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ये बच्चा हड्डी टूटने पर भी रोता नहीं, वजह खुश नहीं, दुखी करने वाली है

चार साल का एक बच्चा. उसके पैर की कई हड्डियां टूटी हुई हैं. अंगूठा और हाथ भी टूटा है. प्लास्टर चढ़ा है. दवाइयां खा रहा है. मगर वो हंस रहा है. आप सोच रहे होंगे कितना बहादुर बच्चा है. इतना दर्द झेलने के बाद भी हंस रहा है. लेकिन सच ये है कि दर्द है ही नहीं.

इतनी चोटें लगने के बाद भी इस बच्चे को दर्द नहीं होता. आप कह सकते हैं कि ये कितनी अच्छी बात है लेकिन इस बच्चे की ज़िंदगी की ये सबसे बुरी बात है. उससे भी बुरी है इसके मां-बाप के लिए. क्योंकि इस बच्चे को दर्द न महसूस होने वाली ऐसी बीमारी है जिसकी वजह से इसकी मौत भी हो सकती है.

डेक्सटर केहिल को एक असाधारण बीमारी है. इस बीमारी का नाम है Congenital insensitivity to pain. कन्जेनिटल अनेलजेसिया लाखों में से किसी एक को होता है. डेक्सटर कभी रोता नहीं. परेशान नहीं करता. इससे उसके मां-बाप को खुश होना चाहिए. मगर वो परेशान हैं. उसकी मां लिंडसे और पापा टॉम अपने डर से लड़ रहे हैं. उन्हें डर लगता है क्योंकि उनका बच्चा गहरी चोटें लगने के बाद भी दर्द महसूस नहीं करता.

डेक्सटर
डेक्सटर

मम्मी-पापा को पता ही नहीं, कैसे लगी चोट

डेली मेल की रिपोर्ट के मुताबिक डेक्सटर को तीन हफ्ते पहले बाएं पैर में फ्रैक्चर हो गया. उसका हाथ और अंगूठा भी टूटा है लेकिन उसके मम्मी-पापा को नहीं पता कि ये सब कैसे हुआ. एक दिन उसकी टीचर ने अंग्रेजी अक्षरों का एक गाना बजाया. जैसे ही गाने में D आया, डेक्सटर कूद गया. फिर उठ नहीं पाया. लेकिन न ही उसकी आंखों में आंसू नहीं थे और न ही वो चिल्लाया. उसकी मां ने कहा,

‘डेक्सटर की टीचर ने मुझे बुलाया. मैं पूरे रास्ते रोती रही. जब वहां पहुंची तो सब डेक्सटर को घेरे हुए थे. मैंने सोचा, डेक्सटर उदास होगा मगर ऐसा कुछ नहीं था. अस्पताल में उसके पैर का इलाज हुआ. प्लास्टर चढ़ाया गया मगर उसे किसी इंजेक्शन की ज़रूरत नहीं पड़ी. बस उसे लॉलीपॉप चाहिए थी.’

fracture

ये अानुवांशिक बीमारी है

डेक्सटर जिस बीमारी से जूझ रहा है वो बहुत रेयर है. वैज्ञानिकों का कहना है कि डेक्सटर के मम्मी-पापा दोनों में कुछ गलत जीन्स हैं. इसलिए डेक्सटर को ये बीमारी हुई. लिंडसे और टॉम को डेक्सटर की इस हालत का पता तब चला जब वो चार महीने का हुआ. उसके दांत निकल रहे थे. वो अपनी ज़बान को दांत पर रगड़ता था. इतना कि ख़ून निकल आता लेकिन वो रोता नहीं. जब तक उसे तीन दांत निकले तब तक उसे कई गहरे घाव हो चुके थे. डेक्सटर की बीमारी जानने में 18 महीने लग गए.

इस दम्पति को अपना घर बदलने पर मजबूर होना पड़ा. ब्रिस्टल (इंग्लैंड) में उन्हें खुली जगह पर घर लेना पड़ा जिससे डेक्सटर को चोट न लगे. उसे तो गर्मी और ठंड का भी एहसास नहीं होता. लिंडसे चाहती हैं कि बड़े होने पर डेक्सटर ख़ुद को महसूस कर सके. लेकिन वो जानती है तब तक उसे बहुत चोटें लग चुकी होंगी.

और भी हैं कई मामले

वैज्ञानिकों की मानें तो यूरोप और एशिया के कुछ परिवारों में इस बीमारी के लक्षण पाए गए हैं. जब मां-बाप दोनों में कुछ गलत जीन्स होते हैं तो उनसे पैदा होने वाले बच्चे के दर्द महसूस करने वाले सारे सेंस बंद हो जाते हैं. जॉर्जिया में रहने वाली अश्लिन ब्लोकर को भी दर्द महसूस नहीं होता. वो कहती हैं,

‘मेरी क्लास में सब मुझसे पूछते हैं इस बारे में. मैं उनसे कहती हूं कि मुझे दबाव महसूस होता है मगर दर्द नहीं’.

अश्लिन ब्लोकर
अश्लिन ब्लोकर

ब्लोकर को गरम चीज़ें, घाव, चोट, कीड़ों का काटना कुछ महसूस नहीं होता. 2012 में न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में ब्लोकर के मम्मी-पापा ने कहा कि ‘हमें ऐसी किसी हालत के बारे में पता नहीं था. ये बहुत डराने वाला था.’

वाशिंगटन में पले-बढ़े स्टीवेन पेटे और उसके भाई को भी यही दिक्कत है. इसका टेस्ट करने के लिए बचपन में उनके पैरों को लाइटर से जलाया गया लेकिन उन्हें कुछ पता नहीं चला. स्टीवेन बताते हैं,

पांच साल की उम्र में स्टीवेन अस्पताल में थे.
पांच साल की उम्र में स्टीवेन अस्पताल में थे.

‘मैं अक्सर स्कूल से छुट्टी पर रहता था क्योंकि मुझे बहुत चोटें लगा करती थीं. एक बार मैंने अपना पैर तुड़वा लिया. लोग मुझे देख रहे थे क्योंकि मेरी पैंट खून से भर गई थी. हड्डी बाहर निकल आई थी. और मुझे पता ही नहीं चला. जब मैं पांच या छह साल का था तब कोई बच्चों को बचाने वाली संस्था मुझे मेरे घर से ले गई थी क्योंकि किसी ने मेरे मम्मी-पापा के खिलाफ चाइल्ड एब्यूज़ की रिपोर्ट कर दी थी.’

कुछ डॉक्टर ऐसे मरीजों को नई दवाएं खोजने में मददगार समझते हैं. उन्हें लगता है कि जिन लोगों को दर्द महसूस नहीं होता उन पर आसानी से एक्सपेरिमेंट किया जा सकता है. इस मर्ज़ को ऐसे समझिए कि जब हमारी उंगली ज़रा भी गरम चीज़ को छूती है तुरंत हाथ अपने आप हट जाता है. या पैर मुड़ता है तो तुरंत हम उसे ठीक करते हैं. वो इसलिए क्योंकि हमारे सेंसेज एक्टिव होते हैं. हमें दर्द महसूस होता है. दर्द महसूस होना बहुत ज़रूरी है. शारीरिक तौर पर भी मानसिक तौर पर भी. वरना हम एक एहसास से वंचित रह जाएंगे. ठीक वैसे जैसे सुबह की रोशनी महसूस करने के लिए रात का अंधेरा देखना बहुत ज़रूरी है.


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