Submit your post

Follow Us

चीन के जंगज़ाओ में जो हुआ, वो सुनकर हमें आज से, अभी से चेत जाना चाहिए

भविष्य जानने की ललक बहुतों में होती है. क्या आप भी उन लोगों में हैं, जिन्हें लगता है कि काश, अपना फ़्यूचर जान सकते. चलिए, आज भविष्य बांचने से ही शुरुआत करते हैं.

ये भविष्य है, आज से 29 साल बाद का. तारीख़, 2050 का एक दिन. हवा में असहनीय गर्मी है. उसमें प्रदूषण फैलाने वाले कण भरे हैं. इनके मारे आपकी आंखें हमेशा जलती रहती हैं. मुंह पर हरदम मास्क लगा रहता है, लेकिन आपकी खांसी है कि कभी रुकती नहीं. अब आप ताज़ी हवा खाने कहीं नहीं जाते. क्योंकि दुनिया में ताज़ी हवा जैसी कोई चीज बची ही नहीं है. बाहर इतना प्रदूषण है कि आपके घर की खिड़कियां और दरवाज़े ही हरदम बंद रहते हैं.

इतने एहतियात के बावजूद घर के भीतर की हवा भी भारी लगती है. लगता है, उसमें किसी ने एसिड घोल दिया हो. समुद्र का जल स्तर दिनोदिन बढ़ता जा रहा है. किनारों पर बसे लोग अपना घर-बार छोड़कर ऊपर, और ऊपर के इलाकों में खिसकते जा रहे हैं. कई लोग तो घर के भीतर भरे घुटने तक पानी में ही जीने लगे हैं. दुनिया के कई हिस्से इतने गर्म हो गए हैं कि इंसानों के रहने लायक नहीं बचे. अब साफ़ पानी एक सपना है. भरपेट खाना ख़्वाहिश है. बाढ़, चक्रवात, सूखा, वाइल्डफ़ायर…सब आम हो गए हैं. खेती दूभर हो गई है. दुनिया में इतनी भुखमरी पहले कभी नहीं रही. भूख, बीमारी और दुर्भिक्ष से थककर की जाने वाली आत्महत्याएं की ख़बरें अब रोज़मर्रा का हिस्सा बन गई हैं.

जानकार कहते हैं, अब इंसानी प्रजाति का अंत दूर नहीं. वो कहते हैं, अंत तय है. बस एक चीज अनिश्चित है कि ये अंत कब आएगा. हमारी और कितनी भावी पीढ़ियां अस्तित्व में आ सकेंगी. आपको लगता है, आप एक अथाह अंधकार में बस गिरते ही चले जा रहे हैं. और इन अंतहीन तकलीफ़ों के बीच आपको अपने पूर्वजों, अतीत की पीढ़ियों से घृणा होती है. आप गुस्से में मुट्ठी भींचते हुए सोचते हैं, काश…पहले की पीढ़ियों ने समय रहते इस बर्बादी को रोक लिया होता.

मैंने अभी आपको जिस भविष्य की एक झलकी बताई, वो दरअसल एक क़िताब के अंश का भावार्थ है. इस क़िताब का नाम है- दी फ़्यूचर वी चूज़: सर्वाइविंग दी क्लाइमेट क्राइसिस. इस क़िताब में 2050 की स्थितियों का वर्स्ट केस सीनेरियो बताया गया है. माने, जलवायु परिवर्तन के जिस दौर में हम हैं, उसकी एक स्याह आशंका. इसी स्याह भविष्य की एक भीषण झलक बीते रोज़ चीन में दिखी. वहां कुछ ऐसा घटा, जिसे देखकर लगा कि हम रोलैंड ऐमेरेख़ की बनाई फ़िल्म 2012 का कोई फ्रेम देख रहे हों. क्या है ये मामला, विस्तार से बताते हैं.

The Future We Choose
किताब- The Future We Choose. (फोटो- Amazon)

चीन के जंगज़ाओ में क्या हुआ?

