Thelallantop

इंदिरा गांधी पर व्यंग्य करने वाले भोजपुरी कवि की पूरी कहानी

25 फरवरी, 2019 को कुबेरनाथ मिश्र 'विचित्र' का निधन हो गया था.

यह लेख दी लल्लनटॉप के लिए मुन्ना के. पाण्डेय ने लिखा है. 1 मार्च 1982 को बिहार के सिवान में जन्मे डॉ. पाण्डेय के नाटक, रंगमंच और सिनेमा विषय पर नटरंग, सामयिक मीमांसा, संवेद, सबलोग, बनास जन, परिंदे, जनसत्ता, प्रभात खबर जैसे प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में तीन दर्जन से अधिक लेख/शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली सरकार द्वारा ‘हिन्दी प्रतिभा सम्मान(2007)’ से सम्मानित डॉ. पाण्डेय दिल्ली सरकार के मैथिली-भोजपुरी अकादमी के कार्यकारिणी सदस्य रहे हैं. उनकी हिंदी प्रदेशों के लोकनाट्य रूपों और भोजपुरी साहित्य-संस्कृति में विशेष दिलचस्पी. वे वर्तमान में सत्यवती कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) के हिंदी-विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं.

जैसा कि अधिकतर मंचीय कवियों के होते हैं उनका भी एक तखल्लुस था – ‘विचित्र’. लेकिन यह तखल्लुस केवल नाम भर का न था. वह यथा नाम तथा धर्म वाले व्यक्तित्व के कमाल कवि थे. नबीन चंद्रकला कुमार विचित्र जी से जुड़ी याद लिखते हैं-

अपने विचित्र वेश-भूषा से उनकी पहचान बनी थी. माथे पर गांधी टोपी, पैरों में हवाई चप्पल, कंधे पर लटकती झोली, झोली में शंख-पत्रा और अपनी छपी हुई पोथी और बिना छपी पांडुलिपि. हाथ में एक छाता, गरदन में रूद्राक्ष की माला, चेहरे पर दिव्य तेज, धोती-कुरता और गमछा. वह जब मंच पर कविता पढ़ने के लिए उठते तो उनको देख लोग पेट पकड़ कर हंसने लगते.

यह भोजपुरी के सबसे मारक व्यंग्यकार, हास्य कवि विचित्र जी का बाहरी कलेवर था. लिखते-लिखते कलमनवीसी विचित्र जी के नाम से मशहूर हुई, पर उनका पूरा नाम कुबेरनाथ मिश्र ‘विचित्र’ था. उन्होंने भोजपुरी के पारंपरिक परिपाटी की कविताई न करके जो विधा चुनी वह थी – व्यंग्य और हास्य. उनकी अधिकतर रचनाओं में भोजपुरी के और भी जीवन रंग हैं ओर मुख्य ताव यही है. विचित्र जी का मन इन दोनों में खूब रमा और वह काव्य-मंच के उस्ताद कवि थे. पूरे पूर्वांचल के भोजपुरिया अंचल में वह जनप्रिय तो थे ही खासे लोकप्रिय भी थे. देवरिया के भाटपाररानी में आज ही के दिन 1935 में जन्में और पेशे से बी.आर. डी. कृषि इंटर कॉलेज में शिक्षक कुबेर नाथ मिश्र ‘विचित्र’ का गांव भिंडा मिश्र था.

जहां उनके समकालीन भक्ति अथवा श्रृंगार में डूबे हुए थे, वहीं विचित्र जी ने सामाजिक विसंगतियों और राजनीतिक उठापटक पर अपनी कलम चलाई. कुछ कविताएं तो ऐसी हैं कि आज की सरकारें उन्हें सीखचों में डाल दे. ऐसा ही एक राजनीतिक दौर था, जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की और विपक्ष को परे कर दिया. इस दौर पर साहित्यकारों ने खूब लिखा. और कुछ फिल्मकारों ने फ़िल्म भी बनाई. इंदिरा गांधी जी के राजनीतिक प्रभाव से आज हम सहमत-असहमत हो सकते हैं पर याद कीजिए गुलजार की आंधी फ़िल्म को जिससे साहित्यकार कमलेश्वर का नाम जुड़ा है. इस फ़िल्म की नायिका को इंदिरा गांधी की परछाई के रूप में देखा गया था. इसी फिल्म का वह गीत याद कीजिए – ‘सलाम कीजिए आली जनाब आये हैं’- भोजपुरी में इसी तरह का एक व्यंग्य गीत विचित्र जी ने इंदिरा गांधी पर रचा. भोजपुरी साहित्य में और इसके अलग-अलग इलाकाई मंचों पर विचित्र जी व्यंग्य के इसी मारक तेवर के साथ खड़े थे. उन्होंने एक कविता के भीतर इन्दिरा जी को बधाई देते हुए तमाम विपक्ष को नामों सहित और तबके तमाम मुद्दे (जो आज भी मौजूं हैं) को अपनी कविता ‘इंदिरा जी के बधाई पहुंचे’ में उतार दिया है-

