई ऐसी बातें पढ़ने-देखने-सुनने को मिली हैं, जो इस कलेक्टिव कॉन्शियसनेस को सत्यापित करती हैं. बातें इंडिवजुअल्स की, संस्थाओं की, मुहिमों की और परिवारों की. तो चलिए शुरू की जाए बात उम्मीद की.

उम्मीद की बात # 1

पहली उम्मीद की बात हरियाणा से. हरियाणा रोडवेज के कुरुक्षेत्र डिपो ने 5 बसों को एंबुलेंस में बदल दिया है. अब ये सारी बसें स्वास्थ्य विभाग को सौंप दी जाएंगी. इन बसों, या कहें एंबुलेंसों में ऑक्सीजन की भी व्यवस्था की गई है. कुरुक्षेत्र रोडवेज डिपो के GM अशोक मुंजाल के अनुसार हर बस में 4 मरीज अपने अटेंडेंट्स के साथ एकॉमडेट हो सकते हैं.

उम्मीद की बात # 2

दूसरी स्टोरी हमें उपलब्ध करवाई है, हमारी कुलिग दिव्यांशी ने. और स्टोरी है Help Indian Hospitals मुहिम के बारे में. जिसकी शुरुआत IIT Kanpur के कुछ पूर्व छात्रों ने मिलकर की है. Help Indian Hospitals का उद्देश्य देश भर के अस्पतालों को ऑक्सीजन, बेड, वेंटीलेटर, बाईपैप मशीनें और बाकी जीवनदायक दवाईयां उपलब्ध करवाना है.

पूरी मुहीम की शुरुआत एक फंडरेजिंग प्रोग्राम से हुई. 24 अप्रैल को ‘मिलाप मंच’ के माध्यम से शुरू किए गए इस फंड रेज़र प्रोग्राम के तहत सिर्फ़ 7 दिनों के अंदर ही 1 करोड़ से ज्यादा की राशि इकट्ठा हो गई. 12 मई तक ये राशि ढाई करोड़ रुपये का आंकड़ा छू चुकी थी. अब तक इस राशि का क़रीब 90 फीसदी हिस्सा अस्पतालों को सुविधाएं मुहैया कराने के लिए दिया जा चुका है.

इस संस्था के द्वारा अब तक 15 राज्यों के 51 हॉस्पिटल्स में मेडिकल जरूरतों का सामान पहुंचाया जा चुका है. इनका लक्ष्य है कि अगले कुछ दिनों में लगभग 7.5 करोड़ रुपये की राशि जुटाई जा सके ताकि दूर-दराज के इलाकों के अस्पतालों में भी ज़रूरी सामान उपलब्ध कराया जा सके. संस्था ने हॉस्पिटल्स और लोगों तक अपनी सहायता पहुंचाने के वास्ते यूनिवर्सल हेल्थ फ़ाउंडेशन, नई दिल्ली और भूमिका ट्रस्ट, चेन्नई जैसे NGOs के साथ भागीदारी की हुई है.

आज Help Indian Hospitals को आईएएस अफसरों से लेकर करीना कपूर, अजय देवगन जैसे सेलेब्स का भी साथ मिल रहा है.

इस मुहिम से जुड़े लोगों का कहना है कि आने वाले वक्त में जब हम इस महामारी से उबर जाएं तो आने वाली जनरेशन को बता सकें कि हमने भरसक कोशिश की थी हालात बेहतर बनाने की.

इस मुहिम में जुड़े हुए कई IIT एल्यूमिनी ऐसे भी हैं जो विदेशों में रहकर अपना योगदान दे रहे हैं.

