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तालिबान और चीन की जमकर छन रही है, लेकिन इस 'दोस्ती' में एक रोड़ा भी है

जर्मनी के एक बड़े दार्शनिक जॉर्ज विल्यम हेगल का कथन है –

‘इतिहास हमें अगर कुछ सिखाता है तो वो ये कि हम इतिहास से कभी कुछ नहीं सीखते.’

इतिहास यूं तो एक पैसिव कॉन्सेप्ट है. लेकिन इंसानी मामलों में ये इतना ऐक्टिव्ली काम करता है. जितना कोई फ़िज़िक्स या बायोलॉजी का सिद्धांत. ये तब तक खुद को दोहराता रहता है, जब तक इंसान इससे सीख लेकर आगे ना बढ़ जाए. इतिहास से सीख लेने के मामले में सबसे अनूठा रिकॉर्ड है अमेरिका का. कैसे? आइए जानते हैं.

जून 21, 1788 में अमेरिका ने संविधान को अपनाया और एक गणतंत्र की शुरुआत की. लेकिन शुरुआत से ही अमेरिका अपनी रंगभेदी नीतियों और दास प्रथा के लिए बदनाम रहा है. अमूमन ये बात अफ्रीकी-अमेरिकी अश्वेत लोगों के लिए कही जाती है. लेकिन रंगभेद इतने तक ही सीमित नहीं था. 1940 तक अमेरिका में जापानी और एशियाई मूल के लोगों की अच्छी ख़ासी संख्या हो चुकी थी. स्लैंग टर्म में इन लोगों को येलो पीपल कहा जाता था. ऐसा नहीं है कि एशियाई मूल के लोग पीले रंग के होते हैं. लेकिन रंग का पर्याय भेद करने से था. चमड़ी का रंग सुर्ख़ नहीं तो गोला घुमाकर कोई ना कोई और रंग देना ज़रूरी था. ताकि ये साफ़ रहे के गोरे लोगों और बाक़ियों में अंतर है.

जब सामने आए अमेरिका और जापान

जब द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हुआ तो अमेरिका शुरुआती चरणों में युद्ध से दूर रहा. यूरोप और अमेरिका के बीच लगभग 5 हज़ार मील की दूरी है. उसे लगा कि खाली दूसरे के फटे में टांग क्यों अड़ाएं. अमेरिका ब्रिटेन को आर्थिक मदद दे रहा था. लेकिन उसने ज़मीन पर अपने ट्रूप्स नहीं उतारे. दूसरी ओर जापान अपनी विस्तार वादी नीतियों के तहत चाइना पर आक्रमण कर चुका था. इसके अलावा उसकी नजर साउथ एशिया स्थित अमेरिकन, ब्रिटिश और फ़्रेंच कॉलोनियों पर भी थी. अमेरिका ने जापान को मिलने वाले तेल की आपूर्ति रोक दी. साथ ही उस पर और कई तरह के आर्थिक प्रतिबंध लगाए.

अमेरिका को लगा कि ये येलो पीपल दिमाग़ से सनकी और मंदबुद्धि हैं. अगर वो नकेल कसेगा तो जापान अपनी लाइन में आ जाएगा. जापान से उसे कोई ख़ास ख़तरा भी नज़र नहीं आता था. कारण- जापान और अमरीका के बीच 4 हज़ार मील लम्बा प्रशांत सागर. अमेरिकन इंटेलिजेंस ऑफिशियल को ये यकीन था कि अगर अटैक हुआ तो भी जापान साउथ पैसिफ़िक यूरोपियन कॉलोनी में या उसके आस-पास अटैक करेगा. इन कॉलोनीज़ में डच ईस्ट इंडीज़, सिंगापुर या इंडो-चाइना शामिल थे.

पर्ल हार्बर पर हमला

लेकिन जापान ने एक अप्रत्याशित रिस्क लेते हुए, अमेरिका के मुहाने पर चोट की. पर्ल हार्बर पर हमला हुआ और अमेरिका पैसिफ़िक नेवी फ्लीट के 20 युद्धपोतों और 300 एयरप्लेन्स को नष्ट कर डाला गया. इस हमले में 2500 सैनिक मरे और लगभग 1000 घायल हुए. मजबूरन अमेरिका को युद्ध में उतरना पड़ा. इसके 40 साल बाद इतिहास ने खुद को दोहराया.