भारी जीत भइल इंदिरा जी बारंबार बधाई लs
आज विरासत में इन्हन से जातिवाद महंगाई लs
ढील भइल कानून व्यवस्था मुद्रा के बढियाइ लs
…डीजल तेल अकास छुए अनुशासनहीन पढ़ाई लs
मास्टर डॉक्टर इंजीनियर के जेहल बीच पिटाई लs
…मेहता, लिमये, भित्तर गइले राजनारायण पाइ लs
संजय, रेडी, कमलापति, बहुगुन्ना, दत्त, पाई लs
…दिल्ली के गद्दी खातिर दिग्विजयी कांग्रेस ‘आई’ लs
…भारी जीत भइल इंदिरा जी बारंबार बधाई लs

उनके काव्यात्मक तंज हास्य की चादर ओढ़े आते और लक्षित बिंदु पर लगते तो सुनने वाला तिलमिलाकार रह जाता और उसके चेहरे पर खिसियानी हंसी रह जाती. उनका कुनैन को मीठी गोली में डाल कर परोसने का अंदाज निराला था. यह विचित्र जी की कविता की धार थी. वह असल व्यंग्यकार थे, जो सत्ता से सीधे भिड़ता है और जनता के सवालों को सत्ता के मुंह पर चिपका देता है. भोजपुरी और हिंदी के लेखक , आलोचक एवं कवि डॉ. सुनील कुमार पाठक कहते हैं,

विचित्र जी के व्यंग्य में मारकता बहुत नहीं थी पर वह विशुद्ध हास्य के अवतारी कवि थे. कितना कठिन होता है विशुद्ध हास्य रस की कविता लिखना यह सभी नहीं जान सकते हैं. वह काव्य-मंचों पर अपनी कविता से, पहनावा-ओढ़ावा, भाव-भंगिमा सब विषयों पर हास्य की भरपूर सर्जना कर देते. उनकी तरफ इशारा करते संचालक जब कविता-पाठ के लिए आमंत्रित करते तो उनके अपनी जगह से उठते ही सभी के चेहरे खिल जाते. सबको हंसा-हंसाकर लोट-पोट कर देने वाले कवि से जब भी अकेले में बतियाने का मौका मिलता तो एक संजीदा और गुरु गंभीर चिंतन वाले इंसान के दर्शन होते.

उनकी चर्चित कृतियों में – लीलावती, कलावती, भिनसहरा, दुपहरिया, बलिया के बब्बर, कुबेर कविताई, भागवत रसायन, काशी में तीन पांच और विचित्र समोसा प्रमुख हैं.

वैसे भोजपुरी में ऐसे कम ही कवि हुए हैं, जिनका जीवन भी ऐसे प्रसंगों से भरा हो, जिनसे सहज ही हास्य पैदा हो जाए. ऐसे ही एक प्रसंग का जिक्र आखर पेज ने किया है कि ‘जब विचित्र जी को दिल्ली सरकार के मैथिली-भोजपुरी अकादमी में काव्यपाठ के लिए आमंत्रित किया गया था, तब विचित्र बाबा अपने साथ दातुन काटने के लिए चाकू लेकर आए थे पर दिल्ली मेट्रो की सुरक्षा जाँच में उनके चाकू को जब्त कर लिया गया. विचित्र बाबा बहुत परेशान हुए. और बोले बबुआ एक चाकू का इंतज़ाम करो नहीं तो मैं दातुन कैसे बनाऊँगा? फिर उनके साथ के व्यक्ति ने पहाड़गंज से दातुन का इंतज़ाम किया फिर बात बनी.’

