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चचेरे-ममेरे भाई-बहनों के बीच शादी को लेकर हमारे धर्मग्रंथ क्या कहते हैं?

कॉन्सैंग्विन मैरिज यानी कज़न-मैरिज के बारे में ये हमारा दूसरा आर्टिकिल है. पहला आर्टिकिल आप इस लिंक के जरिए पढ़ सकते हो : चाचा-मामा के बच्चों से शादी के ये नियम आपको हैरान कर देंगे!


बात शादी की हो या किसी भी और रस्म की, दुनिया में जितने भी पंथ, मजहब या रिलिजन हैं, सबमें हर बात के तय नियम हैं. ट्राइबल कम्युनिटीज़ में भी कुछ रिवाज होते हैं, वो भी जीवन के हर संस्कार को लेकर इनसे बंधे हैं. ईवन जो लोग धर्म से परे हैं, यानी खुद को एग्नॉस्टिक या अथीस्ट मानते हैं, वो भी किसी न किसी तरह सामाजिक व्यवस्थाओं से ज़रूर जुड़े हुए हैं.

हमने कज़न-मैरिज से जुड़े अपने पहले आर्टिकिल में अलग-अलग देशों में इसे लेकर नियम, क़ानून और मान्यताओं के बारे में आपको बताया था. अब इस दूसरे भाग में हम बात करेंगे कि कॉन्सैंग्विन मैरिज के लिए अलग-अलग धर्म (Religion) और संप्रदायों में क्या नियम हैं. हमने ये बात जानने के लिए धार्मिक ग्रंथों को खंगाला. तो चलिए आपको सिलसिले-वार बताते हैं कि खून के रिश्तों में शादी यानी कज़न-मैरिज के बारे में कहां क्या बताया गया है.

# यहूदी धर्म (हिब्रू बाइबिल)

मूल रूप से बाइबिल दो हैं, ओल्ड टेस्टामेंट और न्यू टेस्टामेंट. इनको आप दो एडिशन मानिए. समझने में आसानी होगी. न्यू टेस्टामेंट यानी नई वाली बाइबिल में ईसा मसीह के उपदेश भी दिए गए हैं. और भी कुछ अपडेशन हैं. और यहूदी लोग ‘तनख़’ या हिब्रू बाइबिल को मानते हैं, ये ओल्ड टेस्टामेंट का ही दूसरा रूप है. हिब्रू बाइबिल असल में कई किताबों का संकलन है- जैसे तोरा, नवीम, केतविम. इनके भी अन्दर कई किताबें हैं.

हिब्रू बाइबिल तनख़ का इंग्लिश ट्रांसलेटेड एडिशनऔर हिब्रू भाषा में लिखित लेविटिकस (Leviticus) का एक पृष्ठ (फोटो सोर्स -wikimedia )
हिब्रू बाइबिल तनख़ का इंग्लिश ट्रांसलेटेड एडिशनऔर हिब्रू भाषा में लिखित लेविटिकस (Leviticus) का एक पृष्ठ (फोटो सोर्स -wikimedia )

जहां तक कज़न मैरिज की बात है, हिब्रू बाइबिल में जिस तरह के रिश्तों को लेकर प्रतिबंध की बात की गई है, उनमें कज़न-मैरिज शामिल नहीं है. यानी इसको लेकर कोई मनाही नहीं है. हालांकि, मोजेज यानी मूसा द्वारा हिब्रू भाषा में लिखित लेविटिकस (Leviticus) में कुछ लिस्ट दी गई हैं. स्पेसिफ़िकली कहें तो लेविटिकस 18 में. इनके मुताबिक सगे भाई-बहन, पिता की बहन, मां की बहन जैसे रिश्तों में सेक्सुअल रिलेशन बनाने की सख्त मनाही है.

यहूदियों के शुरुआती इतिहास से जुड़े हुए कुछ नामों की डिटेल्स में कई जगह कज़न-मैरिज की मिसालें मिलती हैं. जैसे- आइज़ेक(Issac) जो कि इजराइल की बारह शुरुआती ट्राइब्स के ग्रैंडफ़ादर माने जाते हैं, उन्होंने रेबेका(Rebekah) से शादी की, जो उनकी कज़न थी. बेटे जैकब ने भी लिया(Leah) और रशेल(Rachel) से शादी की, दोनों ही जैकब की फर्स्ट-कज़न थीं. ज़ेलोफेहाद के मरने के बाद उनकी पांच बेटियों की शादी भी ज़ेलोफेहाद के भतीजों से हुई. यूं तो ये पुराने वक़्त की बातें हैं लेकिन इनसे ये साफ़ हो जाता है कि यहूदियों में कज़न-मैरिज को लेकर कोई मनाही नहीं है.

