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ये 2 हज़ार साल पुरानी दवा कोरोना से लड़ाई में क्या मदद करने जा रही है?

एक दवा है. लगभग 2000 साल पुरानी. इस्तेमाल गठिया में होता आया था. और अब रिसर्च में दावा है कि इसका भी इस्तेमाल कोरोना से लड़ाई में किया जा सकता है. दवा का नाम है कॉल्चिसीन. 

दवा का तियां पांचा जानिए. कब बनी? किसने क्यों बनाई? और कोरोना की रिसर्च में इस दवा का क्या रोल है? सब जानिए.आसान भाषा में. 

क्या है कॉल्चिसीन?

अरे बताया तो. दवा है. लेकिन लगभग 2000 साल पुरानी है. एक ग्रीक दवा वैज्ञानिक पेडनिस डायोस्कोराइडस ने पहली शताब्दी में बताया कि इस दवा से गठिया का इलाज भी हो सकता है. इसके बाद यूनान के कई डॉक्टरों ने इस दवा का इस्तेमाल गठिया के लिए किया. बात आगे बढ़ी. साल 1763 में कॉल्चिसीन का उपयोग ड्रॉप्सी के इलाज के लिए भी शुरू हुआ. इसके बाद देश दुनिया के कई हिस्सों में जिस पेड़ से इसे बनाया जाता है — मतलब कॉलचिकम — उस पेड़ को ले जाया गया. दवा दुनिया भर में फैल गयी और 2000 साल से कॉल्चिसीन गठिया की सबसे प्रचलित दवा बनी हुई है.

कॉल्चिसीन का कोरोना में क्या रोल है?

एक पत्रिका है. Journal of American Medical Association. छोटे में कहिए JAMA ओपन नेट्वर्क. JAMA में एक रिसर्च प्रकाशित हुई. ग्रीस में कोरोना के 105 मरीज़ों पर कॉल्चिसीन का ट्रायल किया गया. क्लीनिकल ट्रायल के तहत 55 मरीजों को कॉल्चिसीन नहीं दिया गया. जबकि 50 मरीजों ने सामान्य दवा के साथ कॉल्चिसीन का सेवन किया. कॉल्चिसीन का इस्तेमाल करनेवाले मरीजों को प्रतिदिन तीन हफ्ते तक खुराक दी गयी. जिन मरीज़ों को कॉल्चिसीन दिया गया था, उनमें से सिर्फ़ एक मरीज़ की तबीयत ज़्यादा ख़राब हुई. लेकिन मरीज़ों के जिस समूह को बिलकुल भी कॉल्चिसीन नहीं दिया गया था, उनमें से 7 मरीज़ों की ज़्यादा तबीयत ख़राब हुई. फ़ौरी निष्कर्ष ये निकला कि कॉल्चिसीन के इस्तेमाल से कोरोना के मरीज़ों की हालत में सुधार हो सकता है.

तो क्या कॉल्चिसीन है कोरोना की दवा?

नहीं. ये कहना अभी भी जल्दबाज़ी है. दुनिया भर के वैज्ञानिक इस रीसर्च के सैम्पल पर सवाल उठा रहे हैं. कह रहे हैं कि महज़ 105 पेशेंट्स के साथ किए गए ट्रायल से ऐसा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है. इसी जर्नल JAMA में प्रकाशित एक सम्पादकीय टिप्पणी कहती है कि कॉल्चिसीन के ट्रायल के लिए सैम्पल को और बड़ा होना चाहिए. यानी और ज़्यादा लोगों पर ट्रायल किया जाना चाहिए. साथ ही लम्बे समय तक ट्रायल की ज़रूरत है. 

वहीं दी हिंदू बिज़नेस लाइन से बातचीत में इंडियन मेडिकल एसोसीएशन (IMA) के पूर्व अध्यक्ष डॉक्टर केके अग्रवाल ने बताया है कि कॉल्चिसीन एक बहुत सस्ती दवा है और इसके इस्तेमाल से कोई भी नुक़सान नहीं है. गठिया के साथ-साथ इसे दिल से जुड़ी छोटी दिक्कतों के साथ दिया जाता है. ऐसे में अगर किसी को कोरोनावायरस के इन्फ़ेक्शन की वजह से कोई दर्द या बुखार जैसी स्थिति है, उसके लिए कॉल्चिसीन दिया जा सकता है. इस दावे के बावजूद बहुत सारे डॉक्टर और पक्की रिसर्च की मांग कर रहे हैं. 

कोरोना से लड़ने के लिए और कौन-सी दवाएं आ चुकी हैं?

कॉल्चिसीन कोई पहली दवा नहीं है. Hydroxycholoquine सबसे पहले आई. भारत ने कई देशों को HCQ का निर्यात शुरू किया. मलेरिया और गठिया से लड़ाई में काम आती थी, लोग कोरोना से लड़ने के लिए खाने लगे. HCQ को लेकर कई रिसर्च सामने आ चुके हैं, लेकिन अभी किसी ने इसे कोरोना की दवा होने का दावा नहीं ठोंका है. इसके बाद रेमडेसिविर आयी. गिलियड की बनाई हुई. कम्पनी ने हिपैटाइटिस-सी और ईबोला से लड़ने के लिए बनाया था, दोनों जगह काम नहीं कर पाई. कम्पनी ने कहा, तो कोरोना में काम करेगी. तमाम देशों ने अपने यहां रेमडेसिविर को मंज़ूरी दे दी. इसके बार फविपिरविर भी आयी, सर्दी की दवा. और कोरोना से लड़ने में काम करेगी, ये भी बनाने वाली कम्पनी ने ही कहा. मंज़ूरी मिल गयी इस्तेमाल की. और अब है कॉल्चिसीन. 


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