1979 में सोवियत अफ़ग़ानिस्तान में एंटर हुआ. अफ़ग़ानिस्तान की अमेरिका से दूरी- साढ़े सात हज़ार मील. अमेरिका का इससे लेना-देना- निल बट्टे सन्नाटा. कोल्ड वॉर के दिन थे. अमेरिका की डॉमिनो थियोरी – अगर अफ़ग़ानिस्तान सोवियत के कब्जे में आ गया तो पूरे साउथ एशिया में उसका प्रभुत्व हो जाएगा.

नतीजा- अमेरिका ने पाकिस्तान के सहारे अफ़ग़ानी मुजाहिद्दीन को मदद देनी शुरू कर दी. बाक़ायदा वाइट हाउस बुलाकर रीगन ने मुजाहिद्दीन से मुलाक़ात की. सोवियत लौट गया और अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का क़ब्ज़ा हो गया. देखते-देखते अफ़ग़ानिस्तान अल-क़ायदा का मुख्य अड्डा बन गया.

Pearl Harbour
पर्ल हार्बर पर हमले की तस्वीर.

फिर आया 9/11

इस थर्ड वर्ड में दख़ल देते हुए अमेरिका इस हेकड़ी में था कि हज़ारों मील दूर उसकी धरती को इससे कोई ख़तरा नहीं था. इतिहास इंतज़ार कर था. बिलकुल उस मीम के माफ़िक़- ‘हां ये कर लो पहले’. और जल्द ही वो अपना सबक़ सिखाने अमेरिका के दरवाज़े पर पहुंच गया. इतिहास ने दुबारा दस्तक दी- 11 सितम्बर, 2001 को. वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला हुआ और अमेरिका को एक नए युद्ध में उतरना पड़ा. नई सदी के इस नए युद्ध का नाम था- वॉर ऑन टेरर.

NATO फोर्सेस अफ़ग़ानिस्तान की धरती पर उतरी. राष्ट्रपति बुश इस वॉर को अमेरिकी जनता को सेल (sell) करने की कोशिश में लगे हुए थे. वॉर को जायज़ ठहराने के लिए अफ़ग़ानी महिलाओं का नाम उछाला गया. बात ऑथेंटिक लगे, इसके लिए अमेरिका की फ़र्स्ट लेडी लॉरा बुश ने देश के नाम एक संदेश देते हुए कहा.

“अमेरिकी फ़ौजों ने सुनिश्चित किया है कि अफ़ग़ानिस्तान की महिलाएं अपने घरों में कैद होकर नहीं रहें. ये लड़ाई सिर्फ़ आतंक के ख़िलाफ़ नहीं है. ये अफ़ग़ानी महिलाओं के हक़ की लड़ाई है.”

अमेरिका अफ़ग़ानी महिलाओं का तारणहार बनने का दावा कर रहा था. जबकि असलियत ये थी कि अमेरिका और सोवियत की रस्साकशी ने ही अफ़ग़ानी महिलाओं को तालिबान के क्रूर शासन तले दबा दिया था. बाकी तो 1970’s में कॉलेज जाती अफ़ग़ान लड़कियों की तस्वीरें आपने देखी ही होंगी.

अफगान महिलाओं की स्थिति का सच

ख़ैर इस बात में कोई शक नहीं कि 2001 में काबुल से तालिबान के एग्ज़िट के बाद महिलाओं की स्थिति में सुधार आया. पिछले बीस वर्षों में उन्होंने दुनिया में अपनी पहचान बनाई. उन्होंने पुलिस सुरक्षा से लेकर वकालत का ज़िम्मा संभाला. नई दुनिया से जुड़ी. कला और विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. क्रिकेट और वॉलीबॉल जैसे खेलों में अंतरराष्ट्रीय मंचो पर शिरकत की. पत्रकारिता के क्षेत्र में नाम कमाया.
लेकिन अब अमेरिका लौट चुका है. और 20 साल से तैयार की गई ज़मीन पैरो तले से खिसक गई है.