आइज़ेक(Issac) अपनी पत्नी रेबेका के साथ (बाएं) और उनके बेटे जैकब अपनी पत्नी लिया के साथ (दाएं) (प्रतीकात्मक फोटो - Wikiedia
आइज़ेक(Issac) अपनी पत्नी रेबेका के साथ (बाएं) और उनके बेटे जैकब अपनी पत्नी लिया के साथ (दाएं) (प्रतीकात्मक फोटो – Wikiedia

और आज की बात करें तो इजराइल के हब्बानी यहूदियों में करीब 55% शादियां फर्स्ट कज़न्स के बीच होती हैं, समारिटंस यहूदियों में भी हाई इन्ब्रीडिंग रेट है, करीब 40 फीसदी समारिटंस की शादियां फर्स्ट-कज़न्स के साथ हुई हैं.

# ईसाई धर्म

ईसाई धर्म तीन मतों में बंटा है- रोमन कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट और ऑर्थोडॉक्स. और तीनों में तमाम मुद्दों पर हमेशा गतिरोध रहा है. सो कज़न-मैरिज को लेकर भी राय अलग-अलग है.

रोमन कैथोलिक ईसाई धर्म में कज़न-मैरिज को लेकर मिसालें वक़्त के साथ बदलती रही हैं. रोम में ईसाईयत की शुरुआत के वक़्त फ़र्स्ट-कज़न-मैरिज की अनुमति थी. उदाहरण के लिए पहले रोमन क्रिस्चियन सम्राट ‘एम्परर कॉन्टेस्टाइन’ ने अपने बच्चों की शादी अपने सौतेले भाई के बच्चों से की थी. लेकिन इसके बाद 506 AD में फर्स्ट और सेकंड कज़न-मैरिज पर बैन लगा दिया गया. 11वीं सदी आते-आते ये बैन सिक्स-कज़न तक बढ़ा दिया गया. हालांकि कई बार रियायतें दी गई. और साल 1917 तक दोबारा कैथोलिक चर्च की तरफ से थर्ड-कज़न तक शादी की अनुमति दे दी गई. और इसके बाद साल 1983 में आए लॉ के मुताबिक़ सेकंड कज़न-मैरिज और कुछ व्यवस्थाओं के साथ फर्स्ट कज़न-मैरिज की भी अनुमति दे दी गई.

शुरू की बात करें तो फॉल ऑफ़ रोम के बाद कैथोलिक कज़न-मैरिज पर पाबंदियां बढ़ने की कई वजहें बताई जाती हैं. एक एक्स्प्लेनेशन ये दिया जाता है कि चर्च की नीतियों पर जर्मन इफ़ेक्ट आ रहा था. अमेरिकी प्रोफेसर जॉर्ज इलियट हावर्ड (George Elliott Howard) के मुताबिक ट्यूटोनिक आक्रमण से पहले तक चर्च ने रोमन कानून और रिवाज का पालन किया, उसके बाद जर्मनों को स्वीकार कर लिया गया. हालांकि दूसरी ओर इसके ठीक उलट तर्क भी दिया गया है. ये कि कज़न-मैरिज पर रोमन चर्च का प्रतिबंध, स्थानीय जर्मनों के रीति-रिवाजों के खिलाफ एक रिएक्शन था. और किंग ‘पेपिन-द शॉर्ट’,  रईसों में होने वाली कज़न-मैरिज को अपने खिलाफ़ एकजुट होती हुई ताकत के तौर पर देखता था.

उस दौर में कज़न-मैरिज पर बैन को लेकर कारण जो भी हों, लेकिन ये बैन पांचवीं सदी तक रहे, जिन्हें सेंट ऑगस्टाइन ने आगे बढ़ाया. सेंट ऑगस्टाइन ने लिखा-

एक ही व्यक्ति को स्वयं कई रिश्तों को बनाए नहीं रखना चाहिए, बल्कि रिश्तों को ज्यादा लोगों के बीच डिस्ट्रीब्यूट करना चाहिए, और इस तरह सामाजिक हितों के लिए ज्यादा संख्या में लोग एक साथ आएंगे.

