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कोरोना में खुद से दवा फ़ांकने से पहले ज़रा ये पढ़ लीजिए

कोरोना (Corona Virus) से जुड़े कुछ ऐसे दावे, ऐलान और सूचना सोशल मीडिया पर घूम रहे हैं, जिन पर अमल करने के पहले आपको बहुत ज़्यादा चौकन्ना रहना होगा. चौकन्ना इसलिए क्योंकि ज़रा-सी भी चूक स्थिति को भयावह बना सकती है. और सबसे पहले हम बात करेंगे एक दवा की. दवा का नाम है आइवरमेक्टिन. और इस दवा पर हम क्यों बात कर रहे हैं? क्योंकि गोवा सरकार ने कहा है कि प्रदेश के जो भी बाशिंदे 18 साल से ऊपर की आयु के हैं, वो आइवरमेक्टिन का सेवन करें. स्वास्थ्य मंत्री विश्वजीत राणे ने ये भी कहा कि इस दवा को लेने के लिए ज़रूरी नहीं कि आप कोरोना संक्रमित हैं या नहीं हैं.

पिछले साल उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों ने कोरोना में इलाज के लिए आइवरमेक्टिन को अपने प्रोटोकॉल में शामिल किया था. इसी प्रोटोकॉल को मानते हुए कई चिकित्सक कोरोना संक्रमित मरीज़ों को आइवरमेक्टिन खिला रहे थे. क्या है आइवरमेक्टिन? साल 1975 में इस दवा की खोज हुई थी. मूल काम है एक ख़ास तरह के इंफ़ेक्शन को दूर करना. अब सिर में जुए पड़ जाने पर इसकी क्रीम या लोशन इस्तेमाल में लाया जाता है. पेट के उस इंफ़ेक्शन को, जिसे आम भाषा में पेट में कीड़े पड़ जाना कहा जाता है, उसमें टैबलेट के रूप में आइवरमेक्टिन दी जाती है. लेकिन यहीं पर हम कुछ विशेषज्ञों की बातों को ग़ौर से सुनें तो पता चलता है कि ये दवा कोरोना संक्रमण में काम करती है या नहीं, इस बारे में अभी कोई भी रीसर्च सामने नहीं आयी है.

सबसे पहले बात विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO की. WHO ने कोरोना में आइवरमेक्टिन के इलाज से मना किया है. WHO की चीफ साइंटिस्ट सौम्या स्वामीनाथन ने ट्वीट करके कहा है कि किसी दवा को इस्तेमाल करने से पहले उसकी सेफ़्टी और उसकी एफ़िकेसी यानी प्रभावशीलता के बारे में जानकारी होना ज़रूरी है. उन्होंने ये भी कहा कि WHO क्लिनिकल ट्रायल के इतर आइवरमेक्टिन के कोरोना में इस्तेमाल को मंज़ूरी नहीं देता है.

इसके साथ ही इस दवा को विकसित करने वाली कम्पनी मर्क ने भी 4 फ़रवरी 2021 को एक बयान जारी किया. इस बयान में मर्क ने कहा कि कोरोना में इस दवा के इस्तेमाल के पीछे कोई भी वैज्ञानिक आधार मौजूद नहीं है. साथ ही जो भी अध्ययन हुए हैं, उनमें इस दवा को लेकर कोई भी सेफ़्टी या एफ़िकेसी का आंकड़ा अभी तक सामने नहीं आया है. मार्च 2021 में अमरीका के फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन और यूरोपियन मेडिसिंस एजेंसी ने भी कोरोना में आइवरमेक्टिन के इस्तेमाल को रोकने का आदेश जारी किया.

भारत में आइवरमेक्टिन को लेकर सरकारी स्थिति क्या है? स्वास्थ्य मंत्रालय ने कम लक्षण या बिना लक्षण वाले केसों में आइवरमेक्टिन की 3 से 5 दिनों तक खाने की सलाह दी है. ख़बरों के मुताबिक़, एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया ने भी प्रेस कॉन्फ़्रेन्स में आइवरमेक्टिन खाने की सलाह दी थी, लेकिन ज़्यादा दवाएं खाने से परहेज़ करने को कहा था. हमसे बातचीत में डॉक्टर बताते हैं कि स्वास्थ्य मंत्रालय की गाइडलाइन के अनुसार चलने पर ये दवाएं कोरोना के मरीज़ों को प्रेस्कराइब करना पड़ता है. साथ ही कई कोविड वार्डों में भी ये दवा लोगों को खिलानी पड़ती है. पक्का रिसर्च न होने के बावजूद.

