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ऑटो को एंबुलेंस बनाने से लेकर मरीजों को राशन पहुंचाने तक की उम्मीद भरी 7 कहानियां

हमारे साथी कुलदीप मिश्रा लिखते हैं:

ठीक है कि फ़िज़ा ठीक नहीं. मालूम है कि माहौल डर का है. कि किसी का हाथ छूना नहीं है. पर किसी का साथ छोड़ना नहीं है. कल जब सब कुछ सही हो जाएगा, तो देखना हमारे इन्हीं आसमानों में उड़ते हुए पंछी कहेंगे कि कमबख़्त इंसानों की इस ज़िद्दी ज़ात ने, एक लड़ाई और जीत ली.

आपको बताएंगे इसी ज़िद्दी जात की कुछ ऐसी कहानियां, जो महमारी के इस बुरे दौर में भी हमें चलते रहने को कहती हैं. हमें खुद की और औरों की हेल्प करने को मोटिवेट करती हैं. कहानिया इंडिवजुल्स की, कहानियां संस्थाओं की, कहानिया उम्मीद की.

# 1. भोपाल के ऑटो चालक हैं जावेद खान. इंस्टाग्राम से लेकर ट्विटर तक सभी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर छाए हुए हैं. उन्होंने अपने ऑटो में ऑक्सीजन का सिलेंडर लगा लिया है और मरीज़ों को घर से हॉस्पिटल लाने ले जाने की सेवाएं दे रहे हैं. और इन सेवाओं के लिए वो किसी से पैसे नहीं लेते. ऑटो एंबुलेंस चालक जावेद खान के अनुसार उन्हें इसके वास्ते अपनी बीवी का सोने का लॉकेट बेचना पड़ा. जावेद के मुताबिक वो अबतक करीब दर्जन भर मरीजों को निःशुल्क अस्पताल ले जा चुके हैं. वो अपने ऑटो एंबुलेंस को रोज़ सैनिटाइज करते हैं. जावेद 4 से पांच घंटे लाइन में लगकर अपने खर्चे पर इस ऑक्सीजन सिलिंडर को रिफिल करवाते हैं. मरीज़ों की सेवा में कोई व्यवधान न हो, इसके चलते उन्होंने अबकी रोज़े भी नहीं रखे हैं.

# 2. दूसरी उम्मीद की बात गुजरात के अहमदाबाद से. यहां वस्त्रापुर की DHC हॉस्पिटल में ऑक्सीजन की कमी हो गई थी. जल्द ही ऑक्सीजन की व्यवस्था न होती तो जानिए कि उस वक्त इस हॉस्पिटल में क़रीब 35 मरीज़ों का जीवन ऑक्सीजन पर आश्रित था. और ऑक्सीजन सप्लाई वाली जगह से DHC हॉस्पिटल की दूरी क़रीब 20 किलोमीटर थी. ऐसे में चांगोदर पुलिस ने तुरंत एक ग्रीन कॉरिडोर का निर्माण करके 20 मिनट में ऑक्सीज़न, हॉस्पिटल तक डिलिवर करवा दी. इस पूरे ऑपरेशन के दौरान दो पीएसआई और पुलिस की टीम भी कान्वॉई में थी.

Gujarat Police
ग्रीन कॉरिडर बनाकर 20 मिनट में ऑक्सीजन पहुंचाया. फोटो – इंडिया टुडे

# 3. तीसरी उम्मीद की बात तमिलनाडु से. यहां के कोयंबटूर ज़िले में एक गांव है नल्लिकोउंडन पलयम. यहां के व्यक्ति हैं थवमनी. चाय की दुकान चलाते हैं. थवमनी बढ़ते कोविड के मामलों और ग्रामीणों की मास्क के प्रति उदासीनता को लेकर चिंतित थे. जागरूकता पैदा करने का सबसे आसान तरीक़ा उन्हें ये लगा कि लोगों के पसंदीदा नेताओं के माध्यम से ही उनके लिए एक इग्ज़ैम्पल सेट किया जाए. तो उन्होंने अपनी चाय की गुमटी के पास में स्थित जयललिता और MGR की प्रतिमाओं पर मास्क लगा दिए. चुनावों के दौरान तमिलनाडु में कोविड केसेज़ में अप्रत्याशित वृद्धि देखी गई. ऐसे में दुआ है कि थवमनी की ये छोटी सी दिखने वाली पहल, बड़ा असर करे.

Mgr Statur
एमजीआर की मास्क लगी हुई मूर्ति.