इनटेंगलमेंट. क्वांटम फ़िज़िक्स का एक और अजब सा कॉन्सेप्ट. दो इनटेंगल पर्टिकल्स अगर ब्रह्मांड के दो छोरों पर भी रख दिए जाएं, तो भी एक का हाल, दूसरे के मिज़ाज पर तुरंत प्रभाव डाल देगा. सोचिए वो क्या चीज़ है जो प्रकाश से तेज़, यानी असंभव गति से चल कर इन दोनों पार्टिकल्स के बीच कम्यूनिकेशन करवा रही है? वो क्या चीज़ है जो दुनिया के अलग-अलग कोनों में बैठे भारतीयों को भारत की पीड़ाओं से इंटेंगल कर रहा है?

उम्मीद की बात # 3

आज की तीसरी उम्मीद की बात रीवा, मध्यप्रदेश से. मऊगंज थाना प्रभारी विद्या वारिधि तिवारी इन दिनों कोविड पॉज़िटिव हैं. जब स्वस्थ थे तो लॉक डाउन के दौरान अपनी ड्यूटी के चलते जमकर तारीफ़ पा रहे थे. तब वो लोगों के पास जा-जाकर उन्हें जागरूक भी कर रहे थे. और अब पॉजिटिव होने पर वो नहीं तो उनकी आवाज़ उम्मीद बनी हुई है. यूं कि, विद्या वारिधि इन दिनों गाना गाकर कोरोना वारियर्स की हौसला अफज़ाई कर रहे हैं. अपनी कोविड पॉजिटिव बेटी वैदेही के साथ मिलकर गाया उनका एक गीत सोशल मीडिया पर काफ़ी वायरल हो रहा है. जिसमें उन्होंने हारमोनियम ख़ुद संभाला हुआ और और गिटार पर हैं उनकी बेटी वैदेही.

Rewa
विद्या वारिधि और उनकी बेटी वैदेही.

उम्मीद की बात # 4

चौथी उम्मीद की बात विदेश से. एनआरआई सतीश अंबाती आर्टिफिशियल इंटिलिजेन्स सॉफ्टवेयर (Artificial Intelligence software) बनाने वाली कंपनी के CEO हैं. सतीश  ने  ‘ऑक्सीजन फॉर इंडिया’ नाम की एक संस्था बनाई है जो भारत में ऑक्सीजन कंसंट्रेटर भेजने का कार्य कर रही है. इस संस्था के प्रयासों से अब तक 407 कंसंट्रेटर मशीनें भारत में आ चुकी हैं. हाल ही में संस्था ने KGMU लखनऊ को भी 8 कंसंट्रेटर मशीनें उपलब्ध करवाई हैं. ऐसी एक मशीन की कीमत 50 से 60 हजार रुपये के क़रीब बताई जा रही है. ‘ऑक्सीजन फॉर इंडिया’ के एक दूसरे सदस्य अपूर्व राजा रायजादा के अनुसार संस्था आगे चलकर और भी हेल्थ किट भारत भेजने का प्रयास करेगी.

उम्मीद की बात # 5

अगली उम्मीद की ख़बर हमें भेजी है रांची से टीवी टुडे नेटवर्क के संवाददाता आकाश कुमार ने. यहां की एक महिला अधिवक्ता इन दिनों सड़क के किनारे, अस्पतालों के आसपास और धार्मिक स्थलों के समीप रहने वाले आश्रितों के पास जा-जाकर उन्हें भोजन उपलब्ध करवा रही हैं. रूना मिश्रा शुक्ला नाम की ये महिला सुबह से शाम तक सेवा कार्य में लगी रहती हैं. खाना बनाने से लेकर उसे जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाने तक का सारा कार्य रूना ने अकेले दम पर संभाला हुआ है. रुना कहती हैं कि सुरक्षा मानकों का ख्याल रखते हुए हर किसी को अपने स्तर से मदद करनी चाहिए.

क्वांटम फ़िज़िक्स कहती है, आप किसी पार्टिकल की गति और स्थिति एक साथ एक्यूरेटली नहीं माप सकते. जितनी प्रिसाइसली आप गति नापेंगे, स्थिति के मामले में आपको उतना अधिक ‘एप्रोक्सीमेट’ होना पड़ेगा.

