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काबुल में धमाके करने वाले आतंकी संगठन ISIS-K की कहानी और इसका पाकिस्तान कनेक्शन क्या है?

जिस बात की आशंका जताई जा रही थी, वो कल सच हो गई. काबुल में स्थित हामिद करज़ई इंटरनैशनल एयरपोर्ट इस समय एयरलिफ़्ट कैंपेन का केंद्र है. अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के क़ब्ज़े के बाद से लोग देश से भाग रहे हैं. इनमें विदेशी और स्थानीय अफ़ग़ान नागरिक भी हैं. एयरपोर्ट पर इतनी भीड़ जमा हो रही है कि सारी व्यवस्था चरमराई हुईं है. सिस्टम बदहाल है. इसी बाबत 26 अगस्त की सुबह सुरक्षा एजेंसियों ने हमले की चेतावनी जारी की थी. और, शाम होते-होते ये सच साबित हो गई. काबुल एयरपोर्ट के पास सीरियल बम धमाकों में 90 से अधिक अफ़ग़ान नागरिकों की मौत हो गई. इसके अलावा, 13 अमेरिकी सैनिक भी इस हमले में मारे गए.

काबुल सीरियल ब्लास्ट की पूरी कहानी क्या है? इतनी भारी सुरक्षा और तालिबान के आश्वासन के बाद भी ये हमला कैसे हो गया? किस आतंकी गुट ने हमले की जिम्मेदारी ली है? इस घटना का पाकिस्तान कनेक्शन क्या है? और, आगे क्या होने वाला है?

जब 3 देशों ने दी चेतावनी

26 अगस्त 2021 को इंटरनैशनल मीडिया में एक ख़बर सुबह से ही चर्चा में थी. ये ख़बर जुड़ी थी, काबुल एयरलिफ़्ट से. जैसे-जैसे बाहर निकलने की डेडलाइन नजदीक आ रही है, काबुल एयरपोर्ट से उड़ रहे प्लेन्स की फ़्रीक्वेंसी लगातार बढ़ रही थी. 26 अगस्त को हर 39 मिनट में एक प्लेन उड़ान भर रहा था. अमेरिका ने 31 अगस्त तक अपने सभी सैनिकों को बाहर निकालने का वादा किया है. अभी तीन हज़ार से अधिक अमेरिकी सैनिक काबुल एयरपोर्ट की सुरक्षा में तैनात हैं.

सुबह तक सब ठीक चल रहा था. फिर तीन देशों की वॉर्निंग जारी हुई. अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया ने अपने नागरिकों को एयरपोर्ट छोड़कर सुरक्षित जगह पर जाने के लिए कहा. बाकी लोगों को भी एयरपोर्ट पर आने से परहेज करने के लिए कहा गया. ये भी पता चला कि ख़तरे के बारे में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन को भी ब्रीफ़ किया गया है. यूएस आर्मी को प्लान बी तैयार रखने का आदेश मिला. ताकि एयरलिफ़्ट कैंपेन में किसी तरह की रुकावट न आए. अमेरिका ने ये चेतावनी तालिबान के साथ भी साझा की. फिलहाल, तालिबानी लड़ाके एयरपोर्ट के बाहर की सिक्योरिटी देख रहे हैं. एयरपोर्ट के अंदर जाने के लिए पहले तालिबान के घेरे से होकर गुजरना होता है.

जब तक कि चेतावनी पर अमल हो पाता, पहले हमले की ख़बर आ गई. एयरपोर्ट के पास कुछ दूर हटकर बैरन होटल है. यहां ब्रिटिश अधिकारी एयरपोर्ट जाने वालों के कागज़ात चेक करते हैं. फिर उन्हें वहां से बसों में बिठाकर एयरपोर्ट की तरफ रवाना किया जाता है. 26 अगस्त की शाम छह बजे इसी होटल के पास पहला धमाका हुआ. जब तक लोग धमाके से उबर पाते, कुछ बंदूकधारियों ने गोलीबारी शुरू कर दी. ये चल ही रहा था कि एयरपोर्ट के मेन एंट्रेंस पर दूसरा धमाका हो गया. इसके बाद तो अफरा-तफरी मच गई. शुरुआत में ख़बर चली कि कुछ लोग घायल हुए हैं. लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, इस हमले में नुकसान का ग्राफ़ ऊपर जाने लगा.

Kabul Airport
हमले के बाद काबुल एयरपोर्ट पर भगदड़ मची हुई है.

