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रामजियावन दास: जिन्हें भोजपुरी साहित्य में तुलसीदास सरीखा सम्मान मिला

यह लेख दी लल्लनटॉप के लिए मुन्ना के. पाण्डेय ने लिखा है. 1 मार्च 1982 को बिहार के सिवान में जन्मे डॉ. पाण्डेय के नाटक, रंगमंच और सिनेमा विषय पर नटरंग, सामयिक मीमांसा, संवेद, सबलोग, बनास जन, परिंदे, जनसत्ता, प्रभात खबर जैसे प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में तीन दर्जन से अधिक लेख/शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली सरकार द्वारा ‘हिन्दी प्रतिभा सम्मान(2007)’ से सम्मानित डॉ. पाण्डेय दिल्ली सरकार के मैथिली-भोजपुरी अकादमी के कार्यकारिणी सदस्य रहे हैं. उनकी हिंदी प्रदेशों के लोकनाट्य रूपों और भोजपुरी साहित्य-संस्कृति में विशेष दिलचस्पी. वे वर्तमान में सत्यवती कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) के हिंदी-विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं.


रामजियावन दास ‘बावला’ जिन्हें चरवाही में राम नाम की ऐसी धुन लगी कि भोजपुरी साहित्य में उन्हें तुलसीदास सरीखा सम्मान मिला. भोजपुरी के जिन कवियों ने अपनी काव्य प्रतिभा से सबसे अधिक लोक प्रसिद्धि पायी है उनमें रामजियावन दास ‘बावला’ का नाम सबसे बड़ा है. कवि सम्मेलनों अथवा गोष्ठियों में वह अपना परिचय देते समय अधिकतर कविताई ही करते थे –

भीखमपुर वासी उदासी बनवासी हम
घासीके पाती में जिनिगी बिताइला
बाहुबल बूता अछूता अस जंगल में
मंगल के कामना से मंगल मनाइला
सेवा में फूल फल जल से पहाड़ी के
पाहुन केहू आवे त परान अस जोगाइला
धूरी में माटी के अपने परिपाटी में
विंध्याचल घाटी में बावला कहाइला

बावला जी विंध्याचल की पहाड़ियों में बसे चकिया के भीखमपुर गांव में 1 जून 1922 को पैदा हुए थे. तबका बनारस एस्टेट का यह पहाड़ी इलाका आज का चंदौली जिला है. वह बमुश्किल चौथे दर्जे तक पढ़ सके. कहते हैं चौथी कक्षा भी उन्होंने जैसे-तैसे पास की थी. बेहद सामान्य परिवार के रामजियावन को स्कूल तो नहीं बाँध पाया पर उनकी कविताई को सरस्वती का आशीर्वाद जरूर मिला. एक लुहार परिवार में जन्मे बावला जी भी पुश्तैनी काम में दक्ष हुए थे पर उनका झुकाव शुरू से ही संगीत और कविताई की ओर था. रामचरितमानस की कथा संगत उन्हें अपने पिता और लोकसंस्कृति से मिली थी.

जैसा कि गांवों का एक रिवाज था तो सोलह की उम्र धरते रामजियावन की शादी मनराजी देवी से हो गयी. अब गृहस्थी की जिम्मेदारियों के साथ युवक रामजियावन ने घर की भैसों की चरवाही का काम अपने जिम्मे ले लिया था. वह विंध्य पर्वत श्रेणी के घाटियों जंगलों में अहले सुबह ही पशुओं को लेकर निकल जाते और देर शाम लौटते. कहते हैं इसी समय धुसूरिया नामक जगह पर बावला जी की संगत वनवासी भीलों, कोल-किरातों से हुई. यही वह समय था जब मानस में रमने वाले कवि का मन वनवासी राम की स्थिति को ओर रत हुआ. महर्षि वाल्मीकि ने ‘मा निषाद’ से जिस राम कथा का बीजवपन किया वह बावला जी के यहां इन्हीं वनवासियों को देखकर जागा और अनायास ही उनके मुंह से निकला –

