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राजस्थान: वैक्सीन बर्बादी मॉडल की पूरी कहानी!

महामारी से जूझ रहे देश को अभी टीके की कितनी ज़रूरत है, ये समझने के लिए किसी दक्षता की ज़रूरत नहीं है. इसीलिए पूरा देश अभी टीके के गणित में उलझा है. सुप्रीम कोर्ट सरकार की टीका नीति पर सवाल उठाता है. केंद्र की सरकार वैक्सीन पर अपनी कमी छिपाने में लगी है. राज्य की सरकारें टीका जुटाने के जुगाड़ में लगी हैं. कोई मुख्यमंत्री कम टीके लगाकर खत्म होने से बचाने की सूझबूझ देता है. और आम आदमी एक टीके की आस में टीका केंद्र के बाहर लाइन लगाता है. और निराश होकर लौटना भी पड़ता है. फिर अखबार में वो तस्वीरें दिखती हैं कि अस्पताल के कूड़ादान से वैक्सीन निकलती हैं. वैक्सीन की आधी भरी शीशी, जमीन में दबा दी जाती हैं. सरकार कहती है कि सब झूठ है. अखबार सरकार से आंखें मिलाकर कहता है ये ही सच है. पिछले कई दिनों से राजस्थान में टीकों की बर्बादी की ये खबरें चल रही हैं. तो बात करेंगे कि टीकों की इतनी मारामारी हो रही है तो फिर बर्बाद क्यों किए जा रहे हैं? क्या ये जानबूझकर हो रहा है या लापरवाही है.

पहले तो ये समझते हैं टीकों की बर्बादी का मतलब क्या है?

यूएस के सेंटर फॉर डिज़ीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन ने टीकों की बर्बादी या वेस्टेज के कुछ मापदंड बताए हैं.
>> जैसे वैक्सीन वाइल माने उसकी शीशी को तय तापमान की रेंज से कम या ज़्यादा तापमान पर बहुत देर तक रख दिया जाए तो उसके अंदर मौजूद टीका बर्बाद हो जाता है.
>> या एक वाइल में जितनी मात्रा में वैक्सीन है उसका पूरा इस्तेमाल ना हो, माने अगर वाइल से 10 डोज़ लग सकते हैं लेकिन उससे कम ही लगाए जाएं, तो शीशी में बची हुई खुराक बराबाद हो जाती हैं. ज़्यादातर टीके इसी तरह से बर्बाद होते हैं.
>> अगर वाइल खोल ली गई और तय घंटों में उसका इस्तेमाल नहीं किया गया, तो भी वो बर्बाद हो जाती है.
>> इसके अलावा वैक्सीन की एक्सपाइरी डेट तक उसका इस्तेमाल ना हो तो ये भी बर्बादी की श्रेणी में ही आता है.

तो इन तरीकों से हमारे देश में वैक्सीन की कितनी बर्बादी हो रही है उस पर आते हैं. वैक्सीन के वेस्टेज पर तीन तरह के वर्ज़न आते हैं. एक केंद्र सरकार का आंकड़ा आता है. फिर उस आंकड़े को झूठा बताने वाला राज्य सरकारों का बयान आता है. और आंकड़ों राजनीति से अलग फिर कोई पत्रकार अस्पताल के डस्टबिन में झांककर देखता है तो वहां टीकों की बर्बादी की पोल खुलती है. यानी सरकारें जो छिपाने की कोशिश करती हैं, वो मीडिया बता देता है.

केंद्र सरकार ने गलत आंकड़ा शेयर किया?

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय हफ्ते- दो हफ्ते से टीकों की बर्बादी के आंकड़े बताता रहता है और इसके साथ ही राज्यों के लिए ये नसीहत भी नत्थी रहती है कि टीकों की बर्बादी रोकिए. 26 मई को स्वास्थ्य मंत्रालय ने टीकों की बर्बादी के जो आंकड़े दिए थे, उसकी बात करते हैं. और ये आंकड़े एक तय वक्त के लिए थे. स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक झारखंड में सबसे ज़्यादा 37 फीसदी टीके बर्बाद हुए हैं. यानी हर तीसरा टीका खराब किया गया है. छत्तीसगढ़ में 30 फीसदी वैक्सीन की बर्बादी हुई है. तमिलनाडु में 15.5 फीसदी और जम्मू कश्मीर में 10.8 फीसदी वैक्सीन की बर्बादी है. मध्य प्रदेश में 10.7 फीसदी वैक्सीन की बर्बादी हो रही है. जबकि पूरे देश में वैक्सीन की बर्बादी का औसत 6.3 फीसदी है.

केंद्र सरकार के इन आंकड़ों पर राज्य कहने लगे कि हमें गलत बदनाम किया जा रहा है, हम इतने टीके बर्बाद नहीं कर रहे. झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा था कि वैक्सीन बर्बादी पर केंद्र के आंकड़े हास्यास्पद हैं. राज्य में सिर्फ 4.65 फीसदी वैक्सीन की बर्बादी हुई है. जो कि राष्ट्रीय औसत से कम है. छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंह देव की तरफ से भी कहा गया कि केंद्र के बात आधारहीन है.

