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कोरोना डायरीज़: इस लड़की ने लॉकडाउन में जो सीख लिया, देखकर अच्छा लगेगा!

हर्षिका
हर्षिका

नाम- हर्षिका

काम- स्टूडेंट

जगह- बनारस

मैं एक घर में लगभग बंद हूं. लगभग शब्द इसलिए कह रही, क्योंकि दिन में एक बार दूध लेने के लिए बाहर निकलना पड़ता है. सुबह 7 बजे तक उठ जाओ तो दूध मिल जाता है बाकी अगर नींद नहीं खुले तो दूध नहीं मिलता और तब दिन भर चाय पीने का मन करता है. तब महसूस होता है कि लॉकडाउन चल रहा है.

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मैं इस टाइम बनारस में हूं. रेड ज़ोन में. यहां कई इलाके हॉटस्पॉट बन चुके हैं कई जगहें सील हो गयी हैं. ऐसे में बाहर निकलना वीरता का काम है. इसलिए ‘घर’ में ही रहती हूं. हम किराये पर रहने वाले स्टूडेंट्स के पास अमूमन एक कमरा ही होता है जिसे हम घर कहते हैं. घर इसलिए भी कह ले रही क्योंकि इसमें हमारी जरूरत का सारा सामान है-किताब, कापी, पेन, गिटार (जो बहुत अच्छे से बजाना भले ही नहीं आता लेकिन कभी-कभी अच्छा टाइम पास करता है), एक छोटा चूल्हा (जिससे खाने पीने का मैनेज हो जाता है), आखिरी कुछ कपड़े और मेकअप (मेकअप जो ज्यादा खुश होने पर इस्तेमाल होता है).

लेकिन इस लॉकडाउन में सबसे जरुरी चीज़ जो मुझे मिली है वो है मेरी पेंटिंग किट. मैं तो भूल ही गयी थी कि मैं पेंट भी कर सकती हूं. इसके लिए लॉकडाउन को थैंक्स कहूंगी. बाकी ‘घर’ में एक बेड है जो इस लॉक डाउन में मुझसे ऊब गया है इसलिए आज मैंने उसे दूसरे कोने में डाल दिया है. और जमीन पर लेटने की प्लानिंग की है.

हर्षिका ने अपनी इस तस्वीर को 'दिमाग की गंदगी' नाम दिया है.
हर्षिका ने अपनी इस तस्वीर को ‘दिमाग की गंदगी’ नाम दिया है.

मां जब फ़ोन करती हैं कहती हैं घर आ जाओ, वो भी जानती हैं कि ऐसा मुश्किल है. घर यहां से 650 किलोमीटर दूर है, बिना पब्लिक ट्रांसपोर्ट के जाना संभव नहीं है. इसलिए उनकी बात सुन लेती हूं. समझाने की कोशिश करती हूं. जाने का कोई प्लान नहीं है.

यहां बहुत सारे दोस्तों के लिए ये लॉकडाउन थोड़ा मुश्किल भरा है. उनकी अपनी परेशानियां हैं. जो दोस्त घर चले गए हैं उनकी तो सुन के लगता है कि अपना ही ठीक है. अधिकतर के यहां ज्यादा फोन चलाने पर मनाही है. यहां जो साथ की लड़कियां बनारस में हैं वो बेसिक जरूरतों के लिए संघर्ष कर रही हैं. दुकानों पर सैनेटरी पैड मिलने में मुश्किलें हो रही. या तो मिलता नहीं है या किसी दुकान पर अगर मिल भी रहा तो उसकी क्वालिटी ख़राब होने के चलते हाइजीन का ख़तरा है. 40 रुपये के सैनेटरी पैड की कीमत दो गुनी कर के बेंचा जा रहा है. ऑनलाइन डिलीवरी करने वाली साइट्स ने तो तीन गुना तक दाम बढ़ा दिया गया है.डिलीवरी चार्ज अलग से ले रहे हैं सब.

 इसे scribble art कहते हैं. हर्षिका ने बताया कि इसमें ब्लैक पेन से कलाकारी की गयी है.
इसे scribble art कहते हैं. हर्षिका ने बताया कि इसमें ब्लैक पेन से कलाकारी की गयी है.

किसी तरह की कोई रोक टोक नहीं है. ये लॉकडाउन मेरे लिए खूबसूरत है क्योंकि जरूरत का सारा सामान और पेंटिग्स ये मेरे पास हैं. अपने लिए बहुत सारा वक़्त है जो चीज़े छूट गयी थी या फिर जिनके लिए वक़्त नहीं था वो फिर से करने लग गयी हूँ. दिन भर कुछ ना कुछ करते बीतता है अब कविताएं बहुत ज्यादा पढ़-लिख लेती हूं, पेंटिंग्स करने लगती हूं. हालांकि पेंटिग के लिए कैनवास और रंग नहीं हैं इसलिए पेंसिल का इस्तेमाल कर ड्राइंग शीट पर स्केचिंग कर रही हूं. इन सारी अय्याशियों के बाद भी कुछ वक्त किताबों के लिए निकल ही आता है. गिटार की धुन मैडिटेशन का जरिया है.

# कोट-

कुल मिलाकर हम घर पर होते तो शायद एक-एक दिन गिन रहे होते. यहां सही है.


कोरोना डायरीज. अलग अलग लोगों की आपबीती. जगबीती. ताकि हम पढ़ें. संवेदनशील और समझदार हों. ये अकेले की लड़ाई नहीं है. इसलिए अनुभव साझा करना जरूरी है. इस वीडियो में हर्ष अपनी कहानी बता रहे हैं. जो गुरुग्राम के एक कॉल सेंटर में काम करते थे. अगर आपका भी कोई खास एक्सपीरियंस है. तस्वीर या वीडियो है. तो हमें भेजें.

corona.diaries.LT@gmail.com पर.



वीडियो देखें:

करोना डायरीज़: पोलैंड में कोरोना वायरस से कैसे निबट रही है सरकार? –

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