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DNA में क्या छेड़खानी करके जीता इस बार का केमिस्ट्री नोबेल?

साल 2020 के नोबेल प्राइज़ अनाउंस हो रहे हैं. 7 अक्टूबर को केमिस्ट्री के नोबेल प्राइज़ का ऐलान हुआ. ये नोबेल जीनोम एडिटिंग टेक्नोलॉजी के लिए दिया जाएगा. इस साल का केमिस्ट्री का नोबेल दो लोगों के बीच बंटेगा. ऐसा पहली बार हो रहा है कि दो महिला वैज्ञानिक नोबेल प्राइज़ शेयर करेंगी. इनके नाम हैं –

1. इमैनुएल शार्पेंटिए (फ़्रांस)
2. जेनिफ़र डॉडना (अमेरिका)

इमैनुएल और जेनिफ़र ने मिलकर एक ऐसी चीज़ खोजी, जिससे बहुत आसानी से DNA बदला जा सकता है. इस टेक्नोलॉजी का नाम है CRISPR-Cas9.

जेनेफर डॉडना और इमैनुएल शापेंटिए ने 2012 में ये खोज सबके सामने रखी. (डीएनए काटने वाली कैंची की टेक्नोलॉजी तैयार करने के लिए मिला नोबेल. (© Nobel Media))
जेनिफर डॉडना और इमैनुएल शार्पेंटिए ने 2012 में ये खोज सबके सामने रखी. (डीएनए काटने वाली कैंची की टेक्नोलॉजी तैयार करने के लिए मिला नोबेल. (© Nobel Media))

हम समझेंगे कि ये क्या चीज़ है? नोबेल जीतने वालों ने क्या किया है? और इस टेक्नोलॉजी को लेकर क्या कॉन्ट्रोवर्सी है?

CRISPR-Cas9 क्या है?

ये जीनोम एडिटिंग टेक्नोलॉजी है. जीनोम यानी हमारे अंदर का सारा का सारा DNA. हमारे अंदर मौजूद DNA से जो कुल-जमा निकलकर आएगा, उसे जीनोम कहेंगे. एडिटिंग यानी छेड़खानी करना. किसी चीज़ का स्वरूप बदलना. तो CRISPR-Cas9 से हमारा DNA बदला जा सकता है. सिर्फ हमारा ही नहीं, सभी जीवों का. क्योंकि हर जीव की बुनियाद DNA है.

DNA शरीर में इंस्ट्रक्शन मैनुअल की तरह होता है. जैसा DNA में लिखा होगा, शरीर वैसा ही बनेगा. इस इंस्ट्रक्शन मैनुअल से सबकुछ डिसाइड होता है. आंखों का रंग क्या होगा? मसल्स कितने स्ट्रॉन्ग होंगे? लंबाई कितनी होगी? सीना कितने इंच का होगा? वगैरह-वगैरह.

DNA animation.gif(क्रेडिट – विकिमीडिया)

आपने जीन सुना होगा. पैंट वाली नहीं, पैरेंट्स वाली जीन. DNA के हिस्सों को जीन कहते हैं. हमारे बहुत सारे फ़ीचर अपने मम्मी-पापा से मैच करते हैं. ऐसा जीन्स के कारण होता है. क्योंकि हमारे कई जीन मम्मी-पापा से मिलते-जुलते हैं.

मम्मी-पापा के DNA से हमारा DNA तैयार होता है. गौर कीजिए कि हमारा DNA और मम्मी-पापा का DNA एक जैसा नहीं होता. उसके कुछ हिस्से यानी जीन्स एक जैसे होते हैं.

कई बार ऐसा भी होता है कि DNA कॉपी होते वक्त गड़बड़ी हो जाती है और बच्चे को बीमारी घेर लेती है. इसी को जेनेटिक डिजीज़ कहते हैं. अगर DNA के गड़बड़ वाले हिस्से को हटा लिया जाए, उसकी जगह सही चीज़ लगा दी जाए, तो ऐसी बीमारियों को मिटाया जा सकता है. यही बदलाव करने वाली टेक्नोलॉजी है CRISPR-Cas9.

जीन एडिटिंग की टेक्नोलॉजी पहले से ही थीं. लेकिन इतनी क्रांतिकारी नहीं.
जीन एडिटिंग की टेक्नोलॉजी पहले से ही थी, लेकिन इतनी क्रांतिकारी नहीं.

बैक्टीरिया ने दिखाया रास्ता

CRISPR का पूरा नाम है – Clustered Regularly Interspaced Short Palindromic Repeats. ये नाम पल्ले नहीं पड़ा होगा. इग्नोर करते हैं. और मेन चीज़ पर आते हैं.

CRISPR टेक्नोलॉजी एक बैक्टीरिया से आई है. हमारे आसपास बहुत सारे बैक्टीरिया है और बहुत सारे वायरस भी हैं. बैक्टीरिया और वायरस आपस में बहुत लड़ते हैं. लड़ाई के दौरान वायरस अपना DNA बैक्टीरिया के अंदर डालने की कोशिश करते हैं. और बैक्टीरिया इस चीज़ का विरोध करते हैं.

