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पैन्डोरा पेपर्स की पूरी कहानी, जिसमें 35 से ज़्यादा प्रधानमंत्रियों, राष्ट्रपतियों के नाम दर्ज़ हैं

एक पिटारे ने पूरी दुनिया में तहलका मचा रखा है. इस पिटारे से निकले दस्तावेज़ों ने कुछ चुनिंदा नेताओं और जानी-मानी हस्तियों की पोल खोल दी है. इन लोगों पर विदेशों में धन छुपाने, टैक्स चोरी करने, अनैतिक तरीके से संपत्ति बनाने जैसे संगीन आरोप लग रहे हैं. इस लिस्ट में शामिल कुछ नाम ऐसे भी हैं, जिन पर आपको सहसा विश्वास नहीं होगा. इस खुलासे को नाम दिया गया है, ‘पैन्डोरा पेपर्स’.

‘पैन्डोरा पेपर्स’ की पूरी कहानी क्या है? इसे अब तक का सबसे बड़ा खुलासा क्यों बताया जा रहा है? पैन्डोरा पेपर्स में किन नेताओं और हस्तियों का नाम सामने आ रहा है? और, खुलासे के बाद आगे क्या होगा? सब विस्तार से बताएंगे.

इंटरनैशनल कंसोर्शियम ऑफ़ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स (ICIJ). ये दुनियाभर के इन्वेस्टिगेटिव पत्रकारों की एक संस्था है. इसे 1997 में लॉन्च किया गया था. वॉशिंगटन डीसी में. इसका मकसद है अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रहे भ्रष्टाचार और दूसरे अपराधों को रिपोर्ट करना और सरकार की जवाबदेही तय करना.

2 साल पहले की सीक्रेट टिप

आज से दो बरस पहले की बात है. ICIJ को सीक्रेट टिप मिली. उन्हें 14 कंपनियों से डेटा के भंडार मिले. ये डेटा लगभग तीन टेराबाइट का था. इसके अंदर एक करोड़ बीस लाख से भी अधिक दस्तावेज अलग-अलग रूप में मौजूद थे. लगभग 64 लाख डॉक्यूमेंट्स, तीस लाख से अधिक तस्वीरें, 10 लाख से अधिक ईमेल्स और लगभग पांच लाख पीपीटी. ICIJ के लिए इन दस्तावेज़ों को अकेले दम पर खंगालना आसान नहीं था. इसलिए, उन्होंने 117 देशों के 600 से अधिक पत्रकारों को इसमें शामिल किया. उन्हें दस्तावेज़ों का एक्सेस दिया गया. भारत से इंडियन एक्सप्रेस को इस पूल का हिस्सा बनाया गया था. ये जांच-पड़ताल लगभग दो साल तक चली. अब जाकर उसका रिजल्ट बाहर आया है. इसके आकार और छिपे राज़ को ध्यान में रखते हुए इस लीक को ‘पैन्डोरा पेपर्स’ का नाम दिया गया है.

लीक से क्या पता चला है?

इससे पता चला है कि कैसे दुनिया के कुछ सबसे ताक़तवर राजनेताओं, उद्योगपियों, मशहूर हस्तियों और दुर्दांत अपराधियों ने अपना बेहिसाब पैसा छिपाने के लिए ऑफ़शोर कंपनीज़ की मदद ली. इस लिस्ट में शामिल कुछ राजनेता ऐसे भी हैं, जिन्होंने अपने देश में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ा हुआ है. कुछ नेता आने वाले समय में चुनाव का सामना करने वाले हैं. एक व्यक्ति जिसका नाम पैन्डोर पेपर्स की लिस्ट में आया है, उसके ऊपर दो दर्ज़न से अधिक हत्याओं का आरोप है.

ऑफ़शोर का मतलब क्या होता है?

