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कोरोना से लड़ाई में कहां फेल हुई राज्यों की व्यवस्था?

कोरोना की दूसरी लहर ने सभी सिस्टमों को तोड़ दिया, सभी व्यवस्थाओं को ध्वस्त कर दिया और ऐसी स्थिति में जब लोग एंबुलेंस, अस्पताल के बेड्स, ऑक्सीजन सिलेंडरों और दवाइयों के लिए तड़प रहे हैं, जरूरत है एक वॉर रूम की, या यूं कहें कि वेबसाइट और ऐप की, जहां लोगों को जानकारी और मदद मिल सके. ऐसा नहीं है कि सरकारों ने कोशिशें नहीं की हैं, लेकिन क्या इन कोशिशों का फायदा आम जनता तक पहुंच पाया है? और यदि पहुंचा भी है तो कितना?

इंडिया टुडे में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक कोविड की इस दूसरी लहर में अराजकता की स्थिति बन गई है. रोगियों ने अस्पतालों को घेर सा लिया है. राज्यों के कोविड कॉल सेंटरों में लगातार फोन आ रहे हैं.

दिल्ली सरकार ने 4 मई को एक हेल्पलाइन स्थापित की, ताकि लोगों को मदद मिल सके. हाईकोर्ट की बेंच ने सरकार को सुझाव दिया था कि एक मोबाइल ऐप विकसित किया जाए जिसमें लोग विवरण अपलोड कर सकें और डॉक्टरों का एक समूह उन्हें परामर्श दे सके.

रियल टाइम मैनेजमेंट की जरूरत

इस रिपोर्ट में बताया गया है कि ना तो राज्य सरकारों ने और ना ही केंद्र ने महामारी की दो लहरों के बीच के समय का इस्तेमाल, राष्ट्रव्यापी आपदा प्रबंधन प्रणाली को स्थापित करने के लिए किया जो अस्पतालों में पहुंच रही भीड़ का मैनेजमेंट कर सके या डॉक्टरों के एक ऐसे पूल का निर्माण कर सके जो दूर से मरीजों की निगरानी करें.

अगर हर राज्य में एक रियल टाइम कोरोना मैनेजमेंट सिस्टम हो, जो केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से जुड़ा हुआ हो तो सोचिए कि लोगों को कितना फायदा हो सकता है. हालांकि इससे ना तो ऑक्सीजन की समस्या हल होगी और ना ही बेड्स की, लेकिन हेराफेरी रुकेगी और कालाबाजारी भी.

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मुरादाबाद में बने एक ऐसे ही कोविड कंट्रोल रूम का निरीक्षण करते मुख्यमंत्री. फोटो- PTI

अप्रैल की शुरूआत में ऑक्सीजन ट्रकों में GPS लगाए गए. इनकी निगरानी के लिए 24×7 नियंत्रण कक्ष स्थापित किए गए. 28 अप्रैल को यूपी सरकार ने एक ऐसी तकनीक की मदद ली जिससे वह अपने कोटे के ऑक्सीजन को ट्रैक करता है. हर जिले में वॉर रूम्स की स्थापना की गई है, ताकि लोगों की आवश्यकता को पूरा किया जा सके, लेकिन जनता में जागरुकता की कमी है और इन सेटअप्स से अपर्याप्त सूचनाएं मिल रही हैं. पंजाब में भी एक ऐसी व्यवस्था बनाई गई है जिससे लोगों को दवाइयां, खाना और सलाह घर पर ही मिले. कर्नाटक में जो वॉर रूम है वह सरकारी और निजी अस्पतालों में ऑक्सीजन और दवाओं की आपूर्ति पर निगाह रख रहा है.

BMC ने भी ऐसे कॉल सेंटर बनाएं हैं जो लोगों की मदद करते हैं. रिपोर्ट बताती है कि भारतीय आईटी फर्मों ने डिजिटल के क्षेत्र में कई बड़े काम किए हैं. पूरे देश के पासपोर्ट सिस्टम को संभाला है, बैंकिंग सिस्टम में सुधार किए हैं, और भी काफी कुछ. यानी ऐसे सॉफ्टवेयर बनाए जा सकते हैं जहां लोगों को ना केवल घर पर ही वीडियो या ऑडियो कॉल के जरिए मुफ्त में सलाह मिल जाए, बल्कि दवाइयां और खाना भी मिल सके. इसके अलावा जरूरत पड़ने पर ऐप के जरिए एंबुलेंस और अस्पतालों में बेड्स की स्थिति का पता चल सके. जैसे ओला ऊबर में रियल टाइम पोजीशन दिखती है वैसे ही हो सके. ताकि लोगों को सहूलियत हो.

सरकार और सिस्टम कैसे हुए फेल?

पिछले साल जब केंद्र ने लॉकडाउन की घोषणा की थी तब देश में कोविड मामलों की संख्या 618 थी लेकिन एक साल के बाद जब देश में 30 लाख सक्रिय केस थे तब देश 1 अप्रैल से शुरू होने वाले कुंभ मेले की तैयारी कर रहा था. देश भर के विशेषज्ञों ने इस आयोजन को लेकर चेतावनी दी थी लेकिन उत्तराखंड सरकार ने इस पर गौर नहीं किया. रोजाना मामले 2 लाख तक पहुंच गए तब भी केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और राज्य सरकार ने कुंभ को रोकने की इच्छा नहीं दिखाई.

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सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखने की चिंता जैसे हर ओर से खत्म हो चुकी थी. फोटो- PTI

17वें दिन पीएम मोदी ने प्रतीकात्मक रूप से कुंभ में भाग लेने का अनुरोध किया. केंद्रीय स्वास्थ्यमंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने 11 राज्यों के स्वास्थ्यमंत्रियों के साथ एक बैठक में कोरोना के बढते केसों के लिए जनता को जिम्मेदार ठहराया. लेकिन वह भूल गए कि उनकी ही सरकार ने ऐसे आयोजनों को होने दिया. इंडिया टुडे की रिपोर्ट कहती है कि केंद्रीय गृहमंत्रालय ऐसे आयोजनों को रोकने के लिए आपदा प्रबंधन अधिनियम को लागू कर सकता था लेकिन उसने भी नजरें फेर लीं.

पांच राज्यों में चुनाव हुए, रैलियां हुईं, हजारों लोग इकट्ठे हुए लेकिन चुनाव आयोग मूकदर्शक बना रहा. केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह भी इन रैलियों में हिस्सा लेते रहे. कोलकाता हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद चुनाव आयोग की नींद टूटी लेकिन इस वक्त तक कोविड पॉजिटिविटी रेट 2 प्रतिशत से 22 प्रतिशत पर पहुंच गया था. पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई कुरैशी ने कहा कि चुनाव आयोग कोविड संबंधी दिशानिर्देशों का पालन कराने में विफल रहा. 26 अप्रैल को मद्रास हाईकोर्ट ने भी कोरोना के प्रसार के लिए चुनाव आयोग को जिम्मेदार बताया.


वीडियो- क्या 5G नेटवर्क की टेस्टिंग से कोरोना ज्यादा फैल रहा है और लोग मर रहे हैं?

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