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फ्री वैक्सीन के बाद पीएम मोदी ये 6 ऐलान भी करेंगे?

हमने ये खूब देखा है कि बहुत ज़रूरी लगने वाली चीज़ें भी तब तक नहीं होतीं जब तक कोई बहुत बड़ी आपदा न आ जाए. चीन से युद्ध हुआ तो हमें समझ आया कि देश को एक मज़बूत सेना की ज़रूरत है. और उस सेना में सुधार की ज़रूरत है, ये हमें समझ आया जब हमारा छुटभैया पड़ोसी कारगिल की चोटियों पर आकर बैठ गया. आज भी हमारा देश युद्ध लड़ रहा है. एक वायरस के खिलाफ. 1962 और कारगिल की ही तरह इस लड़ाई ने भी हमें बताया कि हमारी फौज – माने देश के हेल्थ सिस्टम में क्या खामियां हैं. तो आपदा में अवसर तलाश लेने की गौरवशाली परंपरा के तहत दी लल्लनटॉप का सुझाव है कि कोरोना महामारी को एक मौका मानकर देश के हेल्थ सेक्टर में व्यापक सुधार किए जाएं. ताकि अगली बार हम बेहतर तैयारी के साथ किसी महामारी से लड़ सकें. भारत की स्वास्थ्य सेवाओं को एक दिन में या एक प्रयास में सुधारा नहीं जा सकता. लेकिन कुछ बिंदू हैं जिनपर गौर किया जा सकता है.

1. पहला बिंदु है- सही डेटा का अभाव

हम कभी नहीं जान पाएंगे कि भारत में कोरोना कितने लोगों में फैला. ठीक ठीक कभी मालूम नहीं चल पाएगा कि कितने लोगों की मौत कोरोना से हुई. नदी में बहती लाशें देखीं, शमशानों में शवों की कतारें देखी, लेकिन इनके मुकाबले मौतों का सरकारी आंकड़ा छोटा था. उस आंकड़े पर लगातार सवाल उठे. एक्सपर्ट्स कहते रहे कि आंकड़े में पारदर्शिता महामारी पर नियंत्रण में मदद करती है. लेकिन हमारी सरकार ने इस तरफ ज़्यादा गंभीरता नहीं दिखाई. आंकड़ों में हेरफेर के आरोप लगते रहे. अगर हमारी सरकार ने सही आंकड़े जुटाए होते और उनके हिसाब से तैयारी की होती तो शायद कोरोना की दूसरी लहर में इतनी तबाही ना होती. और बात सिर्फ कोरोना तक ही सीमित नहीं है. स्वास्थ्य संबंधी डेटा जुटाने में मेहनत करना हमारे सरकारी सिस्टम की आदत में नहीं है. हमारे देश में हर साल कितने लोग किस बीमारी से मरते हैं, इसका ठीक ठीक डेटा तैयार नहीं किया जाता है. आंकड़ें जुटाने वाले सिस्टम पर कभी ध्यान नहीं गया, या सरकार ने जानबूझकर ध्यान देने की ज़रूरत नहीं समझी. सही डेटा पर ही सारी तैयारियों की बुनियाद रखी जाती है. सरकार को किस बीमारी से निपटने के लिए कितनी तैयारी करनी है, कितना खर्च करना है, ये तभी ठीक से प्लान हो पाएगा जब इसके आंकड़े सही हो. और अगर सरकार से सही आंकड़ें मिले तो ही उस पर सही रिसर्च हो पाएगी.

हम उस दौर में हैं जहां डेटा की कीमत करोड़ों में होती है. आपका निजी डेटा खरीदने के लिए कंपनियां पैसा खर्च करती हैं. आप मोबाइल पर क्या देखते हैं, क्या खरीदते हैं, कहां पैसा खर्च करते हैं, ऐसे तमाम डेटा स्टोर हो रहे हैं. तकनीक के इस दौर में ये बहुत आराम से सहेजा जा रहा है. तो फिर सरकार अपने नागरिकों के स्वास्थ्य से संबंधित सही डेटा क्यों नहीं तैयार कर सकती है. उम्मीद है इस कमी को भी पीएम मोदी दुरुस्त करेंगे.