तो, जब आपकी गति को, आपके कार्यों को प्रिसाईसली मापने की बारी आएगी, तब कोई न माप पाएगा आपकी स्थिति, आपका स्टेट्स, आपका अधिवक्ता या सुप्रीम कोर्ट का जज होना, आपका महिला, पुरुष या थर्ड जेंडर का होना. और हिसाब-किताब रखने वाला सहेज़ लेगा इन सभी मापों को अपने रोज़नामचे में.

उम्मीद की बात # 6

संजय राय ‘शेरपुरिया’ नाम के एक समाजसेवी युवक हैं. छठी उम्मीद की बात उनके ही बारे में. वैसे तो संजय गुजरात में रहते हैं लेकिन मूल निवासी गाजीपुर के हैं. इन्होंने अपने गृह जनपद आकर जिलाधिकारी के माध्यम से 50 ऑक्सीजन कंसंट्रेटर डोनेट किए हैं.

इन 50 ऑक्सीजन कंसंट्रेटर के अलावा वो अब तक एक टेलीमेडिसिन वैन, एक एंबुलेंस, 10 हजार टेस्टिंग किट्स और मेडिसिन किट भी डोनेट कर चुके हैं. और उनकी योजना जल्द ही 40 बेड का  एक कोरोना वार्ड बनाने की भी है. संजय राय अपने गृह जनपद को एक पूर्ण विकसित जनपद के रूप में देखने का सपना भी रखते हैं. इसी वास्ते यहां उन्होंने ‘यूथ रूरल इंटरपेन्योर’ नाम की संस्था की भी नींव भी रखी है.

गाजीपुर के जिलाधिकारी मंगला प्रसाद सिंह ने संजय को उनके कार्यों के लिए धन्यवाद देते हुए बताया कि जल्द ही संजय जनपद के मरीज़ों के लिए और भी जरूरत के समान डोनेट करेंगे.

उम्मीद की बात # 7

अगली उम्मीद की बात बेज़ुबान जानवरों के लिए. लॉकडाउन या जनता कर्फ़्यू के लंबा चलने से  स्ट्रे डॉग्स और बाकी सड़क पर रहने वाले पशुओं को काफ़ी दिक्कत हो रही है. जब तक बाज़ार गुलज़ार थे, इन्हें भी खाने-पीने को कुछ ना कुछ मिल जाता था. लेकिन अब इनका क्या हाल हो रहा होगा, अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है. ऐसे में स्तुति खंडूजा जैसे लोग इन जानवरों के लिए आगे आ रहे हैं. स्तुति खंडूजा इंजीनियरिंग प्रथम वर्ष की छात्रा हैं. लॉकडाउन में अपने घर प्रयागराज चली आई हैं. इन्होंने खबरों में जब लोगों की परेशानी सुनी तो इन्हें ख्याल आया की ऐसे में बेज़ुबानों की बात तो कौन ही सुनेगा. माता-पिता से परामर्श किया और रोज शाम को रोटी और बिस्किट लेकर अपने क्षेत्र में निकलने लगीं. इसी तरह के एक दूसरे वीडियो में आपको दिख रहा है कि ई-रिक्शा पर खाना लाद कर कमल नाम का ये शख़्स भी भोजन बाँटने निकला है.

Kamal
जानवरों को खाना खिलाते स्तुति और कमल.