ये लड़ाई करोड़ों बरसों से चली आ रही है. वायरस से बचने के लिए बैक्टीरिया ने अपने इम्यून सिस्टम तैयार कर लिए हैं. CRISPR एक तरह का इम्यून रिस्पॉन्स है, जो कुछ बैक्टीरिया में पाया जाता है. इससे होता ये है कि जब भी वायरस अपना DNA बैक्टीरिया के अंदर डालते हैं, तो CRISPR उस DNA के टुकड़े-टुकड़े कर देता है.

बैक्टीरिया में मौजूद CRISPR सिस्टम वायरस का डीएनए तोड़कर उसे याद कर लेता है. (© Johan Jarnestad/The Royal Swedish Academy of Sciences)
बैक्टीरिया में मौजूद CRISPR सिस्टम वायरस का डीएनए तोड़कर उसे याद कर लेता है. (विकिमीडिया)

इस खेल का हिस्सा एक स्पेशल प्रोटीन भी होता है, जिसका नाम है Cas9. ये सुपारी किलर टाइप का आदमी है. इसे एक बार किसी DNA के हिस्से की फोटो दिखा दो, तो ये उसे काट के रख देता है. Cas9 को जेनेटिक सिज़र भी कहा जाता है. यानी DNA काटने वाली कैंची.

ये सिस्टम बैक्टीरिया का बनाया हुआ था. लेकिन हमने इसे अपने लिए इस्तेमाल कर लिया. इसी कैंची की मदद से DNA के अनचाहे हिस्से को काटकर, मनचाहा हिस्सा लगाया जा सकता है. ये हमारे लिए एक बेहतरीन जीनोम एडिटिंग टेक्नोलॉजी साबित हुई.

जीनोम एडिटिंग इससे पहले से भी हो रही थीं. लेकिन CRISPR-Cas9 ने जीनोम एडिटिंग को तेज़, सस्ता और बेहद सटीक बना दिया.

इसकी खोज की कहानी बहुत इंट्रेस्टिंग है.

इमैनुएल और जेनिफ़र का साथ

इमैनुएल और जेनिफर अलग-अलग जगहों से आती हैं. काम भी अलग-अलग कर रही थीं. लेकिन इन्होंने मिलकर इस CRISPR टेक्नोलॉजी खोजी.

इमैनुएल एक बैक्टीरिया पर काम कर रही थीं. बैक्टीरिया का नाम Streptococcus Pyogenes. ये बैक्टीरिया हर साल 70 करोड़ लोगों में स्किन इन्फेक्शन की वजह है. इमैनुएल ने इस बैक्टीरिया में एक कमाल की चीज़ खोज़ी. tracrRNA. और ये साबित किया कि ये RNA उस बैक्टीरिया के CRISPR-Cas का अहम हिस्सा था. इन्होंने अपनी ये खोज 2011 में पब्लिश की.

2011 में ही इमैनुएल की मुलाक़ात जेनिफ़र से हुई. जेनिफ़र डॉडना बहुत ही अनुभवी बायोलॉजिस्ट हैं. और RNA के बारे में बहुत कुछ जानती थीं. दोनों ने एक साथ काम करना शुरू किया. दोनों की टीम ने समंदर पार से तालमेल बिठाया और एक साल के अंदर कमाल कर दिया.

जेनिफर और इमैनुएल कैमिस्ट्री में नोबेल पाने वाली सातवीं और आठवीं महिला हैं.
जेनिफर और इमैनुएल केमिस्ट्री में नोबेल पाने वाली सातवीं और आठवीं महिला हैं.

2012 में इमैनुएल और जेनिफ़र दुनिया के सामने CRISPR-Cas9 लेकर आईं. वैज्ञानिकों ने इसे आज़माना शुरू किया और इसका कई जगह इस्तेमाल देखा जाने लगा. खेती-किसानी में ऐसी फसलें बनाई जाने लगीं, जो हर कठिन स्थिति में टिकी रहतीं. कैंसर के उपचार के लिए नई थैरेपी निकलने लगीं. और जेनेटिक बीमारियों को दुरुस्त करने का सपना देखा जाने लगा.

इस जेनेटिक कैंची ने जीव विज्ञान को एक नई ऊंचाई दी है. लेकिन इसकी नैतिकता को लेकर प्रश्न भी हैं.

दिक्कत क्या है?

इस टेक्नोलॉजी को लेकर बवाल कट गया, जब चीन का एक मामला सामने आया. 2018 में एक चाइनीज़ रिसर्चर ने एक मानव भ्रूण के जीन्स में कुछ बदलाव किए. इसका नतीजा ये निकला कि जुड़वा बच्चे पैदा हुए. ये पहली बार था जब CRISPR के ज़रिए इंसानी बच्चों की तकदीर बदली गई हो. इन्हें ‘डिज़ाइन बेबीज़’ के नाम से जाना गया.

चिंता ये है कि जीन्स में बदलाव करके लोग मनचाहे बच्चे पैदा करने लगेंगे. किसी को लंबे बच्चे चाहिए होंगे. किसी को गोरे. किसी को ताकतवर. तो किसी को होशियार. किसी बच्चे के पैदा होने से पहले उसके प्राकृतिक स्वरूप के साथ छेड़खानी करना कितना सही होगा?


विडियो – इन वैज्ञानिकों को ब्लैक होल में क्या दिखा कि फिज़िक्स का नोबेल प्राइज़ मिल गया?

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