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कोरोना डायरीज: ‘ख़बर लिखते-लिखते, मैं भी ख़बर बन जाऊंगा’

नाम- विवेक (बदला हुआ नाम)

काम- प्रिंट जर्नलिस्ट

पता- लखनऊ

छोटे थे तो नज़र से जुड़ा एक नियम पढ़ा था. कोई ऑब्जेक्ट नज़र से ज़्यादा दूर हो तो नहीं दिखता. और ज़्यादा नज़दीक हो तो भी नहीं दिखता. जो पैदल सैकड़ों किलोमीटर चलकर गांव लौट रहे हैं, वो मजदूर हैं दूर के ऑब्जेक्ट. देखिए नाम में ही ‘दूर’ है. और हम पत्रकार हैं नज़दीक के ऑब्जेक्ट. हम ख़बर के इतने क़रीब होते हैं कि कभी ख़बर में नहीं आ पाते. अभी खोज-खोज के हमने वो कंपनियां बंद करवाई हैं जिनके लोगों को जबरन काम पर बुलाया जा रहा था. इसे हम अखबार के लोग ‘ख़बर का असर’ कहते हैं.

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लेकिन मैं आज भी रोज़ अपनी मोटरसाइकिल पर दफ़्तर जाता हूं. दिन में भी शहर का  सन्नाटा नाइट शिफ्ट का एहसास कराता है. पुलिस वाले तक़रीबन सब पहचानते हैं, इसलिए प्रेस कार्ड दिखाने की ज़रुरत नहीं पड़ती.

मालिक ने लॉक डाउन के शुरू में ही सबको मेल कर दिया था कि ‘हम भी डॉक्टरों की तरह फ्रंट लाइन के सिपाही हैं. और इस महामारी के दौर में भी काम करते रहना हमारी ‘नैतिक ज़िम्मेदारी’ है. नैतिकता का नाम सुनकर ही हंसी आ गई. नैतिकता के बेसन में लपेटकर असल में मुनाफ़े का पकौड़ा तला जा रहा है. और हम सब हैं लाल-हरी चटनी. मालिक खाएं आराम से. चाय के साथ अपने आलीशान ड्राइंग रूम में.

अभी कल शाम को ही अजीब वाकया हुआ. पीजीआई के एक डॉक्टर के साथ रात को चाय पी रहा था. तब तक एक पहचान के पुलिस अधिकारी आ गए. हम तीनों साथ बैठे. ना मास्क ना ग्लव्स. तीनों की एक ही कहानी. फ्रंट लाइन के सिपाही. तीनों व्यवस्था के मारे हुए.

एक और सांकेतिक तस्वीर.
एक और सांकेतिक तस्वीर.

कभी पीजीआई के सामने खड़े होकर मरीज़ों को देखिए. जितने भीतर उससे ज़्यादा बाहर सोते हैं. सरकारें चाहे जो कहें लेकिन काम सब अपनी धीमी रफ़्तार से ही चल रहा है. बिना पैसे और पहुंच के ढंग का इलाज कहां होता है.

किसी दिन सुबह नहाने के बाद हल्की सी भी छींक आ जाती है तो दिन भर दिल बैठा रहता है. पता नहीं अभी बचे हैं कि नहीं. दिल्ली में हमारी पहचान के दर्जनों पत्रकार हैं टीवी मीडिया के, वो भी रोज़ टाइम से ऑफ़िस जा रहे हैं. कैब में तीन से चार लोग बैठ के आते-जाते हैं. ये कितना सेफ़ है? ये सवाल कहां उठेगा?

लेकिन ‘शो मस्ट गो ऑन’ वाला मामला है. अगर कोरोना की चपेट में आ गए तो कौन मालिक मुखिया होगा? किसके आगे हाथ फैलाएंगे?

पत्रकारिता करते बरसों हो गए. लेकिन ये दौर भी आएगा सोचा नहीं था. घरवाले अलग परेशान हैं. पत्नी बच्चे दिन में कई दफ़े यूं ही फोन करते हैं. फोन पर हल्की सी भी खांसी आ गई तो दिन भर प्राण सूखे रहते हैं पत्नी के. लेकिन क्या करें. ख़बर तो लिखनी ही है न.

कोट-

जो अखबार आपके दरवाज़े तक पहुंचता है. उसमें हमारे डर और निराशा का भी हिस्सा होता है.


कोरोना डायरीज. अलग अलग लोगों की आपबीती. जगबीती. ताकि हम पढ़ें. संवेदनशील और समझदार हों. ये अकेले की लड़ाई नहीं. है. इसलिए अनुभव साझा करना जरूरी है. आपका भी कोई खास एक्सपीरियंस है. तस्वीर या वीडियो है. तो हमें भेजें. corona.diaries.LT@gmail.com


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कोरोना लॉकडाउन:सलमान खान इस तरह कर रहे 25 हजार कामगारों की आर्थिक मदद-

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