लेकिन 13वीं शताब्दी के बाद से कैथोलिक चर्च ने कज़न-मैरिज को सिविल लॉ के हिसाब से नॉर्मलाइज़ कर दिया है.

सेंट ऑगस्टिन (बाएं) और एम्परर कॉन्टेस्टाइन (दाएं), फ़ोटो सोर्स- Dreamstime.com)
सेंट ऑगस्टिन (बाएं) और एम्परर कॉन्टेस्टाइन (दाएं), फ़ोटो सोर्स- Dreamstime.com)

प्रोटेस्टेंट क्रिस्चियन चर्च सामान्य तौर पर कज़न-मैरिज की अनुमति देता है. और इसपर बैन लगाने के मामले में कैथोलिक चर्च की निंदा करता है. मार्टिन लूथर और जॉन केल्विन ने कज़न मैरिज को लेकर कैथोलिक चर्च की आलोचना की है. मार्टिन लूथर के मुताबिक़,

कज़न मैरिज पर कैथोलिक बैन सिर्फ चर्च का एक्सप्रेशन है न कि कोई डिवाइन लॉ. और इस बैन को हटाया जाना चाहिए.

इन्हीं आलोचनाओं के लिहाज से प्रोटेस्टेंट चर्च कज़न-मैरिज की अनुमति देते हैं. ज्यादातर अमेरिकी सम्प्रदाय जैसे बैपटिस्ट, पेंटेकोस्टल, लूथरन, प्रेस्बिटेरियन और मेथोडिस्ट, प्रोटेस्टेंट चर्च के निर्देशों को मानने वाले हैं. किंग हेनरी VIII के शासन के दौरान एंग्लिकन कम्युनियन की स्थापना हुई, इस संप्रदाय में भी कज़न-मैरिज को लेकर मनाही नहीं है.

वहीं ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स चर्च सेकंड-कज़न तक शादी को उचित नहीं मानता. जबकि साइप्रस के ऑर्थोडॉक्स चर्च द्वारा साल 2010 के लेटेस्ट कांस्टीट्यूशन के मुताबिक़ सेकंड-कज़न तक भी शादी की छूट है.

किंग हेनरी 8th और ऑर्थोडॉक्स चर्च
किंग हेनरी 8th और ऑर्थोडॉक्स चर्च

# इस्लाम

मुसलमानों की पवित्र धार्मिक किताब कुरआन में फर्स्ट-कज़न मैरिज को लेकर कोई प्रतिबंध नहीं है. हमने थोड़ा खंगाला तो islamonline.net पर एक आर्टिकल मिला. इस आर्टिकल में इस्लामिक सोसायटी ऑफ़ नॉर्थ अमेरिका के फॉर्मर प्रेजिडेंट डॉ मुज़म्मिल सिद्दीकी का एक स्टेटमेंट है. मुज़म्मिल कहते हैं कि सूरा-अन-निसा की 22 से लेकर 24वीं आयत में अल्लाह द्वारा उन महिलाओं का ज़िक्र किया गया है, जिनसे शादी या सेक्सुअल रिलेशन की मनाही है. हमने quran.com पर सूरा-अन-निसा यानी कुरआन का चौथा चैप्टर देखा.यहां 22 से लेकर 24वीं आयत में साफ़ लहजे में लिखा है कि-

मांएं, बहनें, भतीजियां, पिता की बहनें, मां की बहनें और वो महिलाएं जिनसे ब्रेस्टफीडिंग का ताल्लुक (दूध का रिश्ता) हो, सभी से शादी करना वर्जित है, और अल्लाह की नजर में घृणित काम है.

मुज़म्मिल सिद्दीकी कहते हैं कि इन प्रतिबंधों के अलावा एक मुसलमान जिसकी अल्लाह में आस्था हो वो अपनी फ़र्स्ट-कज़न से शादी कर सकता है. सूरा-अल अज़ाब में अल्लाह प्रोफेट मुहम्मद से कहते हैं कि वे पितृ पक्ष या मातृ पक्ष की कज़न्स से शादी कर सकते हैं, मुहम्मद के अलावा वो हर व्यक्ति जो अल्लाह में ईमान यानी भरोसा रखता है, वो भी कज़न-मैरिज कर सकता है.

