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भोजपुरी साहित्यकार रामनाथ पाण्डेय की अंतिम इच्छा, जो अब तक पूरी न हो सकी!

यह लेख दी लल्लनटॉप के लिए मुन्ना के. पाण्डेय ने लिखा है. 1 मार्च 1982 को बिहार के सिवान में जन्मे डॉ. पाण्डेय के नाटक, रंगमंच और सिनेमा विषय पर नटरंग, सामयिक मीमांसा, संवेद, सबलोग, बनास जन, परिंदे, जनसत्ता, प्रभात खबर जैसे प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में तीन दर्जन से अधिक लेख/शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली सरकार द्वारा ‘हिन्दी प्रतिभा सम्मान(2007)’ से सम्मानित डॉ. पाण्डेय दिल्ली सरकार के मैथिली-भोजपुरी अकादमी के कार्यकारिणी सदस्य रहे हैं. उनकी हिंदी प्रदेशों के लोकनाट्य रूपों और भोजपुरी साहित्य-संस्कृति में विशेष दिलचस्पी. वे वर्तमान में सत्यवती कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) के हिंदी-विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं.


भोजपुरी गीतों से परे भोजपुरी साहित्य की भी एक बड़ी दुनिया है, जिनमें गद्य की तमाम विधाएं अपने उत्कृष्ट रूप में हैं. जिनको भोजपुरी का दायरा भिखारी ठाकुर के बिदेसिया या महेंद्र मिश्र के गीतों तक ही दिखता है, उनके लिए रामनाथ पाण्डेय का साहित्य भोजपुरी साहित्यिकी और ज्ञान का नया द्वार खोलता है.

साहित्य लेखन और अध्ययन में गहरी रुचि वाले पंडित रामनाथ पाण्डेय का जन्म 08 जून 1924 को छपरा (सारण जिला) के रतनपुरा में हुआ था. एक दौर में जो कद हिंदी साहित्यकारों में बनारस और इलाहाबाद का रहा है वही कद भोजपुरी में सारण की भूमि की रही है. भारतीय स्वन्त्रता संग्राम में कंपनी राज के खिलाफ पहले जनविद्रोह के नायक महाराजा फतेह बहादुर साही से लेकर भिखारी ठाकुर, महेंद्र मिश्र, राधामोहन चौबे ‘अंजन’, महेंद्र शास्त्री, पाण्डेय कपिल जैसी विभूतियां इस मिट्टी की साहित्यिक उपज हैं. इसे भोजपुरी का रत्न जिला कहें तो अतिशयोक्ति न होगी. बाद में, इसकी उपशाखाओं का विस्तार छपरा के अतिरिक्त सिवान और गोपालगंज नामक दो और जिलों के रूप में हुआ.

कॉमर्स ग्रेजुएट और रेलवे के कर्मचारी रामनाथ पाण्डेय भोजपुरी में सिद्ध होने से पहले हिंदी में कुछ उपन्यास लिख चुके थे. उन्होंने पानी समाज, खूनी समाज, एक जल तीन फूल, वह वेश्या थी, फूल झड़ गया : भौंरा रो पड़ा, बदलती दुनिया, नयी जिंदगी : नया जमाना, उड़ चली बदरिया नभ में काली, मिटेंगे काले बादल, मचलती जवानी, जिंदगी का मोड़, कीचड़ और कमल जैसे कुल बारह उपन्यास लिखे. लेकिन जल्दी ही उन्हें अहसास हो गया कि सतही रूमानी हिन्दी उपन्यास उनका लक्ष्य नहीं अतः मातृभाषा की सेवा ही उनके लेखन का उद्देश्य बना. फिर आगे चलकर वह लेखन ही नहीं भोजपुरी साहित्य के अन्य विधाओं के प्रकाशन से भी जुड़े रहे.

