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टीचर का बच्चा आतंकवादी बन गया है, आपको कहीं दिखा क्या

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आज मैं आपको अपने घर ले चल रहा हूं. पहली बार. यहां बरोठे से लगा एक बंडा है. कोई खिड़की नहीं. बस एक दरवाजा. पिसिया कटके खरिहान से आती तो यहीं गंज दी जाती. भीतर खूब दवाई. कीड़ा न लगे. बाहर दरवाजे पर गोबर थोप देते. सूख जाता. एक भी सुराख नहीं. न हवा भीतर. न नमी बाहर.

रामदीन कक्का क्यों करते होंगे ऐसा. तब समझ नहीं आता. अब जब समझ है. तो बंडा वैसा नहीं है. भूख आदमी का चरित्र तय करती है. गेंहूं समाजवादी है. उसे बचाकर रखना जरूरी क्रूरता. और उस पर लिखना अय्याशी.

मेरे बंडे में कोई छह एक साल से एक बाबा रहता है. जवान. खरा. खुरदुरा. निर्मोही इत्ता कि कभी गुस्से में लगे कि इसको खींचकर दुनिया मार दूं. मगर एक तागा है. मोह का. जो उसे यहीं जमीं से जोड़े रहता है. फिल्मों का. ये संन्यासी सिनेमा बहुत देखता है. आलम ये है कि कभी आप इसकी कलाई पकड़ लें तो एक गरम थरथराहट छू पाएं. जैसे पुली पर रील सरक रही हो. पिच्चर चल रही हो.

उसको बोला. ऑस्कर पर कुछ बांच दो. मान गया. मेरा नसीब. मगर आखिर में एक झिझक. निपट सात्विक. निरीह करने वाली.

कि लिख तो दिया है. मगर मत छापो.  होश में नहीं था. बस कीबोर्ड पर उंगलियां मारे जा रहा था…

और आखिर में. लिखा कि अब सोने जा रहा हूं.

दरवेश फिर से नींद में गया है. गोकि ध्यान है. मगर उसके पहले पूरी रात उसने आठ हजार हर्फ हलक से निकाल दिए.

मैं चंपादक हूं. बांट और तकरी साथ लिए चलता हूं. नपने की सहूलियत समझता हूं. यूं कि गृहस्थ हूं.

इसलिए सिनेमा संन्यासी की लुटिया से निकली खीलें पांच दिनों तक बांटूंगा. भले ही भंडारा कल हो. ऑस्कर बंटने में 24 घंटे भी न बाकी हों. दी लल्लनटॉप पर परसाद छनेगा. ब्रहस्पतिवार तक. आज उसकी पहली किस्त.

आप कहेंगे कि इस साधु का नाम क्या है. हम कहेंगे. न नाम पूछो, न जात.

अस्तु. – सौरभ द्विवेदी


 

सुख सभी फिल्में देखते रहने में है, 

किसी एक की ताजपोशी में नहीं

   इस वर्ष 2015-16 की, या पूर्व वर्षों की, या आगामी वर्षों की.. फिल्मों के लिहाज से खासियत ये है कि बहुत सी ऐसी हैं जिन्हें आप नंबर-2 नहीं कह सकते। सिनेमा का नियम भी यही है। एक “द इनटर्न’ या “पॉल बार्ट: मॉल कॉप-2’..  एक “द रेवनेंट’ या “क्रिमसन पीक’ या “मैड मैक्स: द फ्यूरी रोड’ से कमतर नहीं हो सकतीं। क्योंकि मूल रूप से स्टोरीटेलिंग का काम वे भी पूरा करती हैं। लेकिन हम अवॉर्ड के मौके पर तेजी से वो विभाजन करने की कोशिश करते हैं और खुश होते हैं। अगर “द रेवनेंट’ को 10 ऑस्कर मिल जाएं और विश्व भर के अखबारों में बस इसी टीम की फोटो हो तो भौतिक फर्क ये पड़ता है कि उस साल की अन्य सभी अच्छी फिल्मों को हम कमतर मान लेते हैं। जबकि एक “द रेवनेंट’ से हमारा काम नहीं चलना। डेनियल डे लुइस ने “लिंकन’ के लिए ऑस्कर जीता। अद्भुत सम्मान इस फिल्म में तब पाया। लेकिन ऑस्कर के बाद मैंने कभी उस फिल्म को नहीं देखा। इच्छा ही नहीं हुई। बल्कि इस बार चंद हजार ऑस्कर वोटर्स द्वारा पकड़ा दिए गए कुछ चमचमाती फिल्मों के नॉमिनेशंस के बीच मैंने लीयाम नीसन की लवणयुक्त “रन ऑल नाइट’ देखी तो चैन मिला। यही “स्ट्रैट आउटा कॉम्पटन’ देखते हुए होता है। इसमें कोई लोकप्रिय स्टार नहीं है लेकिन कहानी खींच लेती है। इन सभी फिल्मों को देखते हुए तब वे ही मेरे लिए विश्व की सबसे अच्छी फिल्में हो जाती हैं। एक पुरस्कार की लहर को महत्व देने के बजाय क्यों न एक-एक करके सब फिल्में देखूं और एंजॉय करूं।