पत्रकारों का एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है, रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर (RSF). उसके मुताबिक़ काबुल में अब सिर्फ़ 39 महिला पत्रकार रह गई हैं. जो प्राइवेट रेडियो और TV स्टेशन में काम कर रही हैं. पिछले साल तक इनकी संख्या 700 से भी अधिक थी. RSF की सेक्रेटरी जनरल हैं क्रिस्टोफे डेलॉयरे. एक प्रेस रिलीज़ के माध्यम से उन्होंने तालिबान के नाम एक संदेश जारी किया है. उन्होंने कहा,

“महिला पत्रकारों को जल्द से जल्द दुबारा काम करने की आज़ादी मिलनी चाहिए. ये उनकी आजीविका का साधन होने के साथ-साथ उनका मौलिक अधिकार भी है. अगर मीडिया लैंड्स्केप से महिलाएं ग़ायब हो गई तो इसका असर सभी अफ़ग़ान महिलाओं पर होगा. हम तालिबान लीडरशिप से गुज़ारिश करते हैं कि वो महिला पत्रकारों की आज़ादी और सुरक्षा की गॉरन्टी दें.”

साल 2000 तक काबुल हेरात और बल्ख प्रोविंस में कुल मिलाकर 1700 से ज़्यादा महिला पत्रकार काम कर रही थीं. लेकिन अब उनकी संख्या गिनती भर की रह गई है. जो काम कर रही हैं, उन्हें भी तालिबान के डर से नाम बदलकर रिपोर्टिंग करनी पड़ रही है.

पिछले दिनों तालिबान ने बार-बार दोहराया है कि वो महिलाओं के काम करने के पक्ष में है. लेकिन ऐसा ही आश्वासन उसने 1996 में भी दिया था. और बाद में अपनी बात से पलटते हुए महिलाओं का घर से निकलना दूभर कर दिया था. इस बार भी तालिबान कह रहा है कि लड़कियां स्कूल जा सकती हैं. लेकिन उसकी नीयत का अंदाज़ा इसी बात से लग जाता है कि पुरुष शिक्षकों द्वारा लड़कियों को पढ़ाए जाने पर पाबंदी लगा दी गई है.

Afghan Women
तालिबान लगातार कह रहा है कि वो महिलाओं की स्थिति का ख़्याल रखेगा. लेकिन उसकी कथनी और करनी में अंतर दिख रहा है. (सांकेतिक फोटो)

ढर्रे पर लौटता तालिबान

तालिबान के प्रवक्ता ने कहा है कि औरतें काम पर निकलें. लेकिन ज़मीन पर उसके मेम्बर औरतों को काम पर जाने से रोक रहे हैं. सरकार बनी नहीं है, कोई नियम क़ानून हैं नहीं. लिहाज़ा तालिबान के लड़के अपनी मन मर्ज़ी चला रहे हैं. मसलन, कौन बाहर निकल सकता है, कौन नहीं. कपड़े कैसे पहने हैं, एट्सेटरा. सब कुछ अनाधिकारिक व्हिम पर तय किया जा रहा है.

टाइम पत्रिका से बात करते हुए गज़नी प्रोविंस में काम कर रही एक महिला पत्रकार ने बताया कि तालिबान ने एक नई चेतावनी जारी की है. उसका कहना है कि रेडियो स्टेशन चालू रह सकते हैं. लेकिन उनमें महिलाओं की आवाज़ नहीं चलनी चाहिए. इसके अलावा रेडियो के माध्यम से संगीत के प्रसारण पर भी रोक है.

TV पर प्रसारित होने वाले महिलाओं से सम्बंधित TV चैनल भी बंद कर दिए गए हैं. इनमें से मुख्य हैं बानो TV और ज़न TV. ये दोनों प्राइवेट्ली ओंड TV चैनल थे. जिसमें 80 के लगभग महिला पत्रकार काम किया करती थी. छोटे स्तर पर ही सही अफ़ग़ान महिलाएं तालिबान के सामने अपना प्रतिरोध जता रही हैं. कुछ हफ़्ते पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ था. जिसमें दिख रहा था कि हथियारबंद तालिबानी लड़ाकों के सामने अफ़ग़ानी महिलाएं प्रदर्शन कर रही थी.

‘डोंट बी अफ़्रेड’

बृहस्पतिवार को पश्चिमी अफ़ग़ानिस्तान के हेरात प्रांत से भी ऐसी ही तस्वीरें आई. दर्जन भर महिलाएं हेरात की सड़कों पर इकट्ठा हुई और उन्होंने तालिबान के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया. उनकी मांग थी कि नई सरकार में महिलाओं को भी शामिल किया जाए. इस दौरान उन्होंने गवर्नर ऑफ़िस तक मार्च किया.