चीन के मध्य क्षेत्र में हेनन नाम का एक प्रांत है. इसकी राजधानी है, जंगज़ाओ. ये इलाका जिस भौगोलिक क्षेत्र में पड़ता है, उसे कहते हैं हुआंग हे वैली. मतलब, हुआंग हे की घाटी. चीन के लोग इस नदी को ‘मदर रिवर’ पुकारते हैं. क्यों? क्योंकि इसी नदी की घाटी में प्राचीन चाइनीज़ सभ्यता का जन्म हुआ था. करीब 5,400 किलोमीटर लंबी हुआंग हे चीन की दूसरी सबसे लंबी नदी है. लंबाई में पहले नंबर पर है, चांगजियांग नदी.

ख़ैर, वापस आते हैं हुआंग हे नदी पर. ये नदी अपने साथ बहुत सारा गाद लेकर बहती है. इस गाद के चलते नदी का पानी देखने में पीले और भूरे रंग का लगता है. जब नदी में पानी ओवरफ़्लो होता है, तो ये अपने पीछे पीले रंग का अवशेष छोड़ती है. इसी के चलते इस नदी का एक नाम ‘येलो रिवर’ भी है. नदी का छोड़ा उर्वर गाद खेती के लिए वरदान है. मगर वरदान तक पहुंचने का ये रास्ता कई बार भीषण बर्बादी से होकर जाता है. इस बर्बादी का कारण है, बाढ़ और उससे होने वाला जान-माल का नुकसान. यही वजह है कि इस नदी को ‘चीन का शोक’ भी कहा जाता है.

इस भौगोलिक वर्णन के बाद फिर लौटते हैं हेनन प्रांत की राजधानी जंगज़ाओ पर. 21 जुलाई की बात है. इस शहर में एक  सब-वे ट्रेन सुरंग से होती हुई आगे बढ़ रही थी. अगला स्टेशन बस आने ही वाला था कि एकाएक अजीब सा मंज़र दिखा. रेल की पटरियां एकाएक ओझल होने लगीं. ओझल होने की वजह ये थी कि पटरियां पानी में डूब गई थीं. ट्रेन के डब्बों के बाहर पानी भरने लगा. पीछे के डब्बे, जो कि सुरंग की ढलान पर थे, पानी में डूब गए. डब्बों के भीतर भी पानी घुस आया.

पहले एड़ियां डूबीं, फिर कमर, फिर सीना और फिर गरदन तक पानी भर गया. डब्बे के भीतर पानी, बाहर पानी…बचकर भागते तो कहां भागते. ऐसा लगा कि अब वो पानी में डूब जाएंगे. यात्रियों में दहशत फैल गई. लोग अपने परिवार और दोस्तों को फ़ोन करके अलविदा कहने लगे. कइयों ने विडियो मेसेज रिकॉर्ड करके सोशल मीडिया पर डाला. ये सोचकर कि ये शायद दुनिया से किया गया उनका आख़िरी संवाद हो. डब्बे में चीख-पुकार मची थी. लोगों को घुटन हो रही थी. गरदन तक पानी में डूबे यात्री जैसे अब अपनी मौत का इंतज़ार कर रहे हों. कइयों का इंतज़ार छोटा रहा. रेस्क्यू किए जाने से पहले ही कम-से-कम 12 यात्रियों की मौत हो गई. आपने टाइटैनिक फ़िल्म देखी है. उसमें टाइटैनिक के भीतर पानी भरने की रफ़्तार याद है? पानी में तैर रहा सामान, उसमें डूबकर मर रहे लोग याद हैं? कुछ-कुछ ऐसी ही हालत थी, सब-वे ट्रेन में फंसी रेल बोगियों की.

