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कोरोना डायरीज: ये डॉक्टर क्यूं बोले, ‘कोरोना के असल आंकड़े डरावने हैं, अगर वो पता चल सकें’

तस्वीर एक डॉक्टर की ही है लेकिन सांकेतिक है
तस्वीर एक डॉक्टर की ही है लेकिन सांकेतिक है

नाम- सरफ़राज़ (बदला हुआ नाम)

काम- रेज़िडेंट डॉक्टर

पता- पटना, बिहार

मैं डॉक्टर हूं. बिहार के पटना ज़िले में इस समय तैनात हूं. एक सरकारी अस्पताल में. लॉकडाउन के बाद पता चला कि देश भर में मेरे रिश्तेदार हैं. जाने कहां-कहां से नंबर निकालकर लोग फोन करते हैं. हमारे बिहार में परंपरा है ‘दूर की रिश्तेदारी वाली’. लोग फोन करके ‘असल हालत’ जानना चाहते हैं. उन्हें लगता है कि सरकार आंकड़े छुपा रही है. या तो लोग फोन करके सर्दी ज़ुकाम जैसे सिम्टम बताते हुए पूछते हैं कि कहीं कोरोना तो नहीं हुआ. मुझे सुबह से देर रात तक अस्पताल के कोरोना सेंटर में काम करना होता है. इन अनचाहे फोन कॉल्स से परेशान हुआ तो नंबर बदल दिया.

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लेकिन आपको पता है कि असल हालत क्या है? आपका चाहे जो जवाब हो. लेकिन पटना के किसी भी डॉक्टर से पूछिए, जो कोरोना को डील कर रहा हो. वो जवाब नहीं देगा. क्योंकि सरकार की लापरवाही के कारण आपको दहशत में नहीं डाला जा सकता. 22 मार्च को जब बड़े-बड़े लोग थाली बजाकर हमें वाह-वाही दे रहे थे, तब हमारे अस्पताल में चीफ़ मेडिकल ऑफिसर और रेज़िडेंट डॉक्टरों के बीच बहस चल रही थी. मुझे याद है. शाम का टाइम था. थालियों की आवाज़ आ रही थी. और अधिकारी हमें बिना ‘पर्सनल सेफ्टी किट’ के ही काम करने का आदेश दे रहे थे. आपको विश्वास नहीं होगा कि तब तक हम लोग अपने-अपने घर से लाए रेनकोट पहनकर कोरोना से लड़ रहे थे. उसके बाद किट भेजी गईं. लेकिन ऐसे जैसे हमारे यहां बारात को घी परोसा जाता है. गिन चुन के.

अस्पताल में सैकड़ों पोटेंशियल पॉजिटिव केस रोज़ आते हैं. लेकिन अब भी हमें मेडिकल ग्रेड की किट नहीं मिली है. एक ही ग्लव्स और मास्क कई दिनों तक इस्तेमाल करना पड़ता है. उसको रात में हैण्ड वॉश में भिगोकर रखते हैं. क्यूंकि ड्यूटी करनी है. सरकार का ‘सख्त आदेश’ है. अपने लिए किट मांगिए तो बिटवीन दी लाइन्स आपको ‘देख लिए जाने’ की बात कह दी जाती है. सब अपनी-अपनी खाल बचाने में जुटे हैं. अधिकारी लोग मंत्री जी को आगे क्या जवाब देंगे? फिर मंत्री जी आगे सीएम साहब से क्या कहेंगे?

दुनिया भर में कोरोना के फ्रंट लाइनर्स को हर तरह की सुविधा दी जा रही है (तस्वीर सांकेतिक, PTI)
दुनिया भर में कोरोना के फ्रंट लाइनर्स को हर तरह की सुविधा दी जा रही है (तस्वीर सांकेतिक, PTI)

थोड़ा टाइम मिलता है तो मोबाइल देखते हैं. दुनिया भर की ख़बर आती है. सब लोग सैकड़ों करोड़ दान दे दिए. दान देकर इमेज चमकाए और छुट्टी. लेकिन कोई देखने क्यों नहीं आता कि यहां बिहार के ग्रामीण इलाकों में या भारत भर के गांवों में जो ज़िला अस्पताल हैं, उन तक क्या सुविधाएं पहुंची हैं.

हमें भी पता है ये ऐतिहासिक दौर है. आगे की पीढ़ी से हम कह सकेंगे कि उस समय हम रोज़ घरों से निकलकर लोगों को बचाने जाते थे. लेकिन हम बचेंगे तब न? हमें इतनी बेसिक चीज़ें सरकार नहीं दे पा रही है?

टेस्ट सेंटर्स पर जाइए. आपको पता चलेगा कि कैसे लोगों के साथ मज़ाक किया जा रहा है. असल में इस महामारी से लड़ने के लिए हमारे पास संसाधन हैं ही नहीं. एक दिन हम सब रेज़िडेंट डॉक्टरों ने यहां हड़ताल भी की थी. लेकिन फिर सरकारी तंत्र से ही ऐसी-ऐसी धमकियां मिलीं कि मन टूट गया.  

कोट-

डॉक्टर हर कीमत पर जीवन बचाने के लिए तैयार है. लेकिन वो कीमत मौत नहीं होनी चाहिए.


 

कोरोना डायरीज. अलग अलग लोगों की आपबीती. जगबीती. ताकि हम पढ़ें. संवेदनशील और समझदार हों. ये अकेले की लड़ाई नहीं है. इसलिए अनुभव साझा करना जरूरी है. आपका भी कोई खास एक्सपीरियंस है. तस्वीर या वीडियो है. तो हमें भेजें. corona.diaries.LT@gmail.com 



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