रामनाथ पाण्डेय जी के बारे में एक दिलचस्प तथ्य यह है कि वह भोजपुरी के पहले उपन्यासकार ही नहीं, बल्कि उन्होंने भोजपुरी की पहली बाल पत्रिका ‘नवनिहाल’ (1982), कहानी की पत्रिका ‘चाक’ और भोजपुरी साहित्य की पहली आलोचना पत्रिका ‘कसउटी’ प्रकाशन भी करवाया था. यह आलोचना पत्रिका प्रो. हरिकिशोर पाण्डेय के संपादन में निकलती थी. प्रो. हरिकिशोर पाण्डेय छपरा के प्रतिष्ठित जगदम कॉलेज में अंग्रेजी के चर्चित प्रोफेसर थे किंतु रामनाथ पाण्डेय और डॉ. प्रभुनाथ सिंह के प्रभाव में अपनी मातृभाषा की सेवा में तत्पर हुए.

रामनाथ पाण्डेय ने केवल साहित्य सर्जना नहीं कि बल्कि मातृभाषा के प्रति अन्य भोजपुरियों में एक रागात्मक एकता और जागृति की मशाल जलाई और परिणामतः अन्य भाषा विभागों और देश के अन्य क्षेत्रों में कार्यरत भोजपुरियों ने अपनी मातृभाषा/निज भाषा के महत्व को समझते हुए भोजपुरी में रचनात्मक योगदान दिया. भोजपुरी साहित्य के विकास में उनकी भूमिका भाषा मिशनरी जैसी थी. उनके इस भागीरथ प्रयासों और विपुल साहित्य सर्जना को देखते हुए उन्हें साहित्यालंकार, साहित्यरत्न आदि उपाधियों से भी सम्मानित किया गया.

भोजपुरी का पहला उपन्यास ‘बिंदिया’

साल 1956 भोजपुरी साहित्य इतिहास में एक विधा के प्रस्थान बिंदु की तरह है. यही वह वर्ष है जब रामनाथ पाण्डेय ने भोजपुरी का पहला उपन्यास ‘बिंदिया’ शेखर प्रकाशन, छपरा, सारण से प्रकाशित हुआ. इस उपन्यास के प्रकाशन के बाद महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने रामनाथ पाण्डेय को पत्र लिखकर इस उपन्यास की साहित्यिक उपादेयता सिद्ध कर दी. राहुल सांकृत्यायन ने अपने पत्र में लिखा-

भोजपुरी में उपन्यास लिखकर आपने बहुत उपयोगी काम किया है. भाषा की शुद्धता का आपने जितना ख्याल रखा है, वह भी स्तुत्य है. लघु उपन्यास होने से यद्यपि पाठक पुस्तक समाप्त करते समय अतृप्त ही रह जाएगा, पर उसके स्वाद की दाद तो हर एक पाठक देगा. आपकी लेखनी की उत्तरोत्तर सफलता चाहता हूं.

राहुल सांकृत्यायन के ऐसा लिखने की पृष्ठभूमि इस उपन्यास की कथावस्तु थी.

भोजपुरी के विपुल साहित्य से अपरिचित लोगों के लिए यह जानकारी है कि राहुल जी ने दो संग्रहों में भोजपुरी के आठ नाटक लिखे हैं, जिनमें एक नाटक ‘मेहरारुन की दुर्दशा’ है. रामनाथ पाण्डेय के उपन्यास बिंदिया की कथा के केंद्र में स्त्री ही है. यह अपने आप में विशेष बात है कि भोजपुरी के पहले उपन्यास की पृष्ठभूमि स्त्री विमर्श रहा है जबकि भारत में यह बहस अभी एक तरह से शैशवावस्था में था. हालांकि कुछ लेखनी जरूर आ गईं थीं और यही गौरव भोजपुरी के पहले सिनेमा को भी प्राप्त है कि उनके केंद्र में भी स्त्री की समस्या ही है. यह दीगर बात है कि आज भोजपुरी की पॉपुलर गायकी और सिनेमा दुःखद उभार पर हैं?