इसका शाब्दिक अर्थ होता है, अपने देश की सीमा से दूर. वित्तीय नज़रिए से देखें तो ये थोड़ा सा जटिल हो जाता है. मान लीजिए, एक बिजनेसैमन है एक्स. दिल्ली के पॉस इलाके में उसका एक बंगला है. अगर एक्स स्थानीय कानून के तहत उस बंगले को खरीदता है तो उसे तमाम तरह के टैक्स देने होंगे. उसे अपनी इनकम का सोर्स बताना होगा. ऐसे में उसकी कमाई सरकार की नज़र में आ जाएगी. एक्स इस समस्या का एक रास्ता निकालता है. वो एक ऐसी कंपनी से संपर्क करता है, जो ऑफ़शोर कंट्रीज़ में ऑपरेट करती हैं. और, शेल कंपनियां क्रिएट करने में उनकी महारत होती है.

ऑफ़शोर कंट्रीज़ या टेरिटरीज़ वैसी जगहें हैं जहां कंपनी बनाना बेहद आसान होता है. इन जगहों पर ऐसे कानून होते हैं, जिनके चलते असली मालिकों की पहचान उजागर नहीं की जाती. ऐसे इलाकों में कॉरपोरेट टैक्स शून्य या न के बराबर होता है. इन्हें अक्सर ‘टैक्स हेवन्स’ के नाम से भी जाना जाता है. दुनिया में कितने टैक्स हेवन्स हैं, इसका ठीक-ठीक अंदाज़ा लगाना मुश्किल है. लेकिन कुछ चर्चित नाम जान लीजिए. ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स, सिंगापुर, स्विट्ज़रलैंड, पनामा, बहामास आदि.

इन जगहों पर पैसा कैसे छिपाया जाता है?

इसके लिए सबसे पहले शेल कंपनियां बनाई जाती हैं. ये कंपनियां बस काग़ज़ पर ही होती हैं. असलियत में इनका नामोनिशान नहीं होता. न तो इनका कोई ऑफ़िस होता है और न ही कोई स्टाफ़. इन कंपनियों का सबसे बड़ा हथियार वहां के लचर कानून होते हैं. जिस वजह से वो प्रशासन की स्क्रूटनी से बच जाते हैं. इसके बदले में वहां की सरकार को भरपूर पैसा मिलता है.

किसी एक व्यक्ति के लिए ऑफ़शोर कंपनी बनाना और उसके जरिए दूसरे देशों में डील करना बड़े ज़ोखिम का काम है. इससे तुरंत उसका नाम बाहर आ जाएगा. फिर सीक्रेसी की सारी गुंज़ाइश खत्म हो जाएगी. इसलिए इस खेल के बीच में मध्यस्थ होते हैं. उन्हें इस काम का पूरा अनुभव होता है. वे पैसा लेकर अपने नाम से सारा खेल रचाती हैं. असली मालिकों का नाम छिपा रह जाता है. ICIJ की रिपोर्ट के अनुसार, ऑफ़शोर कंपनियों के माध्यम से 06 ट्रिलियन से 32 ट्रिलियन डॉलर्स तक पैसा छिपाए जाने का अनुमान है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर देश भारत को पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था वाला देश बनाने की बात करते हैं. ऑफ़शोर कंपनियों में इतना पैसा है कि ये सपना छह बार पूरा किया जा सकता है. इंटरनैशनल मॉनेटरी फ़ंड (IMF) की रिपोर्ट बताती है कि इससे दुनियाभर की सरकारों को हर साल पांच लाख करोड़ रुपये के टैक्स का नुकसान हो रहा है.

नुकसान का जनता से संबंध

इस नुकसान का सीधा संबंध आम जनता से है. कोई भी सरकार अपने लोगों के लिए वेलफ़ेयर प्रोग्राम बनाती है, तो उसका पैसा सरकारी खज़ाने से जाता है. सरकारी खज़ाने की आमदनी का एक बड़ा हिस्सा टैक्स से आता है. अगर सरकार को मिलने वाले टैक्स में कमी हुई तो वेलफ़ेयर प्रोग्राम्स पर ताला लगाना पड़ेगा. सरकार के खर्च करने की क्षमता घट जाएगी. ऐसे में ज़रूरतमंद लोग रियायती दरों पर मिलने वाली शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी अधिकारों से वंचित रह जाएंगे.