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ये मूल रूप से समझने की बात है। इसका मतलब ये कतई नहीं कि आलेहांद्रो इनारित्तु किसी से भी कमतर हैं। या अच्छे नहीं हैं। वे तो धाकड़ हैं ही। “बर्डमैन’ का जादू साल भर बाद भी नहीं उतरा है। बिलकुल नहीं उतरा है। अब “द रेवनेंट’ भी उसी लकीर पर चलती है। धधकती हुई, धक्क से कुछ भी कर देने वाली। भालू वाला दृश्य ले लें। हिसाब से कुछ सेकेंड में जितने में हमें अंदाजा हो जाए उस भालू को रहना था और अगला सीन आना था। यहां तो जब तक आलेहांद्रो हमारे ब्रेन को सुनिश्चित नहीं करवा देते है कि ग्लास के शरीर के कुछ पुर्जे अंदर से टूट गए हैं, पीठ पर डेढ़-डेढ़ इंच की ख़ून की नालियां बन गई हैं.. वो भालू कहर ढाता रहता है। फिर वो दृश्य जहां दौड़ता घोड़ा और ग्लास एकदम से आ गई खाई में घर्ररर से एक वृक्ष में गिर जाते हैं। ये स्क्रिप्ट के लिहाज से भी कठिन कल्पना रहे होंगे। फिर नेटिव अमेरिकन्स की विरासत, सभी विश्व सभ्यताओं में हमारे पुरखों की ठोस पर्सनैलिटी, उनकी जिजीविषा ये भी इसमें नजर आती है। अगर आप ये फिल्म देखते हैं तो इसकी मेकिंग की डॉक्युमेंट्री भी देखें। फिल्म जितनी ही जादुई और जरूरी ये भी है। फिल्म के सही मायने भी तभी समझ पाएंगे।

इसी तरह “मैड मैक्स: द फ्यूरी रोड’ भी कद्दावर फिल्म है। इसके साथ निर्देशक जॉर्ज मिलर ने जो करने की कोशिश की है वो अपरिमेय है। किसी का किसी से कोई मुकाबला नहीं। उन्होंने अपनी शर्तों पर ये फिल्म रची। स्टूडियो का कोई निर्देश नहीं लिया। ये इंडिपेंडेंट फिल्ममेकर वाला एटिट्यूड ही है। कॉन्सेप्ट के स्तर पर फिल्म विस्मयकारी है। कैसे हम अपने कबीलों के नेताओं के भक्त बन जाते हैं और उनसे मोहभंग होना जरूरी है। टॉम हार्डी इन दोनों ही फिल्मों में हैं। उन्होंने 2015 में ही तीन और फिल्में कीं। कुल पांच (द रेवनेंट, मैड मैक्स: फ्यूरी रोड, चाइल्ड 44, लैजेंड, लंडन रोड)। हर फिल्म में वे पूरी तरह अलग हैं। “लैजेंड’ में गैंगस्टर भाइयों के दोहरे रोल हैं। दोनों में बिलकुल जुदा मैनरिज़्म ले आते हैं। फिर “द रेवनेंट’ में उनका एक्सेंट 360 डिग्री बदला हुआ है। “चाइल्ड 44’ में वो सोवियत संघ के स्टेट सिक्योरिटी एजेंट बने हैं। थ्रिलिंग कहानी है। वे इस समय के सबसे महत्वपूर्ण अभिनेताओं में शामिल हैं, कहानियों के चुनावों के कारण।

