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सरकार के हिसाब से प्लाज्मा थेरेपी बेकार, डॉक्टर क्या इसे करना रोक देंगे?

जैसे-जैसे देश कोरोना की दूसरी लहर (second wave of corona) की गिरफ्त में आया सोशल मीडिया पर मदद मांगने वालों की बाढ़ आ गई. इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की थी जो अपने या अपने किसी परिजन की प्लाज्मा थेरेपी (Plasma Therapy) के लिए मदद मांग रहे थे. जिन्हें कोरोना हो चुका है उनसे प्लाज्मा डोनेट करने की अपील की जा रही थी. भय और दुख के मंजर के बीच बहुत से लोगों आगे आए और उन्होंने प्लाज्मा डोनेट भी किया. हालांकि शुरुआत से ही प्लाज्मा के जरिए कोरोना मरीजों के मैनेजमेंट पर सवाल खड़ा होता रहा है लेकिन 17 मई 2021 को एम्स और आईसीएमआर ने साफ कर दिया कि कोरोना के मैनेजमेंट में प्लाज्मा कतई मददगार नहीं है. नई परिस्थिति में इलाज कराने वालों और मदद देने वालों के मन में नया कंफ्यूजन पैदा हो गया हैं. डॉक्टर अब भी प्लाज्मा थेरेपी बताए तो क्या करें? कोई प्लाज्मा मांगे तो क्या करें? इन सवालों का जवाब हमने जाना एक्सपर्ट्स से

सबसे पहले प्लाज्मा पर सरकार की राय जान लीजिए

जिस प्लाज्मा के लिए लोग सोशल मीडिया पर गुहार लगाते रहे हैं. उसे सरकारी विशेषज्ञों ने किसी काम का नहीं पाया है. भारत सरकार की हेल्थ मिनिस्ट्री के जॉइंट मॉनिटरिंग ग्रुप ने कोविड 19 मरीजों के मैनेजमेंट के लिए रिवाइज्ड क्लीनिक गाइडलाइन जारी की है. इसमें प्लाज्मा थेरेपी का कोई जिक्र नहीं किया गया है. जबकि पहले प्रोटोकॉल में इसे ‘ऑफ लेबल’ इस्तेमाल किए जाने के तौर पर शामिल किया गया था. बता दें कि जब किसी दवा या उपचार को बिना अप्रूवल के सिर्फ प्रायोगिक तौर पर इस्तेमाल किया जाता है तो उसे ‘ऑफ लेबल’ श्रेणी में रखा जाता है.

ICMR ने प्लाज्मा थेरेपी को हटाने के फैसले की जानकारी देते हुए कहा कि कोविड-19 मरीजों के उपचार के लिए प्लाज्मा थेरेपी के उपयोग को मैनेजमेंट दिशा-निर्देश से हटा दिया गया है. सरकार ने पाया कि कोविड-19 मरीजों के उपचार में प्लाज्मा थेरेपी गंभीर बीमारी को दूर करने और मौत के मामलों को कम करने में फायदेमंद साबित नहीं हुई है. कोविड-19 के लिए गठित नेशनल टास्क फोर्ट और ICMR की पिछले हफ्ते हुई बैठक के दौरान सभी सदस्य प्लाज्मा थेरेपी को हटाने पर सहमत हुए थे. जिसके बाद सरकार का यह निर्णय सामने आया है.

शॉर्ट में प्लाज्मा थेरेपी भी समझिए

जब किसी शख्स को इंफ़ेक्शन होता है तो उसके शरीर में इंफ़ेक्शन फैलाने वाले वायरस के खिलाफ़ एंटीबॉडी बनने लगती हैं. ये एंटीबॉडीज़ उस इंफ़ेक्शन से लड़ती हैं और शरीर को रोगमुक्त बनाती हैं. माना जाता रहा है कि कोरोना वायरस से संक्रमित जो लोग ठीक हो रहे हैं. उनके खून के एक जरूरी हिस्से प्लाज़्मा में कोरोना वायरस के खिलाफ़ एंटीबॉडीज़ बन जाती हैं. कोरोना से लड़कर जीतने वाले ऐसे व्यक्ति का प्लाज़्मा अगर कोरोना संक्रमित व्यक्ति को ट्रांसफर किया जाए तो उसकी रोग से लड़ने की ताकत बढ़ सकती है.

तो सरकार ने अब तक इसकी परमीशन क्यों दे रखी थी ?