# 4. चौथी उम्मीद की बात भेजी है बालाघाट में टीवी टुडे नेटवर्क के रिपोर्टर अतुल वैद्य ने. अतुल अपनी स्टोरी के नायकों को अननोन वॉरियर्स कहते हैं. और ये अननोन वॉरियर्स हैं, बालाघाट के दर्जन भर के क़रीब ई-रिक्शा चालक. जो सुबह से लेकर शाम तक मरीजों को अस्पताल लाने ले जाने के काम में जुटे हुए हैं. इतना ही नहीं, ये ई-रिक्शा चालक बुजुर्गों या अकेले रहने वाले कोविड पेशेंट्स तक राशन-दवाई वग़ैरह पहुंचाने का काम भी बखूबी कर रहे हैं. सबसे सुंदर बात ये है कि जहां एक तरफ़ हर जगह से दवाई, ऑक्सीजन, एंबुलेंस की कालाबाज़ारी, उनके महंगे होते दामों की ख़बरें आ रही हैं वहीं इन ई-रिक्शा चालकों ने अपने रेट नहीं बढ़ाए हैं. जहां तक ई-रिक्शा चालकों द्वारा इन सेवाओं के लिए सौ-पचास रुपए चार्ज़ करने की बात है, तो हम सभी अच्छे से समझते हैं कि गरीब तबके से आने वाले इन लोगों को इसी मामूली कमाई से अपना और अपने परिवार का पालन भी करना है. ये अननोन वॉरियर हमारी उम्मीद की बात में इसलिए, ताकि हमें पता चले कि कई बार केवल अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन भर कर देने से ही आप समाज का पर्याप्त भला कर चुकते हैं.

E Rickshaw
ई रिक्शा चालक जो मरीजों तक राशन और दवाइयां पहुंचा रहे हैं.

# 5. दो फ़्रंटलाइन वर्कर्स हैं शिल्पी और राकेश. एक-एक कर इनको और इनके काम को जानें और जानें कि वो किस ‘कॉस्ट’ पर लोगों की सहायता कर रहे हैं. 29 साल की शिल्पी उदयपुर के MB हॉस्पिटल में नर्स हैं. उनकी मां कोविड संक्रमण के चलते ICU में भर्ती हैं, साथ ही उनका 2 साल का एक बच्चा भी है. शिल्पी ने घर के ऐसे सेटअप और मां की इतनी क्रिटिकल कंडीशन में भी अपना जॉब नहीं छोड़ा. वो अब भी मरीज़ों की सेवा में लगी हुई हैं. शिल्पी अपने और अपने काम के बारे में बहुत मुख़्तसर सी बात कहती हैं, ‘अगर हम नहीं, तो फिर कौन?’

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उदयपुर की डॉ. शिल्पी. फोटो – इंडिया टुडे

दूसरे फ़्रंटलाइन वर्कर हैं डॉक्टर राकेश मालवीय. भोपाल में हमीदिया अस्पताल के फिजियोलॉजी विभाग में काम करते हैं. पिछले साल कोरोना की फ़र्स्ट वेव के चलते हमीदिया अस्पताल के ‘कोरोना क्राइसिस मैनेजमेंट’ की ज़िम्मेदारी भी डॉक्टर राकेश के पास ही है. मतलब मरीजों को समय पर खाना दिया गया या नहीं, उनके वार्ड में सब ठीक है या नहीं, ड्यूटी स्टाफ समय पर आया या नहीं, ये सब सुनिश्चित करना डॉक्टर राकेश के जिम्मे है. इस वक़्त डॉक्टर राकेश के परिवार के 6 लोग कोरोना संक्रमित हैं. उनके पिता, मां, दो भाई, बेटा और उनकी बेटी. इसके बावज़ूद डॉक्टर राकेश मालवीय सामान्य दिनों की तरह सुबह सवेरे हमीदिया अस्पताल पहुंच जाते हैं और दिन-भर लगे रहते हैं. जब राकेश के बच्चे उन्हें बिना छुट्टी लिए इतनी लंबी ड्यूटी करने से मना करते हैं तो उन्हें अपने बच्चों को ये एहसास कराना होता है कि मरीज़ को किस चीज की ज़रूरत है और अस्पताल में वो चीज़ मौजूद है या नहीं, ये सब देखने का काम उन्हीं के ज़िम्मे है, इसलिए बिना रुके बिना थके उन्हें अपना फर्ज निभाना है.

Dr. Rakesh
डॉ. राकेश का परिवार कोरोना संक्रमित है. इसके बावजूद वो लगातार ड्यूटी पर हैं.