Zhangzhou China
जंगज़ाओ शहर. (फोटो- AP)

शहर भी जलमग्न

ऐसा नहीं कि जंगज़ाओ शहर की उस भूमिगत ट्रेन और सब-वे स्टेशन पर ही ये आपदा आई हो. सुरंग से ऊपर जो शहर बसा था, वहां का मंज़र भी अलग नहीं था. शहर की गलियां और सड़कें जैसे नदी बन गई थीं. पानी के तेज़ बहाव के चलते कई जगहों पर सड़क धंस गई. इस धंसान से बने गड्ढे में जा रही पानी की तेज़ धार अपने साथ कई लोगों को भी बहाकर ले गई. जाने कितनी कारें इन गड्ढों में जाकर गिरीं. उनमें बैठे ड्राइवरों और यात्रियों का क्या हाल हुआ, कोई नहीं जानता. सड़कों पर इतना पानी था कि उनमें डूबकर बह रही कारों की केवल छतें नज़र आ रही थीं.

जंगज़ाओ शहर में आई इस आपदा से जुड़े कई विडियोज़ सोशल मीडिया पर शेयर हो रहे हैं. किसी विडियो में लोग मानव श्रृंखला बनाकर किसी इंसान को भंवर में जाने से बचा रहे हैं. किसी विडियो में सड़क के एक किनारे कीचड़ से लथपथ लाश पड़ी है. ख़बरों के मुताबिक, इस एक्सट्रीम बारिश के चलते चीन में कम-से-कम 33 लोग मारे गए हैं. कई लोग अब भी लापता हैं. इसके अलावा, लाखों लोग बेघर भी हो गए हैं. जंगज़ाओ शहर भले इस आपदा का केंद्र हो. मगर उसके अलावा मध्य चाइना के और भी हिस्से बाढ़ और भारी बारिश से प्रभावित हुए हैं. अकेले हेनन प्रांत को ही लें, तो इस प्राकृतिक आपदा के चलते यहां करीब 1,400 करोड़ रुपए की संपत्ति बर्बाद हुई है.

क्यों हुआ ये हाल?

वापस लौटते हैं, आपदा के सेंटर पॉइंट जंगज़ाओ शहर पर. क्यों हुई उसकी ये हालत? इसकी वजह है, एक्सट्रीम वेदर. यानी, मौसम की अतिरेकता. यहां इतनी मूसलाधार बारिश हुई, जितनी चीन में पहले कभी नहीं हुई थी. बीते रोज़ यहां एक घंटे के भीतर 201.9 मिलीमीटर बारिश हुई. पूरे दिनभर में जंगज़ाओ शहर के भीतर 609 मिलीमीटर से ज़्यादा बरसात हुई. जबकि इस शहर का सालाना औसत करीब 635 मिलीमीटर है. यानी, सालभर में औसतन जितनी बारिश होती है, करीब उतना ही पानी एक दिन में बरस गया.

इस बारिश की मात्रा का अंदाज़ा बताने के लिए एक और आंकड़ा देते हैं. मौसम विभाग के मुताबिक, भारत में सालाना औसत बारिश 1,180 मिलीमीटर है. यानी, हमारे यहां सालभर में औसतन जितनी बारिश होती है, उसका करीब आधा हिस्सा जंगज़ाओ में एक ही दिन में बरस गया. इस तुलना से आप जंगज़ाओ शहर में बारिश के चलते हुई तबाही का अंदाज़ा लगा सकते हैं.

अब सवाल है कि इतनी बारिश हुई क्यों? इसकी वजह है, मौसम संबंधी ख़ास परिस्थितियां. दक्षिणी चीन के वातावरण में पहले से ही उष्णकटिबंधीय नमी थी. फिर 21 जुलाई को एक और चीज हुई. इस रोज़ साउथ चाइना सी के ऊपर चेम्पाका नाम के एक झंझावात ने ज़ोर पकड़ा. इसका लैंडफॉल हुआ, यांगजिआंग शहर में. ये शहर दक्षिणी चीन स्थित गुआंगडोंग प्रांत में है.

