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कोरोना डायरीज : क्रिमिनल्स को जेल भेजने वाला मजिस्ट्रेट आज अपने घर में कैद है

 

प्रतीक मिश्रा
प्रतीक मिश्रा

नाम – प्रतीक मिश्रा

काम – ज्युडिशियल मजिस्ट्रेट

पता – बिहार

कोरोना की विश्वव्यापि दहशत को धता बताते हुए, हमलोग मोदीजी की कॉल पर अपने सरकारी आवास की छत पर थाली और ताली पीट कर खुद को जिम्मेदार नागरिक और जिम्मेदार सरकारी सेवक समझ कर खुश हो रहे थे. तभी खबर आई कि पूरे बिहार को लॉक डाउन कर दिया गया है. उत्तर प्रदेश के कई जिले लॉक डाउन किये जा चुके थे. अब तो पूरा प्रदेश लॉक डाउन है. यात्री ट्रेनें पहले ही बंद हो चुकी थीं. ना कहीं से आना, ना कहीं जाना.

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लॉक डाउन शब्द कुछ दिनों से रोज सुन पढ़ रहे थे, और सदोष अवरोध और सदोष परिरोध (Wrongful Restraint & Wrongful Confinement) की जानकारी लॉ स्कूल (BHU में Law Faculty को Law School कहते हैं) के दिनों से थी. लेकिन कसम से एक झटके में कॉन्सेप्ट क्लियर हो गया कि लॉक डाउन क्या चीज़ होती है और क्यों भारतीय दंड संहिता में सदोष अवरोध और सदोष परिरोध को अपराध की श्रेणी में रखा गया है.

परिवार और अपने गांव-देश से लगाव का अंदाज़ा ऐसे ही वक्त होता है जब आप उनसे दूर होते हैं. बनारसी तबीयत ऐसी बंदिशों में और कुलांचे मारती है. फ़िलवक्त, तमाम बेचैनी को परे हटाकर मन को शान्त रखकर ही अपने व्यक्तिगत और सेवा धर्म का निर्वहन किया जा सकता है. न्यायालय में अवकाश घोषित नहीं है लेकिन ‘बार एसोसिएशन’ ने 31 मार्च तक कार्य स्थगन कर रखा है. आदमी कोमा में हो जैसे. ना जिंदा, ना मरा.

वक्त की नाज़ुकी को भांपते हुए पूरा महकमा आपातकालीन सेवाओं के लिये मन ही मन तैयार है.

बिहार राज्य में न्यायालय प्रातःकालीन कर दिए गए हैं.  इसके बाद कोरोना के प्रभाव और काम रुकने से दबाव बहुत कम है. सेवा में नवांगतुक के तौर पर कोरोना ने एक मौका दिया है कि तफसील से बैठकर मनन किया जाए. ख़ूब पढा जाए और अपने उच्चाधिकारियों के सत्संग से न्यायालय की कार्यप्रणाली, मुक़दमे की बारीकियां सीखीं जाएं. रोज-मर्रा के काम के दबाव को झेलते हुए न्याय के सिद्धान्तों को लागू करने की लगन कैसे बनी रहे, ये मंत्र प्राप्त किया जाए.

वैसे तो बिहार में प्रदूषण उस रूप में नही है जैसे महानगरों में होता है. फिर भी लगता है लॉक डाउन का ही असर है कि तितलियां उड़ती हुई दिख रही हैं, पक्षियों के झुंड और उनके कलरव सुनाई दे रहे हैं. हवा को महसूस किया जा सकता है.

कमाल अमरोही साहब याद आ रहे हैं.  लगता कि मोबाइल को परे हटाकर किसी सरहद की बंदिश से आज़ाद पंछी को कह दें, कि जाओ संदेशा दे दो:-

कहना के रुत जवां है और हम तरस रहे हैं

काली घटा के साए, बिरहन को डस रहे है,

डर है ना मार डाले, “कोरोना” का क्या ठिकाना

(कमाल सा’ब से थोड़ी माफ़ी के साथ उनकी लिखी लाइनों में सावन को कोरोना लिखा है)

लॉक डाउन न्यायिक सेवा में अपराधियों के लिए आम शब्द है. लेकिन एक ज्युडिशियल मजिस्ट्रेट को लॉक डाउन कोरोना ने ही महसूस कराया.

# कोट-

इस लॉक डाउन में उन चीज़ों को देखिए, महसूस कीजिए जिन्हें आज तक नज़रअंदाज़ कर जाते थे.


कोरोना डायरीज. अलग अलग लोगों की आपबीती. जगबीती. ताकि हम पढ़ें. संवेदनशील और समझदार हों. ये अकेले की लड़ाई नहीं. है. इसलिए अनुभव साझा करना जरूरी है. आपका भी कोई खास एक्सपीरियंस है. तस्वीर या वीडियो है. तो हमें भेजें. corona.diaries.LT@gmail.com


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