क्या टैक्स हेवन्स का इस्तेमाल करना अपराध की श्रेणी में आता है? इट्स कॉम्पलिकेटेड. बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, नियम-कानूनों में लूपहोल्स के चलते टैक्स के भुगतान से बचाव और ऑफ़शोर कंपनीज़ बनाना आसान है और ये कानून के दायरे में भी आता है. हालांकि, कई बार इस प्रोसेस को अनैतिक कहा जाता है.

जानकारों का मानना है कि दूसरे देशों में पैसे या संपत्ति रखने की अलग-अलग वजहें हो सकती हैं. जैसे कि आपराधिक हमलों का डर. कुछ देशों में सरकार का कोई ठिकाना नहीं होता. वहां तख़्तापलट या सैनिक शासन का ख़तरा हमेशा मंडराता रहता है. इस वजह से भी कई लोग अपना पैसा किसी सुरक्षित जगह पर ट्रांसफ़र कर देते हैं.

लेकिन यहीं पर एक दूसरे किस्म का ख़तरा पनपता है. चूंकि ऑफ़शोर कंपनियां पूरी तरह सीक्रेट होती हैं. उनके लेन-देन को ट्रैक करना नामुमकिन होता है. इस वजह से आपराधिक किस्म के लोग इसका ग़लत फायदा उठाते हैं. ड्रग्स स्मगलिंग, ह्यूमन ट्रैफ़िकिंग, हैकिंग, फिरौती जैसे संगीन अपराधों में शामिल लोग इसके जरिए अपना बिजनेस चला सकते हैं. मतलब ये कि कोई भी इन जगहों पर अपनी संपत्ति जमा कर सकता है और जांच एजेंसियां उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती हैं.

पैन्डोरा पेपर्स पर इतना बवाल क्यों मचा है?

2016 में पनामा पेपर्स लीक के बाद पाकिस्तान और आइसलैंड में प्रधानमंत्री की कुर्सी चली गई थी. कई देशों में पुलिस ने छापेमारी की थी. कुछ देशों ने अपने यहां सख़्त कानून भी बनाए. ‘पनामा पेपर्स’ में मिले सारे दस्तावेज़ पनामा स्थित ऑफ़शोर सर्विस प्रोवाइडर फ़र्म ‘मोंसेक फ़ोंसेका’ से लीक हुए थे. पैन्डोरा पेपर्स उस लीक की तुलना में कहीं ज़्यादा बड़ा है. रिपोर्ट के अनुसार, इस बार 14 सर्विस प्रोवाइडर्स का नाम आया है. इनमें 29 हज़ार से अधिक ऑफ़शोर कंपनियों के बारे में जानकारी दर्ज़ है. इन कंपनियों के मालिक 200 देशों और अन्य टेरिटरीज़ से ताल्लुक रखते हैं.

Panama Nawaj
पनामा पेपर्स में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की कुर्सी चली गई थी.

पैन्डोरा पेपर्स में किनका नाम आ रहा है?

इस लिस्ट में कम-से-कम 35 प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों के नाम दर्ज़ हैं. इनमें से कुछ अभी भी कुर्सी पर बैठे हैं. जिस नाम पर सबसे अधिक हंगामा हो रहा है, वो नाम जॉर्डन के किंग अब्दुल्लाह द्वितीय का है. वो 1999 से जॉर्डन की सत्ता में हैं. कुर्सी पर आने के बाद से उन्होंने विदेशों में अमेरिका, मलिबु, लंदन और एस्कट 15 आलीशान घर खरीदे. इनकी कीमत लगभग आठ अरब रुपये बताई जा रही है. किंग अब्दुल्लाह ने 1995 से 2017 के बीच 36 शेल कंपनियां भी बनाईं है. ऑफ़शोर एडवाइज़र्स आपसी बातचीत में उनके लिए एक कोड यूज़ करते थे, ‘यूू नो हू’.

