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कोरोना डायरीज: लॉकडाउन के दौरान जबलपुर में शाम पांच बजे से शोर मचने लगता है, 'वो काटा'

आस्था खरया
आस्था खरया

नाम- आस्था खरया

काम – डेंटिस्ट

पता- जबलपुर

कुछ दिनों से आम बातें ख़ास लगने लगी हैं. जैसे की सुबह का शाम हो जाना. यूं तो कॉलेज जाना, मतलब सुबह का होना होता था और घर को लौटना, मतलब शाम का होना. सुबह सबके साथ बैठते हैं. नाश्ता करते हैं. देश-विदेश की बातें करते हैं. ये कोई आम दिनों की बात तो नहीं थी. अब न तो सुबह हड़बड़ाहट भरी होती है. और न ही रात चिंता में डूबी. सुबह जल्दी उठने के लिए रात में जल्दी सोना होता है. इसलिए सुबह की हड़बड़ाहट एक रात पहले घबराहट बनकर आती है. लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा.

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अब बहुत से लोग रोज़ छत पर आने लगे हैं. पहले छत पर सिर्फ बात करने के लिए निकले थे. लेकिन जब बातों से बोरियत होने लगी तो पतंग का इंतजाम कर लिया. अब रोज़ आसमान पतंगों से भर जाता है. और 5 बजते ही आसमान में एक ही आवाज़ होती है. तालियों और थालियों की नहीं. आवाज़ पतंगबाज़ों के युद्धघोष की. ‘वो काटा है’. जब किसी की पतंग कटती है तो हर जगह से यही आवाज़ आती है. मुझे पतंग उड़ाना नहीं आता था. लेकिन पतंगबाजी का ये माहौल शबाब पर था. तो लगे हाथ मैंने भी पतंग उड़ाना सीख ही लिया.

ऐसा भी नहीं कि लॉकडाउन को सब एंजॉय कर रहे हैं. अब मेड दीदी नहीं आतीं. उनकी गैर-मौजूदगी में मम्मी के ऊपर बोझ बढ़ गया. और उनका सारा मज़ा किरकिरा हो गया. लेकिन हमने इसका भी सॉल्यूशन निकाल लिया है. अब काम सभी में बराबर बांट दिया गया है. मोबाइल की ज़रूरत ज़्यादा लगने लगी है. ऐसा लगता है मोबाइल मेरा शरीर है और इंटरनेट उसकी आत्मा. इंटरनेट के बिना इन दिनों से गुज़रना नामुमकिन होता. पापा की परियां और मम्मी के परे, टिक-टॉक बनाकर इंटरनेट और समय का ‘सदुपयोग’ कर रहे हैं.

इन दिनों अफवाह फैलाने का सारा ज़िम्मा वॉट्सऐप ने उठा रखा है. बात हेलीकॉप्टर से देश को सैनिटाइज़ करने की हो या फिर घरेलू नुस्खों से कोरोना को ख़त्म करने की. वॉट्सऐप पर सब घटता है. ऐसा भी नहीं कि वॉट्सऐप में सब बुरा ही है. पहले वॉट्सऐप से कभी नए समाचार सुनने को नहीं मिले. ग्रुप मेंबर्स पहले से ज़्यादा एक्टिव हैं. कोई घर पर बने टेस्टी गोल गप्पे की तस्वीरें भेज रहा है, तो कोई अपनी अलग-अलग कलाओं की. रसोई में सिर्फ पानी पीने के लिए जाने वाले अब यूट्यूब से देखकर लज़ीज़ खाना पका रहे हैं. जिनमें से एक मैं भी हूं.

ये वो दुकान होती थी जिसपर हर कोई बचपन में जाना चाहता था. पतंगे आसमान से बातें करती थीं, और मांझे के रस्ते हमारे कानों में उतर जाती थीं (सांकेतिक तस्वीर)
ये वो दुकान होती थी जिसपर हर कोई बचपन में जाना चाहता था. पतंगे आसमान से बातें करती थीं, और मांझे के रस्ते हमारे कानों में उतर जाती थीं (सांकेतिक तस्वीर)

घरों में नॉस्टाल्जिया वाला माहोल लौट आया है. टीवी पर दूरदर्शन (रामायण) चलता है. और मसखरी करते बच्चों की ज़ुबान पर डायलॉग्स. ‘माते’ और ‘महाराज’ जैसे शब्द बोलचाल में लाकर लोग बड़े मज़े ले रहे हैं. अब बाहर के अड्डों पर पुलिस का पहरा है. दोस्तों से बाहर मिल पाना तो मुश्किल है. तो हमने फिलहाल PubG को ही अपना अड्डा बना लिया है. सालों पहले खरीदा चेस न जाने कब लॉकडाउन में चला गया था. जब से हमारा लॉकडाउन हुआ है, वो रोज़ बाहर निकलने लगा है. रोज़ खेलते-खेलते चेस में मेरी रुचि बढ़ रही है. लूडो नहीं है. लेकिन लूडो की कमी मोबाइल का लूडो किंग पूरी कर रहा है.

माना कि देश के लिए ये समय नाज़ुक है. लेकिन इस समय ने लोगों को ये सिखाया है – अगर हम सब मिल जाएं, तो कोई मुसीबत बड़ी नहीं. इन 21 दिनों ने हमें सुखद मौके दिए. हम अपने परिवार को समय दे सकते हैं. और अपना बचपन दोबारा जी सकते हैं.

कोट-  

और आखिर हमने अनूप सोनी की बात मान ही ली. अब हम सतर्क भी हैं, सावधान भी हैं और घर पर बैठ सावधान इंडिया तो देख ही रहे हैं.


कोरोना डायरीज. अलग अलग लोगों की आपबीती. जगबीती. ताकि हम पढ़ें. संवेदनशील और समझदार हों. ये अकेले की लड़ाई नहीं है. इसलिए अनुभव साझा करना जरूरी है. आपका भी कोई खास एक्सपीरियंस है. तस्वीर या वीडियो है. तो हमें भेजें. corona.diaries.LT@gmail.com


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