ये चेम्पाका टाइफ़ून दक्षिण चाइना सी में बना. दूसरी तरफ, ईस्ट चाइना सी में भी एक इन-फ़ा नाम का टाइफ़ून मंडरा रहा है. इस टाइफ़ून के इस वीकेंड तक ताइवान और चीन में लैंडफॉल होने की आशंका है.

China
3 हज़ार से ज़्यादा लोगों के बाढ़ में फंसे होने की आशंका है. चीन में लगातार राहत कार्य जारी है. (फोटो- AP)

ख़तरनाक टाइफ़ून्स

अब इन दोनों टाइफ़ून्स का असर समझिए. चेम्पाका ने साउथ चाइना सी की ओर से नमी को अंदर ठेला. वहीं इन-फ़ा ईस्ट चाइना सी के रास्ते चीन में नमी धकेल रहा था. इन दोनों के इतर चीन के वातावरण में पहले से ही भरपूर मॉइश्चर था. इन सबका मिला-जुला असर ये हुआ कि बारिश कराने वाली नमी की अधिकता हो गई.

मौसम विज्ञानी हवा में मौजूद नमी की मात्रा बताने के लिए ‘PWAT’ टर्म का इस्तेमाल करते हैं. इसका फुल फॉर्म है, प्रीसिपिटेबल वॉटर इंडेक्सेज़. ये इंडेक्स बताता है कि किसी जगह पर कितनी बारिश होने का चांस है. PWAT 1.5 इंच से ऊपर हो, तो इसका मतलब होता है भारी बारिश. ये इंडेक्स 2 इंच हो, तो मतलब होता है ट्रॉपिकल बारिश. 21 जुलाई को पूर्वी चीन में PWAT ढाई से तीन इंच तक पहुंच गया था. इसके दो असर हुए. पहला ये कि बेहद मूसलाधार बारिश के लिए मॉइश्चर जमा हो गया. PWAT के इतने ज़्यादा होने के चलते दूसरा असर ये हुआ कि प्रीसिपिटेशन एफ़िसिएंसी भी बहुत बढ़ गई.

अब इसका असर समझिए

इसका क्या प्रभाव हुआ? देखिए, जब बारिश की बूंदें ज़मीन पर गिरती हैं, तो कई बार सतह पर मौजूद हवा में सापेक्ष आर्द्रता होती है. इसके चलते बारिश के सतह पर गिरने के क्रम में शुष्क हवा भी वाष्पन उत्पन्न करती है. इससे बारिश का द्रव्यमान कम हो जाता है. आसान भाषा में इसका अर्थ है, बादल से निकली बूंदों के ज़मीन पर पहुंचते-पहुंचते उनमें मौजूद पानी का कम हो जाना. मगर प्रीसिपिटेशन एफ़िसिएंसी के बढ़ जाने के चलते पूरी हवा में ही नमी ज़्यादा होती है. नीचे सतह पर शुष्क हवा की कमी के कारण शुष्क हवा वाष्पीकरण इन्ड्यूस नहीं करती. यानी, बारिश की बूंदों का द्रव्यमान कम नहीं होता. इसके चलते, बादल अपने भीतर जमा पानी की ज़्यादातर मात्रा ज़मीन पर गिरा देते हैं.

21 जुलाई को जंगज़ाओ शहर के ऊपर यही सब हुआ. इसीलिए जंगज़ाओ शहर के ऊपर मौजूद बादलों ने इतना कहर बरपाया. स्थितियां बदतर इसलिए हुईं क्योंकि शहर में पहले से भी बरसात हो रही थी. शहर पहले ही सैचुरेशन पॉइंट पर पहुंच गया था. ड्रेनेज़ सिस्टम भी आकंठ भर चुका था. ऐसे में जब भीषण बारिश की बारी आई, तब सतह पर पानी के इधर-उधर जाने की राह नहीं बची. सब ओवरफ़्लो हो गया.