CT स्कैन जरूरी है क्या?

आइवरमेक्टिन के बाद बारी आती है CT स्कैन की. कई राज्यों में कोविड टेस्ट की रिपोर्ट में देर हो रही है. हफ़्ते भर तक की देर होने की ख़बरें आ रही हैं. ऐसे में कुछ डॉक्टर और अधिकतर मात्रा में मरीज़ सहारा ले रहे हैं CT स्कैन का. सीटी स्कैन का मतलब है Computerized Tomography Scan. टोमोग्राफ़ी का मतलब किसी भी चीज़ को छोटे-छोटे सेक्शन में काटकर उसका अध्ययन करना. कोविड के केस में डॉक्टर जो सीटी स्कैन कराते हैं, वो है HRCT चेस्ट यानी सीने का हाई रिजोल्यूशन कंप्यूटराइज्ड टोमोग्राफी स्कैन. इस टेस्ट के जरिए फेफड़ों की एक 3डी यानी त्रिआयामी इमेज बनती है जो बहुत बारीक डिटेल्स भी बताती है. इससे ये पता चल जाता है कि क्या फेफड़ों में किसी तरह का कोई इन्फेक्शन है?

लेकिन कोरोना की दूसरी लहर में CT स्कैन इतना ज़रूरी कैसे हो गया है? विशेषज्ञ बताते हैं कि RTPCR और एंटीजन टेस्ट की जांच में कोरोना के नए स्ट्रेन का पता नहीं चलता है. ज़्यादा केस लोड की वजह से अक्सर कोविड टेस्ट भी बहुत मुस्तैदी के साथ नहीं किए जा रहे हैं, इस वजह से भी कोविड टेस्ट में असफलता देखने को मिल रही है. डॉक्टर बताते हैं कि ऐसी स्थिति में यदि मरीज़ों का सीटी स्कैन कराया जाए, तो लक्षणों के आधार पर इंफ़ेक्शन की पुष्टि की जा सकती है.

लेकिन मुंबई के हिंदुजा अस्पताल में फेफड़ों के रोग के विशेषज्ञ डॉक्टर लैन्सेलॉट पिंटो दी हिंदू में छपे अपने लेख में लिखते हैं कि किसी व्यक्ति का कोरोना का इलाज करना है या नहीं, इसकी पुष्टि CT स्कैन के आधार पर नहीं, बल्कि कोविड टेस्ट के आधार पर की जानी चाहिए.
कुछ दिनों पहले कोविड टास्क फ़ोर्स के सदस्य एम्स निदेशक रणदीप गुलेरिया ने भी CT स्कैन के फ़्रीक्वेंट इस्तेमाल को लेकर चेतावनी जारी की थी. रणदीप गुलेरिया ने कहा था कि एक CT स्कैन में 300 एक्सरे के बराबर रेडिएशन पावर होती है, जिससे लोगों में कैंसर का ख़तरा बढ़ जाता है.

झोलाछाप डॉक्टर न बनें

CT स्कैन के बाद बात आती है कि ख़ुद से दवा खाने वालों की. ये आम है कि बुखार चढ़ा, बदन दर्द हुआ, हल्की खांसी हुई, ख़ुद से दवा ख़रीदकर खा लिया. कुछ लोग सीधे पैरासीटामॉल ख़रीदकर खा लेते हैं, तो कुछ इंटरनेट पर पसरे हुए ज्ञान की मदद लेते हैं. और पैरासीटामॉल के साथ-साथ पहले ही दिन से तमाम स्टेरॉइड लेने लगते हैं. स्टेरॉइड यानी डेक्सामेथासोन जैसी दवाएँ. लेकिन कोरोना हो या कोई भी आम बुखार, इलाज का सलीक़ा और शऊर दोनों ही इंटरनेट से काफ़ी दूर और परिष्कृत हैं. बात ऐसी है कि ख़ुद से कोई भी दवा खाने वाले लोगों ने ख़ुद का बहुत नुक़सान किया है. ये नुक़सान इतना बड़ा है कि ख़ुद से दवा खाने की वजह से शायद ब्लैक फ़ंगस जैसी बीमारी प्रकाश में आ रही है, जिसकी वजह से कोविड से ठीक हुए मरीज़ों को अपनी आंख गंवानी पड़ रही है.