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अगर “स्पॉटलाइट’ पत्रकारिता पर ‌‌फक्र करने लायक कहानी है तो “ट्रूथ’ बेहद चर्चित न्यूज प्रोग्रैम “60 मिनट्स वेडनसडे’ की टीम की सच्ची कहानी है। केट ब्लांशेट इसमें मैरी मेप्स के रोल में हैं जो सीबीएस न्यूज की प्रोड्यूसर थीं। रॉबर्ट रेडफोर्ड ने एंकर डैन रादर का रोल किया है। वे बुश से जुड़ी एक खबर करते हैं। उस पर विवाद खड़ा होता है। और टीवी न्यूज के पारंपरिक मूल्यों वाला एक दौर खत्म हो जाता है। इसी तरह “द डेनिश गर्ल’ अगर पहली ट्रांसजेडर महिला की सच्ची, ह्रदयविदारक, ऐतिहासिक महत्व की कहानी है तो “कैरल’ दो समलैंगिक महिलाओं की। “कैरल’ भी महत्वपूर्ण है। इसमें केट ब्लाशेंट और रूनी मारा (द गर्ल विद द ड्रैगन टैटू) ने प्रमुख भूमिकाएं की हैं।

“आवर ब्रैंड इज़ क्राइसिस’ और “द रनर’ पश्चिमी राजनीति, पीआर तंत्र, कैंपेनिंग और अंतर्निहित समस्याओं पर बात करती है। दोनों ही सरल फिल्में हैं। “आवर ब्रैंड..’ में सैंड्रा बुलक मुख्य भूमिका में हैं। “रूम’ मां-बेटे की भावुक कहानी है। बेहद जटिल भावों का पीछा करती है। इसके बारे में काफी बातें की जा सकती हैं। 2015 का जिक्र क्वेंटिन टैरेंटीनो की “द हेटफुल ऐट’ के बिना पूरा नहीं होता। उनसे कुछ तय उम्मीदें होती हैं और कुछ तय आपत्तियां, वे यहां दोनों की ही पूर्ति करते हैं। निश्चित तौर पर ये उतनी ही एंगेजिंग और खूनी है जितनी उनकी पूर्व फिल्में रही हैं। आपको सीट पर पकड़े रखती है।

वर्ष 2015 में, ऑस्कर की अवधि के भीतर बहुत से फिल्में आईं। कुछ ऐसी रहीं जो कई पैमानों, गुणवत्ता और संदर्भों के कारण अपने आप में विशेष थीं। जिन्हें जरूर देखा जाना चाहिए। लेकिन चर्चा में उतनी नहीं रही, नामांकनों में भी उतनी नहीं रही। देख पाएं तो इन्हें जरूर देखें:

  1. Beasts of No Nation

 

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मां, अब मैं सिर्फ तुम्हीं से बात कर सकता हूं क्योंकि भगवान तो सुन नहीं रहा। तुम्हारा गीत ही मेरे शरीर को चला रहा है। और अब मैं कुछ नहीं सोच पा रहा हूं। न स्ट्राइकर (प्रिय दोस्त जो मर गया है) के बारे में, न इस युद्ध के बारे में। मैं गर्म ज़मीन पर लेट जाना चाहता हूं.. आंखें बंद किए, नथुनों में गारे की गंध लिए।

आगु, फिल्म का केंद्रीय पात्र.. एक चाइल्ड सोल्जर

वह सोने की एक खदान में खड़ा है। खाने को कुछ नहीं है। पीने को पानी नहीं है। नमी चुभाने वाली, मारने वाली है। उसके सिर पर टोप है, हाफ पेंट में एक ओर लंबा गंडासा खोपा है, दूसरी ओर बंदूक है। एक हाथ ट्रिगर पर है। दूसरे में नशीली धधकती सिगरेट। पैरों में भारी जूते हैं जो खदान के लाल रंग वाले पानी में डूबे है। वो पहरा दे रहा है। हार चुका है। बहुत कुछ देख लिया। भारी हो चुकी नसों से सोच रहा है।