कुरआन (प्रतीकात्मक फोटो - इंडिया टुडे)
कुरआन (प्रतीकात्मक फोटो – इंडिया टुडे)

मुहम्मद के समय से ही मुस्लिमों में फ़र्स्ट-कज़न से शादी की प्रथा रही है. lastprophet.info और ऐसी ही तमाम वेबसाइट्स के मुताबिक़ मुहम्मद ने स्वयं अपनी क्रॉस-कज़न जैनब बिन्त जाश (Jaynab Bint Jahsh)से शादी की थी, इसके अलावा भी बहुत उदाहरण हैं- जैसे अली और फातिमा की शादी भी कज़न-मैरिज के ही दायरे में आती है.

हालांकि दो सुन्नी फिरके शफ़ी और हंबली इसे मरुख मानते हैं, यानी नापसंद करते हैं. शफ़ी मजहब के फाउंडर इमाम शफ़ी कहते हैं-

जो लोग घर की महिलाओं को रिश्तेदारी के बाहर शादी करने की अनुमति नहीं देते, तो उनके बच्चों में कुछ मूर्ख होंगें.

मुसलमानों के दूसरे खलीफ़ा उमर, जिन्होंने खुद अपनी कज़न से शादी की थी, वो भी कज़न-मैरिज और कई पीढ़ियों तक एक ही ब्लडलाइन में शादी को मना करते हैं. उमर के मुताबिक़ जिन्होंने ऐसा किया है वो बौद्धिक रूप से कमज़ोर हो गए. ऐसे में आगे उन्हें ऐसे बुद्धिमान लोगों से शादी करनी चाहिए, जो उनसे सम्बंधित नहीं हैं.

# हिंदू धर्म

हिंदू मैरिज एक्ट पिता के पक्ष में पांच और मां के पक्ष में तीन पीढ़ियों तक शादी की अनुमति नहीं देता. लेकिन कुछ कस्टम्स में क्रॉस-मैरिज यानी मां के पक्ष में फर्स्ट कज़न-मैरिज को परमीशन दी गई है. एक्सोगैमी यानी अंतर्जातीय विवाह और एंडोगैमी यानी सजातीय विवाह दोनों में अंतर्विरोध भी है और नियम भी कॉण्ट्राडिक्टरी हैं. हालांकि ये अंतर्विरोध उनके लिए ज़्यादा है जो किसी दूसरे धर्म, समाज या देश से आते हैं. अन्यथा हिंदु धर्म में एक्सोगैमी और एंडोगैमी के नियमों को अच्छे से साधा गया है.

ऐसे समझिए कि एक तरफ़ हिन्दुओं में अंतर्जातीय विवाह यानी दूसरी जाति में विवाह को ठीक नहीं माना जाता और दूसरी तरफ़ सजातीय विवाह के बारे में आम मान्यता ये है कि ब्लडलाइन कनेक्शन न हो, यानी समगोत्रीय विवाह भी न हों. ‘समगोत्रीय हैं शादी नहीं हो सकती’, ये एक लाइन आपने खूब सुनी होगी. दरअसल, शास्त्रों के मुताबिक ऋषि विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम आदि के नाम पर गोत्र रखे गए. गोत्र की प्रणाली पुरानी है, जबकि वर्ण-व्यवस्था बाद में आई. माने एक हिंदू किसी भी जाति या वर्ण का हो, उसके मूल पूर्वज उन्हीं आठ ऋषियों में से हैं, जिनके नाम पर गोत्र बनाए गए. और इसीलिए वैदिक हिंदू धर्म में समगोत्रीय विवाह की मनाही है, ताकि ब्लड-लाइन कनेक्शन से बचा जा सके.

