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कोरोना डायरीज़: ये लड़की पुराने अखबार में क्या चीज तलाशती रहती है?

नेहा
नेहा

नाम- नेहा नेत्री राय

काम- यूपीएसी की तैयारी

जगह- बनारस

मैं बिहार की हूं. आरा की. पिछले 6 साल से बनारस में रह रही हूं. बीएचयू में पढ़ती थी. एमए कर लिया. अब हॉस्टल से निकलना पड़ा तो कैम्पस के बाहर कमरा लेकर रहती हूं. UPSC की तैयारी करती हूं. एक टाइम के बाद यही करना होता है. मै यूनिवर्सिटी के कई आन्दोलनों में एक्टिव रही हूं इसलिए मेरी बातें पॉलिटिकल हो सकती हैं. मैं ये सब इसलिए बता रही हूं कि आपको ये भ्रम न हो जाए की मैं किसी पार्टी सदस्य हूं या छात्र नेत्री हूं. नाम में भले नेत्री है. ये UPSC की परीक्षा समाज की बेसिक घटनाओं और रोज़ के अपडेट्स एक जागरुक और निष्पक्ष राय की उम्मीद करती है.

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होली की छुट्टियों मे घर जाने से पढाई डिस्टर्ब हो गई थी. अब पुराने अखबार से अपने काम की चीज तलाशती रहती हूं. आजकल रोज़ दो-ढ़ाई घण्टे फ़र्श पर बैठ कर पिछले सप्ताह के अखबार देखती हूं.अखबार में दिल्ली दंगों और शाहीन बाग की खबरें हैं. बीच-बीच में एमपी की उथल पुथल पर रिपोर्ट्स हैं. लेकिन लगभग रोज़ के मुख्य पृष्ठ पर महामारी के अपडेट्स ध्यान मांग रहे. हमारा भी और सरकार का भी. लेकिन सरकारी तौर पर इस चिंता का जिक्र भी नहीं कहीं. खैर, ये कोई आश्चर्य का विषय नहीं हैं मेरे लिए. पिछले दो महीने से देश के प्रधानमंत्री के लिए कुछ भी चिंता का विषय नहीं रहा है. ना आम जनता के लिए ही. बस कुछ विशेष लोग, कुछ गिने-चुने पत्रकार और छात्र नेता उन विषयों पर जनता का ध्यान मांग रहे हैं. लोग उन्हें वामपंथी और देशद्रोही तक कह दे रहे हैं. अखबारों की एक यही तो खासियत होती है. किसी भी खबर को बेतरतीब और एक स्ट्रेटजी के तहत छापकर उस विषय को सामान्य कर देते हैं. और जनता उन खबरों की आदी हो भी जाती हैं. कोरोना को लेकर गंभीरता का आलम ये है कि किसी रविवार को प्रधानमंत्री ने दीप जलाने को कहा तो लोग पटाखे जलाने लग गये.

नेहा के कमरे की तस्वीर है. उन्होंने ही उतारी है.
नेहा के कमरे की तस्वीर है. उन्होंने ही उतारी है.

आजकल कोरोना के कारण कमरे से गहरा रिश्ता जुड़ गया है. कमरे की चमकती हुई फ़र्श, इतनी ही मेरी जमीन है. और खिड़की के पल्लो से दिख रहा आसमान ही मेरे हिस्से का आसमान है. खुद से गैस भरवाना, पैदल अपनी जरूरत के अन्य समान खोज खोज कर लाना ये सब नये तरह के अनुभव हैं. और सबसे जो मजेदार बात है वो है मेरा सुबह 4 बजे जग जाना. इन्हीं दिनों मैं सीढ़ियों से गिर गई. कोरोना के काल में अस्पताल, इन्जेक्शन, अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे सब देखना पड़ा. बाद में मालूम हुआ कि कॉनफिडेंस बढ़ गया है. अब खाना भी बनाती हूं और खुद ही चोट की सेंकाई भी करती हूं. कमरे में अकेले तो हूं पर अकेलापन नहीं है. किताबें हैं तो रौनक लगती है. कभी कभी मजदूरों की तस्वीर और स्थिति देख कर अजीब तरह का दु:ख होता है. सरकारों के लिए कितना ही मुश्किल काम है. मैं एक स्टूडेंट हूं और कई तरीके सोचती हूं कि ऐसे इनकी मदद हो सकती है. क्या सरकार मैं बैठे लोगों को यह आसान तरीके नहीं समझ आते.

कोट-

मैं यह सब सोच के तंग नहीं होती हूं. किताबों पर थोड़ा ज्यादा ध्यान लगा कर, तैयारी करने लगती हूं.


कोरोना डायरीज. अलग अलग लोगों की आपबीती. जगबीती. ताकि हम पढ़ें. संवेदनशील और समझदार हों. ये अकेले की लड़ाई नहीं है. इसलिए अनुभव साझा करना जरूरी है. आपका भी कोई खास एक्सपीरियंस है. तस्वीर या वीडियो है. तो हमें भेजें. 

corona.diaries.LT@gmail.com



वीडियो देखें:

कोरोना डायरीज़: लॉकडाउन में फंसे लोगों के लिए इसल लड़की के काम के आप फ़ैन हो जाएंगे-

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