गांवों में पसरे अंधविश्वास टोने-टोटके पर भी विचित्र जी लिखते हुए राजनीतिक भ्रष्टाचार को अपनी कहन में सलीके से खींच लेते हैं-

जवना सरसो से भूतवा झराए के बा
भूत ओहि सरसउवा में घुसल बाटे
जवना नेतवा के दुखवा सुनावे के बा
लोग ओहि के चमचा के चूसल बाटे

पर ऐसा नहीं कि जीवन के मधुर क्षणों पर विचित्र बाबा की सरकण्डे की कलम नहीं चली. एक कविता में वह लिखते हैं-

रउआ अइती त अंगना अंजोर हो जाइत
हमार मन बाटे सांवर उ गोर हो जाइत
जवन छवले अन्हरिया के रतिया बाटे
तवन रउरे मुस्कइला से भोर हो जाइत

जब वह गांव के दृश्य रचते हैं तब वह किसानी संवेदना में डूबकर लिखते हैं और वहां प्रयुक्त बिम्ब इतने बारीक होते गोया भरोसा ही न हो कि यह उसी कवि की पंक्तियां हैं जो कल शाम सबको हंसा-हंसाकर रुला रहा था. लेकिन यह भी कवि विचित्र जी की खासियत थी कि वह ऐसा करते अपने समय के जरूरी सवालों को नहीं छोड़ते-

केहु बैल के पीठी से पैना लड़ावत बा
केहु ककही के कहला से ऐना लड़ावत बा
जेकरा रहत बा, लहत बा, बहत बाटे
ऊ खिड़की से नैना से नैना लड़ावत बा..

सूई बिना डोरा के, अन्न बिना बोरा के
सेनुर बिना सिन्होरा के, लड़िका बिना कोरा के
आ विचित्र बिना झोरा के उदास हो जालें…

विचित्र जी का एक काव्य-संग्रह है, जिसमें उन्होंने सरस्वती वंदना के अलावा देवरिया के चमत्कारी देवरहा बाबा पर एक कविता लिखी है

बाबा देवरहवा में लागल जियरा
बिना गइले ना माने हमार हियरा

इस संग्रह के परिचय के भोजपुरी के आलोचक डॉ अर्जुन तिवारी ने लिखा है-

विचित्र समोसा हास्य-व्यंग्य का अनमोल काव्य-संग्रह है, जिसको पढ़ने वाला घमंड करेगा कि अब मेरी भाषा भोजपुरी में भी स्वाद वाली रसगर रचना हो रही है.

इस को कहते हुए वह विचित्र जी की नेता संबंधी जिन पंक्तियों को उद्धृत करते हैं उन्हें देखा जाना चाहिए-

जाति बिरादर के बटोरि के करे बेचारू कांव-कांव
लूटि परे तहं टूटि करे उ हरदम चितवे आपन दांव

मुक्तक काव्य में उनकी कलम खूब रमी है. इसी संग्रह के एक मुक्तक की दो पंक्तियाँ हमारी ऑफिस-ऑफिस लालफीताशाही व्यवस्था पर क्या खूब तंज है –

नौकरी में निम्मन ह सबसे कलर्की
बिना चाय-पानी के फ़ाइल न सरकी

विचित्र जी की कविता का वितान गांव-समाज, बदलते नैतिक मूल्य, सांस्कृतिक पतन से लेकर खेती-किसानी, राजनीतिक भ्रष्टाचार, भेदभाव आदि तक फैला हुआ है. गंभीर से गंभीर बात को हास्य की चाशनी में डुबोकर होमियोपैथी की मीठी गोलियों की तरह जनता के हृदय में उतार देना विचित्र जी की खासियत थी.

शायद यही वजह है कि हिंदी साहित्य के हास्य में जो स्थान काका हाथरसी को और व्यंग्य में जो इज्जत परसाई जी को प्राप्त है, वही स्थान भोजपुरी कविताई में कुबेरनाथ मिश्र ‘विचित्र’ जी को प्राप्त है. विगत 25 फरवरी, 2019 को भोजपुरी साहित्य के इस अप्रतिम हास्य-व्यंग्यकार का निधन हो गया. पर उनकी कविताएं उनके पुस्तकों के रूप में हमारे बीच है और भोजपुरी साहित्य की थाती है. भोजपुरी परिषद भाटपार रानी के अध्यक्ष दूधनाथ शर्मा ‘श्याम’ ने विचित्र जी की कविताई पर कहा है कि ‘उनकी कविता को सुनने वाला इतना लट्टू हो जाता है कि क्या कहने? लोग उनकी कविता को सुनने के बाद सोचते कि कवि जी को कहां उठाएं कहां बैठाएं या कि अपनी जमीन में ही बसा लें. ऐसी रसगर और चोट करने वाली कविता का मैंने पूरे भोजपुरी अंचल में नहीं देखी.’ आज उन्हीं कुबेरनाथ मिश्र ‘विचित्र’ जी का जन्मदिन है.

विडियो- भिखारी ठाकुर की टीम में रहे रामचंद्र मांझी का लौंडा नाच देखिए

Read more!

Recommended