ऋषि विश्वामित्र और ऋषि भारद्वाज
ऋषि विश्वामित्र और ऋषि भारद्वाज

लेकिन कज़न-मैरिज की बात करें तो महाभारत काल से ही क्रॉस-कज़न मैरिज के ट्रेसेज़ मिलते हैं. कहा जाता है अर्जुन ने अपनी फर्स्ट-क्रॉस-कज़न सुभद्रा से शादी की थी. सुभद्रा अर्जुन के ममेरे भाई कृष्ण की बहन थीं. ये भी कहा जाता है कि उत्तरा के अलावा अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु की शादी उनकी क्रॉस-कज़न शाशिरेखा से भी हुई थी. अर्जुन ने भले ही अपनी ममेरी बहन से शादी की हो, लेकिन हिंदू मैरिज एक्ट के तहत अब ऐसा नहीं कर सकते. (हिंदू मैरिज एक्ट को हमने पहले आर्टिकिल में अच्छे से जानने का प्रयास किया था.) और क़ानून और धर्म के चलते क्रॉस-कज़न से शादी करने के कई बार ऐसे मामले आए हैं, जब विवाह करने वालों को धर्म तक बदलना पड़ा.

अर्जुन और उनकी पत्नी सुभद्रा बाएं एवं अभिमन्यु और उनकी पत्नी उत्तरा दाएं
अर्जुन और उनकी पत्नी सुभद्रा बाएं एवं अभिमन्यु और उनकी पत्नी उत्तरा दाएं

साल 2011 में ऐसे ही एक मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने कपल के पक्ष में फैसला सुनाया. वो भी एक रिटायर्ड जज की अर्जी के खिलाफ. पूर्व जज ओपी गोंग ने अपने मजिस्ट्रेट बेटे के खिलाफ़ कोर्ट में याचिका दायर की थी. कहा था कि उनके बेटे ने अपनी ममेरी बहन से शादी कर ली है, जो कि हिंदू मैरिज एक्ट के मुताबिक़ गैर-कानूनी है. लेकिन जब कोर्ट के सामने ये तथ्य आया कि जज के बेटे ने शादी के पहले ईसाई धर्म अपना लिया था, तब कोर्ट ने गोंग की याचिका खारिज कर दी और बेकार के आरोप लगाने के लिए गोंग पर ज़ुर्माना भी लगाया.

हिंदुओं में पिता के पक्ष में कज़न-मैरिज का प्रतिशत तो न के बराबर ही है. लेकिन हिंदुओं में जियोग्राफिक-डाइवर्सिटी धार्मिक मामलों में भी लागू होती है. उदाहरण के लिए दक्षिण भारत के ब्राह्मणों में फर्स्ट-कज़न मैरिज होती रही हैं.

# अन्य धार्मिक मान्यताएं

बुद्धिज़्म स्टैंडपॉइंट के मुताबिक़ पत्नी के अलावा किसी अन्य से संबंध होना, पांच ‘पर्सेप्ट्स’ यानी पंच-उपदेशों के खिलाफ़ है. सेक्सुअल मिसकंडक्ट को लेकर इन्हीं में से तीसरे उपदेश में निर्देश दिए गएहैं. और जहां तक कजन-मैरिज का सवाल है, बौद्ध धर्म में कजन-मैरिज को लेकर कोई विशेष रोक या प्रावधान नहीं है, लेकिन यहूदी और मुस्लिम धर्म की तरह यहां भी एक सेट ऑफ़ रिलेशन में सेक्सुअल मिसकंडक्ट की सख्त मनाही है.

सिख धर्म में बड़े पैमाने पर एक ही वंश में शादी को लेकर प्रतिबंध हैं.

भगवान् बुद्ध का प्रतीकात्मक चित्र (फोटो सोर्स- इंडिया टुडे)
भगवान् बुद्ध का प्रतीकात्मक चित्र (फोटो सोर्स- इंडिया टुडे)

ये तो थे कज़न मैरिज को लेकर अलग-अलग धर्मों के प्रावधान, हालांकि कई बार कज़न-मैरिज को लेकर धार्मिक प्रतिबंधों के पीछे यह तर्क दिया जाता है कि ईश्वरीय विधान और धर्मों में वैज्ञानिकता है. धर्म वेत्ताओं को मालूम था कि एक ही ब्लड लाइन में शादी करने से होने वाली संतान शारीरिक और मानसिक रूप से दुर्बल होती है, उसमें जेनेटिक डिसऑर्डर्स आ जाते हैं. अब ये स्यूडो-साइंस है या वाकई सच, ये हम अगले पार्ट में डिस्कस करेंगे.


वीडियो देखें: क्यों 50 से ज्यादा उम्र की किसी औरत की शादी को हउआ समझा जाता है?

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