अपने एक एपिसोड में हमने लोकऋण की बात की थी. ऐसे ही एक ऋण होता है भूतऋण. मतलब  जानवरों, पशु पक्षियों, पेड़ पौधों के प्रति हमारा कर्तव्य. ये स्टोरी तो प्रयागराज के छोटे से हिस्से की है. सिर्फ़ दो लोगों की, जिसकी डिटेल्स संयोग से हमें मिल गई. लेकिन भारत भर में हर जगह ऐसे इलाक़े होंगे, जहां ये स्ट्रे एनिमल भूख के मारे बेहाल होंगे. हालांकि कई जगह पर स्तुति और कमल जैसे लोग भी होंगे. लेकिन बाकी जगहों पर आप भी इनमें से एक बन सकते हैं. अनुरोध है कि अपने आँगन में पक्षियों के लिए दाने-पानी की व्यवस्था रखें. मुहल्ले के कुत्ते बिल्लियों को कुछ न कुछ देते रहें. और अंत में उन्हें धन्यवाद बोलें, आपको भूत-ऋण से उऋण करने के वास्ते.

क्वांटम फ़िज़िक्स में श्रोडिंगर की बिल्ली वाला थॉट एक्सपेरिमेंट पता है आपको? उसमें जब तक आप बिल्ली को देख न लें, तब तक वो जीवित और मृत दोनों ही है. हमारी आपसे विनती और उस बिल्ली के लिए दुआ है कि अगर आप वो बिल्ली देखें तो उसे जीवित देखें, जीवित रखें.

उम्मीद की बात # 8

आठवीं उम्मीद की बात UP की राजधानी लखनऊ से. यहां ‘स्प्रेड स्माइल फ़ाउंडेशन’ ने ऑटो यूनियन के साथ मिलकर उन कोविड पेशेंट्स के लिए मुफ़्त ऑटो सेवा शुरू की है जिन्हें हॉस्पिटल आने जाने में भारी दिक़्क़तों का सामना करना पड़ता है. या जिन्हें एंबुलेंस नहीं मिल रही और मिल भी रही है तो इतनी महंगी कि एफ़ोर्ड करना मुश्किल हो रहा है.

‘स्प्रेड स्माइल फ़ाउंडेशन’ के ये ऑटो, एंबुलेंस के विकल्प के रूप में इसलिए काम आ रहे हैं क्योंकि इनमें ऑक्सीजन, रेग्यूलेटर और मास्क जैसी सभी बेसिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं. इनके चालक सभी कोविड प्रोटोकॉल्स का पालन कर रहे हैं और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पीपीई किट पहन रहे हैं. लखनऊ के नागरिक नीचे फ़्लैश हो रहे हेल्पलाइन नम्बर्स पर संपर्क करके इस निःशुल्क ऑटो सुविधा का लाभ ले सकते हैं.

स्प्रेड स्माइल फ़ाउंडेशन की संस्थापक स्वाति श्रीवास्तव के अनुसार ऑटो ड्राइवर्स का इंश्योरेंस भी किया जाएगा. साथ ही उनके दैनिक भुगतान से लेकर ऑटो में तेल और सिलेंडर्स में ऑक्सीजन भरवाने का ज़िम्मा भी स्प्रेड स्माइल फ़ाउंडेशन का होगा.  

उम्मीद की बात # 9

नवीं उम्मीद की बात बेगूसराय से. जहां पंकज कुमार नाम के एक शख़्स ने अपने निजी दुःख के बीज़ से सार्वजनिक उम्मीद का बरगद पैदा कर दिया. पंकज बेगूसराय में ‘दून स्कूल’ के डीन हैं. उनकी बहन जब कोरोना संक्रमित हुईं तो उनका इलाज एक प्राइवेट हॉस्पिटल में चला. लेकिन हॉस्पिटल में हुई ऑक्सीजन की कमी के चलते उनकी बहन को बचाया न जा सका. पंकज ने उस हॉस्पिटल में अपनी बहन के अलावा कई अन्य लोगों को भी ऑक्सीजन की कमी से मरते देखा. ऑक्सीजन की कमी से किसी और की जान न जाए इसके वास्ते उन्होंने अपने स्कूल को कोरोना हॉस्पिटल में बदल दिया. स्कूल से हॉस्पिटल में बदली गई इस फ़ेसिलिटी में कुल 30 ऑक्सीजन बेड्स हैं. स्कूल प्रशासन ने बेगूसराय के डीएम को एक चिट्ठी लिखकर ये भी मांग की है कि यहां डॉक्टर और अन्य स्वास्थ्य कर्मी भी नियुक्त किए जाएं ताकि ज़्यादा से ज़्यादा जीवन बचाए जा सकें.