इस दौरान महिलाएं ‘डोंट बी अफ़्रेड’ का नारा लगा रही थी और उन्होंने तख़्तियां पकड़ रखी थी. जिनमें लिखा था, ‘हम सब साथ हैं’. हेरात अफ़ग़ानिस्तान के सबसे उदारवादी प्रांतों में से एक है. हज़ारों की संख्या में महिलाएं यहां यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करती थी. और काम करने के लिए घर से बाहर निकलती थी. तालिबान के क़ब्ज़े के बाद इन सब पर पाबंदी लग चुकी है. इस प्रोटेस्ट की ऑर्गनाइज़र मरियम ने मीडिया को बताया कि –

“हम महिलाएं तालिबान को अपनी ताक़त दिखाना चाहती हैं. अगर हम घर के अंदर बंद रहीं तो तालिबान दिन पर दिन हम पर रेस्ट्रिक्शंस बढ़ाता जाएगा. धीरे-धीरे महिलाओं की हालत 20 साल पहले जैसी हो जाएगी.”

तालिबान पहले ही कह चुका है कि महिलाओं को काम करने की आज़ादी होगी लेकिन उन्हें कोई मंत्रालय या बड़ा सरकारी पद नहीं दिया जाएगा. अभी तक केवल महिला हेल्थ वरकर्स को काम पर लौटने की इजाज़त दी गई है. तालिबान के प्रवक्ता जबीबल्लाह मुजाहिद ने कहा है कि ये निर्णय टेम्परेरी है. तालिबानी लड़ाकों को महिलाओं की इज्जत करने की ट्रेनिंग दी जा रही है. जैसे ही ये काम हो जाएगा, महिलाएं दुबारा काम पर लौट सकेंगी.

खाद्यान्न की मदद शुरू होगी

हमने आपको बताया था कि UN ने चेतावनी दी है कि पूरे अफ़ग़ानिस्तान में खाद्य संकट खड़ा हो सकता है. इस फ़्रंट पे एक अच्छी खबर आई है. UN प्रवक्ता स्टीफ़ेन डुआरिक ने बताया कि UN वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम के तहत चलने वाली ह्यूमैनिटेरियन फ़्लाइट्स दुबारा शुरू हो गई हैं. पाकिस्तान के इस्लामाबाद से मज़ार-शरीफ़ और कंधार तक की उड़ाने शुरू हो गई हैं. UN की तीन फ़्लाइट मज़ार-ए-शरीफ़ में लैंड भी कर चुकी हैं. UN अफ़ग़ानिस्तान में एक राहत प्रोग्राम चलाता है. जिसका नाम है, United Nations Assistance Mission in Afghanistan (UNAMA). UNAMA कि मियाद 7 सितम्बर को खतम हो रही है. 17 सितम्बर को UN सिक्योरिटी कॉउंसिल में इसके एक्सटेंशन को लेकर बहस होनी है. लेकिन तालिबान अभी तक सरकार का ही गठन नहीं कर पाया है. इसलिए UNAMA का भविष्य अधर में लटका हुआ दिखाई दे रहा है. ये भी तय नहीं है कि UN में अफ़ग़ानिस्तान को कौन रेप्रेज़ेंट करेगा.

बृहस्पतिवार को ह्यूमन राइट्स वॉच ने सिक्योरिटी काउन्सिल से कहा है कि UNAMA का मैंडेट बढ़ाया जाए ताकि अफ़ग़ान नागरिकों को मदद मिलती रहे. सरकार बने ना बने लेकिन तालिबान को मदद की ज़रूरत है. तालिबान धार्मिक कट्टरता की जितनी चाहे नई इबारतें लिखता रहे. लेकिन दुनिया में पैसा बोलता है, और तालिबान की जेब ठन-ठन गोपाल है.

इसलिए उसने बैक चैनल्स से UN को ये संदेश भेजा है कि भविष्य में उसे UN ऐड की ज़रूरत होगी. UN से एड मिलने में लम्बा वक्त लग सकता है. सिक्योरिटी काउन्सिल की बैठक इसी महीने हो सकती है. लेकिन प्रक्रिया लम्बी है और तालिबान के पास वक्त है कम. मदद के लिए उसने पड़ोसी देश चाइना की तरफ़ हाथ बढ़ाया है.

