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विजाग स्टील प्लांट के निजी हाथों में जाने पर नौकरियां ही नहीं, भावनाएं भी दांव पर लगी हैं

विशाखापट्टनम. चर्चित नाम से कहें तो विज़ाग और तेलुगु में उक्कुनगरम अर्थात् स्टील सिटी. आंध्र प्रदेश का एक बड़ा औद्योगिक पोर्ट सिटी जो बंगाल की खाड़ी पर बसा है. यहां है भारत का इकलौता पोर्ट शहर पर बसा सरकारी विज़ाग स्टील प्लांट (Vizag Steel Plant). कुल 35000 कर्मचारियों वाले इस प्लांट को भारत सरकार ने पूरी तरह से प्राइवेट हाथों में सौंपने का फ़ैसला लिया है. इसके ख़िलाफ़ 173 दिनों से विरोध प्रदर्शन चल रहा है जो अब दिल्ली पहुंच चुका है. विरोध में ना सिर्फ़ यहां के कर्मचारी, बल्कि विशाखापट्टनम के आम लोग भी शामिल हैं.

प्लांट के प्राइवेट सेक्टर के हाथ में जाने की बात से कर्मचारियों को आजीविका का डर सता रहा है. उनका आरोप है कि 2 लाख करोड़ की सम्पत्ति वाले प्लांट को केंद्र सरकार महज़ 32 हज़ार करोड़ में बेच रही है. उधर, संसद में केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री भागवत किशन राव ने मंगलवार 3 अगस्त को ये साफ़ कह दिया कि सरकार इस फ़ैसले पर किसी भी तरह का पुनर्विचार करने के लिए तैयार नहीं है. आइए इस पूरे मसले को विस्तार से समझते हैं.

Vizag Steel Plant Protest
विज़ाग स्टील प्लांट के कर्मचारियों का भारत सरकार के निजीकरण के फ़ैसला के ख़िलाफ़ 173 दिनों से आंदोलन चल रहा है. जो अब दिल्ली पहुंच चुका है. दिल्ली के जंतर मंत्र की तस्वीर.

इतिहास

राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड या विज़ाग स्टील प्लांट भारत सरकार की 14 नवरत्न कंपनियों में से एक है. ये स्टील मंत्रालय के अधीन आता है. इसकी बनने की शुरुआत 1970 के दशक में हुई थी. हालांकि, इसके पहले का इतिहास भी जानना बेहद ज़रूरी है.

1966 की बात है. तत्कालीन इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार ने एंग्लो-अमेरिकन कंसोर्टियम नाम की एक विदेशी कंपनी को ज़िम्मेदारी सौंपी कि वो दक्षिण भारत में स्टील प्लांट बनाने की जगह को लेकर सुझाव दे. सुझाव में विज़ाग का नाम आया. इसके सबसे बड़े कारणों में से एक था इस इलाके का समुद्र के तट पर बसा होना. लेकिन सिफारिश के बावजूद इंदिरा सरकार ने विज़ाग में स्टील प्लांट नहीं लगाने का फैसला किया.

सरकार के इस कदम को तेलुगु लोगों ने अपमान समझा. स्वतंत्रता सेनानियों टी. अमृता राव और टेनेटी विश्वनाथम के नेतृत्व में हजारों छात्रों, अलग-अलग पार्टियों के कार्यकर्ताओं और आम लोगों ने आंदोलन शुरू किया, जिसने पूरे राज्य को हिलाकर रख दिया. विरोध प्रदर्शन तब हिंसक हो गया जब पुलिस ने प्रदर्शन कारियों पर फ़ायरिंग कर दी. 12 निहत्थे लोग मारे गए, जिसमें नाबालिग भी शामिल थे. विज़ाग में स्टील प्लांट की मांग के समर्थन में तत्कालीन अविभाजित आंध्र प्रदेश के 66 विधायकों और सात सांसदों ने इस्तीफा भी दे दिया. आख़िरकार 1970 में इंदिरा गांधी ने विशाखापट्टनम में स्टील प्लांट के स्थापना की घोषणा की और इसी तरह भारत का पहला तटीय स्टील प्लांट बना.

