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मंकू की नाली में पटाखा दगा तो कीचड़ दुमहले तक जा पहुंचा

अभी क्या है कि हम सारे त्योहार फेसबुक पर मनाते हैं. अगर करवा चौथ पर मेकप करते हैं तो प्रोफाइल पिक अपडेट करने के लिए. होली में फटे कपड़े पहन नाचते हैं तो फेसबुक पर लाइव होने के लिए. दिवाली पर पटाखे जलाते या मिठाई खाते हैं तो उसकी फोटो खींचकर फेसबुक पर डालने के लिए. लेकिन फेसबुक हमेशा तो था नहीं. हमारे सामने मजबूरी थी कि हमें असल में त्योहार मनाने पड़ते थे. और इतना जमकर एंजॉय करते थे कि उस मजबूरी में भी करेजा हरियर रहता था.

स्कूल हमारा घर से चार किलोमीटर दूर था. सिसु मंदिर की कक्षा सप्तम् या अष्टम् में था. दिवाली के पहले दिवाली की तैयारी के क्रम में वहां से सुतली वाले पटाखे लाता था. स्कूल के बगल में ही पटाखा प्रोफेशनल की दुकान थी. एक पटाखा पांच रुपैया का था. पांच रुपए घर से निकालना काफी मेहनत का काम था. दो तीन दिन की कोशिश से एक पटाखा आता था. फिर उससे घर में हथगोले बनाते थे. मैं और मेरा छोटा भाई. उसकी रेसिपी ये थी- कुछ छोटे कंकड़, थोड़ा कागज और धागा जिसमें बारूद और कंकड़ भरकर लपेट दिया जाता था. फिर उसको कसके जिस दीवार पर मारो वहां पलस्तर छूट जाता था भाईसाब. लेकिन कोई चुगुलहा आदमी उस प्रोफेशनल पटाखा वाले को बता दिहिस कि ये लउंडे धरपटक बनाते हैं. वो कान पकड़ लिहिस. भैया अब तुमको पटाखा नहीं देंगे.

Image: Reuters
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पता है पहली बार अपने वैज्ञानिक होने का सुबूत कैसे मिला? दिवाली की तैयारी के क्रम में साइकिल की वॉलबाडी काम आती थी. अरे छुच्छी भैया. इसका इस्तेमाल दिवाली से तकरीबन महीने भर पहले शुरू हो जाता था. क्योंकि पटाखे मार्केट में तब तक आए नहीं होते थे. तो एक पटरी में साइकिल की वॉलबाडी संलग्न की जाती थी. उसकी छुच्छी में माचिस की तीली से मसाला निकालकर भरते थे. ऊपर से एक कील खोंसकर दीवार पर मारो. ठांय से आवाज आती थी. चिड़ियां उड़ जाती थीं. लेकिन उस सीजन में छुच्छी का क्राइसिस बहुत खलता था. लिहाजा अपने घर की समस्त साइकिलों के अलावा रात बिरात पड़ोसियों की साइकिल भी छुच्छी फ्री करनी पड़ती थी. पकड़ जाने पर बेतहाशा लात घूंसों का इनाम मिलता था इन वैज्ञानिक प्रयोगों के बदले.

मयंक बाबू साथ पढ़ते थे. दिवाली की पूर्वसंध्या पर हमें अपने घर इनवाइट किया. हम अपने घर से पहुंचे तो वो अपना खरीदा असला बारूद दिखाने लगे. ये छुरछुरिया है. पांच रुपए की एक आई है. अनार साला 10 रुपए से कम ही नहीं कर रहा था. दर्जन भर लिए तो आठ का एक लगाया. ये धरपटक, ये पिटिक्की ये कट्टे की रील. साथ में मिर्ची बम. हम कहे कि यार मिर्ची बम सॉलिड लग रहा तुम्हारा. आओ टेस्ट करते हैं. उसको प्लास्टिक वाले डिस्पोजल ग्लास में भरकर उनके घर से लगकर बह रही नाली के कीचड़ में रख दिया. माचिस छुआ दी. जो ब्लास्ट हुआ कि पड़ोसी खिड़की से झांकने लगे. लेकिन इस धमाके के बाद जो सीन उपस्थित था वो भी किसी धमाके से कम नहीं था. पापा ने आज ही घर की पुताई फिनिश कराई थी. नाली के अंदर से काला कीचड़ उड़कर दुमहले तक पहुंचा था. हम अपनी साइकिल उठाकर निकल आए. तीसरे दिन स्कूल गए तो मयंक भाई सूजे हुए हमारे बगल वाली सीट पर बरामद हुए थे.

देखो मिठाई की बात अभी बीच में मत लाओ. जरूरी बात हो रही है. पटाखे की और फुलझड़ी की. फुलझड़ी का रोल तो जलकर खत्म होने के बाद शुरू होता था. जब उसकी बची हुई लोहे की तीली को चप्पल पर रखकर निशान बनाए जाते थे. सबसे खतरनाक वो टिक्की होती थी जिसके बीच में मक्खी की मुंडी भर मसाला भरा रहता है. हथौड़ी से फोड़ते थे उसे. तेज आवाज के लिए बंद कमरे का इस्तेमाल किया जाता था. उनको एकाध बार ज्यादा फायदा निकालने के लिए मोमबत्ती में जलाने की कोशिश भी की. लेकिन फिस्स होकर रह गई. फिर एक के ऊपर तीन चार रखकर फोड़ी गईं तब आनंद आया.

Image: Facebook
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आनंद से याद आया मकसूद आया था एक दिवाली की रात. हमारे घर. उसको दूर से दगते पटाखे अच्छे नहीं लग रहे थे. अब्बू ने खरीदने दिए नहीं तो हमारे साथ एंजॉय करने आ गया. एकाध मिर्ची बम फोड़े. फुलझड़ी जलाई. किचन से थाली लेकर आया और चकरी के पलीते में आग लगाई. सबको मौज आ रही थी. वो जो काले काले सांप निकलते हैं टिकिया से वो भी निकाले. फिर अनार निकाला. येब्बड़े बड़े अनार थे भाईसाब. हम लोगों को कोई एक्सपीरिएं नहीं था अनार जलाने का. मकसूद हिनहिनाए कि हटो तुम लोग. हम जलाते हैं. फिर उसके ऊपर छेद करके कागज हटा दिया. माचिस की एक तीली जलाकर करीब ले गए. नहीं पकड़िस. फिर दूसरी तीली. नहीं पकड़िस. फिर तीसरी, चौथी और पांचवीं. आखिरी में उसके अंदर फुलझड़ी खोंस दिए. जलती हुई. फिर जो भन्ना के जला कि भागते मकसूद के पिछवाड़े चड्डी में चिंगारियां लग गईं. पान मसाले से काले हुए दांत चियारते हुए बोले- जानौ साला सूखा नहीं रहा ठीक से.

खैर, वो माहौल वो मौका सब निपट गया. चलो जल्दी से एथनिक कुर्ता पहनकर दिवाली की तैयारी करो. फोटो डालनी है.

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