ये कहानी पश्चिमी अफ्रीका के एक देश की है। गृहयुद्ध छिड़ा हुआ है। सरकार और सेना समर्थित बाग़ियों के मध्य। एक गांव में एक रचनात्मक लड़का आगु परिवार के साथ रहता है। वह गुदगुदाने वाला जीव है। अपने शिक्षक पिता के टीवी के नट-बोल्ट खोलकर उसका बाहरी ढांचा लेकर अलग-अलग जगह घूमता है और बेचने की कोशिश करता है। जब पूछा जाता है कि इस खोखे का हम क्या करें तो कहता है, “ये इमैजिनेशन टीवी है।’ और वो चैनल घुमाता है, फ्रेम के दूसरी ओर उसका नटखट नन्हा दोस्त तरह-तरह के एक्ट करता है। गृह युद्ध के कारण स्कूलें बंद हैं।

फिर सरकार गिर जाती है। सेना समर्थित बाग़ी और सुरक्षादल लड़ते हैं। उसका गांव घेरा जाता है। आगु के पिता को उसकी आंखों के आगे गोली मार दी जाती है। उसकी दुनिया तबाह होनी यहां से शुरू होती है। एक बाग़ियों की हथियारबंद टुकड़ी NDF से वह टकरा जाता है। इसका कमांडेंट (इदरिस एल्बा) उसे मारता नहीं चाइल्ड सोल्ज़र बना लेता है। एक संवेदनशील, फूल से बच्चे को निर्मम हत्यारा बनाने की प्रक्रिया चलने लगती है। कमांडेंट सब चाइल्ड सोल्जर्स को अपना बेटा कहता है। रात में उनके साथ रेप करता है।

ब्रिटेन के संगठन वॉर चाइल्ड के मुताबिक दुनिया में अभी करीब 2.5 लाख चाइल्ड सोल्जर हैं। ये फिल्म उसी दुनिया में हमें ले जाती है। निर्देशक कैरी फुकुनागा ने ही उसे लिखा है, डायरेक्ट किया है, सिनेमैटोग्राफी और सह-निर्माण किया है। बेस्ट डायरेक्टर की सूची में उनका काम कहीं नहीं है। जबकि इस फिल्म का हर विभाग सटीक है। एक फिल्म से जो उम्मीदें की जा सकती है वो सब इसमें हैं। फुकुनागा ने जिस टीवी सीरीज “ट्रू डिटेक्टिव’ का पहला सीजन डायरेक्ट किया उसे पहले “द रेवनेंट’ वाले आलेहांद्रो करने वाले थे। राजनीति और इतिहास पढ़े फुकुनागा स्टूडियो सिस्टम के बहुत प्रशंसक नहीं हैं और आर्ट हाउट सिनेमा के अस्तित्व को बहुत जरूरी मानते हैं। ऑस्कर में उनकी उपेक्षा का एक कारण ये भी है कि “बीस्ट्स ऑफ नो नेशन’ को ऑनलाइन फिल्म पोर्टल नेटफ्लिक्स ने प्रस्तुत किया।

खैर, फिल्म में इदरिस का अभिनय बहुत बढ़िया है। कुछ दृश्यों में तो वे आसमान में बैठाए जा रहे लियोनार्डो से काफी बेहतर हैं। उन्हें लगातार देखने का मन करता है। वे जटिल किरदारों को पसंद करने वाले गंभीर अभिनेताओं की सूची में आते हैं। घाना के एब्राहम एटा ने आगु का रोल किया है। कोई कह नहीं सकता कि वे पेशेवर एक्टर नहीं हैं।


 

अगली किस्त में दो और फिल्मों, एक्सपेरिमेंटर और द डैनिश गर्ल के बहाने कुछ जरूरी बातें.

सोमवार  का यूं भी इंतजार हो. 

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