बिंदिया पर बात करते हुए भोजपुरी के विद्वान साहित्यकार और आलोचक भगवती प्रसाद द्विवेदी लिखते हैं,

उस वक्त स्त्री-विमर्श जैसी अवधारणा न होने के बावजूद दृष्टि-सम्पन्न रामनाथजी ने उपन्यास के कथानक को नारी-विमर्श पर ही केन्द्रित किया था. यही वजह है कि पहला ही उपन्यास मील का पत्थर साबित हुआ था….बिंदिया में जहां गंवई परिवेश में पली-बढ़ी प्रतिकूल परिस्थितियों से लोहा लेती, दृढ़ता व साहस की प्रतिमूर्ति युवती के कारनामों के जीवंत चित्र उकेरे गए थे, वहीं ‘जिनगी के राह’ में छात्र-जीवन से ही अन्याय के विरुद्ध संघर्षरत प्रमोद के, आगे चलकर मजदूरों के वाजिब हक की खातिर शोषण-उत्पीडऩ के विरुद्ध, अनवरत संघर्ष की दास्तान पेश की गई थी.

पहले ही उपन्यास को इतनी प्रशंसा मिलने पर रामनाथ पाण्डेय का हौसला बुलंद हुआ और उनका उपन्यास लेखन शुरू हुआ और उन्होंने ’जिनगी के राह‘, ’महेन्दर मिसिर‘, ’इमरीतिया काकी‘ और ’आधे-आध‘ जैसे उपन्यास लिखे और यह सब उपन्यास भी उतनी ही प्रशंसित हुए. विषय वैविध्य और सामाजिक-राजनीतिक विमर्श उनके उपन्यासों की खासियत रही. ‘इमरीतिया काकी’ उपन्यास में दलित परिवार की नायिका इमरीतिया है जो केवल जाति-धर्म, ऊंच-नीच के विरुद्ध सवाल नहीं करती बल्कि समाज को बांटने वाली शक्तियों से भी टकराती है.
इसी तरह पूरबी गायकी वाले महेंद्र मिश्र भोजपुरी के आलोचकों की नजर से छिटका वह सितारा है जिसकी रचनाओं ने किन्हीं वजहों से तब के आलोचकों के नहीं बल्कि लोक के हृदय में स्थान पाया. रामनाथ पाण्डेय का एक उपन्यास पूरबी के जनक महेन्दर मिसिर (महेंद्र मिश्र) पर ही है. इस उपन्यास में उन्होंने तथ्यात्मक और तार्किक ढंग से महेंद्र मिश्र के जीवन से जुड़ी किंवदंतियों को तोड़कर उनसे जुड़े ऐतिहासिक संदर्भों को सामने लाया. इस उपन्यास की महत्ता पर भोजपुरी और हिंदी के बड़े आलोचक एवं अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. विवेकी राय ने लिखा था – “पुस्तक पढ़ रहा हूं. फुलसूंघी से हर स्तर पर उत्तम पुस्तक है.” – फुलसूंघी भोजपुरी के एक और बड़े साहित्यकार पाण्डेय कपिल का उपन्यास है जिसकी पृष्ठभूमि महेंद्र मिश्र, हलिवन्त सहाय और ढेलाबाई है.

Ramnath Pandey Bhojpuri
रामनाथ पाण्डेय का महेन्दर मिसिर पर लिखा उपन्यास बेहद लोकप्रिय हुआ.