मगर क्या इस भीषण बरसात का सारा दोष क़ुदरत का है? जवाब है, नहीं. ये एक चेन रीएक्शन है. साइबेरिया और कैलिफॉर्निया के जंगलों में लगी आग. जर्मनी में आया फ़्लैश फ़्लड. कनाडा में पड़ रही भीषण और अप्रत्याशित गर्मी. ये सारी घटनाएं एक चेन रीएक्शन का हिस्सा हैं. इन सबके पीछे मुख्य वजह है, क्लाइमेट चेंज.

California
क्लाइमेट चेंज का भयावह नतीजों में से एक. 2020 में कैलिफोर्निया में लगी आग. (फोटो- PTI)

क्लाइमेट चेंज मतलब?

हमारी धरती का वातावरण तेज़ी से गर्म हो रहा है. इसकी मुख्य वजह है, कार्बन डाई ऑक्साइड का तेज़ी से हो रहा उत्सर्जन. आपको पता है. जंगल, पेड़-पौधे, मिट्टी, समंदर…ये सब क़ुदरत के फेफड़े हैं. हम जितना कार्बन डाई ऑक्साइड छोड़ते थे, उसका आधे से ज़्यादा हिस्सा ये सोख लेते थे. मगर इंसानों ने जंगलों को तेज़ी से काटना शुरू किया. कभी खेती के लिए. कभी खनिज-संसाधनों के लालच में. कभी इंसानी बसाहट के विस्तार के लिए. कभी कारख़ानों के लिए. कई वजहों से जंगलों की कटाई और तेज़ होती रही. इसके साथ-साथ कार्बन उत्सर्जन की स्पीड भी बेतहाशा बढ़ती गई.

आप आए दिन ख़बरों में पढ़ते होंगे कि ग्लेशियर्स पिघल रहे हैं. ग्लेशियर्स के पिघलने से क्या नुकसान है? ये हमारी धरती, हमारे समंदरों की हिफ़ाजत करने वाली एक छतरी है. उनकी बर्फ़ सूरज से आ रही अतिरिक्त उष्मा को वापस अंतरिक्ष में फेंक देता है. इस तरह वो हमारे ग्रह को ठंडा रखता है.

क्लाइमेट चेंज के चलते ग्लेशियर्स तेज़ी से ख़त्म हो रहे हैं. आर्कटिक क्षेत्र की बर्फ़ ख़त्म हो रही है. उसके भीतर का समुद्री पानी एक्सपोज़ हो रहा है. ये समुद्री पानी सूरज की रोशनी को वापस अंतरिक्ष में नहीं भेजता. बल्कि उन्हें सोख लेता है. इसके चलते ध्रुवों का तापमान और बढ़ रहा है. बर्फ़ की शीट और ग्लेशियर्स पिघलने की प्रक्रिया और तेज़ हो रही है. साथ ही, सूरज की रोशनी को अंतरिक्ष में वापस फेंकने वाली प्रक्रिया भी धीमी हो रही है. पहले की तुलना में कम सनलाइट स्पेस में वापस रीफ्लैक्ट हो पा रहा है.

बर्फमुक्त आर्कटिक!

ग्लेशियर्स के पिघलने के चलते समुद्र का जल स्तर बढ़ रहा है. पता है, अगर हम किस स्तर पर पहुंच चुके हैं. अगर अब हम कार्बन उत्सर्जन में बहुत कमी भी ले आएं, तब भी दुनिया में बचे ग्लेशियर्स का एक-तिहाई से ज़ियादा हिस्सा सन् 2100 से पहले पिघल चुका होगा. सन् 2040 तक आर्कटिक क्षेत्र बर्फ़मुक्त हो जाएगा. इसके परिणाम कितने भयावह होंगे, इसकी एक झलक हमने इस स्टोरी की शुरुआत में लिखी भविष्यवाणी में आपको बताई थी.