राज्स्थान में कूड़ेदान में वैक्सीन?

तो ये आंकड़ों का झगड़ा लगतार चल रहा है. अब आते हैं राजस्थान के मामले पर. दैनिक भास्कर अखबार में आनंद चौधरी की बाइलाइन से 31 जून को एक खबर छपी. इसमें दावा किया कि राजस्थान में 8 जिलों के 35 वैक्सीनेशन केंद्रों पर कोरोना वैक्सीन की 500 शीशी कूड़ेदान में पड़ी मिलीं. अखबार ने ये भी कहा कि इनमें से सारी शीशियां 20% से 75% तक भरी हुई थीं. इनमें 2,500 से भी ज्यादा डोज थीं, जो बर्बाद हो गईं. इस खबर पर हल्ला मचा तो राज्य की अशोक गहलोत सरकार अखबार को धमकाने के मोड में आ गई. स्वास्थ्य मंत्री रघु शर्मा ने इस खबर पर 5 ट्वीट किए. रघु शर्मा ने कहा कि “दैनिक भास्कर अखबार में डस्टबिन में वैक्सीन मिलने की खबर पूर्णतः तथ्यों से परे एवं भ्रामक है. वैक्सीन वायल का उपयोग करने के बाद इन्हें नियमानुसार संबंधित चिकित्सा संस्थान में ही जमा करवाया जाता है.”

इसके साथ ही रघु शर्मा ने ये भी लिखा है कि “इस खबर के लिए संबंधित पत्रकारों ने स्वयं को गलत तरीके से स्वास्थ्य विभाग, राजस्थान का उच्चाधिकारी एवं WHO का प्रतिनिधि बताया. संबंधित कर्मचारियों पर दबाव डालकर उनसे इन वायल को प्राप्त किया. यह वायल किसी डस्टबिन में नहीं मिली हैं.” स्वास्थ्य मंत्री ने गलत पहचान बताने और झूठी खबर फैलाने के आरोप में कार्रवाई की धमकी भी दी. लेकिन अखबार अपनी बात से पीछे नहीं हटा. अगले दिन रिपोर्ट लगाई कि चाहे तो स्वास्थ्य मंत्री उनके पास मौजूद वाइल्स देख सकते हैं. सरकार ने फिर रिपोर्ट्स को गलत साबित करने की कोशिश की. स्वास्थ्य मंत्री रघु शर्मा ने ट्विटर पर लिखा- मैंने दैनिक भास्कर में प्रकाशित फोटो गौर से देखी और तत्काल जांच करवाई. जांच से स्पष्ट हुआ कि यह फोटो पीले बैग की है, जिसमें भारत सरकार के बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट नियमों के अनुसार एक्सपायर्ड एवं डिस्कार्डेड वैक्सीन वाइल्स डालनी होती है. यानी स्वास्थ्य मंत्री कहना चाहते थे कि वैक्सीन डिब्बों में मिली हैं वो कूड़ेदान नहीं हैं. अखबार ने फिर एक नई रिपोर्ट छापी. इसमें करौली ज़िले के कई टीकाकरण केंद्रों में वैक्सीन वाइल ज़मीन में दबाने या जलाने की बात मालूम चली. अब सरकार निरुत्तर है.

सरकार जितनी बता रही है, असल में उससे कहीं ज्यादा मात्रा वैक्सीन बर्बाद हो रही?

भास्कर की पूरी खबर से जाहिर होता है कि सरकार जितनी बर्बादी बता रही है, असल में उससे कहीं ज्यादा मात्रा में वैक्सीन बर्बाद हो रही है. 75 फीसदी तक भरी हुई शीशियां क्यों फेंकी गई, शीशियों को कूड़ेदान में या ज़मीन में क्यों दबाया गया. ऐसे कई सवाल हैं जिनके जवाब राज्य की सरकार से नहीं मिल रहे हैं. वैक्सीन के रखरखाव और खाली शीशी को ठिकाने लगाने की भी गाइडलाइंस हैं. जैसे –
>> एक सेशन के लिए किसी वैक्सीनेशन सेंटर को वैक्सीन की जितनी वायल्स दी जाती हैं, उन्हें वापस कोल्ड चेन पॉइंट पर लाना ज़रूरी है.
>> ये कोल्ड चेन पॉइंट्स जगह-जगह बनाए जाते हैं. इनमें वैक्सीन की भरी हुई वायल्स को निर्धारित तापमान में रखा जाता है. यहीं से वैक्सीनेशन सेंटरों तक इनकी सप्लाई होती है.
>> वैक्सीनेशन के बाद सभी वायल्स को कोल्ड चैन पॉइंट पर वापस भेजना ज़रूरी होता है. उनमें से चाहे थोड़ी-बहुत दवा इस्तेमाल हुई हो, या पूरी खाली हो चुकी हो. ऐसी वैक्सीन वायल जिनका इस्तेमाल नही हुआ हो, वो भी कोल्ड चैन पॉइंट पर भेजनी होती हैं.
>> गाइडलाइंस में लिखा है कि वैक्सीन की पूरी या आधी इस्तेमाल हो चुकी वायल्स का डिस्पोज़ल केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के दिशा-निर्देशों के आधार पर किया जाएगा.
>> CPCB की गाइडलाइंस में कोविड-19 की वैक्सीन के डिस्पोज़ल पर खासतौर से कुछ नहीं कहा गया है. लेकिन आमतौर वैक्सीन के डिस्पोज़ल के दो तरीक़े होते हैं. – पहला तरीक़ा है ऑटोक्लेविंग (Autoclaving) . इसका मतलब है शीशी को डिसइन्फ़ेक्ट करना. इन शीशियों को बहुत तेज गरम पानी से साफ़ किया जाता है. दूसरा तरीक़ा है माइक्रोवेविंग. इसमें माइक्रोवेव के इस्तेमाल से इन शीशियों को साफ़ किया जाता है. ये दोनों ही तरीक़े दूरदराज के इलाक़ों में नहीं होते. ऐसे में वायल्स को ज़िले के अस्पताल या अन्य किसी सरकारी संस्थान में ले जाकर डिस्पोज किया जाता है.

