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गुरु शिष्य परंपरा को मिली नई ऊंचाई, ये अंगूठा नहीं देते टांगें तोड़ देते हैं

गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वर:
गुरुर साक्षात् परम ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः

प्रात काल उठि कै रघुनाथा
मात पिता गुरु नावहिं माथा

गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पांय
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय

वैसा कुछ नहीं है जैसा आप सोच रहे हैं. हमको अचानक गुरू पर श्रद्धा नहीं उमड़ रही. दरअसल दिल्ली के रामजस कॉलेज में जो हुआ उसमें गुरु शिष्य परंपरा के प्रति हमारा विश्वास और सुदृढ़ हो गया है. एक बात बताओ. भारत में सबसे ज्यादा संस्कृति और परंपरा का ठेका कौन लेता है? कौन राम के नाम से उबल पड़ता है? आंख दबाने की जरूरत नहीं है. पता तो है ही वो कौन सी पार्टियां हैं. जिनके लोगों ने गुरु शिष्य परंपरा को अलग ऊंचाइयों पर पहुंचाया. टीचर को पीटकर गुरु दक्षिणा दे दी.

स्वामी विवेकानंद की बात करते हैं. उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस थे. जीवन के अंतिम दिनों में वो बीमार थे. तो उनके पास जो शिष्य था वो नांक भौं सिकोड़ता था. बुजुर्ग बीमार आदमी के आस पास छीछालेदर रहती है. तो विवेकानंद ने उसे डांटा. कहा कि जाओ, हम संभाल लेंगे. फिर वो सारी गंदगी साफ करते थे. उन्हीं विवेकानंद को आदर्श मानने वालों ने एक गुरू को पीट दिया.

दिल्ली विश्वविद्यालय की आर्ट्स फैकल्टी में जीत का जश्न मनाते ABVP छात्र. सोर्स: रमेश शर्मा/डेली मेल
दिल्ली विश्वविद्यालय की आर्ट्स फैकल्टी में जीत का जश्न मनाते ABVP छात्र. सोर्स: रमेश शर्मा/डेली मेल

चलो राम की बात करते हैं. जिसकी बात इनकी पैरेंट पार्टी करती है. प्रात: काल उठकर माता पिता और गुरु को प्रणाम करते थे. गुरु के कहने के अलावा एक काम इधर से उधर नहीं किया. ऐसे कितने ही शिष्य हमारी प्राचीन परंपरा में भरे पड़े हैं. एक थे आरुणि. उनको गुरु ने कहा वहां खेत में पानी बह रहा है. जाओ उसे रोकने का इंतजाम करो. वो मेड़ पर लेट गए क्योंकि और किसी विधि से रोक नहीं पा रहे थे.

एक थे एकलव्य. द्रोणाचार्य खुन्नस के मारे उससे अंगूठा मांग लिए. उसने दे दिया. उनकी परंपरा की लकीर पीटने वालों ने कमाल कर दिया. उनके गुरु जी ने अंगूठा नहीं मांगा था. न ही इन्होंने दिया. ये लात घूंसे देकर परंपरा निभाते हैं. इस नई परंपरा को क्या कहा जाए? क्या संस्कृति की माला जपने वाले अपनी संस्कृति से बोर हो गए. उन्हें नया थ्रिल चाहिए? नया एडवेंचर? या कोई और बात है.

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अब वैसी पढ़ाई का स्कोप शहरों से देहातों तक लगभग खत्म हो गया है. जिसमें पिता जी ही क्लास टीचर से बता आते थे कि “ज्यादा बदमाशी करे तो पीटना.” फिर गुरु जी लोग अभयदान पाकर बेफिक्रे हो पीटते थे. डंडे से, डस्टर से, स्केल से. हथियारों की कमी नहीं होती थी उनके पास. बल भर कूटते थे. पूरी स्कूली जिंदगी ऐसी ही कटी. टीचर्स पर गुस्सा बहुत आता था लेकिन बंधे थे संस्कारों से. गाली तक न निकलती थी उनके लिए.

लेकिन उस टाइम भी ऐसे कुछ बालक साथ में होते थे जिनके अंदर टीचर्स को “देख लेने” की प्रबल इच्छा दबी रहती थी. शायद वैसे ही लोग आगे चलकर ऐसे संगठन जॉइन कर लेते हैं जिनसे कि उनका सपना पूरा हो सके. वो टीचर्स को औकात दिखा सकें.

कुछ लोग कहते हैं कि कॉलेज में राजनीति नहीं होनी चाहिए. वो राजनीति को इतना सीरियसली लेते क्यों हैं? मैं तो कहता हूं कि पढ़ाई भी नहीं होनी चाहिए. कॉलेज सिर्फ गुंडागर्दी के लिए होने चाहिए. उनमें हर किस्म की गुंडा पार्टी अपने लिए नर्सरी तैयार करे. आगे चलकर वो देश के लिए कानून बनाएं. गुरु जी लोगों को भी इससे कष्ट नहीं होना चाहिए. राष्ट्र के निर्माण में थोड़ा त्याग तो करना पड़ता ही है न.


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