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कोरोना डायरीज़: दस हज़ार की सरकारी मदद क्यों नहीं ले रहीं दिल्ली हाईकोर्ट की ये वकील?

 

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर

नाम- प्रांजिता (बदला हुआ नाम)

काम – दिल्ली हाईकोर्ट वकील

पता – नई दिल्ली

मैं दिल्ली हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करती हूं. बहन की शादी में कोलकाता आई थी. अगले दिन ही पीएम ने लॉकडाउन अनाउंस कर दिया. तबसे मैं और मेरे कई रिश्तेदार यहीं फंसे हुए हैं. सिर्फ़ मेरा परिवार ही नहीं और भी कई शादियों में जो लोग बाहरी राज्यों से आए थे, सब फंसे हुए हैं. समझ नहीं आ रहा कि क्या किया जाए. लग रहा था कि 21 दिन के लॉकडाउन के बाद शायद जो लोग इधर उधर फंसे हुए हैं उनके लिए मूवमेंट कराया जाएगा. लेकिन पीएम ने अब 3 मई तक लॉकडाउन कर दिया है. ऊपर से कहा है कि नियम पहले से और सख्त होंगे.

मुझे दिल्ली में लॉ प्रैक्टिस करते हुए 9 साल हो गए. सेशन कोर्ट्स से शुरू किया था. अब हाई कोर्ट तक पहुंची हूं. घर में हम दो बहनें और मां दादाजी हैं. पापा काफ़ी पहले गुज़र चुके हैं. सेल्स में नौकरी करते-करते वकालत की पढ़ाई की थी मैंने. हम दोनों बहनों को ही घर का सारा ज़िम्मा उठाना था. घर बैठकर पढ़ाई नहीं कर सकते. हमारे यहां वकालत में एक कहावत कही जाती है ‘बाप की फसल बेटा काटता है’. इस कहावत में हम वकीलों का सारा स्ट्रगल छुपा हुआ है. अगर आपकी लास्ट जेनेरेशन लॉ प्रैक्टिस में नहीं रही है तो बहुत दिक्कत आती है. बहुत ज़्यादा. केस आपको तभी मिलेगा जब कोई आपको रेकमंड करेगा. उसके लिए लोगों के पास अपने रिश्तेदार बहुत हैं. कोई आपको रेकमंड क्यों करेगा?

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ऐसे ही बड़े वकीलों के साथ इंटर्नशिप कर करके मैं आगे बढ़ी. फिर ख़ुद की प्रैक्टिस शुरू की. अब कहीं जाकर काम ठीक चल रहा था. इतनी सेविंग कभी थी नहीं कि इतना लंबा टाइम बिना कोर्ट गए आराम से निकल जाए. सबकी तरह हमारा भी काम ठप्प है. कहीं से एक पैसा नहीं आ रहा. कोर्ट सिर्फ़ इमरजेंसी सुनवाई ही कर रही है.

अब दिल्ली हाईकोर्ट बार एसोसिएशन 10 हज़ार रूपए दे रही है. लॉकडाउन में सर्वाइव करने के लिए. बार काउंसिल ऑफ़ दिल्ली 5 हज़ार दे रही है. दोनों में से कोई एक आप अप्लाई कर सकते हैं. लेकिन उसकी कई शर्तें हैं. जैसे कि आपके सामने सर्वाइवल की भयानक दिक्कत होनी चाहिए. आपको लिखकर देना होगा. कोर्ट इसे रिकॉर्ड के तौर पर रखेगी.

दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन का वो आदेश जिसमें ज़रुरतमंद वकीलों को दस हज़ार रुपए की आर्थिक मदद की बात कही गई है
दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन का वो आदेश जिसमें ज़रुरतमंद वकीलों को दस हज़ार रुपए की आर्थिक मदद की बात कही गई है

टू बी क्वायट फ्रैंक हमारा काम शो बिजनस जैसा है. आपको शो ऑफ़ करना होता है. मेंटेन नहीं कर सकते तब भी गाड़ी रखनी होती है, पॉश जगह ऑफ़िस लेना पड़ता है. क्योंकि क्लायंट को तभी यक़ीन होता है कि आपकी वकालत अच्छी चल रही है और आप उसका केस हैंडल कर लेंगे. ऐसे में बार एसोसिएशन के 10 हज़ार रूपए कोई ले नहीं रहा है. वजह? कोई ख़ुद को ग़रीब नहीं दिखाना चाहता. चार बातें बनेंगी. लिस्ट में आपका नाम होगा. दस हज़ार कभी-कभी एक हियरिंग के ही मिल जाते हैं. मैं पहले अप्लाई कर रही थी. फिर साथ के वकीलों ने मना किया कि क्या कर रही हो. इससे रेपुटेशन ख़राब होगा. मैंने अप्लाई तो नहीं किया. लेकिन एक चिट्ठी बार एसोसिएशन को ज़रूर लिखी है कि ये पैसे ज़्यादा ज़रुरतमंद लोगों को या क्लैरिकल स्टाफ़ को दे दिए जाएं. वकील लोगों को अपनी इज़्ज़त बचानी है तो बचाए रहें.

कोट-

बार-बार उन मजदूरों का चेहरा सामने आ जाता है जिन्हें सैकड़ों किलोमीटर सिर्फ़ इसलिए वापस लौटना पड़ा क्योंकि उनके पास कोई रोज़गार नहीं बचा.


कोरोना डायरीज. अलग अलग लोगों की आपबीती. जगबीती. ताकि हम पढ़ें. संवेदनशील और समझदार हों. ये अकेले की लड़ाई नहीं है. इसलिए अनुभव साझा करना जरूरी है. आपका भी कोई खास एक्सपीरियंस है. तस्वीर या वीडियो है. तो हमें भेजें. corona.diaries.LT@gmail.com



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