तालिबान-चीन संबंध

तालिबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन द्वारा ट्वीट कर इसकी जानकारी दी गई. तालिबान के राजनीतिक ऑफिस के डिप्टी डायरेक्टर अब्दुल सलाम हनफी ने चाइना के विदेश राज्य मंत्री वू जिआनघाओ के साथ फोन पर बातचीत की है. चाइना ने तालिबान को भरोसा दिया है कि काबुल में चाइना का दूतावास खुला रहेगा. साथ-साथ उसने तालिबान को आर्थिक मदद का भरोसा भी दिया है.

इसके अलावा एक इटैलियन अख़बार को दिए गए इंटरव्यू में तालिबान के प्रवक्ता जबीबुल्लाह मुजाहिद ने कहा है कि चाइना तालिबान का सबसे ज़रूरी पार्ट्नर है. इंटरव्यू के अनुसार मुजाहिद ने कहा,

“चाइना के साथ रिश्ते हमारे लिए बहुत ज़रूरी हैं. दोनों देशों के पास साथ काम करने का अवसर है और चाइना हमारे देश में निवेश और पुनर्निर्माण के लिए तैयार है”

मुजाहिद ने आगे बताया कि चाइना का ‘वन बेल्ट वन रोड’ (OBOR) प्रोग्राम तालिबान के लिए बहुत महत्व रखता है. इससे आने वाले दिनों में अफ़ग़ानिस्तान के लिए व्यापार के नए रास्ते खुलेंगे. आपको बता दें कि अफ़ग़ानिस्तान में कॉपर की खानें है जिस पर चाइना नज़र गढ़ाए बैठा हुआ है. मुजाहिद ने बताया कि चाइना की मदद से इन कॉपर माइन्स को दुबारा चालू किया जा रहा है. इससे अफ़ग़ानिस्तान के लिए पूरी दुनिया में व्यापार के रास्ते खुल जाएंगे. चाइना ने भी इस मामले में बयान जारी किया है. चाइना के विदेश मंत्रालय प्रवक्ता वैंग वेनबिन ने कहा,

“चाइना को उम्मीद है कि तालिबान सभी अफ़ग़ान नागरिकों के हित में फ़ैसला करेगा. तालिबान एक स्थिर सरकार का गठन करेगा और नई सरकार का ढांचा सबको साथ लेकर तैयार किया जाएगा.”

वेनबिन ने चाइना और अफ़ग़ानिस्तान के रिश्तों को लेकर कहा,

“चाइना और अफ़ग़ानिस्तान मित्र देश हैं. चाइना अफ़ग़ानिस्तान के लोगों के प्रति दोस्ताना नज़रिया रखता है. और उनकी संप्रभुता का सम्मान करता है. चाइना अफ़ग़ानिस्तान के किसी भी आंतरिक मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा. और अफ़ग़ानिस्तान के पुनर्निर्माण में पूरा सहयोग करेगा.”

लेकिन इतने से बात ख़त्म नहीं होती. चाइना और अफ़ग़ानिस्तान की दोस्ती में एक बड़ा रोड़ा है, तालिबान का आतंकी संगठनों से गठजोड़. जैसे अल-क़ायदा. साथ ही चीन के पार्ट्नर पाकिस्तान के लिए तालिबान का पाकिस्तानी फ़ैक्शन सरदर्द बना हुआ है. चाइना तालिबान को चेता चुका है कि वो सभी आतंकी संगठनों से अपने रिश्ते तोड़ ले. ताकि उसे अपने पड़ोसियों से बेहतर रिश्ते स्थापित करने में मदद मिले. Uyghur मुसलमानों का मुद्दा भी दोनों देशों के बीच फांस बना हुआ है. अफ़ग़ानिस्तान में क़रीब 2000 Uyghur मुस्लिम रहते हैं. तालिबान के आने के बाद इस कम्यूनिटी को डर बना हुआ है कि तालिबान उन्हें चाइना को डिपॉर्ट कर देगा.


भारत के साथ बातचीत में आतंकवाद को लेकर तालिबान क्या बोला?

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