उम्मीद की बात # 10

आज की दसवीं और अंतिम उम्मीद की बात जम्मू कश्मीर से. पेशे से ड्राइवर 50 वर्षीय मंज़ूर अहमद अस्थमा के चलते पिछले तीन सालों से चौबीसों घंटे ऑक्सीजन सपोर्ट पर हैं. ड्राइविंग करते वक्त भी एक पोर्टेबल ऑक्सीजन सिलेंडर हमेशा उनके साथ होता है. मंज़ूर एक लोड कैरियर चलाते हैं और श्रीनगर के ऑक्सीजन प्लांट्स और वहां के हॉस्पिटल्स के बीच ऑक्सीजन सिलेंडर्स ट्रांसपोर्ट करते हैं. कोविड इमरजेंसी के दौरान मंज़ूर भी कोविड रोगियों की सेवा करने में अपना योगदान देना चाहते हैं. उनका कहना है कि वो ये काम इसलिए करते रहना चाहते हैं क्यूंकि वो जानते हैं साँसों के लिए हाँफने वाले को कैसा महसूस होता है.

#उम्मीद का संदेश

‘उम्मीद के संदेश’ में आज सुनते हैं लखनऊ के इमरान खान को. सामान्य परिस्थितियों में भी इमरान अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा और इलाज मुहैया करवाते आए हैं. पिछले साल लॉकडाउन के दौरान उन्होंने पलायन कर रहे मजदूरों को मुफ्त भोजन उपलब्ध कराया था. इस दूसरी वेव के दौरन वो कोरोना मरीजों तक मुफ्त खाना, दवा और ऑक्सीजन पहुंचा रहे हैं. इमरान और उनके साथी कोरोना से जान गंवा चुके लोगों के गरीब परिजनों को वैन और अंतिम संस्कार से जुड़ी अन्य सामग्री और सेवाएँ भी निःशुल्क उपलब्ध करवा रहे हैं.

#अंत

आइंस्टीन को एक तरह से क्वांटम फ़िज़िक्स का प्रणेता कहा जा सकता है. और लोगों का मानना ग़लत है कि अपने जीवन के अंतिम दशकों में उन्होंने क्वांटम फ़िज़िक्स को नकार दिया था. दरअसल उन्होंने क्वांटम फ़िज़िक्स को नहीं इसके उस रूप को नकारा था, जिसे और परिमार्जित करने की ज़रूरत थी. और तब उन्होंने कहा था: God can’t play dice with us.

आज क़रीब एक सदी के बीत जाने के बावज़ूद क्वांटम फ़िज़िक्स वहीं पर अटकी है, लेकिन हम सब जानते हैं कि बड़े सवालों को हल करने में बेशक लंबा समय लगता है, लेकिन फिर मिलने वाले उत्तर भी उतने ही क्रांतिकारी, उतने की युग प्रवर्तक होते हैं. और उत्तर खोजने के दौरान काम आता है ढेर सारा परिश्रम, ढेरों जिजीवषाएँ और अनंत उम्मीदें. उम्मीदें, जो साइंस से लेकर एथिक्स तक पसरी हुई हैं. उम्मीदें जो कहती हैं कि: God can’t play dice with us.

आज के लिए इतना ही, याद रखिए इलेक्ट्रॉन्स की तरह अनिश्चित इस काल में भी कहीं भीतर  उम्मीद की स्ट्रिंग्स अपने सभी दसों आयामों में नृत्य कर रही हैं. अलविदा.


क्वांटम फिजिक्स का डबल स्लिट एक्सपेरिमेंट कैसे कोरोना में उम्मीद की बात करता है?

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