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छत्तीसगढ़: थप्पड़ मारने वाले DM पर तुरंत कार्रवाई, लेकिन आदिवासियों की मौत पर ढिलाई क्यों?

छत्तीसगढ़ का सुकमा जिला. नक्सली गतिविधियों के कारण अक्सर चर्चा में रहता है. अप्रैल के महीने में यहां नक्सलियों के एक बड़े हमले में 22 जवान शहीद हो गए थे. अब यहां सुरक्षाबल एक कैंप बना रहे हैं. लेकिन ग्रामीण इस कैंप का विरोध कर रहे हैं. ये विरोध इतना बढ़ा कि 17 मई को ग्रामीणों और पुलिस के बीच भिड़ंत हो गई. इसमें 3 ग्रामीण मारे गए. इसे लेकर आदिवासियों ने विरोध प्रदर्शन किए. एक्टिविस्ट भी यहां पहुंचे. आदिवासियों और पुलिस के बीच बातचीत भी हुई. अभी भी इलाके में तनाव बना हुआ है. इस रिपोर्ट में समझने की कोशिश करेंगे कि आखिर क्यों ग्रामीण इस कैंप का विरोध कर रहे हैं.

क्या है मामला?

पूरे वाकये को तफ्सील से जानने के लिए हमने बात की छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार विकास तिवारी उर्फ रानू तिवारी से. रानू ‘बस्तर टॉकीज’ नाम के यूट्यूब चैनल के फाउंडर भी हैं. उन्होंने हमें बताया,

“11 मई को सिलगेर में कैंप बन कर तैयार हुआ और 12 तारीख से गांव वालों का विरोध शुरू हो गया. लगभग 22 पंचायतों के ग्रामीण हजारों की संख्या में वहां पर पहुंचने लगे. आदिवासियों का ये प्रदर्शन काफी उग्र था. 17 तारीख तक ये इतना बढ़ चुका था कि पुलिस की ओर से फायरिंग कर दी गई. इस फायरिंग के दो पक्ष हैं. पुलिस का ये कहना है कि माओवादियों ने ग्रामीणों की आड़ से गोली चलाई और जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने भी गोली चलाई जिसमें तीन नक्सली मारे गए हैं. वहीं ग्रामीणों का कहना है कि पुलिस ने उनके तीन किसानों को मार दिया है.”

सामाजिक कार्यकर्ताओं को रोका गया

रानू बताते हैं कि ग्रामीणों के अनुसार पुलिस की फायरिंग में 18 लोग घायल भी हुए हैं. कुछ लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार भी किया है. उनकी रिहाई अभी तक नहीं हुई है. ये संख्या 9 बताई जा रही है. इसके बाद से आंदोलन और उग्र हो गया है. ग्रामीण अभी भी कैंप के विरोध में डटे हुए हैं. तीन मौतों की खबर पता चलने पर सोशल एक्टिविस्ट बेला भाटिया मौके के लिए निकलीं, लेकिन उन्हें कोविड जांच के नाम पर रोक लिया गया. तीसरे दिन वो मौके पर पहुंच पाईं.

वहीं, पूर्व वन मंत्री महेश गागड़ा को भी आधे रास्ते से वापस लौटा दिया गया. अखिल भारतीय आदिवासी महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और कोंटा विधानसभा से सीपीआई के पूर्व विधायक मनीष कुंजाम को भी रोक दिया गया था. इसके अलावा आम आदमी पार्टी की टीम भी मौके के लिए निकली थी, लेकिन उसे भी बस्तर जिले के कोडेनार में रोक दिया गया था. बेला भाटिया और मनीष कुंजाम ही मौके तक पहुंच पाए. मनीष कुंजाम ने इस मामले में न्यायिक जांच की मांग की है. उनका कहना है कि पुलिस ने बेकसूर आदिवासियों को अपनी गोली का निशाना बनाया है.

अधिकारियों से मिले पैसे लौटाए

हालात सामान्य करने की कोशिश के तहत बीती 23 मई को पुलिस और गांव वालों के बीच बातचीत हुई. 40 सदस्यीय ग्रामीणों ने बस्तर के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ काफी लंबी बैठक की. इसमें बस्तर आईजी, बस्तर कमिश्नर, सुकमा और बीजापुर के एसपी और कलेक्टर भी शामिल हुए. गांव वालों को अधिकारियों ने 10-10 हजार रुपये के 3 लिफाफे भी दिए. ये पैसे मृतकों के अंतिम संस्कार के नाम पर दिए गए. इन पैसों को गांव वालों ने लौटा दिया. उन्होंने अपनी मांगें ज्ञापन के तौर पर अधिकारियों को दी हैं. इसमें सबसे प्रमुख मांग कैंप को इलाके से हटाने की है. अधिकारियों ने कहा कि इस ज्ञापन को वे सरकार तक पहुंचा देंगे क्योंकि अंतिम निर्णय सरकार को ही करना है.