जॉर्डन आर्थिक संकट से जूझ रहा है. वहां टैक्स में बढ़ोत्तरी और सख़्त कानूनों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन भी हुए थे. जॉर्डन को पश्चिमी देशों से लगातार फ़ंडिंग मिलती रही है. ऐसे हालात में किंग अब्दुल्लाह का आलीशान घरों पर बेतहाशा खर्च हैरान करता है. उनके वक़ीलों का कहना है कि राजा साहब ने इन घरों को खरीदने में पब्लिक के फ़ंड का इस्तेमाल नहीं किया. इसके लिए उन्होंने अपने निजी फ़ंड से पैसे दिए हैं. वकीलों ने एक बात और कही कि किंग अब्दुल्लाह इन संपत्तियों को अपने लोगों से छिपाना नहीं चाहते थे.

यहां पर कई सवाल उठते हैं. पहला, अगर राजा साहब के निजी फ़ंड में इतना पैसा था तो उन्होंने उसे अपने देश के लोगों पर खर्च क्यों नहीं किया? दूसरी बात, अगर वो इन संपत्तियों को छिपाना नहीं चाहते थे तो कभी इसका ज़िक़्र क्यों नहीं किया? पेपर्स लीक होने के बाद स्वीकार करना तो उनकी मज़बूरी है. और तीसरी बात, अगर राजा साहब इतने ही लोकतांत्रिक हैं तो ईमेल्स में उनके नाम की बजाय कोड का इस्तेमाल क्यों किया जाता था?

सवालों का जवाब

जानकारों का कहना है कि अगर किंग अब्दुल्लाह ने ये जानकारी इसलिए छिपाई कि उन्हें विरोध का ख़तरा था. उनके अपने लोग सड़कों पर उतर सकते थे. फिर उन्हें समझाना मुश्किल हो जाता. दूसरी बात, अगर पश्चिमी देशों को इन संपत्तियों के बारे में जानकारी मिलती तो वे फ़ंडिंग पर रोक लगा देते.

जनता की मुफलिसी पर ऐश करने वाले सिर्फ़ जॉर्डन के राजा ही नहीं हैं. इसमें जॉर्डन का पड़ोसी देश लेबनान भी है. वही लेबनान, जहां की मुद्रा लगातार नीचे गिर रही है. वहां बुनियादी सुविधाएं खत्म होने की कगार पर पहुंच गई हैं. तेल खरीदने के लिए सड़कों पर लड़ाई हो रही है.
पैन्डोरा पेपर्स में वर्तमान में लेबनान के प्रधानमंत्री नजीब मिकाती, पूर्व प्रधानमंत्री हसन दियाब और सेंट्रल बैंक के गवर्नर रियाद सलामे का नाम है. इसमें एक और नाम मंत्री रह चुके मरवान खिरेदाइन का है. वो फिलहाल अल मवारिद बैंक के गवर्नर हैं. 2019 में मरवान ने देश की ख़राब आर्थिक स्थिति के लिए साथी सांसदों को लताड़ लगाई थी. उन्होंने कहा था कि सरकार को टैक्स चोरी की समस्या पर ध्यान देने की ज़रूरत है.

इस भाषण के कुछ ही समय बाद मरवान ने 15 करोड़ रुपये का याट खरीदा. वो भी एक शेल कंपनी के माध्यम से. इस खरीदारी को छिपाकर रखा गया. पैन्डोरा पेपर्स ने मरवान के चेहरे से नकाब खींच लिया है. लेबनान के बाद चलते हैं रूस. राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन सीधे तौर पर तो इसमें शामिल नहीं हैं. लेकिन उनके कई करीबियों का नाम पैन्डोरा पेपर्स में आया है. एक नाम उनके प्रोपेगैंडा मैन कोस्तेंतिन अर्न्सट का है.