कोई भी दवा तभी खाएं या टेस्ट तभी करवाएं, जब डॉक्टर कह रहा हो. सलाह पर ही आगे बढ़ें. आगे बढ़ने से पहले एक कहावत है. नीम हकीम खतरा-ए-जान. कई बार कई मौक़ों पर ये कहावत सुन चुके होंगे. कोरोना काल में भी ये मुहावरा सही बैठता है. हमारी ग्रामीण आबादी के बीच स्वास्थ्य सेवाओं का हाल कमोबेश ज़ाहिर है. इन इलाक़ों में न कायदे से इलाज उपलब्ध हैं और न ही संसाधन. जब तबीयत बिगड़ती है तो लोगों को शहर का रूख करना पड़ता है. महामारी के इस दौर में जब शहरों की हालत पहले से ही खराब है. अस्पतालों में लाइन लगी है. बेड के लिए मारामारी मची है तो ऐसे में ग्रामीण आबादी पूरी तरह से झोलाझाप डॉक्टरों पर निर्भर हो गई है.

वीडियो वायरल है, सही ही होगा

गांवों से अब सोशल मीडिया की ओर चलते हैं. जहां कोरोना से बचाव के ऐसे तरीकों की बाढ़ सी आई हुई है, जिनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. एकदम बेसिरपैर की सलाह. एक वायरल वीडियो में एक तिलकधारी बाबा बता रहे हैं कि उन्हें कोरोना का रामबाण इलाज पता चल गया है. नाक में तीन-तीन बूंद नींबू का रस डाल लीजिए. पांच सेकेंड में ही ये रस आपके पूरे सिस्टम नाक-कान-गले-हृदय को शुद्ध कर देगा. जिसने भी ऐसा किया है, वो मरा नहीं है और स्वस्थ हुआ है. ये दावा कितना भ्रामक और मूर्खतापूर्ण है, ये हम ख़ुद ही बता सकते हैं. कुछ भी हो, ऐसा मत करिए.

इसी तरह के कई और दावे सोशल मीडिया पर किए जा रहे हैं. जैसे- कोई कह रहा है कि लौंग, कपूर, नीलगिरी और अजवाइन का तेल सूंघने से कोरोना मर जाता है तो कोई काली मिर्च, अदरक और शहद से कोरोना मारने का दावा कर रहा है. कोई ऑक्सीजन की कमी दूर करने के लिए पीपल के पेड़ पर चढ़कर बैठने की सलाह दे रहा है. कई लोग ऑक्सजन की कमी दूर करने के लिए पुड़िया में लौंग, कपूर और अजवायन मिलाकर सूंघ ले रहे हैं, स्थिति सुधर नहीं रही, बल्कि और बिगड़ जा रही है. सोशल मीडिया पर वायरल इन दावों पर आप विश्वास कर लें इसके लिए वायरल पोस्ट के अंत में किसी बड़े संस्थान के मनगढंत डॉक्टर का नाम भी लिख दिया जाता है.

इस महामारी से हमारी जिंदगी कितनी बुरी तरह प्रभावित हुई है, ये साफ़ है. हममें से कितने ही सारे लोगों ने इस महामारी में अपने परिजनों, दोस्तों, सहेलियों और यारों को खो दिया है. अब जब ये साफ़ है कि कोरोना शहरों के साथ-साथ गांवों में पहुंच रहा है, तो इन दावों को हर बार वैज्ञानिक चेतना के साथ झुठलाने की ज़रूरत है. लेबल करने की ज़रूरत है कि ये दावा ग़लत है और मूर्खतापूर्ण है. इससे कोरोना का न तो इलाज होता है और न ही जान बचायी जा सकती है. ऐसे में ग़लत और भ्रामक दावों से बचें, और ख़ुद का इलाज ख़ुद से करने से बचें. डॉक्टरों, वैज्ञानिकों और तमाम विशेषज्ञों की बातों पर भरोसा करें. साथ ही ख़याल रखें अपना, अपनों का और आसपास जो भी मदद मांगता दिखे, उसकी पक्की और तसल्लीबख़्श मदद करें.


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