ये ख़बर लिखे जाने तक लगभग सौ से अधिक अफ़ग़ान नागरिकों की मौत की ख़बर है. 26 अगस्त की रात तक 12 अमेरिकी सैनिकों के मरने की सूचना थी. 27 अगस्त को ये आंकड़ा बढ़कर 13 हो चुका है. 18 अमेरिकी सैनिक ज़ख़्मी हैं.

10 साल का सबसे बड़ा हमला

ये अफ़ग़ानिस्तान में यूएस आर्मी पर पिछले 10 सालों में हुआ सबसे बड़ा हमला है. इससे पहले 06 अगस्त 2011 को यूएस आर्मी के एक हेलिकॉप्टर पर ग्रेनेड से हमला हुआ था. इसमें 30 अमेरिकी सैनिक और आठ अफ़ग़ान मारे गए थे. उस समय अमेरिका कॉम्बैट मिशन में था. अभी कथित तौर पर शांतिकाल चल रहा है. तालिबान और अमेरिका के बीच शांति का समझौता हुआ है. 31 अगस्त की डेडलाइन तक तालिबान ने अमेरिका और उसके सहयोगियों पर हमला न करने का वादा किया है.

ये धमाके काबुल में हुए थे, लेकिन इसकी गूंज ने पूरी दुनिया को दहला दिया. आतंकियों द्वारा दो बम धमाकों के बाद भी काबुल में पैनिक की स्थिति थी. क्योंकि रात के अंधेरे में रह-रहकर धमाके की आवाज़ सुनाई पड़ रही थी. हालांकि, बाद में पता चला कि यूएस आर्मी अपने गैर-ज़रूरी गोला-बारूद को नष्ट कर रही है. हमले के बाद तत्काल सभी एजेंसियां हरक़त में आ गईं. शुरुआती जांच में पता चला कि कम-से-कम एक हमलावर सुसाइड बॉम्बर था. उसने भीड़ के बीच ख़ुद को बम से उड़ा लिया था.

क्या ये हमला तालिबान ने किया था?

ऐसी भी ख़बरें चलीं कि ये हमला तालिबान ने ही कराया था ताकि विदेशी सैनिकों को जल्द-से-जल्द बाहर निकलने पर मजबूर किया जा सके. इस पर तालिबान का बयान आया कि काबुल ब्लास्ट एक आतंकी हमला है. इस हमले में उसके ख़ुद के 28 लड़ाके मारे गए हैं. अमेरिका की तरफ़ से भी बयान आया कि तालिबान इस हमले का ज़िम्मेदार नहीं है. वो तो एयरलिफ़्टिंग में मदद कर रहा है.

अभी ये पता नहीं चला है कि तालिबान की स्क्रीनिंग के बावजूद हमलावर एयरपोर्ट के दरवाज़े तक पहुंचने में कामयाब कैसे हो गए? अगर काबुल पर तालिबान का क़ब्ज़ा है तो उसकी निगरानी में इतना बड़ा हमला संभव कैसे हुआ? काबुल पर क़ब्ज़े के बाद तालिबान ने पहली प्रेस कॉन्फ़्रेंस में एक भरोसा दिलाया था. तालिबान ने कहा था कि वो अफ़ग़ानिस्तान की धरती का इस्तेमाल आतंकी हमले के लिए नहीं होने देगा. काबुल ब्लास्ट ने उसकी कथनी और करनी में अंतर को और बढ़ा दिया है.

तालिबान नहीं तो और कौन?

इस बर्बर हमले की ज़िम्मेदारी ली, इस्लामिक स्टेट ऑफ़ ख़ुरासान प्रॉविंस (ISKP) ने. इसे ISIS-K, IS-K जैसे नाम से भी जाना जाता है. हमले के बाद ISKP ने बाकायदा स्टेटमेंट जारी किया. इसके मुताबिक, तालिबानी लड़ाके इस हमले का निशाना नहीं थे. आतंकी अमेरिकी सैनिकों और उनके अफ़ग़ान सहयोगियों को नुकसान पहुंचाने के इरादे से आए थे. स्टेटमेंट के साथ आत्मघाती हमलावर की तस्वीर भी जारी की गई है. उसका नाम अब्दुल रहमान अल-लोगारी बताया गया है. तस्वीर में लोगारी का चेहरा स्पष्ट नहीं है. उसके बाएं हाथ में बंदूक है और पीछे इस्लामिक स्टेट का झंडा लगा है.

काबुल ब्लास्ट में शामिल आतंकी अफ़ग़ानिस्तान के लोगार प्रांत का रहनेवाला था.
काबुल ब्लास्ट में शामिल आतंकी अफ़ग़ानिस्तान के लोगार प्रांत का रहनेवाला था.

