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तालिबान की सरकार बनते ही अमेरिका तक इन 5 लोगों का ज़िक्र ताजा हो गया

साल 2009. तारीख़ 30 जून. अफ़ग़ानिस्तान के पकतिका प्रांंत के पास यूएस आर्मी की एक चेकपोस्ट पर 23 साल के सार्जेंट बो बर्गडाल की तैनाती थी. बर्गडाल 2008 में सेना में भर्ती हुआ था. ड्यूटी के पहले ही बरस में उसे अफ़ग़ानिस्तान भेज दिया गया था. 30 जून 2009 को बर्गडाल ने अपना पोस्ट छोड़ दिया. उसने ऐसा क्यों किया, ये आज तक पता नहीं चल सका है. वो पहले भी ट्रेनिंग के दौरान ऐसी हरकत कर चुका था. लेकिन उस दिन पोस्ट से हटने के कई घंटे बीतने के बाद भी वो वापस नहीं लौटा. अमेरिकी सैनिकों ने कई दिनों तक इलाके में पड़ताल की. मगर बर्गडाल का कोई अता-पता नहीं था.

बर्गडाल तो नहीं मिला. लेकिन तीन दिनों के बाद एक ख़बर मिली. क्या? यूएस आर्मी का बयान आया कि उनका एक सैनिक हक़्क़ानी नेटवर्क के क़ब्ज़े में है. वो सैनिक बो बर्गडाल था. उसे किडनैप कर बॉर्डर पार पाकिस्तान के नॉर्थ वज़ीरिस्तान ले जाया गया. ये जगह लंबे समय से हक़्क़ानी नेटवर्क की पनाहगाह है. नेटवर्क की स्थापना सोवियत-अफ़ग़ान वॉर के दौरान हुई थी. जलालुद्दीन हक़्क़ानी के बीमार पड़ने के बाद नेटवर्क की कमान उसके सबसे बड़े बेटे सिराजुद्दीन हक़्क़ानी ने संभाली. सिराजुद्दीन एफ़बीआई की मोस्ट वॉन्टेड लिस्ट में शामिल है. उसके ऊपर 37 करोड़ रुपये का ईनाम है. हक़्क़ानी नेटवर्क की दो पहचान और है. पहली, इस संगठन को यूनाइटेड नेशंस ने आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के लिए बैन कर रखा है. और दूसरी, हक़्क़ानी नेटवर्क और तालिबान एक-दूसरे के लंगोटिया साथी हैं.

Let’s fight for him!

अमेरिका ने बर्गडाल को छोड़ने के लिए तालिबान से बात शुरू की. ये बातचीत मई 2014 तक चली. इस बीच में तालिबान इंटरनेट पर बर्गडाल के वीडियोज़ रिलीज़ करता रहा. इन वीडियोज़ में बर्गडाल ख़ुद को बचाने की गुहार लगाता दिखता. किडनैपर्स ने उसे बेतरह टॉर्चर किया था. उसके पूरे चेहरे पर चोट के निशान होते थे. उसे ठीक से खाने और सोने तक नहीं दिया जाता था. बो बर्गडाल अफ़ग़ानिस्तान वॉर में दुश्मनों के क़ब्ज़े में गया पहला और इकलौता अमेरिकी सैनिक था.

Bo Bargdal
बो बर्गडाल.

इस बीच बर्गडाल के माता-पिता ने ‘स्टैंड विद बो’ नाम से एक कैंपेन शुरू किया. इस कैंपेन के पोस्टर्स में लिखा होता था –

‘He fought for us… Let’s fight for him!’

उसने हमारे लिए जंंग लड़ी… अब उसके लिए खड़े होने की बारी हमारी है.’

धीरे-धीरे लोगों का हुजूम इससे जुड़ता चला गया. लेकिन अमेरिका में ही एक बड़ा धड़ा बर्गडाल के ख़िलाफ़ था. इनमें से एक डोनाल्ड ट्रंंप भी थे. जो बाद में अमेरिका के राष्ट्रपति बने. ट्रंप ने पब्लिक स्पेस में बो बर्गडाल को गद्दार कहा था. उन्होंने बर्गडाल को गोली मार देने की भी बात कही थी.

हालांकि, बर्गडाल की रिहाई वाले कैंपेन की गूंज व्हाइट हाउस तक पहले पहुंची. इस कैंपेन का असर दिखना तब शुरू हुआ, जब अमेरिका ने तालिबान के साथ क़ैदियों की अदला-बदली को लेकर मीटिंग शुरू की. इन मुलाक़ातों में क़तर मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा था. होते-होते पांच बरस बीत गए. 31 मई 2014 को उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने एक ऐलान किया. उन्होंने बताया कि बो बर्गडाल की रिहाई तय हो गई है. बदले में अमेरिका ने ग्वांतनामो बे की जेल में बंंद पांच कुख्यात तालिबानी नेताओं को छोड़ने की शर्त मान ली थी. इन सभी तालिबानी नेताओंं को 9/11 के हमले के बाद गिरफ़्तार किया गया था. इनमें से कुछ ओसामा बिन लादेन के क़रीबी भी थे.

