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भारत सरकार के दवाई इस्तेमाल के ये नये नियम कोरोना में हमारी कैसे मदद करने वाले हैं?

दवा को लेकर नया नियम आ रहा है. नए वाले नियम में अगर किसी को कोई जानलेवा बीमारी है, या कोई ऐसी बीमारी है जिससे उसके शरीर का कोई हिस्सा हमेशा के लिए ख़राब हो सकता है, ऐसी स्थिति में उसका इलाज करने वाला अस्पताल ऐसी दवा भी लगा सकता है, जिसकी अभी पुष्टि नहीं हुई है. मतलब अभी प्रयोग चल रहा है, पता नहीं कि दवा का क्या असर होगा, लेकिन दवा दे सकते हैं. 

क्या हैं ये नियम?

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने न्यू ड्रग एंड क्लिनिकल ट्रायल (संशोधित) नियमों का एक ड्राफ़्ट यानी ख़ाका तैयार किया है. ये नियम सबसे पहले 2019 में बनाए गए थे, अब 2020 में संशोधन के साथ सामने हैं. इसमें दवा के इस्तेमाल के लिए compassionate use का इस्तेमाल किया गया है. शब्द से मतलब निकालें तो तरस खाकर इलाज के लिए दी गयी परमिशन, या दया भाव से. तो दवा के कम्पैशनट इस्तेमाल का प्रावधान इस नए संशोधन में जोड़ा गया है. किसी मरीज़ को यदि गम्भीर और जानलेवा बीमारी हो, या ऐसी बीमारी जिससे उसका शरीर या शरीर का कोई हिस्सा हमेशा के लिए बेकार हो सकता हो, तो इसके लिए अस्पताल या इलाज करने वाला संस्थान इसके लिए भारत में या बाहर बन रही किसी दवा का ऑर्डर दे सकता है. और वो दवा उस ऑर्डर के आधार पर उस मरीज़ के लिए भेजी जा सकती है. लेकिन ऐसी किसी एक्सपेरिमेंटल दवा के इस्तेमाल के लिए अस्पताल को मरीज़ या उसके किसी वंशज से परमिशन लेनी होगी, तमाम साइड इफ़ेक्ट के बारे में जानकारी देनी होगी, और अनुमति मिलने पर ही दवा दी जा सकेगी.

एक्सपेरिमेंटल दवा क्या होती है?

जो दवा अभी मार्केट में काउंटर से ख़रीदने के लिए उपलब्ध नहीं हैं. क्योंकि ऐसी दवाओं पर रिसर्च ही हो रहा है. अभी उन्हें तमाम टेस्ट्स और तमाम परमिशन से गुज़रना होगा, उसके बाद ही वो दवा लोगों के लिए मार्केट में उपलब्ध हो सकेगी. तभी लोगों को खिलाई जा सकती है. लेकिन नए वाले नियम में एक्सपेरिमेंटल दवा के इस्तेमाल के लिए भारी भरकम छूट दी गयी है. 

समझने के लिए उदाहरण चाहिए?

एकदम चाहिए होगा. किसको नहीं चाहिए उदाहरण. कोरोना के उदाहरण से देखें. पिछले हफ़्ते ही भारत सरकार ने कोरोना के इलाज के लिए गिलियड फ़ार्मा द्वारा बनाई जा रही रेमडेसिविर के इस्तेमाल को मंजूरी दे दी. ये दवा कोरोना पर काम करेगी या नहीं, इस बारे में जो भी रिसर्च या दावा है, वो इसको बनाने वाली कम्पनी गिलियड ने ही किया है. यानी दवा का क्लिनिकल रिसर्च — यानी जो मरीज़ों पर असल में इस्तेमाल करके दवा की शक्ति चेक की जाती है — वो हुआ ही नहीं है. फिर भी रेमडेसिविर को कोरोना के इलाज में हरी झंडी दे दी गयी है. ये वाला नियम कुछ ऐसा ही है. 

यानी शुरुआती रिसर्च में सुनाई दे रहा है कि दवा काम कर सकती है, और मर्ज़ गम्भीर है. दवा का ऑर्डर दे दीजिए. 

क्या कुछ रोकटोक भी है?

एकदम है. क्लिनिकल ट्रायल के कई चरण होते हैं. लेकिन कम से कम तीन होने आवश्यक हैं. नए वाले नियमों के तहत उसी एक्सपेरिमेंटल दवा का इस्तेमाल या ऑर्डर किया जा सकता है, जो अपने ट्रायल के तीसरे चरण में हो. उसके पहले हो, तो मान्य नहीं होगा. 

इस सबके अलावा जो दवा बनाने वाली कम्पनी है, उसे भी पेशेंट के लिए दवा बनाने के पहले पेशेंट या उसके घरवालों की अनुमति लेनी होगी. (अस्पताल को लेनी होगी, वो तो बता ही दिया). लेकिन अनुमति मिलने के बाद ही मामला नहीं हल होता है. अनुमति के बाद अस्पताल या चिकित्सा संस्थान की एथिक्स कमिटी — यानी नियम क़ानून का ख़याल रखने वाली कमिटी — को सबकुछ बताना होगा. वहाँ से भी परमिशन लेनी होगी, और फिर दवा का उत्पादन और उसका वितरण शुरू किया जा सकेगा.

कितने दिनों तक दवा के कितने डोज़ उपलब्ध होंगे?

सारे परमिशन के बाद दवा बनाने वाली कम्पनी को एक लाइसेंस मिलेगा. इस लाइसेंस की मियाद एक साल तक की ही होगी. यानी एक साल तो उस अस्पताल और मरीज़ के लिए दवा बनाई जा सकती है. और किसी मरीज़ के लिए कुल मिलाकर औसतन 100 खुराक तक ही ये दवा बनाई जा सकेगी. लेकिन अपवाद के केस में लाइसेंस के नियम बदले जा सकते हैं. बस अस्पताल की एथिक्स कमिटी और केंद्रीय ड्रग रेगुलेटर से परमिशन लेनी होगी, फिर उक्त दवा का और भारी मात्रा में प्रोडक्शन शुरू किया जा सकेगा. 

तो क्या ये नयी दवा मार्केट से ख़रीद सकते हैं?

नहीं. जिस मरीज़ और जिस अस्पताल के लिए उक्त दवा की परमिशन मिलेगी, वो दवा सिर्फ़ उसी मरीज़ और अस्पताल के लिए भेजी जा सकेगी. किसी और अस्पताल को या कहीं खुले मार्केट में बेचे जाने के लिए दवा उपलब्ध नहीं करवाई जा सकेगी. 

यानी मिलाजुलाकर एक्सपेरिमेंट का मसला चल रहा है. गम्भीर बीमारी बीच में है. तो लोगों की जान ख़तरे में है, तो जल्द से जल्द दवा मंगवाकर दे दो. शायद जान बच जाए.


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