इस्लामिक स्टेट की ऑफ़िशियल न्यूज़ एजेंसी ने 160 लोगों की हत्या का दावा किया है. उसने साफ़ लिखा कि इन हमलों का निशाना अमेरिकी सैनिक थे, तालिबानी नहीं.

क्या चाहता है ISKP?

जून 2014 में इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक़ एंड लेवांत (ISIL) ने ‘इस्लामिक स्टेट’ बनाने का ऐलान किया. इराक़ और सीरिया के उन इलाकों में, जहां पर ISIL का क़ब्ज़ा था. उस समय इस गुट की कमान अबू बक़र अल-बग़दादी के पास थी. बग़दादी ने ख़ुद को खलीफा यानी दुनियाभर के मुस्लिमों का लीडर घोषित कर दिया. एक तालिबान, पाकिस्तान में भी है. उसका नाम है तहरीक़-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP). सितंबर 2014 में उसके छह सीनियर कमांडर्स अलग हो गए. वे सभी अफ़ग़ानिस्तान गए. वहां उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान वाले तालिबान के कुछ बागियों के साथ मिलकर ISKP की स्थापना की. इस्लामिक स्टेट ऑफ़ ख़ुरासान प्रॉविंस.

ख़ुरासान क्या है? ये एक ऐतिहासिक इलाके का नाम है. जो सातवीं सदी में इस्लामिक कैलिफ़ेट के क़ब्ज़े में आया था. इसका अर्थ होता है, उगते सूर्य की धरती. आधुनिक समय में ख़ुरासान के कुछ-कुछ हिस्से अफ़ग़ानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और ईरान में फैले हुए हैं. इसी प्राचीन नाम के आधार पर ISKP का नामकरण हुआ. गठन के साथ ही ISKP ने बग़दादी को अपना खलीफा मान लिया. अपने पीक पर ISKP का संख्या-बल लगभग तीन हज़ार के आस-पास था. इसमें अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के अलावा भारत के भी जिहादी शामिल हुए. तालिबान के वे लड़ाके, जिन्हें अपना संगठन कम कट्टर लगता था, उन्होंने भी ISKP से हाथ मिला लिया. ISKP, अफ़ग़ानिस्तान में हुए कुछ सबसे नृशंस आतंकी हमलों के लिए कुख्यात है. पिछले साल मैटरनिटी हॉस्पिटल में बम धमाका हो या काबुल में गुरुद्वारे पर आत्मघाती हमला और अब काबुल एयरपोर्ट. इन सारे हमलों की ज़िम्मेदारी ISKP ने ली है.

ISKP, तालिबान के कितना क़रीब है?

मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि अफ़ग़ानिस्तान पर हुए बड़े हमलों को ISKP और हक़्क़ानी नेटवर्क ने मिलकर अंज़ाम दिया है. हक़्क़ानी नेटवर्क इस समय तालिबान का सबसे बड़ा पार्टनर है. वो तालिबान के साथ अफ़ग़ानिस्तान में सरकार बनाने की तैयारी कर रहा है. इस्लामिक स्टेट ने कई बार अमेरिका के साथ समझौते को लेकर तालिबान की आलोचना भी की है. आइएस का कहना है कि तालिबान इस्लाम की मूल विचारधारा से भटक गया है. ISKP और तालिबान ने एक-दूसरे के ख़िलाफ़ लड़ाईयां भी लड़ीं है.

अमेरिका और अफ़ग़ान सेना के साथ लड़ाई में ISKP को अच्छा-खासा नुकसान पहुंचा था. उसके कई बड़े कमांडर एयरस्ट्राइक में मारे गए. माना जा रहा था कि ISKP का अस्तित्व मिट चुका है. 2017 में यूएस आर्मी ने दावा किया था कि ISKP के 75 फीसदी आतंकी मारे जा चुके हैं. इराक और सीरिया में भी इस्लामिक स्टेट को उखाड़ा जा चुका है. अक्टूबर 2019 में बग़दादी की मौत के बाद इस्लामिक स्टेट का नाम चर्चा से गायब होने लगा था.

जानकारों का कहना है कि ISKP ने ये हमला अपने उभार का सबूत देने के लिए किया है. उसका हाल-फिलहाल में कोई राजनैतिक मकसद नहीं है. वो बस अपने नाम के डर को कायम रखना चाहता है. हालांकि, ये बात भी सच है कि इसकी तरफ ध्यान देने की ज़रूरत आ चुकी है. अगर इससे अभी नहीं निपटा गया तो ये आगे चलकर नासूर बन सकता है. अगर तालिबान सच में ISKP से ख़ुद को अलग दिखाना चाहता है तो उसे भी उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करनी होगी.

