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कोरोना डायरीज़: जब ओमान से वापस आए एक बंदे के चलते इनका गांव 'वुहान' कहलाने लगा

संजय सिंह
संजय सिंह

नाम- संजय सिंह
काम- सरकारी सेवा में कार्यरत
जगह- पंजवार, सिवान

 

एक हफ्ते पहले तक सब ठीक था. सरसों की दंवरी हो रही थी. गेहूं काटने की तैयारी चल रही थी. लोग अब हंसिया फावड़ा ठीक कर रहे थे कि अचानक से सबकुछ बदल गया. 21 मार्च को ओमान से वह आया था. हाथ में सील लगी थी. अकेले रहने का निर्देश था. लेकिन नहीं माना. घर वालों को बताया कि यह ओके का सिंबल है. यानि मैं ठीक हूं, इसलिए मुहर लगाई गई है. फिर वह घूमने फिरने लगा. इतने दिन बाद लौटा भी था, बाजार गया. क्रिकेट भी खेला. आने के 10 दिन के बाद सिवान जाकर सैंपल दिया. सरकारी निर्देश था. लक्षण तब तक हावी नहीं थे. उसका मिलना जुलना चलता रहा. जिस दिन उसकी रिपोर्ट आई, वह क्रिकेट खेल रहा था.

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फिलहाल कोरोना ठहरा हुआ है. पॉजिटिव आए लड़के के घरवालों का टेस्ट हुआ. कुल 23 लोग पॉजिटिव हैं. जिसमें उसके घर के 21 लोग हैं. एक वह लड़का है जो उसके साथ क्रिकेट खेल रहा था. फिर पड़ोसियों का टेस्ट हुआ. कुल 150 से अधिक की रिपोर्ट निगेटिव आई है. सभी लोग अलग-अलग जगहों पर क्वारन्टीन हैं. सभी खतरे से बाहर हैं. एक जन आईसीयू में गए थे. लेकिन वह भी अब जनरल वॉर्ड में आ गए हैं.

पंजवार के इस रस्ते पर बच्चे चुहल करते रहते थे. साभार- संजय सिंह
पंजवार के इस रस्ते पर बच्चे चुहल करते रहते थे. साभार- संजय सिंह

गांव सील है. ड्रोन कैमरे पहरा दे रहे हैं. वाच टॉवर भी लगा है. पुलिस पेट्रोलिंग बढ़ गई है. लोग घरों में हैं. कोरोना और पुलिस दोनों के डर से. अब आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति होने लगी है. राशन, गैस और सब्जी लदी गाड़ियां गांव में घूम रही हैं. थोड़ी अव्यवस्था है. उम्मीद है दो एक दिन में ठीक हो जाएगा. लेकिन अभी भी पूरा गांव सैनीटाइज नहीं किया गया है. भाव ऐसे समझें कि गांव वाले चातक पक्षी हों और सैनेटाइज करनेवाले स्वाति नक्षत्र की बूंद बरसाने वाले.

समझ में नहीं आ रहा किसको जिम्मेदार माना जाये. यह सही है कि प्रशासन की अपनी सीमाएं हैं. प्रशासन ने चेताया. एकांत में रहने के लिए कहा. उसे, उसके परिवार की दुहाई दी. वह नहीं माना. सरकार ने कोरोना प्रभावित गांवों के सघन सत्यापन का निर्णय लिया है. सभी जरूरी जांचें भी होंगीं. भरोसा है कि इसके लिये मुहूर्त नहीं निकाला जायेगा.

पिछले 10 दिन हमारे लिये बहुत चुनौती भरे रहे हैं. हमारे गांव पंजवार का नाम सुनकर जिनका चेहरा खिल जाता था उनकी मुस्कान भी कुटिल हो गयी. कुछ लोगों ने पंजवार को वुहान की संज्ञा दे दी.

गांव के एक टोले की हालत. शाम को यहां सब गुलजार रहता था. तस्वीर- संजय जी से प्राप्त हुई
गांव के एक टोले की हालत. शाम को यहां सब गुलजार रहता था. तस्वीर- संजय जी से प्राप्त हुई

पंजवार, ग्राम-समुदाय का आदर्श है. 1940 से पुस्तकालय है यहां.  1980 के दशक में गांव के लोगों ने अपने सर पर खर-पतवार ढ़ोकर गर्ल्स हाई स्कूल बनवाया था. कस्तूरबा बालिका इंटर कॉलेज. 1990 के शुरुआती वर्षों से संगीत कॉलेज चल रहा है. और आज तक जिसने भी यहां से संगीत की पढ़ाई पूरी की, वह अध्यापक ज़रूर बना है. 100 प्रतिशत प्लेसमेंट वाला संस्थान है. आस पास के जिले में ऐसा कोई दूसरा संस्थान नहीं है. एक डिग्री कॉलेज भी है. किसी पूंजीपति ने नहीं बनवाया. एक संत ने जीवन भर की कमाई लगा कर बनवाया. गांव के लोगों ने जमीनें दान दीं. मकसद बस इतना कि गांव के बच्चे भूजा-सतुआ खाकर भी उच्च शिक्षा प्राप्त कर लें.

25 वर्षों से पंजवार ऐसे प्रतिभाओं की खेती कर रहा है.

कोट

और भी बहुत कुछ है. लेकिन ज्यादा नहीं कहना. बस इतना कहना है कि हम हारेंगें नहीं. लड़ेंगें. सरकार का कंधा कमजोर पड़ेगा तो उसका बोझ बांट लेंगें. बस यही आग्रह है कि हमारे गांव को गांव ही रहने दीजिए.


कोरोना डायरीज. अलग अलग लोगों की आपबीती. जगबीती. ताकि हम पढ़ें. संवेदनशील और समझदार हों. ये अकेले की लड़ाई नहीं है. इसलिए अनुभव साझा करना जरूरी है. आपका भी कोई खास एक्सपीरियंस है. तस्वीर या वीडियो है. तो हमें भेजें. 

corona.diaries.LT@gmail.com 

वीडियो देखें:  सीवान के पंजवार जैसा गांव आपने बिहार में देखा नहीं होगा

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