Submit your post

Follow Us

मांसाहार करने वालों को हथिनी की मौत पर दुख जताने का अधिकार नहीं है!

himanshu singhयह लेख दी लल्लनटॉप के लिये हिमांशु सिंह ने लिखा है. हिमांशु दिल्ली में रहते हैं और सिविल सेवा परीक्षाओं की तैयारी करते हैं. हिन्दी साहित्य के विद्यार्थी हैं और करेंट अफेयर्स टुडे पत्रिका में वरिष्ठ संपादक भी रह चुके हैं. समसामयिक मुद्दों के साथ-साथ विविध विषयों पर स्वतंत्र लेखन करते हैं. अभी हिमांशु ने केरल की हथिनी और मांसाहार को लेकर लिखा है. आप भी पढ़िए.


कुछ दिनों पहले केरल में एक गर्भवती हथिनी की विस्फोटक भरा फल खाने से मौत हो गई थी. हम सभी ने ये घटना सुनी. दुखी हुए. दुख ज़ाहिर किया. मैं भी बहुत दुखी हुआ. पर तत्काल मुझसे कहा गया कि, “तुम जैसे मांसाहारियों को इस घटना पर दुख जताने का कोई अधिकार नहीं है”. साथ ही बताया गया कि क्रूरता देखकर मांसाहारियों का दुखी होना हिपोक्रेसी और स्वांग है.

ऐसे में मेरे पास इस विषय पर चुप रहने का धैर्य खत्म हो गया. तो अब मैं बिना लाग-लपेट खरी-खरी बात लिख दे रहा हूं. आप पढ़िए.

किसी भी व्यक्ति का मांसाहारी या शाकाहारी होना सिर्फ उस व्यक्ति का निजी चुनाव नहीं होता. इसके पीछे तमाम सामाजिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक कारक मौजूद होते हैं. मुझे याद भी नहीं है कि मैंने पहली बार नॉन-वेज कब खाया था, क्योंकि ये हमारे परिवार की कुज़ीन में उसी तरह से शामिल था, जैसे बाकी अनाज और अन्य खाद्य पदार्थ. और ये सिर्फ मेरी बात नहीं है.

दुनिया की एक बड़ी आबादी मांसाहारी है, और इसके लिए उन सभी की क्रूरता नहीं, बल्कि उनका परिवेश जिम्मेदार है. सवाल है कि क्या पूरी दुनिया में अनाज का इतना उत्पादन हो पाता है कि सभी शाकाहारी होने का क्षद्म गर्वोन्माद महसूस कर सकें? जवाब है नहीं. दुनिया के तमाम हिस्सों में भौगोलिक परिस्थितियां इतनी विकट होती हैं, कि वहां मांसाहार ही अंतिम विकल्प बचता है.

भारत में सवा अरब की बड़ी आबादी रहती है, यहां अगर सभी शुद्ध शाकाहारी का तमगा पाने के लिए मांसाहार त्याग देंगे, तो क्या देश की खाद्य जरूरतें पूरी हो पाएंगी?

अगर ऐसा हुआ, तो अर्थशास्त्र के ‘डिमांड एंड सप्लाई’ के नियम के हिसाब से अनाज की कीमतें इतनी ज्यादा बढ़ जाएंगी, कि गरीब आदमी भुखमरी की कगार पर आ जायेगा. ऐसे में मांस प्रोटीन का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है, जो देश की बड़ी आबादी को कुपोषण से बचाये हुए है. वही प्रोटीन, जिसकी कमी शाकाहारी लोग दुग्ध उत्पादों से पूरी करते हैं. जिनके बारे में इसी लॉजिक से कहा जा सकता है कि वो दुधारू पशुओं के बच्चों का हिस्सा छीन कर तैयार किये जाते हैं.

कल ही मैंने एक निष्कर्ष पढ़ा कि मांसाहारी व्यक्ति अनिवार्य रूप से क्रूर होता ही है. ऐसे में मेरा पहला प्रश्न ये है कि क्या हिंसा का एकमात्र अर्थ हत्या ही है? मेरा दूसरा प्रश्न ये है कि क्या शाकाहारी परिवारों में घरेलू हिंसा, मांसाहार करने वाले परिवारों से कम होती है? मैं जानता हूं कि मेरा ये प्रश्न कुछ पाठको को अप्रासंगिक लग सकता है; पर क्या घरेलू हिंसा-हिंसा नहीं है? या गाली-गलौज वाचिक हिंसा नहीं है?

ऐसे में, डाइनिंग टेबल से इतर, सवाल ये है कि, क्या शाकाहारी लोग किसी भी तरह की हिंसा में मांसाहारी लोगों से पीछे हैं? सच तो ये है कि किसी व्यक्ति का शाकाहारी या मांसाहारी होना महज कुछ सामाजिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक संयोगों के परिणाम के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है.

हरिशंकर परसाई ने कहा था कि,

“जो लोग पानी छानकर पीते हैं, वो गरीबों का खून बिना छाने ही पी जाते हैं.”

भाव ये है कि हिंसा महज एक कर्म नहीं, बल्कि स्वभाव भी है, और किसी भी तरह का दमन और शोषण हिंसा का ही एक रूप है.