हमले के बाद अमेरिका ने क्या किया?

26 अगस्त को इज़रायल के नए-नवेले प्रधानमंत्री नफ़्ताली बेनेट व्हाइट हाउस में थे. फ़िलिस्तीन के साथ चल रहे ताज़ा विवाद को लेकर उन्हें राष्ट्रपति जो बाइडन से मुलाक़ात करनी थी. लेकिन ऐन मौके पर काबुल ब्लास्ट की ख़बर आ गई. तय समय से 15 मिनट पहले बेनेट के साथ मीटिंग रद्द कर दी गई. जो बाइडन को स्टेट्स के गवर्नर्स के साथ वर्चुअल मीटिंग भी तय थी. उसे भी कैंसिल कर दिया गया.

हालात की समीक्षा के बाद जो बाइडन ने राष्ट्र के नाम संबोधन दिया. उन्होंने पहले मारे गए सैनिकों को याद किया और उनके परिवारों के प्रति संवेदना प्रकट की. बाइडन ने साफ़ किया कि अमेरिका का अफ़ग़ानिस्तान में और रुकने का कोई इरादा नहीं है. उन्होंने कहा कि एयरलिफ़्ट कैंपेन पहले की तरह ही चलता रहेगा. लांकि, बाइडन ने ये भी वादा किया कि अमेरिकी सैनिकों की हत्या के दोषियों को बख़्शा नहीं जाएगा. उन्हें सज़ा दी जाएगी. उसके लिए समय और जगह अमेरिका तय करेगा.

31 अगस्त तक अमेरिका का बाहर जाना लगभग तय है. लेकिन उसका अफ़ग़ानिस्तान से नाता तब भी शायद ही टूटेगा. उसे अपने सैनिकों की हत्या का बदला लेने वापस आना ही होगा. ये कब और किस स्वरूप में होगा, ये देखने वाली बात होगी.

Joe Biden
जो बाइडेन ने कहा है कि हमले के दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा.

अब निष्कर्ष की बात.

काबुल बम ब्लास्ट के बाद बहुत सारी विडंबनाएं सामने आई हैं.

पहली. तालिबान ने कहा कि काबुल ब्लास्ट एक ‘आतंकी’ हमला है. लेकिन इसी तालिबान ने 9/11 के मास्टरमाइंड ओसामा बिन लादेन को शरण दी थी. यही तालिबान हज़ारों अमेरिकी सैनिकों और बेगुनाह अफ़ग़ान नागरिकों की हत्या का ज़िम्मेदार भी है. यही तालिबान अतीत में विदेशी दूतावासों और नागरिकों पर अनगिनत हमले कर चुका है.

दूसरी बात. अमेरिका ने तालिबान को ‘विद्रोही गुट’ घोषित किया हुआ है. ताकि आतंकियों से समझौता करने का लांछन न लगे. जबकि तालिबान के साथ काबुल की गद्दी पर बैठने वाला ‘हक़्क़ानी नेटवर्क’ घोषित आतंकी संगठन है. काबुल स्थित विदेशी दूतावासों पर हमले और विदेशी नागरिकों की किडनैपिंग में उसका नाम आया है. नेटवर्क का मुखिया सिराज़ुद्दीन हक़्क़ानी एफ़बीआई की मोस्ट वॉन्टेड लिस्ट में है. उसके ऊपर 37 करोड़ रुपये का ईनाम है. तालिबान की लीडरशिप में वो दूसरे नंबर पर है. जब तालिबान की सरकार बनेगी, तब उसकी भूमिका अहम होने वाली है. कौन भरोसा करेगा कि सरकार में शामिल होने के बाद हक़्क़ानी नेटवर्क अचानक से पाक-साफ़ हो जाएगा.

तीसरी बात. ISKP कैसे बना? पाकिस्तानी तालिबान और अफ़ग़ान तालिबान के बागियों को मिलाकर. अमेरिका और पाकिस्तान ने ISKP और पाकिस्तानी तालिबान को आतंकी संगठन की लिस्ट में शामिल किया हुआ है. ISKP के कई टॉप लीडर्स का पाकिस्तान से सीधा कनेक्शन रहा है. उन्हें वहां ट्रेनिंग मिली है. समय-समय पर आईएसआई का सपोर्ट भी मिलता रहा है. पाकिस्तान दुनिया को ये बताता है कि वो अपने यहां वाले तालिबान को मिटाने के लिए मिलिटरी कैंपेन चलाता रहता है. मगर रिपोर्ट्स बताती हैं कि पाकिस्तान उन्हें हर तरह से मदद देता है. अमेरिका के एयरस्ट्राइक में ISKP की कमर टूट गई थी. इस गुट को समाप्त माना जा रहा था.

