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जब यूपी में ‘सबको बैटिंग देने’ के चक्कर में तगड़ी सियासी उठापटक मच गई थी!

छत्तीसगढ़ में इन दिनों राजनीतिक उठापटक मची हुई है. कहा जा रहा है कि कांग्रेस के भूपेश बघेल, जो पिछले ढाई साल से राज्य में मुख्यमंत्री हैं, अब पद से हटेंगे. पूरा कयास ये है कि भूपेश बघेल हटेंगे और अगले ढाई साल के लिए टीएस सिंहदेव CM बनेंगे. वे अभी छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री हैं. दोनों के बीच तनातनी चल रही है, जिसे लेकर दिल्ली में कांग्रेस आलाकमान दोनों नेताओं से बैठकें कर रहा है. इस सबके चलते अगर वाकई में भूपेश बघेल का इस्तीफा हुआ तो छत्तीसगढ़ में पहले ढाई साल एक मुख्यमंत्री, और अगले ढाई साल दूसरा मुख्यमंत्री देखने को मिल सकता है.

वैसे देश के एक बड़े सूबे में ऐसा पहले हो चुका है. वही राज्य, जहां के राजनीतिक प्रयोग देश भर की सियासत में मशहूर रहे हैं. उत्तर प्रदेश.

93 के चुनाव में आया था फॉर्म्युला

1993 के चुनाव में बीजेपी सरकार बनाने लायक सीटें नहीं ला पाई. ऐसे में सपा-बसपा ने मिलकर सरकार बना ली. 1996 में फिर से चुनाव हुए. सपा और बसपा अलग थे. अलग क्यों थे, क्योंकि गेस्ट हाउस कांड हो चुका था. जब चुनावी नतीजा आया तो बीजेपी 173 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी. लेकिन सरकार नहीं बनी. फिर लगा राष्ट्रपति शासन. हटा तो मायावती मुख्यमंत्री बन गई थीं, बीजेपी के सहयोग से. समझौता हुआ था कि छह महीने बसपा और छह महीने भाजपा का मुख्यमंत्री होगा. मायावती के छह महीने पूरे हुए तो कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने. तारीख थी 21 सितंबर, 1997. लेकिन एक महीना भी नहीं बीता कि मायावती ने समर्थन वापस ले लिया. तारीख थी 19 अक्टूबर, 1997.

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1997 की बात है, जब मायावती ने कुर्सी छोड़ने से मना कर दिया था. (फोटो- India Today Archive)

90 मंत्री बनाकर बची सरकार

मायावती के समर्थन वापस लेने के बाद कल्याण सिंह का जाना तय माना जा रहा था. इस बीच कुछ पार्टियों में तोड़फोड़ हुई. राज्यपाल रोमेश भंडारी बीजेपी के थे. उन्होंने कल्याण सिंह को दो दिन के अंदर बहुमत साबित करने को कहा. 21 अक्टूबर को कल्याण सिंह ने बहुमत साबित कर दिया. हालांकि इसके बदले उन्हें 90 से ज्यादा मंत्री बनाने पड़े जो अब तक सबसे बड़ा मंत्रिमंडल माना जाता है.

महाराष्ट्र में भी उठी थी मांग

महाराष्ट्र में 2019 के विधानसभा चुनाव से पहले ये बात सामने आने लगी थी कि भाजपा-शिवसेना गठबंधन टूट सकता है. ऐसे में महाराष्ट्र के नेता और केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने वहां भी ढाई-ढाई साल के CM वाली थ्योरी दी थी. कहा था कि वे चाहते हैं कि भाजपा और शिवसेना ढाई-ढाई साल के लिए अपना-अपना CM बनाने की बात पर रज़ामंद हो जाएं और गठबंधन बना रहे. अठावले ने तो ये भी कहा था कि वे खुद दोनों पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व से बात करके उन्हें मनाएंगे. मगर ये हो न सका.

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एक बार को लगा था कि 2018 के महाराष्ट्र चुनाव में शिवसेना और भाजपा भी CM पद के मामले में 50-50 के फॉर्म्युले पर विचार करेंगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. (फाइल फोटो- PTI)

अब छग में दाऊ बनाम बाबा

अब ये ‘ढइया’ आई है छत्तीसगढ़ में. 2018 में राज्य में जब कांग्रेस की सरकार बनी तो मुख्यमंत्री पद के लिए दो नाम बड़े दावेदार के तौर पर उभरे थे. भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव. दिल्ली में बैठे आलाकमान ने टीएस सिंहदेव को ‘भरोसे’ में लेते हुए भूपेश बघेल पर ‘भरोसा’ जताया. लेकिन न जाने कहां से ये हवा उड़ गई कि साब ये तो ढाई साल के लिए सीएम हैं और बाद के ढाई साल टीएस सिंहदेव मुख्यमंत्री होंगे. अब ढाई साल हो गए हैं और छग (छत्तीसगढ़) के विधायकों का और मुख्यमंत्री का दिल्ली दर्शन को निकलना ये बात साबित कर रहा है कि बिना चिंगारी के धुंआ नहीं निकला था.

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दिल्ली में सोनिया गांधी से मुलाकात के बाद निकलते भूपेश बघेल (सफेद कुर्ते-पायजामे में), पीएल पुनिया (उनके बगल में सदरी पहने) और टीएस सिंहदेव (पीछे लंबे कद के). (फोटो- India Today)

सियासी अटकलों के बीच 27 अगस्त को भूपेश बघेल दिल्ली पहुंचे. वे यहां राहुल गांधी से मिले हैं. कहा जा रहा है कि उनके साथ 30 से अधिक मंत्री, विधायक दिल्ली पहुंचे थे. इसे आलाकमान के सामने ‘दाऊ’ का एक तरह का शक्ति प्रदर्शन भी कहा जा रहा है. बघेल अपने समर्थकों के बीच दाऊ नाम से जाने जाते हैं.

लेकिन शक्ति प्रदर्शन तो ‘बाबा’ यानी टीएस सिंहदेव भी कर सकते हैं. फिलहाल तो उन्होंने विवाद से बचते हुए कह दिया है कि –

“कप्तान बनना कौन नहीं चाहते? सभी चाहते होंगे. लेकिन बात चाहने न चाहने की नहीं है. बात ये है कि कौन सक्षम है.”

अब बाबा शक्ति प्रदर्शन करेंगे या नहीं, ये तो आने वाले दिन बताएंगे. वैसे 3 दिन पहले राहुल गांधी से हुई बैठक के बाद सिंहदेव ने कहा था कि मुख्यमंत्री पद को लेकर उनकी कांग्रेस नेतृत्व से कोई बात नहीं हुई. वहीं, शुक्रवार 27 अगस्त को राहुल के साथ 3 घंटे से भी ज्यादा देर तक बैठक करने के बाद भूपेश बघेल भी कुछ स्पष्ट नहीं बोले और विधायकों से मिलने चले गए.

बहरहाल, आने वाले दिन ही बताएंगे कि पंजाब, राजस्थान की तरह कांग्रेस एक और राज्य में अपनी सरकार को लेकर संकट झेलती है या कंडीशन अंडर कंट्रोल कर पाती है. तब तक छत्तीसगढ़ में ढाई साल के CM वाली कयासबाजियां जारी रहेंगी.


उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का निधन

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