क्लाइमेट चेंज के चलते हम भविष्य में एक्सट्रीम वेदर के और भीषण परिणाम देखेंगे. जंगलों में लगने वाली आग और फ्रीक्वेंट हो जाएगी. मौसम का स्वभाव बदल जाएगा. बेमौसम बरसात होगी. बर्फ़ के मौसम में बर्फ़ नहीं गिरेगी. चक्रवातों की नियमितता बढ़ जाएगी. फ्ल़ैश फ्लड्स की रेगुलैरिटी बढ़ जाएगी. टीड्डों के हमले बढ़ जाएंगे. बीमारियां और भुखमरी बढ़ जाएगी.

कहीं अतिवृष्टि होगी. कहीं अल्पवृष्टि से आफ़त आएगी. हम एक वैश्विक महामारी से बर्बाद हो गए हैं न. क्लाइमेट चेंज के चलते ऐसी और कई महामारियां आएंगी. कैसे? हमने बताया कि आर्कटिक की बर्फ़ीली परतें तेज़ी से पिघल रही हैं. दसियों हज़ार साल से जमी इस ध्रुवीय बर्फ़ के नीचे कई अनदेखे माइक्रोब्स दबे हैं.

बर्फ़ पिघलने के चलते वहां क़ैद ये माइक्रोब्स आज़ाद हो सकते हैं. ये ऐसी-ऐसी बीमारियां पैदा कर सकते हैं, जिनकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते. ऐसी बीमारियां, जिनसे बचने का या जिनके इलाज का हमारे पास कोई तरीका नहीं है.

ऐंथ्रेक्स का उदाहरण

यहां हम 2020 में हुई एक घटना का ज़िक्र करना चाहेंगे. आप रेंडियर नाम के जीव को जानते हैं? ये बेहद ठंडे इलाकों में पाया जाता है. ऐसा ही एक इलाका है, साइबेरिया. यहां रेंडियर्स के झुंड में ऐंथ्रेक्स नाम की एक ख़तरनाक बीमारी फैली.

पता चला कि इन रेंडियर्स ने पर्माफ़्रोस्ट पर उगी वनस्पतियों को खाया था. पर्माफ़्रोस्ट मतलब होता है, धरती की सतह के ऊपर स्थायी रूप से जमी हुई सतह. बर्फ़ और ग्लेशियर्स पिघलने के कारण ये एक्सपोज़ हो रहे हैं. इनपर से बर्फ़ गायब हो जा रही है. उसकी जगह वनस्पति उग रही है. साइबेरिया के रेंडियर्स ने इसी पर्माफ़्रोस्ट पर उगी वनस्पतियां खाईं. वहां वो पिघली हुई बर्फ़ से आज़ाद हुए माइक्रोब्स के भी संपर्क में आए. अनुमान है कि इसी के मार्फ़त वो ऐंथ्रेक्स फैलाने वाले जीवाणुओं की भी चपेट में आए.

इन सारी बातों का सार ये है कि अगर हम इंसानों ने अब भी होश नहीं संभाला. अगर हम अब भी पर्यावरण के लिए नहीं चेते. तो हमारा भविष्य बहुत भीषण होने वाला है. हम तो फिर भी शायद अपना जीवन काट लें. लेकिन हमारी आने वाली पीढ़ियां, हमारे बच्चे, बच्चों के बच्चे…उनके लिए हम एक बेहद दयनीय संसार छोड़ जाएंगे. ऐसी दुनिया छोड़ जाएंगे, जहां पीने का पानी, सांस लेने के लिए साफ़ हवा, पेट भरने को खाना भी मुश्किल से मयस्सर होगा.