तालिबान नेताओं की रिहाई

ओबामा के ऐलान का अमेरिका में ज़बरदस्त विरोध हुआ. कहा गया कि सरकार आतंंकी ख़तरे को नज़रअंदाज़ कर रही है. ये भी आशंका जताई गई कि तालिबान के टॉप लीडर्स की रिहाई अमेरिका के लिए घातक होगी. साथ ही, इससे तालिबान का मनोबल कई गुणा बढ़ जाएगा. जो अंत में अमेरिका को ही भारी पड़ेगा. आलोचनाओं से घिरे ओबामा कुछ दिनों के बाद फिर से मीडिया के सामने आए. इस बार उन्होंने अपने फ़ैसले का बचाव किया. उन्होंने कहा,

‘अगर रिहा हुए तालिबानी नेताओं से हमारी सुरक्षा को ख़तरा हुआ तो हम फिर से उन्हें गिरफ़्तार कर लेंगे. इस बात का मुझे पूरा भरोसा है.’

खैर, क़ैदियों की अदला-बदली पूरी हो गई. पांचों तालिबानी नेताओंं को क़तर ले जाकर छोड़ दिया गया. समझौते की शर्त के अनुसार, उन्हें एक साल तक क़तर से बाहर जाने की इजाज़त नहीं थी.

31 मई 2014 को ही अफ़ग़ानिस्तान के खोश्त में तालिबान ने बो बर्गडाल को रिहा कर दिया. उसे पहले जर्मनी ले जाया गया. वहांं मिलिटरी हॉस्पिटल में उसका इलाज हुआ. बाद में उसके ऊपर मिलिटरी कोर्ट में ट्रायल चला. अक्टूबर 2017 में बर्गडाल ने अपने ऊपर लगे आरोपों को स्वीकार कर लिया. कोर्ट ने उसे जेल की सज़ा तो नहीं दी. लेकिन उसका रैंक घटा दिया गया. उसके ऊपर दस हज़ार डॉलर का ज़ुर्माना लगाया गया. साथ ही, उसे समय से पहले सर्विस से डिस्चार्ज़ करने का आदेश दिया गया. बाकी सज़ा तो नवंंबर 2017 से लागू हो गईं. हालांकि, डिस्चार्ज़ करने के आदेश पर कोर्ट में अपील पेंडिंग है.

Bo Bargdal (1)
रिहा होने के बाद बो बर्गडाल.

ये तो हुई सार्जेंंट बो बर्गडाल की ब्रीफ़ प्रोफ़ाइल. उसके एवज में छोड़े गए पांच तालिबानी नेता कौन थे और अब कहां हैं? उनके साथ आगे क्या हुआ? और, ये कहानी हम आज क्यों सुना रहे हैं? सब विस्तार से बताएंगे.

तालिबान सरकार- 2

काबुल पर क़ब्ज़े के तीन हफ़्ते बाद तालिबान ने अंतरिम सरकार का ऐलान कर दिया है. 30 अगस्त को अंतिम अमेरिकी सैनिक के निकलते ही अफ़ग़ानिस्तान में बीस साल से चल रही लड़ाई का अंत हो गया. तभी से अफ़ग़ानिस्तान में नई सरकार के गठन को लेकर कयास लगाए जाने लगे थे. कई दिनों तक टालने के बाद आख़िरकार तालिबान ने सात सितंबर को अंतरिम सरकार का ऐलान कर दिया. इसके साथ ही, अफ़ग़ानिस्तान को इस्लामिक अमीरात भी घोषित कर दिया गया है. अंतरिम कैबिनेट में कुल 33 लोगों को रखा गया है. इसमें एक भी महिला नहीं है. अंतरिम सरकार में पश्तूनों का बोलबाला है. तालिबान ने कहा है कि स्थायी व्यवस्था होने तक यही लोग कार्यवाहक सरकार चलाएंगे.

अब कैबिनेट में शामिल हुए चर्चित चेहरों के बारे में जान लेते हैं.

