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'छपाक' और 'तान्हाजी' को लेकर राज्यों का जो टैक्स फ्री वाला गेम चल रहा है, वो होता क्या है?

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‘छपाक’ और ‘तान्हाजी’. दो मूवीज़. दोनों की ही अलग-अलग विधाएं. विधाएं, जो न एक दूसरे की समानार्थी हैं, न विरोधाभासी. लेकिन फिर भी दोनों मूवीज़ आपस में भिड़ा गई हैं.

‘भिड़ गई हैं’ नहीं, ‘भिड़ा गई हैं’. जान बूझ कर नहीं अनजाने में. अव्वल कारण तो इनका एक ही दिन रिलीज़ होना है. ठीक जैसे ‘ॐ शांति ॐ’ और ‘सांवरिया’ या ‘शिवाय’ और ‘ऐ दिल है मुश्किल’ आपस में भिड़ा दिए गए थे.

लेकिन इस बार मामला अलग है. जेएनयू हिंसा के विरोध में दीपिका के जेएनयू कैम्पस जाने के बाद ‘छपाक’ एंटी स्टेब्लिशमेंट (सरकार विरोधी) और ‘तान्हाजी’ प्रो स्टेब्लिशमेंट (सरकार समर्थक) का सिंबल बन गई है. ‘छपाक’ मूवी की लीड एक्ट्रेस और प्रोड्यूसर दीपिका का जेएनयू जाना उनको लेफ्ट (या विपक्ष) के करीब ले आया, वहीं ‘तान्हाजी’ की राईट आइडियोलॉजी वाली फील और डायलॉग्स उसको सरकार के करीब ले आई.

# कॉज़ एंड इफ़ेक्ट-

अब कारण तो हमने बता दिया कि क्यूं भिड़ा गईं. इसके बाद आते हैं प्रभाव पर. तो इस ‘एक्सीडेंट’ के जो प्रभाव हुए वो सोशल मीडिया से लेकर आईएमडीबी तक दिखाई दे रहे हैं.

# सोशल मीडिया पर #ISupportDeepika और #BoycottChhapaak जैसे हैश टैग्स ट्रेंड करने लगे. लोग अपने सभी अस्त्र शस्त्र लेकर चार पालों में बंट गए. ‘छपाक’ के विरोध और समर्थन में दो पाले और ‘तान्हाजी’ के  विरोध और समर्थन में दो और पाले.

# आईएमडीबी पर ‘छपाक’ के खिलाफ मुहीम छिड़ गई. इतने लोगों ने उसे नेगेटिव रिव्यू दिया कि मूवी की रेटिंग 4.4 तक गिर गई. 

# तान्हाजी को क्रिटीसाईज़ करने वाले समीक्षक देशद्रोही तक कहलाने लगे.

लेकिन ये लड़ाई इंटरनेट से निकल कर रियल वर्ल्ड तक पहुंच गई है. कैसे? आप गौर करें. कांग्रेस शासित प्रदेशों में जहां ‘छपाक’ टैक्स फ्री कर दी गई है, वहीं भाजपा शासित प्रदेशों में ‘तान्हाजी’.

और रियल वर्ल्ड में किसी मूवी के टैक्स फ्री होने का क्या मतलब है, ये समझना है इस स्टोरी का उद्देश्य. चलिए शुरू से शुरू करते हैं.

# मापदंड-

किसी मूवी को टैक्स फ्री करने का कोई सेट, लिखित या ऑफिशियल मापदंड नहीं है. कि इन-इन  ‘मापदंडों’ पर खरी उतरने वाली मूवी टैक्स फ्री हो जाएगी. ये राज्य सरकारों के विवेक पर निर्भर करता है कि वो किस मूवी को टैक्स फ्री करते हैं या किसे नहीं. हालांकि मूवी अगर कोई सामजिक संदेश देती हो, मोटिवेशनल हो, किसी अच्छे कॉज़ को प्रमोट करती हो तो उसके टैक्स फ्री होने की संभावना बहुत अधिक होती है.

लेकिन फिर, ‘बंटी और बबली’ जैसी मूवीज़ भी अतीत में टैक्स फ्री हुई हैं. इसे यूपी में टैक्स फ्री किया गया. क्यूंकि इसकी शूटिंग वहां हुई थी. कम से कम ऑफिशियल कारण तो यही दिया गया था.

# हिस्ट्री और मैथ्स-

ऊपर हमने एक जगह कहा है- ये ‘राज्य सरकारों के’ विवेक पर निर्भर करता है. राज्य सरकारों के.

क्यूंकि जिस तरह कहा जाता है कि ‘जीवन लेने का अधिकार उसी को है, जो जीवन दे सकता है’ (हालांकि ये नैतिक रूप से बिलकुल ग़लत है, पर फिर भी). उसी तरह किसी मूवी को टैक्स फ्री वही सरकार कर सकती है जिसने वो टैक्स लगाया हो. तो दोस्तों, 2017 की जुलाई से पहले ‘मनोरंजन कर’ राज्य सरकारें ही लिया करती थीं. और यही वो कर था जो मूवी टिकट के ऊपर लगता था. चूंकि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग  ‘मनोरंजन कर’ था, मतलब कहीं शून्य तो कहीं 100 प्रतिशत तक. तो किसी राज्य में आपको टिकट 100 रुपए का और किसी में 200 रुपए का मिलता था.

