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एक वादे के बल पर 38 साल का ये आदमी राष्ट्रपति बन गया!

टू कोस्टा रिका,
विद लव…

ये खबर नहीं है. एक लव लेटर है. दिल्ली से करीब साढ़े 12 हजार किलोमीटर दूर एक छोटा सा मुल्क है. कोस्टा रिका. ये लव लेटर वहां के लोगों के लिए लिखा गया है. रोजाना इंटरनैशनल न्यूज पढ़ने वाली मेरी आंखों को बहुत दिनों बाद इतनी खूबसूरत खबर नजर आई है.


चुनाव जीतने के लिए नेता कई तरह के वादे करते हैं. नौकरी, भरी जेब, सस्ती चीजें, मुफ्त शिक्षा. ये वादे असर भी करते हैं. लेकिन क्या कोई नेता समलैंगिक अधिकारों का पक्ष लेने की वजह से चुनाव जीत सकता है? क्या ये वादा बाकी सारे वादों पर भारी पड़ सकता है? जवाब है, हां. कोस्टा रिका में ऐसा ही हुआ. वहां राष्ट्रपति चुनाव हुए थे. इसमें जीते हैं कार्लोस अलवराडो. इनका चुनावी वायदा था, सेम सेक्स मैरिज का समर्थन. उनको 62 फीसद से ज्यादा वोट मिले.

समंदर किनारे का छोटा सा खूबसूरत देश है
कार्लोस के बारे में बताने से पहले थोड़ा कोस्टा रिका के बारे में जान लीजिए. सेंट्रल अमेरिका का छोटा सा मुल्क है ये. अपने आस-पास के इलाकों में सबसे ज्यादा खुशहाल. सबसे ज्यादा संपन्न. जिंदगी अच्छी है लोगों की. जिसको लिविंग स्टैंडर्ड बोलते हैं, वो बहुत भरा-पूरा है. खूबसूरत देश है. समंदर का किनारा. नीला पानी. ऊंचे पहाड़. जंगल-जानवर. आबादी 50 लाख के करीब है. अच्छा और जागरूक देश है. इसी के राष्ट्रपति बने हैं कार्लोस.

कार्लोस बस 38 साल के हैं. फ्रांस और न्यू जीलैंड के राष्ट्राध्यक्ष भी 40 से कम उम्र के हैं. तस्वीर में कार्लोस चुनाव नतीजों के ऐलान के बाद अपने घर के बाहर जुटी मीडिया से बात करने के लिए सीढ़ियां उतर रहे हैं.
कार्लोस बस 38 साल के हैं. फ्रांस और न्यू जीलैंड के राष्ट्राध्यक्ष भी 40 से कम उम्र के हैं. तस्वीर में कार्लोस चुनाव नतीजों के ऐलान के बाद अपने घर के बाहर जुटी मीडिया से बात करने के लिए सीढ़ियां उतर रहे हैं. जीतने के बाद कार्लोस ने कहा कि ये जीत कोस्टा रिका की आवाम के हाथों दिया गया एक खूबसूरत मेसेज है. ये लोकतंत्र की जीत है.

किसके बीच था मुकाबला?
कार्लोस की पार्टी है सिटीजन ऐक्शन पार्टी. ये सेंटर लेफ्ट पार्टी है. मतलब बैलेंसवादी, लेकिन लेफ्ट की तरफ झुकाव. कार्लोस जवान हैं. 38 साल की उम्र होती ही क्या है. पहले भी सरकार का हिस्सा रह चुके हैं. कैबिनेट मंत्री थे. गायक हैं. लेखक हैं. उनका मुकाबला था नैशनल रेस्टोरेशन पार्टी के उम्मीदवार फैब्रिसियो अलवाराडो मुनोज से. काफी कट्टर विचारों के इंसान हैं मुनोज. समलैंगिक शादियों के खिलाफ अभियान चलाकर ही उन्होंने राजनीति में अपना नाम बनाया.

कोर्ट ने समलैंगिकों के हक में फैसला सुनाया
जनवरी 2018 में अमेरिकन कोर्ट ऑफ ह्युमन राइट्स (ACHR) ने एक फैसला दिया था. ये ऑर्गनाइजेशन ऑफ अमेरिकन स्टेट्स (OAS) के सदस्य देशों में मानवाधिकार से जुड़े मसलों को देखता-सुनता है. OAS में कुल 35 देश हैं. कोस्टा रिका भी इसका सदस्य है. ACHR ने कहा था कि इसके मेंबर देश अपने-अपने यहां समलैंगिकों को बराबरी दें. उनको भी बाकी नागरिकों की तरह आजादी मिले. वो भी अपनी मर्जी से शादी कर सकें. संपत्ति खरीद सकें.

मुनोज ने हार मान ली. फिर अपने समर्थकों को ढाढस बंधाया. कहा कि उन्होंने हारकर भी इतिहास बना दिया है. क्योंकि उन्होंने जो मुद्दा उठाया, वो मुद्दा हर नागरिक तक पहुंचा. वो जो संदेश देना चाहते थे, वो संदेश लोगों तक पहुंच गया.
मुनोज ने हार मान ली. फिर अपने समर्थकों को ढांढस बंधाया. कहा कि उन्होंने हारकर भी इतिहास बना दिया है. क्योंकि उन्होंने जो मुद्दा उठाया, वो मुद्दा हर नागरिक तक पहुंचा. वो जो संदेश देना चाहते थे, वो संदेश लोगों तक पहुंच गया.

