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कोरोना डायरीज़: जब एक ऑडियो सुनकर इन MR ने मॉर्निंग वॉक पे जाना बंद कर दिया

रत्नेश उपाध्याय
रत्नेश उपाध्याय

नाम- रत्नेश उपाध्याय

काम- मार्केटिंग रिप्रेजेंटेटिव

जगह- बलिया
हमें अपनी कंपनी की दवाईयों के लिए डॉक्टर्स से बात करनी होती है. पहले सुबह डे-प्लान बनाना होता है. कहां जाना है और किन किन डॉक्टर्स से मिलना है. बेसिकली अपने ब्रांड की दवाईयां ज्यादा सेल हों ये हमारा उद्देश्य होता है. कंपनी टार्गेट देती है. हर महीने आपको एक निश्चित एमांउट की दवाईयां सेल करानी हैं. उसमें कमी-बेसी पर आगे की जवाबदेही तय होती है. फिलहाल दो सप्ताह से सब बंद है. ऐसे में कुछ कर नहीं सकते. कंपनी ने भी काफी सहूलियत दी है. बहुत दबाव नहीं है, लेकिन हमें अपना काम तो करना ही है. इसलिए मैं पर्सनली डॉक्टर्स के टच में रहता हूं. कॉल पर या व्हाट्सऐप पर, जैसे भी पिंग करता रहता हूं. अब लोग तो बीमार हो रहे हैं. दवाईयां तो चाहिए ही. ठीक ये हुआ है कि यह फाइंनेस इयर खत्म हो गया. तो अब जो नए टार्गेट मिलने थे वो सब कुछ ठीक होने के बाद मिलेंगे. कंपनी फ्लैक्सिबल हुई है.

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पहले काम से इंटिरियर में निकलते थे तो घर आने की जल्दी रहती थी. अब दिन भर घर में रहते रहते थक गया हूं. पूरे दिन सोशल मीडिया करता रहता हूं. वजन की चिंता लगी रहती है. पहले साइकलिंग करता था. दो दिन पहले एस.पी. का ऑडियो जारी हुआ था कि बेवजह सड़क पर ना निकलें. मॉर्निंग वॉक पर भी नहीं. उसके बाद से बालकनी और छत ही सहारा हैं. घर में छोटे बच्चे हैं तो मन लगा रहता है लेकिन कई बार चिढ़ भी मच जाती है. मैंने काम नही रोका है. डॉक्टर्स से टच में रहता हूं. अपना ब्रांड नेम कान तक पंहुचता रहे, बहुत है. सब ठीक होगा तो देखेंगे. वैसे ट्रांसपोटेशन भी नहीं हो रहा, तो दवाईयों का स्टॉक भी कम होता जा रहा. सिर्फ ज़रुरी दवाईयां ही मंगाई जा रही हैं.

सांकेतिक तस्वीर. साभार-PTI
सांकेतिक तस्वीर. साभार-PTI

जनरली मैंने देखा है, लोग डॉक्टर्स से मिलने आते हैं तो भी साफ ढ़ंग से नही रहते. कैसे भी आ जाते हैं. अब लगता है कि लोग सेनेटाइजेशन को लेकर सीरियस हुए हैं. कब तक रहेंगे ये देखने लायक होगा. बाकी जो सबसे बड़ा प्रभाव पड़ा है वह खेती किसानी पर है. गेहूं की फसल लगी है. पंजाब से कटाई के लिए हार्वेस्टर नहीं आ सके. ना ही मजदूर मिल रहे. सबसे ज्यादा प्रभाव टियर टू के शहरों पर पड़ेगा. यहां सबको दिक्कत होगी.

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चिंता मजदूरों की करनी चाहिए. ये शहर लौटने की हिम्मत कर के, सितंबर के बाद तक जाएंगे. तब तक उनकी जान बची रही तो.


कोरोना डायरीज. अलग अलग लोगों की आपबीती. जगबीती. ताकि हम पढ़ें. संवेदनशील और समझदार हों. ये अकेले की लड़ाई नहीं. है. इसलिए अनुभव साझा करना जरूरी है. आपका भी कोई खास एक्सपीरियंस है. तस्वीर या वीडियो है. तो हमें भेजें.

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