# 6. लोगों को सीधे सर्विसेज़ देने वालों संस्थानों में से शायद इंडियन रेलवे हर मायने में देश का सबसे बड़ा संस्थान है. आज बात इसी के ‘ऑक्सीजन एक्सप्रेस’ इनिशीएटिव की. कई दिनों से भारतीय रेलवे का ‘ऑक्सीजन एक्सप्रेस’ ज़रूरतमंदो तक ऑक्सीजन सप्लाई करके उनकी जान बचा रहा है. ख़ाली टेंकरों वाली पहली ‘ऑक्सीजन एक्सप्रेस’ 19 अप्रैल को मुंबई से विशाखापट्टमन के लिए चली थी. वहां से लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन (LMO) लाने के वास्ते. तब से लेकर अब तक इसका जाल हरियाणा, तेलंगाना, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और दिल्ली तक में फैल चुका है. इन राज्यों में से ज़्यादातर राज्य ऐसे हैं जहां ऑक्सीजन की भारी क़िल्लत चल रही है. भविष्य में रेलवे, जरूरत के हिसाब से सभी राज्यों को ऑक्सीजन ट्रांसपोर्ट सर्विस उपलब्ध कराने की पूरी तैयारी में है. इस स्टोरी के अंत में ये भी जान लीजिए कि लिक्विड ऑक्सीजन एक क्रायोजेनिक कार्गो है. क्रायोजेनिक कार्गो मतलब किसी गैस के तापमान को कम करके उसे लिक्विड में बदलकर फिर ट्रांसपोर्ट करना. अब क्रायोजेनिक कार्गो की अपनी सीमाएं होती हैं जैसे गति, एक्सलरेशन और ब्रेक की सीमाएं. साथ ही इसे लोड अनलोड करने के दौरान भी बड़ी सावधानियाँ बरतनी पड़ती हैं. ऐसे में साफ़ है कि ‘सुरक्षित’, ‘तेज़ी से’ और ‘ज़्यादा से ज़्यादा’ LMO के ट्रांसपोटेशन का काम सबसे बेहतरीन ढंग से भारतीय रेल ही कर सकती है. एक-दो नहीं सैकड़ों हज़ारों की संख्या में जिंदगियां बचा सकती है. हांफते हिंदुस्तान के लिए सबसे बड़ी उम्मीद की बात बन सकती है.

Oxygen Tankers
भारतीय रेलवे की ‘ऑक्सीजन एक्स्प्रेस’ कई राज्यों तक ऑक्सीजन पहुंचा रही है.

# 7. आख़िरी उम्मीद की बात तेलंगाना से. वहां के मुख्यमंत्री का नाम है के. चंद्रशेखर राव, शॉर्ट में सब उन्हें KCR कहते हैं. ये स्टोरी उनकी या किसी अन्य बड़े राजनेता की होती तो शायद उम्मीद की बात में न होती. कई कारणों के चलते, जैसे अव्वल तो समाज का भला करना इनके KRA का हिस्सा है, दूसरा अगर वो कुछ आउट ऑफ़ दी बॉक्स सेवा करेंगे भी, तो खबरों का हिस्सा बन ही जाएंगे.

तो बात मुख्यमंत्री की नहीं उनकी बेटी की कलवकुंतला कविता की. हालांकि कविता भी MLA हैं. लेकिन उम्मीद की बात में आई हैं, अपने उस कार्य के चलते, जो वो अपनी पर्सनल केपिसिटी में कर रही हैं. वो व्यक्तिगत रूप से उन सभी SOS संदेशों को हैंडल कर रही हैं, जो उन्हें महामारी के चलते प्राप्त हो रहे हैं. उन्होंने इसकी शुरुआत 2020 में ही कर दी थी जब कोरोना की पहली वेव आई थी.

अब जब दूसरी वेव पहली से कहीं घातक सिद्ध हो रही है, कविता ने 24×7 काम करने वाली कोविड सपोर्ट हेल्पलाइन भी लॉन्च कर दी है. इस हेल्प लाइन से तेलंगाना के लोगों को बुनियादी ज़रूरतों और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुँच आसान हुई है. इससे पहले उन्होंने ट्विटर के माध्यम से अपील की थी कि जिस किसी को भी सहायता की आवश्यकता हो, वो उनके हैदराबाद और निजामाबाद के कार्यालयों के नंबरों पर संपर्क कर सकता है.


वीडियो: उम्मीद की बात: मुंबई में प्रवासी मजदूरों के लिए नौसेना ने जो किया वो काबिल-ए-तारीफ़ है!

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