मैरी कॉम पहली ऐसी मूवी जो रिलीज़ होने से पहले ही टैक्स फ्री हो गई थी. मर्दानी पहली ए रेटेड मूवी जो टैक्स फ्री हुई.
‘मैरी कॉम’ पहली ऐसी मूवी जो रिलीज़ होने से पहले ही टैक्स फ्री हो गई थी. ‘मर्दानी’ पहली ‘ए’ रेटेड मूवी जो टैक्स फ्री हुई.

लेकिन जैसे ही जीएसटी लगा, मनोरंजन पर लगने वाला कर पूरे भारत में 28% प्रतिशत हो गया. यानी 128 रुपए के टिकट में 100 रुपए पिक्चर हॉल को और 28 रुपए सरकार को जाने लगे.

# जीएसटी लगने के बाद सबसे पहली टैक्स फ्री मूवी थी ‘टॉयलेट: एक प्रेम कथा’. इसे यूपी सरकार ने टैक्स फ्री किया था.

बात यहीं पर खत्म नहीं हुई. मनोरंजन में जीएसटी घटा कर 18% कर दी गई. यानी अब टिकट 118 रुपए का भी हो तो भी 100 रुपए पिक्चर हॉल को मिलेंगे. और बाकी के 18% कहां जाएंगे? ऑफ़ कोर्स सरकार के पास. किस सरकार के पास? यहां पर एक और कैच है.

इस 18% में 9% केंद्र सरकार और 9% राज्य सरकार के पास जाएंगे. तो यहां पर हमारी गणित खत्म होती है और बात आती है उसी कंट्रोवर्शियल वन लाइनर पर. कि ‘जीवन लेने का अधिकार उसी को है, जो जीवन दे सकता है’. यानी, अब अगर राज्य सरकार कोई मूवी टैक्स फ्री करती है तो टिकट सिर्फ 9% तक ही सस्ता होगा. यानी आपको 118 में मिलने वाला टिकट 109 रुपए में मिला करेगा.

# किसको फायदा-

जितनी आसान इस मनोरंजन कर की गणित है, उतनी इसकी डायनेमिक्स नहीं. यानी गणित सिंपल है कि अगर कोई मूवी किसी राज्य में टैक्स फ्री हो गई है तो 118 रुपए में मिलने वाला टिकट 109 रुपए में मिला करेगा. पर ज़्यादातर मामलों में क्या होता है कि थियेटर के मालिक इस टैक्स को एब्ज़ॉर्ब कर लेते हैं. यानी वो टिकट का मूल्य बढ़ा कर इतना कर लेते हैं कि टैक्स हटने के बावज़ूद भी वो टिकट 118 का ही रहता है.

जीएसटी लागू होने के बाद 'टॉयलेट: एक प्रेम कथा' पहली मूवी थी जिसे टैक्स फ्री किया गया था.
जीएसटी लागू होने के बाद ‘टॉयलेट: एक प्रेम कथा’ पहली मूवी थी जिसे टैक्स फ्री किया गया था.

दूसरे शब्दों में कहें तो जिस टिकट में अभी तक थियेटर को 100 रुपए मिल रहे थे उसी में अब उसे 108 रुपए के करीब मिलने लगते हैं. टिकट दोनों ही स्थितियों में 118 रुपए का रहता है.

कोमल नाहटा मिड डे को बताते हैं

जब एक टैक्स फ्री मूवी अच्छा प्रदर्शन कर रही होती है तो थिएटर टिकट का मूल्य बढ़ा देता है. जिसका अर्थ है कि 118 रुपए का टिकट (जिसमें 18 रुपए की जीएसटी भी शामिल है) अब भी उसी रेट पर बिकता है. और ये प्रॉफिट अंततः थिएटर मालिकों की जेब में जाता है. निर्माताओं को खैर चलो इस बात का फायदा मिल जाता है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग फिल्म देखने जाते हैं, लेकिन दर्शकों को तो किसी फिल्म के टैक्स फ्री होने का बिल्कुल भी फायदा नहीं होता. और दर्शकों को इससे कोई ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता क्यूंकि अव्वल तो ही कम ही मूवीज़ हैं जो टैक्स फ्री होती हैं, साथ ही टिकट के मूल्य की कैपिंग को लेकर भी कोई नियम कानून नहीं है, कि टिकट इतने से ज़्यादा का नहीं होना चाहिए.

यानी किसी मूवी के टैक्स फ्री होने पर हम दर्शकों का इतना उछलना सही नहीं है. बस ये टैक्स फ्री एक तरह का सर्टिफिकेट सरीखा हो चुका है, एक एप्रिशिएशन. जैसे नेशनल अवॉर्ड होते हैं, वैसा ही कुछ. कि मूवी कोई सामजिक संदेश देती है, या मोटिवेट करती है. लेकिन जैसा कि हर सर्टिफिकेट, हर प्राइज के साथ होता है, कई बार इस सर्टिफिकेट के साथ ‘बंटी और बबली’, ‘तान्हाजी’ और ‘छपाक’ जैसे एक्सेप्शन जुड़ा जाते हैं. जोड़ दिए जाते हैं नहीं, ‘जुड़ा जाते हैं.’ क्यूंकि हो सकता है कि ये मूवीज़ रियल में भी अच्छी हों.


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