तथ्य है कि महात्मा बुद्ध की मृत्यु संक्रमित सुकर मद्दव यानी सुअर का संक्रमित मांस खाने से हुई थी और बुद्ध आजीवन हिंसा के विरुद्ध रहे. क्या इस तथ्य से बुद्ध को ‘पाखंडी’ साबित किया जाना चाहिए? या गांधीजी द्वारा दर्द से तड़पती बकरी को उसकी तकलीफ से निज़ात दिलाने के लिए मारने को कहना, क्या गांधीजी को क्रूर साबित करता है?

असल में मांसाहारियों को अनिवार्य रूप से क्रूर बताना, बेहद बचकाना है. इस तथ्य को झुठलाया नहीं जा सकता कि शाकाहारियों और मांसाहारियों, दोनों के लिए और दोनों के द्वारा किये जाने वाले कृषिकर्म में, कीटनाशकों द्वारा ही असंख्य जीवों की हत्या की जाती है.

सच ये है, कि कोई भी व्यक्ति मांसाहार सैडिस्टिक प्लेज़र पाने के लिए नहीं करता, बल्कि मांसाहार हमारी फ़ूडचेन को मुकम्मल करता है. और जब तक इंसानों में कैनाइन दांत रहेंगे, इंसानों द्वारा मांसाहार प्रकृति-सम्मत रहेगा.

ऐसे में, हाथी के मुंह मे पटाखा जलाना, और इस क्रूरता की तुलना मांसाहार से करना, चिंताजनक स्तर की मूर्खता है.

इस बात की ज्यादा बेहतर समझ के लिए जरूरी है कि मेंसरिया (Mens rea) यानी कृत्य के उद्देश्य को समझा जाए. हमें समझना होगा कि अगर सिर्फ हत्या के कृत्य को ही पाप और अनुचित मान लिया जाय, और इसके बाकी पक्षों पर विचार ही न किया जाय, तो एक सुरक्षाकर्मी द्वारा मुठभेड़ होने पर अपराधी को मार गिराने में, और एक बलात्कारी द्वारा बलात्कार के पश्चात पीड़ित की हत्या किए जाने में कोई भेद नहीं समझा जाएगा. क्योंकि दोनों घटनाओं में अंततः हत्या ही हुई है. पर सामान्य विवेक से भी जाना जा सकता है कि दोनों घटनाओं में बहुत ज्यादा अंतर है. और यहां जरूरत पड़ती है कर्म के उद्देश्य को समझने की.

एक मांसाहारी व्यक्ति अपनी भोजन की जरूरतों के लिए पशुहत्या करता है, न कि उस पशु को कष्ट पहुंचाने के लिए. लेकिन केरल में हुई हथिनी की हत्या निकृष्टतम उद्देश्य और तरीके से की गई हत्या है. भले ही अनजाने में हुई हो. जो निशाना थे (जंगली सूअर), अगर वो मारे गए होते तो भी ह्त्या ही होती. इस कुकृत्य में न सिर्फ जानवर की हत्या शामिल है, बल्कि उसके साथ हुआ विश्वासघात भी शामिल है, जो इसे जघन्य बना देता है.


विडियो- किताबवाला: चौचक दास्तानगो हिमांशु बाजपेयी ने सुनाए लखनउआ किस्से

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

कॉन्ट्रोवर्सियल पेंटर एमएफ हुसैन के बारे में कितना जानते हैं आप, ये क्विज खेलकर बताइये

एमएफ हुसैन की पेंटिंग और विवाद के बारे में तो गूगल करके आपने खूब जान लिया. अब ज़रा यहां कलाकारी दिखाइए.

'हिटमैन' रोहित शर्मा को आप कितना जानते हैं, ये क्विज़ खेलकर बताइए

आज 33 साल के हो गए हैं रोहित शर्मा.

क्विज़: खून में दौड़ती है देशभक्ति? तो जलियांवाला बाग के 10 सवालों के जवाब दो

जलियांवाला बाग कांड के बारे में अपनी जानकारी आप भी चेक कर लीजिए.

मधुबाला को खटका लगा हुआ था इस हीरोइन को दिलीप कुमार के साथ देखकर

एक्ट्रेस निम्मी के गुज़र जाने पर उनको याद करते हुए उनकी ज़िंदगी के कुछ किस्से

90000 डॉलर का कर्ज़ा उतारकर प्राइवेट जेट खरीद लिया था इस 'गैंबलर' ने

उस अमेरिकी सिंगर की अजीब दास्तां, जो बात करने के बजाए गाने में ज़्यादा कंफर्टेबल महसूस करता था

YES Bank शुरू करने वाले राणा कपूर कौन हैं, जिन्होंने नोटबंदी को 'मास्टरस्ट्रोक' बताया था

यस बैंक डूब रहा है.

सात साल पहले केजरीवाल ने वो बात कही थी जो आज वो ख़ुद नहीं सुनना चाहते

बरसों पुरानी इस बात की वजह से सोशल मीडिया पर घेर लिए गए हैं.

क्या भारत सरकार से पूछे बिना पाकिस्तान चली गई इंडियन कबड्डी टीम?

अब ढेरों खेल-तमाशा हो रहा है.

बजट का कितना ज्ञान है, ये क्विज़ खेलकर चेक कर लो!

कितना नंबर पाया, बताते हुए जाना. #Budget2020

संविधान के कितने बड़े जानकार हैं आप?

ये क्विज़ जीत लिया तो आप जीनियस हुए.