2. खराब हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर – देहात और शहर का फर्क

कोरोना महामारी के दौरान लल्लनटॉप की कई टीमें स्वास्थ्य सुविधाओं का हाल देखने ग्राउंड पर गई. गांवों में अस्पतालों के जो हाल हैं वो कोरोना तो क्या किसी भी बीमारी से लड़ने के पर्याप्त नहीं है. प्राइमरी हेल्थ सेंटर्स में ताले दिखते हैं. सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर्स का अभाव है. और हम आईसीयू बेड्स वाले अस्पतालों की बात नहीं कर रहे. बिल्कुल बेसिक इलाज वाले, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की सुविधा भी लोगों को नहीं मिल रही है. देश की करीब 70 फीसदी आबादी गांवों में रहती है. लेकिन स्वास्थ्य सुविधाओं के लिहाज से शहरों में स्थिति बेहतर है. बड़े या अच्छे अस्पताल कुछ ही बड़े शहरों में सीमित हैं. जैसे एमपी का उदाहरण लीजिए. एक रिपोर्ट के मुताबिक एमपी में सिर्फ 4 शहरों में राज्य की दो तिहाई स्वास्थ्य सुविधाएं हैं. गांवों में अस्पताल तो कम हैं ही, जो हैं वहां भी डॉक्टर्स ड्यूटी नहीं करना चाहते. स्वास्थ्य सुविधाओं के लिहाज से गांवों और शहरों वाला ये डिवाइड पूरे देश में ही दिखता है.

3. अब आते हैं डॉक्टर्स की कमी पर.

देश में कितने डॉक्टर्स हैं, इसके बारे में फरवरी 2020 में सरकार ने लोकसभा में जानकारी दी थी. अपने जवाब में सरकार ने सितंबर 2019 तक के आंकड़े बताए. सरकार ने बताया था कि देश में 12 लाख 1 हज़ार 354 एलोपैथिक डॉक्टर्स हैं. अगर इनमें से 80 फीसदी की उपलब्धता मानें तो देश में एक वक्त में 9 लाख 61 हज़ार डॉक्टर्स सेवा दे रहे होते हैं. और देश की आबादी 135 करोड़ मान लें तो 1404 लोगों पर एक एलोपैथिक डॉक्टर है. जबकि वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेसन के पैमानों के हिसाब से एक हज़ार लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए. यानी देश में डॉक्टर्स की कमी तो है. इसमें राज्यों की स्थिति भी अलग अलग है. दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में स्थित बेहतर है तो यूपी बिहार में डॉक्टर्स की भारी कमी है. छोटे से राज्य केरल में 60 हज़ार डॉक्टर्स हैं, लेकिन बिहार में सिर्फ 44 हज़ार डॉक्टर्स है. एक्सपर्ट डॉक्टर्स की तो और भी कमी है. हाल में स्वास्थ्य मंत्रालय ने गांव में स्वास्थ्य सुविधाओं की रिपोर्ट जारी की थी. इसके मुताबिक देश के ग्रामीण इलाकों में कुल 5, 183 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं. और इनमें स्पेशियलिस्ट डॉक्टर्स की 76 फीसदी कमी है. पूरे देश में ग्रामीण इलाकों में अगर 100 महिला रोग विशेषज्ञों की ज़रूरत है तो 30 ही उपलब्ध हैं, 70 फीसदी सीटें खाली हैं.

4. अब बात आती है प्राइवेट हेल्थ सेक्टर.