तालिबान ने कार्यवाहक सरकार में प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी मौलाना मोहम्मद हसन अखुंद को सौंपी है. अखुंद को तालिबान के सह-संस्थापक मुल्ला मोहम्मद उमर के क़रीबी के तौर पर जाना जाता है. अल-जज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार, मुल्ला अखुंद को तालिबान के सुप्रीम लीडर हैबतुल्लाह अखुंज़ादा का वरदहस्त प्राप्त है. अखुंज़ादा को लंबे समय से पब्लिक स्पेस में नहीं देखा गया है. उसके सिर्फ़ आदेश जारी होते हैं. जहां तक मुल्ला अखुंद की बात है, उसका जन्म कंधार में हुआ था. वही शहर, जहां 1994 में तालिबान की नींव रखी गई. पिछली तालिबान सरकार में उसने डिप्टी प्राइम मिनिस्टर के साथ-साथ डिफ़ेंस मिनिस्टर का पद भी संभाला था. 2001 में अमेरिका के हमले के बाद तालिबान की टॉप लीडरशिप पाकिस्तान में शिफ़्ट हो गई थी. उसके बाद रहबरी शूरा का गठन किया गया था. इसे क़्वेटा शूरा के नाम से भी जाना जाता है. मुल्ला अखुंद ने तालिबान के उभार और सत्ता में वापसी में अहम भूमिका निभाई है. यूनाइटेड नेशंस ने मुल्ला अखुंद को प्रतिबंधित लोगों की लिस्ट में रखा है.

अखुंद के डिप्टी

मुल्ला अखुंद के दो डिप्टी भी बनाए गए हैं. इसमें सबसे चर्चित नाम है, मुल्ला अब्दुल गनी बरादर का. बरादर अंतररष्ट्रीय मीडिया में तालिबान का चेहरा है. मुल्ला बरादर का जन्म भी कंधार में हुआ था. अफ़ग़ानिस्तान पर सोवियत संघ के हमले के बाद मुजाहिदीन गुटों ने मोर्चा खोल दिया. इस मोर्चे में बरादर भी शामिल हुआ. उसने मुल्ला ओमर के साथ मिलकर सोवियतों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी. बाद में दोनों ने मिलकर कंधार में तालिबान की नींव रखी. 2001 में तालिबान सरकार के पतन के बाद मुल्ला बरादर पाकिस्तान भाग गया. उसके बारे में फिर ख़बर आई साल 2010 में. पता चला कि आईएसआई के एक ऑपरेशन में मुल्ला बरादर कराची में अरेस्ट हो गया.

उसे 2018 तक पाकिस्तान ने क़ैद में रखा. फिर अमेरिका का दबाव आया तो उसे जेल से निकालकर क़तर भेज दिया गया. अमेरिका, अफ़ग़ानिस्तान से अपने सैनिकों को निकालने के मसले पर तालिबान से डील कर रहा था. क़तर में 2013 से तालिबान का पॉलिटिकल ऑफ़िस काम कर रहा है. जनवरी 2019 में मुल्ला बरादर को तालिबान के पॉलिटिकल ऑफ़िस का मुखिया बना दिया गया. अमेरिका के साथ हुई पीस डील में उसने तालिबान का पक्ष रखा था.

काबुल पर क़ब्ज़े के दो दिन बार मुल्ला बरादर वापस अफ़ग़ानिस्तान लौटा. 2001 के बाद पहली बार. चर्चा थी कि नई सरकार में मुल्ला बरादर को सर्वोच्च राजनैतिक पद मिलेगा. मुल्ला मोहम्मद ओमर की मौत के बाद उसे तालिबान का डि फ़ैक्टो हेड माना जा रहा था. उसे नई सरकार में उप-प्रधानमंत्री का पद हासिल हुआ है. जानकारों का मानना है कि तालिबान का ये फ़ैसला थोड़ा चौंकाने वाला है.

तालिबान की अंतरिम सरकार में रक्षामंत्री बनाया गया है, मौलवी मोहम्मद याक़ूब को. मोहम्मद याक़ूब तालिबान के सह-संस्थापक मुल्ला मोहम्मद ओमर का बेटा है. तालिबान के मिलिटरी कमीशन की कमान उसी के हाथों में है. उसे तालिबान-विरोधियों की हत्या का मास्टरमाइंड बताया जाता है. तालिबान में मुल्ला ओमर की ईश्वरीय छवि है. मोहम्मद याक़ूब उसका अपना ख़ून है. इस वजह से भी तालिबान में उसका सम्मान है. और, यही तथ्य तालिबान को एकजुट रखने में उसकी भूमिका को मज़बूत करता है.

गृह मंत्रालय में हक्कानी

अब चलते हैं गृह मंत्रालय की तरफ. गृहमंत्री की कुर्सी पर जिसे बिठाया गया है, वो एक घोषित ईनामी आतंकवादी है. नाम सिराज़ुद्दीन हक़्क़ानी. उसकी छवि रहस्यमयी है. इंटरनेट पर सिराजुद्दीन की सिर्फ़ एक तस्वीर दिखती है. वो भी एफ़बीआई की मोस्ट वॉन्टेड लिस्ट में. अफ़ग़ानिस्तान में विदेशी नागरिकों के अपहरण और उनकी हत्या में हक़्क़ानी नेटवर्क का सीधा हाथ रहा है. फिरौती वसूलने से लेकर ड्रग्स की तस्करी तक में हक़्क़ानी नेटवर्क की भूमिका रही है. इतना ही नहीं, विदेशी दूतावासों पर हमले की ज़िम्मेदारी भी हक़्क़ानी नेटवर्क ने ली है.