बबुआ बोलत ना
के हो देहलस तोके बनवास
हम बनवासी बबुआ माना हमरी बतिया
बावला समय में बिताईला एक रतिया
कंद मूल फल जल सेवा में जुटैइबे
बबुआ बोलत ना

यह उनके राम भक्ति परक कविताई का उभार था. मन में राम कथा लोक परम्परा से समाई थी और अब वह अपने कविमन का साथ पा लोक की थाती बनने वाली थी. बावला जी को न शास्त्र, पुराण, पुस्तकों का ज्ञान था, न अध्ययन. लोक उनकी पाठशाला थी और लोक में बसे थे राम और शिव फिर हिंदी के महाकवि मैथिली शरण गुप्त ने सत्य ही तो लिखा है, ‘राम, तुम्हारा चरित्र स्वयं ही काव्य है / कोई कवि बन जाये सहज संभाव्य है’ – बावला जी पर यह पंक्तियां सटीक बैठती हैं. उन्होंने अपनी सहज और प्रत्युत्पन्नमति कवित्व शक्ति से शास्त्र को लोक में रंगकर अपने अंचल को सौंप दिया.

भोजपुरी गायक अभिनेता और राजनेता मनोज तिवारी मृदुल अपने एक इंटरव्यू में कहते हैं कि बावला जी जब राम केवट प्रसंग वाली अपनी कविता गाते थे तो न केवल उनकी बल्कि श्रोताओं-दर्शकों की आंखों से आंसू गिरने लगते थे. यह थी उनकी कवित्व शक्ति –

हाथ जोड़िके केवट बोलले हंसके मधुर बानी
है बाबू राउर मरम हम जानी
जो नैया संग जाई नारी छूट जाई हमरो रोजगारी
बड़ी बिपत में पड़ी जईहे घरवा के मोर परानी
बाबू…

हालांकि रामजियावन दास का एक ही काव्य-संग्रह प्रकाशित है परंतु उनके असंख्य कविताओं को भोजपुरी लोक ने अपना स्वर और साथ देकर अपने थाती की तरह सहेजा है.

बावला नाम कैसे पड़ा?

रामजियावन के नाम में दास और बावला के जुड़ने की कथा भी रोचक है. बावला जी पचास के दशक के उत्तरार्द्ध में आकाशवाणी और विभिन्न काव्य सम्मेलनों में एक सम्मानित नाम बन चुके थे और उन्हीं दिनों में बनारस अपने एक मित्र के साथ अपनी कविताओं के प्रकाशन के संबंध में आये हुए थे, वहीं भोजपुरी के ख्यात साहित्यकार गीतकार कवि पंडित हरिराम द्विवेदी जी ने उनकी भक्ति परक रचनाओं को देखते हुए अपने नाम में दास जोड़ने की सलाह दी और रामजियावन हो गए रामजियावन दास . अभी ‘बावला’ होना बाकी था. एक सुबह दशाश्वमेध घाट से नहाकर अपनी कविताई की धुन में लौटते रामजियावन दास एक सज्जन से टकरा गए और उसने अपनी ओर से कुछ विशेषण बनारसी में उनको दे दिया. परन्तु कविमन को जो शब्द रुचा वह था – बावला. तो कविराज हो गए राम जियावन दास बावला.

भोजपुरी के साहित्यकार अशोक द्विवेदी ने बावला जी का मोनोग्राफ लिखा है, वह बावला के पीछे भोजपुरी के एक और महान गीतकार कैलाश गौतम जी के कथन को उद्धृत करते हुए एक और घटना का जिक्र करते हैं, जिसमें घाट पर बावला जी को देख कुछ अंग्रेजों ने कहा था. बहरहाल, बावला जी ने रामधुन की जो धारा भोजपुरी अंचल में गायी वह भोजपुरिया अंचल के घर-घर मे समा गयी. किंतु बावला जी ने केवल राम और शिव के गीत ही नहीं लिखे बल्कि समाज की विसंगतियों और लोक सांस्कृतिक मूल्यों के निरंतर क्षरण पर भी खूब लिखा है. एक ओर वह शिव को पुकारते कहते हैं-