अशोक गहलोत कूड़ेदान में पड़ी वैक्सीन को लेकर क्या कहेंगे?

और इन सारे तरीकों के अलावा सबसे ज़रूरी ये है कि शीशी में जितनी वैक्सीन की मात्रा हो, उसका पूरा इस्तेमाल किया जाए. दैनिक भास्कर की रिपोर्ट आने से पहले, 26 मई को केंद्र सरकार ने राजस्थान में 11 फ़ीसदी वैक्सीन की बर्बादी बताई थी. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने डिटेल्स देते हुए बताया था कि 16 जनवरी से 17 मई के बीच राज्य में साढ़े 11 लाख से भी ज्यादा वैक्सीन की डोज़ बेकार चली गईं. अप्रैल महीने में 7 प्रतिशत बर्बाद हुईं. मई के महीने में 3 प्रतिशत वैक्सीन बेकार होने की बात केंद्र ने कही. हालांकि राजस्थान सरकार ने आरोपों को गलत बताया. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उलटे आरोप लगा दिया कि गड़बड़ी कोविन ऐप में थी. राजस्थान में तो केवल 2 फ़ीसदी वैक्सीन ही बेकार हुई है. क्या मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कूड़ेदान में पड़ी आधी से ज़्यादा शीशियों की वजह भी समझा पाएंगे?

और जैसा हम पहले कह रहे हैं, ऐसे मामले सिर्फ राजस्थान में नहीं, और भी राज्यों से आ रहे हैं. उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में कूड़े के ढेर से कोविड वैक्सीन भरी 29 सिरिंज मिलीं. यानी शीशी से वैक्सीन की सीरिंज भरकर कूड़ेदान में डाल दी गई थी. ये मामला अलीगढ़ शहर में ही जमालपुर के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का था. बाद में जांच हुई तो निहा खान नाम की एएनएम पर वैक्सीन से भरी सीरिंज कूड़ेदान में फेंकने के आरोप लगे. इस मामले में कार्रवाई भी हुई. टीकाकरण केंद्र की प्रभारी चिकित्साधिकारी डॉ. आरफीन जेहरा और संविदा ANM निहा खान के खिलाफ मामला दर्ज किया है.

राज्यों को केरल से सीखना चाहिए!

हम ये नहीं कहते कि वैक्सीन किसी प्रदेश की सरकार जान बूझकर बर्बाद कर रही होगी, लेकिन सच्चाई ये है कि वैक्सीन बर्बाद हो रही है. जो नहीं नहीं होनी चाहिए. अगर किसी अखबार की रिपोर्ट से भी ऐसा मामला सामने आता है तो अखबार को धमकाने के बजाय सरकार को अपना सिस्टम दुरुस्त करना चाहिए. जिस भी स्तर पर लापरवाही हो रही है, उन पर कार्रवाई होनी चाहिए. और ऐसा मुमकिन भी है. हमारे पास केरल का उदाहरण है. केरल में कितनी वैक्सीन की बर्बादी हुई , माइनस 4.16 फीसदी. वैक्सीन बर्बादी के माइनस में होने का मतलब है कि जितनी वैक्सीन दी गई उससे ज्यादा लोगों को डोज़ लगे. एक वाइल से 10 डोज़ वैक्सीन निकलती है. 10 डोज़ के बाद भी वाइल में थोड़ी सी दवा बच जाती है. इसको फेंकने के बजाय केरल में कई खाली शीशियों से दवा इकट्ठा कर 4 फीसदी ज्यादा लोगों को टीके लगा दिए. ऐसी करना कोई मुश्किल प्रयोग नहीं है. केरल की तरह कई और राज्यों में अब ऐसा हो रहा है. होना भी चाहिए. वैक्सीन की एक एक डोज़ महामारी से लड़ने में, लोगों की जान बचाने में मददगार है. जितनी वैक्सीन हमारे पास हैं कम से कम उनकी बर्बादी तो नहीं होनी चाहिए.


विडियो- राजस्थान में कोरोना वैक्सीन की बर्बादी के गंभीर आरोपों पर गहलोत सरकार ने क्या कहा?

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