भगवती द्विवेदी लिखते है कि ‘महेन्दर मिसिर के व्यक्तित्व की पुन: पड़ताल करने के लिए उपन्यास मजबूर करता है और उनके चरित्र को नए सिरे से व्याख्यातित-विश्लेषित करने की दिशा में शोधार्थियों के लिए विशेष उपयोगी है. महेन्दर मिसिर उपन्यास ने पूरबी के इस उस्ताद के जीवन से संबंधित कई भ्रांतियों का निवारण किया. भिखारी ठाकुर नाट्यकर्म के पहले शोधकर्ता प्रो. तैयब हुसैन ‘पीड़ित’ इस उपन्यास के हवाले से लिखते हैं “पूरबी ऐसे परवान न चढ़ती यदि महेंद्र मिश्र जैसा संगीत-साधक इसे न छूता . इसी क्रम में भिखारी ठाकुर से उनकी भेंट भी इस क्षेत्र खातिर वरदान साबित हुआ . दोनों को एक-दूसरे से कलात्मक सहयोग मिला.” इस स्थापना के मूल में रामनाथ पाण्डेय की शोधपरक साहित्य दृष्टि ही रही जो उनके उपन्यास में दिखाई देती है. उनके सभी उपन्यास प्रवाह, पठनीयता व प्रभावोत्पादकता की दृष्टि से बेजोड़ हैं.’ महेंद्र मिश्र की साहित्यिक और ऐतिहासिक महत्ता इस उपन्यास ने स्थापित करके महेंद्र मिश्र के आलोचकों के मुंह पर ताला जड़ दिया.

रामनाथ पाण्डेय को अपने उपन्यासों ‘बिंदिया‘ पर जगन्नाथसिंह पुरस्कार, ’इमरीतिया काकी‘ पर अभय आनंद पुरस्कार और ’महेन्दर मिसिर‘ पर राजमंगल सिंह पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

भोजपुरी गद्य साहित्य में पंडित रामनाथ पाण्डेय पांडेयजी का योगदान एक कालावधि की शुरुआत के रूप में देखा जा सकता है. उन्होंने उपन्यासों के अतिरिक्त दो सौ के आसपास लघु कथाएं भी लिखीं जो भोजपुरी माटी और अन्य पत्रिकाओं में छपीं. इसी तरह उनके कहानियों का संग्रह ‘सतवंती, देस के पुकार पर, अन्हरिया छटपटात रहे’ शीर्षक से प्रकाशित हैं. उनकी भाषायी प्रतिबद्धता का आलम यह था कि वह सारण के तीनों हिस्सों सिवान, गोपालगंज, छपरा के अतिरिक्त अन्य प्रांतों में भी साहित्य आयोजनों में सक्रिय रहते और नौजवानों में मातृभाषा के प्रति जाग्रत करते रहते. रामनाथ पाण्डेय जी के पुत्र और सारण भोजपुरिया समाज के संस्थापक श्री विमलेंदु पाण्डेय बताते हैं कि ‘पिताजी आचार्य शिवपूजन सहाय और प्रो. मनोरंजन प्रसाद सिन्हा के से बेहद आत्मीय थे. देर रात तक लालटेन जलाकर और खुद से पैसे खर्च अलग-अलग हिस्सों में मिलों यात्रा कर भोजपुरी माई का अलख जगाने वाले पिताजी की अंतिम तक यह इच्छा रह गयी कि काश भोजपुरी आठवीं अनुसूची में शामिल हो जाती.’

भोजपुरी में मात्र सौंदर्य, लोकसंस्कृति और ऋतुओं के गीत और रंग के खुशनुमा दृश्यों की तलाश में निकले लोगों के लिए पंडित रामनाथ पाण्डेय का गद्य चुनौती है. वहां विमर्श है तो ऐसा जो वैश्विक साहित्य के समक्ष सीना ताने खड़ा है और संवेदनशीलता है तो ऐसी कि वह साहित्य में सुंदर का स्वप्न देखने वाले तमाम वैचारिकों को राह दिखाता है.

आज ही 2006 के जून की सोलहवीं तारीख को पंडित रामनाथ पाण्डेय ने इस संसार से विदा लेकर भोजपुरी साहित्य में वह शून्य पैदा किया जो आज तक किसी से भरा नहीं गया. आज एक दुःखद स्थिति यह है कि ‘भोजपुरी विकास भवन, छपरा’ के इस जुनूनी संस्थापक ने भोजपुरी की निःस्वार्थ सेवा की और उनके ही शहर में उनसे संबंधित कोई चिन्ह मौजूद नहीं है. अल्लामा इक़बाल ने सही ही लिखा है,

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