लेकिन तालिबान के क़ब्ज़े के बाद इतनी जल्दी उभार होना बताता है कि उन्हें संरक्षण मिल रहा था. इस मसले में सीधा शक पाकिस्तान पर जाता है. ये बात भी याद रखी जानी चाहिए कि, जब तालिबान एक-एक कर अफ़ग़ानिस्तान के इलाकों पर क़ब्ज़ा कर रहा था, तब उसने जेलों में बंद आतंकियों को भी छुड़ा लिया था. इनमें से कई ISKP से भी जुड़े थे. उन्हें अमेरिका और उसके सहयोगियों से बदला लेना था. उन्होंने ले लिया. क्या वे आतंकी यहीं तक रुक जाएंगे? कतई नहीं.

चौथी बात. हिंदुस्तान टाइम्स में 27 अगस्त को शिशिर गुप्ता की रिपोर्ट पब्लिश हुई है. Curious case of ISKP emir Aslam Farooqui and Pak links. रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल 2019 में असलम फ़ारुक़ी ISKP का सरगना बना. उसकी पैदाइश पाकिस्तान की है. असलम फ़ारुक़ी पहले लश्कर-ए-तैयबा के लिए काम कर चुका है. ये गुट पाकिस्तान से ही ऑपरेट होता है.मार्च 2020 में काबुल में एक गुरुद्वारे पर हमला हुआ था. इसमें एक भारतीय और 26 अफ़ग़ान सिख मारे गए थे. इस हमले का मास्टरमाइंड असलम फ़ारुक़ी ही था.

अप्रैल 2020 में फ़ारुक़ी को अफ़ग़ानिस्तान में अरेस्ट किया गया. उस समय पाकिस्तान ने अफ़ग़ान राजदूत को बुलाकर फ़ारुक़ी को सौंपने की मांग रखी थी. पाकिस्तान को डर था कि वो सारा कच्चा-चिट्ठा न खोल दे. हालांकि, उसे पाकिस्तान के हवाले नहीं किया गया. असलम फ़ारुक़ी बगराम जेल में बंद था. आशंका जताई जा रही है कि बगराम पर तालिबान के क़ब्ज़े के दौरान फ़ारुक़ी भी वहां से भाग निकला.

जब ISKP ने काबुल ब्लास्ट की ज़िम्मेदारी ली, उसने अपने चिट्ठी में लिखा कि उसका निशाना अमेरिका और उसके सहयोगी थे, तालिबान नहीं. ये कोई कैसे मान सकता है कि तालिबान और ISKP अलग हैं!

पाकिस्तान में एक धड़ा तालिबान की वापसी को लेकर बहुत खुश है. प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने तो यहां तक कहा कि तालिबान ने ग़ुलामी की ज़ंज़ीरों को तोड़ा है. पाकिस्तान में पूर्व आईएसआई चीफ़ हामिद गुल का एक बयान ख़ूब चर्चित है. गुल ने कई बरस पहले एक टीवी शो में कहा था,

‘जब इतिहास लिखा जाएगा. तब कहेंगे कि आईएसआई ने अमेरिका की मदद से सोवियत यूनियन को शिकस्त दे दी. फिर एक जुमला होगा. आईएसआई ने अमेरिका की मदद से अमेरिका को शिकस्त दे दी.’

इस बात की क्या गारंटी है कि ये जुमला पलटकर एक दिन पाकिस्तान पर चोट नहीं करेगा. अगर आप किसी सनकी के हाथ में बंदूक सौंपते हैं तो उससे ये उम्मीद मत रखिए कि वो हमेशा आपकी हिफ़ाज़त ही करेगा. हो सकता है वो बंदूक की नली आपकी पीठ पर ही तान दे. अफ़ग़ानिस्तान इसका ताज़ातरीन उदाहरण है. इससे सबक लेने में ही सबकी भलाई है. आतंकवाद की जड़, जो कि पाकिस्तान के सरकारी तंत्र की छत्र-छाया में फल-फूल रही है, अगर उसे काटना है तो फिर जड़ पर ही चोट करनी पड़ेगी. वरना विध्वंस रोकना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन होगा.


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