स्वेतलाना क्रिवोनोइख का नाम

एक और हैरान करने वाला नाम स्वेतलाना क्रिवोनोइख का है. ये कहानी दो दशक पहले की है. उस समय स्वेतलाना एक दुकान में सफ़ाई का काम करती थी. 2003 में उसे एक बेटी हुई. उसका नाम रखा गया, एलिज़ावेटा. पैदा होने के कुछ ही महीनों बाद वो एक शेल कंपनी की मालकिन बन गई. इस शेल कंपनी ने मोन्टे कार्लो में एक आलीशान घर खरीदा था. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो स्वेतलाना का पुतिन के साथ अफ़ेयर था. ये भी कहा गया कि एलिज़ावेटा पुतिन की ही बेटी है. पुतिन या स्वेतलाना ने कभी इस पर कोई बयान नहीं दिया. अब पैन्डोरा पेपर्स से सामने आया है कि मोन्टे कार्लो वाला घर स्वेतलाना के लिए ही खरीदा गया था.

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सचिन तेंडुलकर का नाम भी पैन्डोरा पेपर्स में सामने आ रहा है.

अब बात चेक गणराज्य की. प्रधानमंत्री आंद्रेज़ बेबिस बार-बार भ्रष्टाचार को खत्म करने का दंभ भरते रहे हैं. पैन्डोरा पेपर्स में उनका भी नाम आया है. पता चला है कि 2009 में उन्होंने फ़्रांस में 16 करोड़ की प्रॉपर्टी खरीदने के लिए एक शेल कंपनी का इस्तेमाल किया था. चेक गणराज्य में इसी हफ़्ते चुनाव होने वाले हैं. ये खुलासा उन पर भारी पड़ सकता है.

पूरी कहानी सिर्फ़ इन्हीं देशों तक सीमित नहीं है. इसका दायरा पूरी दुनिया तक फैला हुआ है. उनकी चर्चा बाद में करेंगे. उससे पहले भारतीय उपहाद्वीप का हाल जान लेते हैं. पैन्डोरा पेपर्स पाकिस्तान में प्रधानमंत्री इमरान ख़ान का संकट और बढ़ा दिया है. चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने दाग़ी लोगों को हटाने का वादा किया था. पैन्डोरा पेपर्स ने उनके दावे को झुठला दिया है. लिस्ट में उनकी कैबिनेट के दो मंत्री शामिल हैं. जल संसाधन मंत्री मुनिस ईलाही और वित्त मंत्री शौकत तरीन पर ऑफ़शोर कंपनियों के जरिए विदेशों में संपत्तियां छिपाने के आरोप हैं. इमरान ख़ान ने कहा है कि दोषी लोगों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी. पाकिस्तान से 700 से अधिक लोग पैन्डोरा पेपर्स की चपेट में आए हैं. इनमें से सात राजनेता हैं.

पैन्डोरा पेपर्स से भारत भी अछूता नहीं रहा है. सबसे मशहूर नाम क्रिकेट स्टार सचिन तेंडुलकर, उनकी पत्नी और उनके ससुर का है. हालांकि, सचिन के वकील ने दावा किया है कि सारी जानकारी सरकारी एजेंसियों को दी गई है. कुछ भी छिपाया नहीं गया है. दिग्गज उद्योपति अनिल अंबानी ने ब्रिटेन की एक अदालत में दीवालिया होने का दावा किया था. उनके नाम पर खरीदी गईं 18 ऑफ़शोर संपत्तियां पैन्डोरा पेपर्स लीक से सामने आईं है.

इसके अलावा, भगोड़े नीरव मोदी की बहन पूर्वी मोदी, अभिनेता जैकी श्रॉफ़, उद्योगपति गौतम अडाणी के बड़े भाई विनोद अडाणी भी इस लिस्ट में शामिल हैं. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, पैन्डोरा पेपर्स में तीन सौ से अधिक भारतीयों के नाम शामिल हैं. आने वाले दिनों में इन नामों को एक-एक कर बाहर लाया जाएगा.


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