अभी भी गांव वाले सिलगेर में मौजूद

रानू तिवारी बताते हैं कि गांव वाले अभी भी सिलगेर में ही मौजूद हैं. उनका कहना है कि 23 तारीख को हुई बातचीत के बारे में बाकी आदिवासियों को बताया जाएगा. इसके बाद सामूहिक फैसला किया जाएगा कि प्रदर्शन से हटना है कि नहीं. उधर, इस मामले में पुलिस का कहना है कि ये पूरा प्रोटेस्ट माओवादियों के इशारे पर हो रहा है. लेकिन कैंप का विरोध कर रहे आदिवासियों का कहना है कि ये हटना चाहिए. उनका आरोप है कि जवान उनके साथ मारपीट करते हैं और जंगल में घूम रहे आदिवासियों को कभी माओवादी बताकर गिरफ्तार करते हैं तो कभी उनका एनकाउंटर कर देते हैं.

सड़क को लेकर क्या है सरकार का प्लान?

शासन-प्रशासन बीजापुर जिले के आवापल्ली से सुकमा जिले के जगरगुंडा तक सड़क बनाना चाहता है. इसमें आवापल्ली से बासागुड़ा तक और आगे तररेम तक सड़क व बिजली पहुंच चुकी है. साथ ही सुरक्षा बलों के कैंप भी. अब आगे और सड़क बनाने के लिए सिलगेर में कैंप लगाया गया है. ये सड़क सलवा जुडूम से पहले मौजूद थी. अब प्रशासन इसे दोबारा बहाल करना चाहता है. गांव वाले कहते हैं कि उन्हें विकास चाहिए, सड़क चाहिए, लेकिन इतनी चौड़ी सड़क नहीं चाहिए. उनका कहना है कि ठेकेदारों को काम देने की जगह स्थानीय लोगों को मौका दिया जाना चाहिए.

बस्तर टॉकीज के एक वीडियो में प्रदर्शन कर रहे ग्रामीण बताते हैं कि उन्हें विकास चाहिए, स्कूल, अस्पताल और राशन की दुकानें भी चाहिए, सड़क भी चाहिए. लेकिन इतनी चौड़ी सड़क का वे क्या करेंगे. एक युवा कहता है कि अगर आदिवासियों को काम दिया जाए तो वे सड़क बनाएंगे और नक्सलियों से मशीनों की हिफाजत भी करेंगे. उन्होंने ये भी बताया कि गांव में कोरोना की वैक्सीन लगाई जा रही है. लोग लगवा भी रहे हैं. अस्पताल होना चाहिए ताकि कोरोना जैसी बीमारी से बचा जा सके.

सूरजपुर में तेज कार्रवाई, सुकमा में ढिलाई क्यों?

हाल में छत्तीसगढ़ के सूरजपुर के डीएम ने कोरोना प्रोटोकॉल लागू कराने के नाम पर एक नाबालिग लड़के को थप्पड़ मार दिया था. इस घटना का वीडियो सामने आया तो छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार ने तुरंत डीएम को पद से हटा दिया. लेकिन सूरजपुर के विपरीत सुकमा में सरकार की तरफ से ढिलाई देखने को मिली. जबकि वहां सुरक्षा बल और आम आदिवासियों के बीच बड़ा टकराव देखने को मिला, जिसमें जानें तक चली गईं. इस पर छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला कहते हैं,

“सूरजपुर में सरकार ने तेज फैसला लिया, अच्छा फैसला लिया. लेकिन जब बात यहां की होती है तो हम कांग्रेस सरकार का दोहरा चरित्र देखते हैं. जहां न्यायिक जांच का फैसला लिया जाना चाहिए था, जहां कार्रवाई की जरूरत थी, वहां एक बयान भी सरकार की ओर से नहीं आया. जबकि जब कांग्रेस विपक्ष में थी तब बस्तर से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाती थी.”

इसी बात को आगे बढ़ाते हुए छत्तीसगढ़ के एक पत्रकार नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं,

“बस्तर के मामले में बीजेपी सरकार और कांग्रेस सरकार का रवैया एक जैसा रहा है. ये इलाका पांचवीं अनुसूची में आता है. यानी बिना ग्राम पंचायत की मर्जी के यहां विकास के काम भी नहीं हो सकते. ऐसे में नागरिकों की मर्जी के बिना सड़क बनाई जा रही है और कैंप लगाए जा रहे हैं. कांग्रेस सरकार की ओर से इस मामले में कोई बयान सामने नहीं आया जबकि तीन गांव वाले मारे गए. वहीं सूरजपुर वाले मामले में सरकार ने ट्वीट करके बताया कि वो क्या कर रही है.”

तमाम प्रतिक्रियाओं के बीच इलाके में तनाव बरकरार है. गांव वाले और सुरक्षाबलों के जवान अभी भी आमने सामने हैं. ये रिपोर्ट लिखे जाने तक कोई बीच का रास्ता नहीं निकल पाया. सरकार और सुरक्षाबल का पक्ष जानने के लिए हमने बस्तर के आईजी सुंदरराज पी को भी फोन किया, लेकिन फोन उठा नहीं. इस मामले पर जो भी सरकारी पक्ष आएगा, उसे भी रिपोर्ट में जोड़ा जाएगा.


वीडियो: छत्तीसगढ़ के सुकमा में सुरक्षाबलों और ग्रामीणों के बीच हुआ संघर्ष और गोलियां चल गईं

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