इस पूरे आंदोलन में कुल मिलाकर, 32 लोगों ने अपनी जान गवाई. 64 गांवों को खाली किया गया और इस विशालकाय स्टील प्लांट के निर्माण के लिए 22,000 एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण किया गया. आज भी आंदोलन में जान गवांने वाले लोगों और उनके नेताओं को शहीदों के रूप में याद किया जाता है. उन्हें सार्वजनिक रूप से श्रद्धांजलि दी जाती है. ये जो संघर्ष का इतिहास रहा है, इस वजह से विज़ाग स्टील प्लांट का निजीकरण तेलुगु लोगों के लिए एक भावनात्मक मुद्दा बन गया है.

सरकार निजीकरण के क्या तर्क दे रही है?

विज़ाग स्टील प्लांट भारत का इकलौता ऐसा स्टील प्लांट है जिसके पास अपनी एक भी खदान (कैप्टिव माइन) नहीं है. प्राइवेट स्टील प्लांट के पास अपनी कैप्टिव खदान हैं. इस वजह से विज़ाग स्टील प्लांट को लोह अयस्क बाज़ार के भाव पर ख़रीदना पड़ता है. उदाहरण के लिए, कैप्टिव खदानों वाली कंपनियां लौह अयस्क पर 1,500 रुपये प्रति टन खर्च करती हैं, जबकि विज़ाग स्टील प्लांट एक टन के लिए 7,000 रुपये खर्च करती है. इस कारण कैप्टिव खदानों वाली टाटा स्टील या सेल (SAIL) की जहां अपने कच्चे माल पर कुल लागत (क्रमशः) 48 प्रतिशत और 35 प्रतिशत है, वहीं विज़ाग स्टील प्लांट के लिए ये 65 प्रतिशत है.

Vizag Steel Plant Protest 1
विज़ाग स्टील प्लांट के कर्मचारियों दिल्ली के जंतर मंत्र में विरोध प्रदर्शन की तस्वीर.

विज़ाग स्टील प्लांट को बिना कैप्टिव खानों के संचालित करने की वजह से राज्य की स्थानीय राजनीतिक पार्टियां इसे केंद्र सरकार के एक षड्यंत्र की तरह देखती हैं. उनके मुताबिक़ विज़ाग स्टील प्लांट को घाटे में रखने के लिए मजबूर किया जा रहा है. घाटे को वजह बताकर भारत सरकार की कैबिनेट कमिटी ऑफ़ इकनॉमिक अफ़ेयर्स ने 27 जनवरी, 2021 को प्लांट के 100 प्रतिशत निजीकरण का फ़ैसला किया.

इसके बाद विज़ाग स्टील प्लांट के कर्मचारियों, आम नागरिकों, राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ताओं ने मिलकर विशाखा उक्कु परिरक्षणा पोराटा कमिटी नाम की एक संस्था बनाई. ये एसोसिएशन सरकार के फ़ैसले के ख़िलाफ़ आंदोलन को मज़बूत करने के लिए बनाई गई थी. इसके चेयरमैन नरसिंघा राव के मुताबिक़,

2011-12 तक विज़ाग  स्टील प्लांट पूरी तरह कर्ज मुक्त था. लेकिन इसके विस्तार की योजना के लिए भारत सरकार ने अनुदान देने से इन्कार कर दिया. इस वजह से विज़ाग स्टील प्लांट को 10 साल के लिए 22,500 करोड़ रुपये का लोन लेने पर मजबूर होना पड़ा.