छोट-छोट बात उत्पात क न कह जात न सह जात सुसुक-सुसुक बेसहारे के
बाबा शिव शंकर भयंकर हो भूज देता आवे जे उघार करे बावला बेचारे के

और

सुनीला की भोला बाबा हउवा बड़ा दानी
लेकिन हम का जानी

तो दूसरी ओर समाज में गिरते मूल्यों पर कहते हैं-

हाय रे समाज
आज लाज बा ना लेहाज बा
चोर घूसखोर बा कोर्ट कचहरी में
डहरी में लूटपाट बम के धमाका
गांधी जी के सपना कलपना बुझात बा
खात बाटे मेवा केहू केहू करे फाका

इसी तरह एक जगह वह लिखते हैं-

मानवता मरि रहल जहां पर
फिर भी देश महान
वाह रे हिंदुस्तान
घुस लेत अधिकारी देखा
हर विभाग सरकारी देखा
टोपी सूट सफारी देखा
जरै आग में नारी देखा
साधु संत व्यापारी देखा
उल्टा बेंट कुदारी देखा
कहां ज्ञान – विज्ञान
वाह रे हिंदुस्तान

कहते हैं बड़ी रचनाएं अपने समय से आगे भी अपना अर्थ रखती हैं. बावला जी इन दो कविताओं के तेवर और इनमें व्याप्त व्यवस्थाजन्य तल्ख़ी देखिए. अगर आज यह रचना होती और कोई कवि गाता तो सच कहने की सजा भुगतता. कोर्ट-कचहरी में एक आम दृश्य है गांव से आये लोग और सदियों का धैर्य अपने कंधे पर रख पूरा दिन बिता अगली तारीख के लिए लौट जाते हैं. बावला जी से अपने लोक का यह सत्य अछूता नहीं था. छोटे-छोटे अहम के हुए मुकदमों और उनमें पिसते आम जान को चेताते कहते हैं-

चल तहसील कचहरी चल
बरखा बुन्नी जाड़ा पाला
चलै सीत कै लहरी चल
चलल मुकदमा ढाले में
न्याय गिरल बा खाले में
कवने देव के माथ नवाई
कहां-कहां परसाद चढ़ाईं
परग-परग पर नागिन लोटै
फूंक-फूंक के डगरी चल
चल तहसील, कचहरी चल

रामजियावन दास बावला ने अपनी कविता में केवल लोक राग को स्थान दिया. इसलिए उनकी कविताओं में शहराती बनावट नहीं भोजपुरिया लोकसंस्कृति के प्रत्येक चटख रंग दिखते हैं . एक और बहुलता में उनका भक्ति रंग है तो दूसरी ओर उनके समाज, परम्परा और राजनीति के ऊपर हल्की चोट देते हैं तो उनकी कविताई का सबसे प्यारा रंग त्योहारों, ऋतुओं, फसलों आदि के गीतों का है. वह विंध्य घाटी के प्रत्येक रंग को अपनी कविता में उकेरते हैं. लोक का आदर्श उनकी कविताई के मूल में हैं. फागुन के मौसम का उनका गीत हो ”सगरी सरेहिया रंगाईल हो, सखी फागुन आयिल/ खेतवा मटर गदराईल हो, सखी फागुन आयिल.”

लोक संस्कृति के गीतों में लोकाचारों, शुभ अवसरों के गीतों के अतिरिक्त खेती के गीतों की भी अपनी एक विरासत है. बावला जी धान रोपनी का दृश्य रचते हुए अपने ही नहीं बल्कि समस्त भारत के कृषक जीवन के सांस्कृतिक चित्र प्रस्तुत करते हैं-

मेड़न पै सरकै पग दाबी चलै देहियां बल खाला
बून परै झमकै बदरी कजरी आँखियाँ जनु मारत भाला…