अब एकबार फिर सांसारिक घटनाओं की तरफ़ लौटते हैं. हमने आपको चीन में आई भीषण बाढ़ के बारे में बताया. हमारी ही तरह चीन में भी बाढ़ एक सालाना घटना है. कभी कम, कभी ज़्यादा, बाढ़ हर साल बर्बादी मचाती है. अब यहां एक कॉन्ट्रास्ट देखिए. हम एक्सट्रीम वेदर की बात कर रहे थे न. चीन में अतिवृष्टि से तबाही आई. वहीं चीन के पड़ोसी ईरान में अल्पवृष्टि से हाहाकार मचा हुआ है. दक्षिण-पश्चिमी ईरान में भयंकर सूखा पड़ रहा है. ये सूखा ‘वर्स्ट इन डीकेड्स’ बताया जा रहा है. सरकार के मुताबिक, पिछली आधी सदी में इतना बड़ा सूखा नहीं आया था. इसकी वजह है, बारिश की कमी. वहां इस बरस औसत बारिश में 52 पर्सेंट की गिरावट आई.

नदियों में पानी की उपलब्धता इतनी कम है कि उनपर लगे पनबिजली संयंत्र बंद करने पड़े हैं. इसके चलते बिजली की भी काफ़ी किल्लत हो गई है. लोगों को पीने का पानी भी नहीं मिल रहा है. इसीलिए सैकड़ों लोग सड़कों पर उतर आए हैं. पानी की कमी के कारण वहां हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं. इस हिंसा में अब तक कम-से-कम दो लोगों के मारे जाने की ख़बर है. ये भी ख़बर है कि सरकार लोगों की परेशानी समझने की जगह हिंसा करके प्रदर्शन ख़त्म करवाने पर तुली है. वहां पानी मांग रहे प्रोटेस्टर्स पर गोलियां चलवाए जाने की भी ख़बर है.

अगर हम इंसान अब भी नहीं चेते, तो एक दिन हम ऐसी आपदाओं पर चौंकना भी बंद कर देंगे. क्यों? क्योंकि ऐसी आपदाएं हमारी नियति बन चुकी होंगी.


क्या मनगढ़ंत है 8 साल की पर्यावरण एक्टिविस्ट लिकिप्रिया कंगुजाम की कहानी?

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

IPL स्कैंडल, मॉडल्स के आरोप, अंडरवर्ल्ड कनेक्शंस के आरोप, एक्स वाइफ के इल्ज़ाम सब हैं इस कहानी में.

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रेन्सन की कहानी, जहां भी गए तहलका मचा दिया.

'सिंघम' IPS से तमिलनाडु BJP के सबसे युवा अध्यक्ष बने अन्नामलाई की कहानी

पहला चुनाव हार गए थे, बीजेपी ने राज्य की जिम्मेदारी सौंपी है.

'तड़प-तड़प के' जैसा प्रेमियों का ब्रेकअप एंथम देने वाले सिंगर के के आजकल कहां हैं?

उनके गाए 'पल' गाने के बगैर आज भी किसी कॉलेज का फेयरवेल पूरा नहीं होता.

कर लिया योगा? अब क्विज खेलने से होगा

आन्हां, ऐसे नहीं कि योग बस किए, दिखाना पड़ेगा कि बुद्धिबल कित्ता बढ़ा.

तमिल जनता आखिर क्यों कर रही है 'फैमिली मैन-2' का विरोध, क्या है LTTE की पूरी कहानी?

जब ट्रेलर आया था, तबसे लगातार विरोध जारी है.

माधुरी से डायरेक्ट बोलो 'हम आपके हैं फैन'

आज जानते हो किसका हैप्पी बड्डे है? माधुरी दीक्षित का. अपन आपका फैन मीटर जांचेंगे. ये क्विज खेलो.

जिन मीम्स को सोशल मीडिया पर शेयर कर चौड़े होते हैं, उनका इतिहास तो जान लीजिए

कौन सा था वो पहला मीम जो इत्तेफाक से दुनिया में आया?

पार्टियों को चुनाव निशान के आधार पर पहचानते हैं आप?

चुनावी माहौल में क्विज़ खेलिए और बताइए कितना स्कोर हुआ.

लगातार दो फिफ्टी मारने वाले कोहली ने अब कहां झंडे गाड़ दिए?

राहुल के साथ यहां भी गड़बड़ हो गई.