Haqqani
सिराजुद्दीन हक्कानी.

सिराजुद्दीन हक़्क़ानी इसी गुट का मुखिया है. जाहिर सी बात है, ये सभी कांड उसी के आदेश पर हुए होंगे. आतंक फैलाने के अनुभव को देखते हुए तालिबान ने उसे गृह मंत्रालय सौंपा है. ये नियुक्ति अपने आप में तालिबान के उस दावे को बेपर्दा करने के लिए काफी है, जिसमें उसने कहा था कि अफ़ग़ानिस्तान की धरती का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों के लिए नहीं होने दिया जाएगा.

ये तो हुई कुछ चर्चित चेहरों की चर्चा. आपको बो बर्गडाल की कहानी याद है? जहां से हमने बातों की शुरुआत की थी. बर्गडाल के एवज में अमेरिका ने पांच तालिबानी नेताओं को रिहा किया था. जैसी कि आशंका जताई जा रही थी, ये रिहाई बाद में अमेरिका पर ही भारी पड़ेगी. बात यहां तक पहुंची थी कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने रिहाई के फ़ैसले पर फिर से विचार करने की अपील भी की. लेकिन व्हाइट हाउस पर उस समय कोई और ही धुन सवार थी. सरकार ने भरोसा दिलाया कि पांचों नेताओं को क़तर से बाहर नहीं जाने दिया जाएगा. और, न ही उन्हें अफ़ग़ानिस्तान की राजनीति में हिस्सा लेने दिया जाएगा.

असल में क्या हुआ? भरोसा टूट गया. आशंंका सच हो गई. इन पांचों तालिबानी नेताओं को ‘गिटमो फ़ाइव’ या ‘तालिबान फ़ाइव’ के नाम से जाना जाता है. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो तालिबान में इनसे अधिक कट्टर और कोई नहीं है. रिहाई के बाद इन्होंने अफ़ग़ानिस्तान में तालिबानी लड़ाकों से संपर्क किया. फिर उनके साथ मिलकर अमेरिका को बाहर भेजने का प्लान भी बनाया गया. जब अमेरिका ने दोहा में तालिबान के साथ पीस डील पर बात शुरू की तो उनके सामने ये पांचों भी बैठे थे. तालिबान फ़ाइव ने अमेरिका के साथ हुए समझौतों को निर्धारित करने से लेकर काबुल पर क़ब्ज़े तक में अहम भूमिका अदा की है.

आज तालिबान फ़ाइव की कहानी क्यों?

दरअसल, तालिबान की अंतरिम कैबिनेट में तालिबान फ़ाइव के चार लोगों को शामिल किया गया है. मुल्ला ख़ैरुल्लाह ख़ैरख़्वाह को सूचना और संस्कृति मंत्री बनाया गया है. पिछली तालिबान सरकार में वो गृहमंत्री था. दूसरा नाम है, मुल्ला नूरुल्लाह नूरी का. उसे बॉर्डर्स एंड ट्राइबल अफ़ेयर्स मिनिस्ट्री सौंपी गई है. तालिबान के पिछले शासन के दौरान वो बाल्ख़ प्रांत का गवर्नर था. तीसरा नाम है, मुल्ला मोहम्मद फ़ाज़िल मजलूम अखुंद का. उसे डिप्टी डिफ़ेंस मिनिस्टर बनाया गया है. ह्यूमन राइट्स वॉच ने मोहम्मद फ़ाज़िल पर शिया मुस्लिमों के नरसंहार का आरोप लगाया था. चौथा नाम है, अब्दुल हक़ वासिक़ का. वासिक़ को खुफिया विभाग का डायरेक्टर बनाया गया है. पिछली सरकार में वो डिप्टी मिनिस्टर ऑफ़ इंटेलीजेंस के पद पर था.

तालिबान दावा करता है कि वो बदल गया है. उसने सबको अधिकार देने की बात भी कही है. हालांकि, उसके कृत्य इस दावे को झूठा साबित करते हैं. काबुल में प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी हो या महिलाओं को घरों में बैठने का आदेश और अब घोषित आतंकियों से लैस सरकार, कथनी और करनी में साफ़ अंतर दिख रहा है. तालिबान बदल गया है या वो बदलकर और हिंसक और कट्टर हो गया है? अब ये सवाल दुनिया के सामने प्रकट होने लगा है.


काबुल में पाकिस्तान और ISI के खिलाफ लोग प्रदर्शन कर रहे थे लोग, तालिबान ने फायरिंग कर दी

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