शुरुआत में देश भर में कोरोना के इलाज के लिए प्लाज्मा थेरेपी को एक प्रायोगिक इलाज के तौर पर इज़ाजत दे दी गई. हालांकि सरकार ने अक्टूबर 2020 में ही इस तरह के संकेत दे दिए थे कि कोरोना के इलाज में प्लाज्मा थेरेपी ज्यादा कारगर नहीं हो रही है. अक्टूबर 2020 में आईसीएमआर ने एक रिसर्च का हवाला दिया था, जो कहती है कि इस थेरेपी से मृत्युदर में कोई कमी नहीं आती. ICMR (Indian Council of Medical Research) के डायरेक्टर जनरल बलराम भार्गव ने अक्टूबर 2020 में कहा था-

“कोरोना के इलाज की गाइडलाइंस में से प्लाज्मा थेरेपी को हटाए जाने को लेकर विचार चल रहा है. यह काम कोविड-19 के लिए बनी ICMR की नेशनल टास्क फोर्स कर रही है. हमने प्लाज्मा थेरेपी पर दुनिया का सबसे लंबा ट्रायल किया है. यह ट्रायल 39 अस्पतालों में 464 पेशंट्स पर किया गया. इसके नतीजों को 350 लोगों ने लिखा. हम इसे जल्द ही सामने लाएंगे. यह लगभग 10 पेज की रिपोर्ट है, जिसमें कोविड पर प्लाज्मा थेरेपी के असर के बारे में बताया गया है. ब्रिटिश मेडिकल जर्नल ने भी इस तरह के प्रमाण दिए हैं.”

सबकुछ के बीच अब प्लाज़्मा ट्रीटमेंट आया है, जिसे कोरोना का जादुई इलाज कहा जा रहा है?
जब प्लाज़्मा ट्रीटमेंट आया तो इसे कोरोना का जादुई इलाज कहा गया था.

अब क्या हो गया जो सरकार ने इसे हटाने का फैसला ले लिया?

इस रिसर्च के सामने आने के तकरीबन 6 महीने बाद ICMR ने प्लाज्मा थेरेपी को कोरोना मैनेजमेंट की लिस्ट से हटा दिया है. इन 6 महीनों के बीच 3 बड़ी घटनाएं प्लाज्मा थेरेपी को कोरोना से निपटने के तरीकों से हटाने का बड़ा कारण बनीं.

# 15 मई को यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड की RECOVERY नाम की एक स्टडी मशहूर मेडिकल जर्नल लैंसेंट  में छपी. इसमें पाया गया कि कोरोना मरीज के इलाज में प्लाज्मा थेरेपी मददगार साबित नहीं होती है. यह अपनी तरह की कोविड मरीजों के इलाज को लेकर की गई सबसे बड़ी स्टडी है. इसने एक तरह से दुनिया भर में प्लाज्मा थेरेपी पर चल रही बहस पर विराम लगा दिया.

# पिछले हफ्ते भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के. विजय राघवन ने प्लाज्मा थेरेपी के ‘अतार्किक और अवैज्ञानिक’ इस्तेमाल पर सवाल खड़े किए थे. उनके हिसाब से किसी भी बड़ी रिसर्च में इसे जान बचाने वाली थेरेपी नहीं पाया गया.

#देश में वायरोलॉजी और वायरस जनित बीमारियों पर काम करने वाले बड़े डॉक्टरों ने कुछ दिन पहले प्लाज्मा थेरेपी को लेकर आईसीएमआर और एम्स को खत लिखा. खत लिखने वालों में वैक्सीनोलॉजिस्ट गगनदीप कंग और परमेश सीएस जैसे बड़े सर्जन शामिल हैं. उन्होंने पत्र में लिखा

“प्लाज्मा थेरेपी से कोरोना मरीज के मैनेजमेंट में किसी भी तरह की मदद का कोई सबूत नहीं मिला है. फिर भी यह जारी है. हमें आशंका है कि इससे वायरस के नए स्ट्रेन पनप सकते हैं. प्लाज्मा थेरेपी का धड़ल्ले से इस्तेमाल सरकारी एजेंसियों की गाइडलाइंस की वजह से हो रहा है. हम अनुरोध करते हैं कि इस मामले में फौरन हस्तक्षेप किया जाए. ऐसा होने से कोरोना पेशेंट्स, उनके परिजन और कोरोना से ठीक हो चुके लोगों को बहुत मदद मिलेगी. वर्तमान रिसर्च साफ दिखाती है कि कोरोना थेरेपी से कोरोना के इलाज में कोई मदद नहीं मिलती. इसके बावजूद देशभर के अस्पताल इसे धड़ल्ले से रिक्मेंड कर रहे हैं.”

ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी की वैक्सीन की काफी चर्चा है. फोटो: Shiksha Study
ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी की RECOVERY रिसर्च ने यह साबित कर दिया कि प्लाज्मा थेरेपी कतई काम नहीं कर रही है. फोटो: Oxford

अगर अब भी डॉक्टर इस थेरेपी के लिए कहते हैं तो क्या होगा?

वायरस के संक्रमण और इसके इलाज पर लगातार नजर बनाए हुए डॉक्टर विपिन वशिष्ठ ऐसे मामलों में मरीज को आगाह करते हैं. वह ऐसे डॉक्टरों से बचने की सलाह भी देते हैं जो बिना वैज्ञानिक आधार पर इलाज का कोई भी तरीका अपना रहे हैं. डॉक्टर वशिष्ठ कहते हैं

“अगर किसी तरीके को ICMR जैसी बड़ी संस्था ने सही नहीं पाया, तो डॉक्टरों को उसे बंद करना चाहिए. कोई भी अच्छा डॉक्टर सबूत पर आधारित इलाज ही अपने मरीज तो उपलब्ध कराएगा. अगर वह पहले ऐसा कर चुका है, फिर भी नए सबूत आने पर वह प्लाज्मा थेरेपी से बचेगा. हालांकि इस बात की आशंका अब भी है कि दूर-दराज के छोटे शहरों में ऐसा इलाज होता रहे. इसे मरीजों और उनके परिजनों को भी समझना होगा. जिस इलाज के पीछे कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है उसके पीछे भागने का कोई मतलब नहीं है. वैसे भी प्लाज्मा थेरेपी शुरुआत से ही बहुत कम केसेज में कारगर हुई है. इसे लेकर भी स्टडी में कोई पक्के सबूत नहीं मिले. ऐसे में इस तरीके से किनारा करना ही बेहतर है.”

अगर अब भी कोई प्लाज्मा मांगे तो क्या करें?

इसे लेकर फिजीशियन डॉक्टर अनिल बंसल का मानना है कि एक अवैज्ञानिक तरीके को बढ़ावा देना भी उतना ही गलत है जितना उसके जरिए इलाज करना. उनका कहना है कि

“बेहतर होगा कि लोग अब अपने सोशल मीडिया हैंडल और वॉट्सऐप के जरिए ऐसी डिमांड को आगे न बढ़ाएं. जिस उपचार के पीछे कोई वैज्ञानिक आधार ही नहीं है उसका प्रचार लोगों की परेशानी का सबब बनेगा.”

ऐसा ही कुछ डॉक्टर विपिन वशिष्ठ का मानना है. वह इसे लोगों के लिए दुविधा में डालने वाला जरूर मानते हैं, लेकिन उन्हें फैसला लेना होगा. वह कहते हैं

“अगर अब भी कोई प्लाज्मा मांगेगा तो मदद के लिए लोग आगे आना चाहेंगे. लोग एक दूसरे की मदद करना चाहते हैं. मना करना मुश्किल काम है लेकिन बेहतर होगा कि ऐसा करने से बचें. लोगों को यह सोचना चाहिए कि रिसर्च से यह बाद सामने आई है कि प्लाज्मा थेरेपी से भी वायरस के नए स्ट्रेन पैदा होने की आशंका है. ऐसे में प्लाज्मा देने से ज्यादा लोगों को ऐसे स्ट्रेन बनाने में मददगार बनने से बचना चाहिए जो ज्यादा कहर ढाने वाले हों.”

सरकार ने भले ही अपनी तरफ से प्लाज्मा थेरेपी को लेकर स्थिति साफ कर दी हो लेकिन सोशल मीडिया पर अब भी प्लाज्मा डोनेशन की अपीलें देखी जा सकती हैं. अब सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्लाज्मा थेेरेपी को प्रैक्टिस से बाहर करने की है. यह काम यकीनन गाइडलाइन से किसी मैथड को बाहर करने से कई गुना ज्यादा मुश्किल है.


वीडियो – जो प्लाज्मा थेरेपी कोविड में सबसे प्रभावी साबित हुई, उसे ICMR बंद क्यों करना चाहती है?

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