जिस कवि ने स्कूल की मुकम्मल पढ़ाई बेशक न पढ़ी हो परन्तु उन्होंने लोक व्यवहार खूब पढ़ा. एक ऐसा रचनाकार जिसकी सरोकारी कविताएं भी आज उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी दूसरे रसों की. उनकी काव्य संवेदना का विस्तार गांव के डीह, आंगन, दुआर, खेत, मौसम, थाना, कचहरी, पंचायत, आपसी राग-द्वेष के भीतरी परतों तक है. अपनी एक कविता ‘नमन बाटै’ में वह जिस तरह से गांव, घर, खेत से लेकर थाना, कचहरी तक जिस गहरे व्यंग्य से पहुंचते हैं वैसा हिंदी में भी दुर्लभ है-

गांव घर खेत खरिहान के नमन बाटै
नमन सिवान के नमन घूर धार के
ताल खाल नदी नार पोखरा इनार कुल
नमन करिला बाबा डीह-डिहुवार के
नाद कोना चरनी दुआर के दालान के भी
नमन कहार के नमन चौकीदार के
पंच सरपंच परधान के नमन बाटै
नमन बा टीबी के नमन चित्रहार
ब्लॉक के नमन ताक झाँक के नमन बाटै
नमन बिकास वाले रोजी रोजगार के
सींचपाल, लेखपाल आदि के नमन बाटै
नमन बा बिजुरी के बिल सरकार के
फीस के नमन न्यायाधीश के नमन बाटै
नमन बा डोलीवाले पिछिला कहार के
थाने के नमन जेल खाने के नमन बाटै
नमन दीवान के नमन थानेदार के

नए साल पर एक-दूसरे को शुभकामनाएं भेजने का चलन रहा है. सम्भवतः बावला जी भोजपुरी के पहले कवि हैं जिन्होंने नए वर्ष पर कविता लिखी है-

बासल बयार ऋतुराज क सनेस देत, गोरकी चननिया क अंचरा-गुलाल हो
खेत-खरिहान में सिवान भरी दाना-दाना, चिरई के पुतवो ना कतहुं कंगाल हो
हरियर धनिया चटनिया टमटरा क, मटरा के छेमिया के गदगर दाल हो
नया-नया भात हो सनेहिया के बात हो, एहि बिधि शुभ-शुभ नया-नया साल हो

जिन बंधुओं को भोजपुरी ल साहित्य बिदेसिया और महेंद्र मिश्र से आगे नहीं दिखता उनके लिए रामजियावन दास बावला की रचनाएं आईना दिखाती है. भोजपुरी में तुलसी सरीखा सम्मान रखने वाले बावला जी को पश्चिम बंगाल के राज्यपाल द्वारा भोजपुरी का सर्वोच्च सेतु सम्मान (2002) कोलकाता में दिया गया . इसके अतिरिक्त उन्हें काशी रत्न सम्मान, भोजपुरी लोकरस सम्मान, अदबी संगम सम्मान आदि पुरस्कारों से भी नवाजा गया. बावला जी का 1 मई 2012 को देहान्त हो गया लेकिन लोक में व्याप्त उनके गीत आज भी भोजपुरिया संस्कृति की अमानत हैं. पर यह भी सच है कि भोजपुरी साहित्यालोचन और शोध के क्षेत्र में बावला जी का मूल्यांकन होना अभी भी बाकी है. इस विषय पर इधर के दिनों में भोजपुरी गायकी में नवाचार हेतु प्रसिद्ध लोकगायिका चंदन तिवारी अफसोस जताते कहती हैं-

लोकगीतो की दुनिया में, विशेषकर भोजपुरी गीत-संगीत की दुनिया में रचनाकारों को निगल जाने का, उन्हें डिस्क्रेडिट कर गुमनामी में डाल देने का जो सुनियोजित चलन रहा है, उसके बड़े उदाहरण हैं बावलाजी. उनके गीत वर्षों से गाये जा रहे हैं, पर या तो उनके नाम को गायब कर के या फिर बहुत चतुराई से उनके गीतों में एकाध वाक्य जोड़कर, अपने नाम कर के.

चंदन ने रामजियावन दास बावला जी के कई गीतों को अपना स्वर दिया है. चरवाही करते करते, राम नाम जपते कविताई करने वाले इस लोककवि का आज जन्मदिन है.


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