नरसिंघा राव ये भी बताते हैं कि इसके बावजूद विज़ाग स्टील प्लांट ऑपरेशनल कॉस्ट निकाल लेता है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, वित्तीय वर्ष 2020-21 में विज़ाग  स्टील प्लांट ने 18 हजार करोड़ रुपए कमाए थे.

भारत सरकार ने विज़ाग स्टील प्लांट में विनिवेश करने के लिए इसकी कुल सम्पत्ति का आंकलन किया. सरकारी आंकलन के मुताबिक़ विज़ाग स्टील प्लांट की कुल सम्पत्ति 32 हजार करोड़ रुपए हैं. लेकिन नरसिंघा राव केंद्र पर धोखाधड़ी का आरोप लगाते हैं. उनके मुताबिक़, सरकार के आंकड़े में 22 हजार एकड़ ज़मीन की कीमत सिर्फ़ 47 करोड़ रुपए दिखाई गई है. वो कहते हैं,

1970 में 22,000 एकड़ ज़मीन के लिए सरकार ने किसानों को 47 करोड़ रुपए दिए थे. क्या 1970 से 2021 में ज़मीन के दामों में कोई इज़ाफ़ा नहीं हुआ? सरकार लोगों को लूट रही है.

35000 कर्मचारियों पर गिरेगी गाज

संसद में केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री भागवत किशन राव ने मंगलवार 3 अगस्त को ये साफ़ कह दिया कि निजीकरण के बाद काम कर रहे कर्मचारियों की ज़िम्मेदारी सरकार की नहीं है. उधर, कर्मचारी सरकार के निजीकरण के फ़ैसले के ख़िलाफ़ 173 दिनों से आंदोलन कर रहे. वे पिछले 3 दिनों से दिल्ली के जंतर-मंतर पर भी प्रदर्शन कर रहे हैं.

1987 से विज़ाग स्टील प्लांट में काम करने वाले यू रामस्वामी बताते हैं,

प्लांट में कुल 18 हजार पक्के कर्मचारी हैं और 17000 ठेके पर रखे गए कर्मचारी हैं. हम सबकी नौकरी चली जाएगी. हम सड़क पर आ जाएंगे.

रामस्वामी आगे काफ़ी आशा के साथ कहते हैं कि वो इस लड़ाई में अकेले नहीं हैं. ग़ौरतलब है कि आंध्र प्रदेश विधानसभा ने स्टील प्लांट के निजीकरण के ख़िलाफ़ रेजोल्यूशन पारित किया है.

Vizag Steel Protest 3
विज़ाग स्टील प्लांट के कर्मचारियों दिल्ली के जंतर मंत्र में विरोध प्रदर्शन की तस्वीर.

शहर के लोग भी कर रहे हैं विरोध

वहीं, शहर के नागरिकों का कहना है कि इससे विशाखापट्टनम की अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी. स्थानीय निवासी एआरकेवी मूर्ति बताते हैं,

शहर में स्टील प्लांट की वज़ह से कई दूसरे उद्योग चलते हैं. अगर हम जैसे आम लोगों की बात करें, जो स्टील प्लांट में काम नहीं करते, उनके लिए भी प्लांट बहुत ज़रूरी है. विशाखापट्टनम की अर्थव्यवस्था इस पर टिकी है. हमने अपने शहर को बनते देखा है. क्या खुद इसे तबाह होते देख विरोध भी ना करें?

निजीकरण नहीं तो क्या है रास्ता?

नरसिंघा राव के मुताबिक़ इसका हाल काफ़ी सहज है. वो कहते हैं,

सिर्फ़ कैप्टिव खदान अलॉट करने की ज़रूरत होगी. खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 के सेक्शन 17 के तहत सरकार अलॉट कर सकती है.

हालांकि, सरकार इसको विकल्प के तौर पर नहीं देखती. मंत्री द्वारा संसद में दिए भाषण में सरकार ने अपना रवैया साफ़ कर दिया है कि वो टस से मस नहीं होने वाली.


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