देश के पूरे हेल्थ सिस्टम का 70 फीसदी हिस्सा प्राइवेट सेक्टर का है. प्राइवेट अस्पतालों में बेहतर हेल्थ केयर मिलता है, लेकिन इसके साथ ही मोटी फीस और ज़्यादा मुनाफे की बात भी आती है. हमने कोरोना के दौर में देखा कि मरीज़ों को लाखों के बिल थमा दिए गए. सरकार को इलाज की दर तय करनी पड़ी, कोरोना जांच की रेट पर कैप लगाना पड़ा. तो एक तरफ निजी अस्पतालों की मुनाफाखोरी है तो दूसरी तरफ सरकार भी अब लोगों को निजी अस्पतालों के हवाले कर रही है. गंभीर बीमारियों के इलाज में सरकार हेल्थ फैसिलिटी प्रोवाइडर वाली भूमिका से पीछे हट रही है. आयुष्मान भारत जैसे योजना में सरकार कह रही है कि आज चाहे तो प्राइवेट में इलाज करवा लीजिए, पैसे हम देंगे. यानी सरकार बेहतर अस्पतालों पर ज़्यादा ज़ोर देने के बजाय इलाज का खर्च देने की गारंटी देती है. इसमें दिक्कत ये है कि सरकार की योजना का दायरा सीमित है. और फिर इस तरह के इंश्योरेंस स्कीम्स की अपनी दिक्कतें हैं. कोरोना के दौरान हमने अखबारों में कई ऐसे मामले देखे जहां इलाज वाली योजनाओं का लाभ नीजि अस्पतालों में लोगों को नहीं मिला. और फिर हमें कुछ ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जहां निजी अस्पतालों की लापरवाही के चलते मरीज़ों की मौत हुई.

5. अब बात दवाओं की.

भारत को दुनिया की फार्मेसी कहा जाता है. भारत की कई बड़ी कंपनियां पूरी दुनिया को दवा की सप्लाई करते हैं. लेकिन यहां कई दवाओं की कीमत बहुत ज्यादा है. लोगों की ज़ेब से जितना पैसा स्वास्थ्य पर खर्च होता है, उसका बड़ा हिस्सा दवाइयां खरीदने में खर्च होता है. एक्सपर्ट्स सवाल उठाते हैं दवाइयों की कीमत को लेकर सरकार का नियमन ठीक नहीं है. दवाओं का ट्रायल कैसे होता है, ट्रायल में किसे शामिल किया जाता है, इसमें कई तरह की खामियां हैं. कंपनियों का उत्तरदायित्व तय करने वाले मामले में सरकार बहुत पीछे दिखती है.

6. अब बात आती है हेल्थ सेक्टर पर खर्चे की

बेहतर सुविधाएं देनी हैं तो पैसा भी खर्च करना पड़ेगा. नेशनल हेल्थ पॉलिसी के मुताबिक स्वास्थ्य पर जीडीपी का 2.5% खर्च होना चाहिए. इस लक्ष्य से अभी हम बहुत दूर हैं. भारत दुनिया की छठवीं बड़ी अर्थव्यवस्था है. भारत से छोटे और कम संपन्न देश भी हमारे मुकाबले हेल्थ पर ज़्यादा खर्च करते हैं, ज्यादा ध्यान देते हैं. हमारी तुलना में ब्राज़ील 9.5 फीसदी खर्च करता है. चीन और मेक्सिको में 5.4 फीसदी खर्चा होता है. और यूके में जीडीपी का 10 फीसदी स्वास्थ्य पर खर्च करता है. और अभी भारत का हेल्थ पर खर्च जीडीपी के 1.2 फीसदी के करीब है. सरकार हमारे स्वास्थ्य पर ज्यादा खर्च नहीं करती तो हमें ही खर्च करना पड़ता है. यानी स्वास्थ्य पर किए खर्चे का बड़ा भाग सीधे लोगों की ज़ेब से आता है. एक रिपोर्ट के मुताबिक साल में औसतन हर आदमी ढाई हज़ार से ज्यादा अस्पताल या दवाइयों पर खर्च करता है. और बीमारी पर खर्च ही कई परिवारों को गरीबी की रेखा तक घसीट ले जाता है.

जैसा कि हमने पहले भी कहा था स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार एक दिन की बात नहीं है. हम लगातार इस ओर अपना ध्यान लगाए रखेंगे और उन पहलुओं को भी अगली बार शामिल करने की कोशिश करेंगे, जो आज हमसे छूट गए हैं.


विडियो- इस अस्पताल के अधिकारी ने कोरोना मृतकों की संख्या में हुई गड़बड़ी की बात कबूली

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