कोर्ट का एक फैसला बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया
इस फैसले को लेकर OAC के देशों में एकराय नहीं थे. मुनोज भी इस फैसले के खिलाफ थे. कोस्टा रिका की बहुसंख्यक आबादी ईसाई है. वो भी कैथलिक. ईसाई धर्म का कट्टर रूप. जो अबॉर्शन को भी गलत मानता है. मुनोज का कहना था कि सेम सेक्स मैरिज वाला फैसला कोस्टा रिका के मूल्यों के खिलाफ है. उन्होंने वादा किया कि राष्ट्रपति बनने पर वो इस फैसले को ठेंगा दिखा देंगे. इतना ही नहीं, बल्कि अबॉर्शन पर भी करीब-करीब बैन लगा देंगे. करीब-करीब बैन का मतलब कुछ खास स्थितियों में ही गर्भपात की इजाजत मिलेगी. मुनोज ने ये भी वादा किया कि चुनाव जीतने पर वो स्कूलों में दी जा रही सेक्स एजुकेशन खत्म कर देंगे. मुनोज एक खास कैटगरी के लोगों में आते हैं. ऐसे लोग, जिनका मानना है कि समलैंगिकता और नारीवाद परिवार-समाज को बर्बाद कर देंगे. दूसरी तरफ थे कार्लोस. जो कह रहे थे कि वो ACHR का फैसला लागू करेंगे. कोर्ट का ये फैसला कोस्टा रिका में बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया.

ये चुनाव के समय की तस्वीर है. कार्लोस के चुनाव प्रचार के दौरान अक्सर उनके समर्थक LGBTQ समुदाय के इस इंद्रधनुषी झंडे के साथ नजर आते. ये सोचना कि बस समलैंगिकों के सपोर्ट की वजह से कार्लोस जीत गए, बेवकूफी है. समलैंगिक अल्पसंख्यक हैं. कार्लोस को बहुसंख्यकों ने भी वोट दिया. 62 फीसद से ज्याद वोट मिले उनको.
ये चुनाव के समय की तस्वीर है. कार्लोस के चुनाव प्रचार के दौरान अक्सर उनके समर्थक LGBTQ समुदाय के इस इंद्रधनुषी झंडे के साथ नजर आते. ये सोचना कि बस समलैंगिकों के सपोर्ट की वजह से कार्लोस जीत गए, बेवकूफी है. समलैंगिक अल्पसंख्यक हैं. कार्लोस को बहुसंख्यकों ने भी वोट दिया. 62 फीसद से ज्याद वोट मिले उनको.

और क्या है डेमोक्रेसी!
चुनाव से पहले मुनोज का पलड़ा भारी लग रहा था. ऐसा लग रहा था कि दोनों में कड़ा मुकाबला होगा. एकदम कांटे की टक्कर होगी. सर्वेक्षणों में कहा जा रहा था कि मेजॉरिटी लोग समलैंगिक शादी के खिलाफ है. लेकिन जब नतीजे आए, तो ‘होमोफोबिया’ हार गया. साफ हो गया कि कोस्टा रिका की बहुसंख्यक आबादी लिबरल है. वो समलैंगिकों के खिलाफ नहीं. कोई लोकतंत्र इतना जागरूक और संवेदनशील हो, इससे अच्छी बात और क्या होगी! सबका हक, सबके लिए बराबरी. सबके लिए आजादी. और क्या है डेमोक्रेसी.

कार्लोस मई में पदभार संभालेंगे. अभी कोस्टा रिका के राष्ट्रपति हैं लुइस गुइलेरमो सोलिस. अप्रैल 2014 में चुनाव जीतकर सत्ता में आए थे वो. वो भी उसी सिटिजन ऐक्शन पार्टी के हैं, जिस पार्टी के कार्लोस हैं. तस्वीर में कार्लोस के समर्थक उनकी जीत पर खुशियां मनाते दिख रहे हैं.
कार्लोस मई में पदभार संभालेंगे. अभी कोस्टा रिका के राष्ट्रपति हैं लुइस गुइलेरमो सोलिस. अप्रैल 2014 में चुनाव जीतकर सत्ता में आए थे वो. वो भी उसी सिटिजन ऐक्शन पार्टी के हैं, जिस पार्टी के कार्लोस हैं. तस्वीर में कार्लोस के समर्थक उनकी जीत पर खुशियां मनाते दिख रहे हैं.

चेचन्या जैसे देश भी जानें, कोस्टा रिका में क्या हुआ
कोस्टा रिका की ये जीत शायद बाकी कई मुल्कों को सबक दे. वहां भी समलैंगिकों को बराबरी मिले. बहुत मुट्ठीभर देश हैं, जहां समलैंगिकों को बराबर का नागरिक समझा जाता है. जहां उन्हें शादी करने का अधिकार होता है. इसी ग्लोब पर चेचन्या और ईरान जैसे देश भी हैं. चेचन्या में तो समलैंगिकता को बीमारी समझा जाता है. ये किसी की निजी सोच नहीं, स्टेट का स्टैंड है. जैसे हिटलर की नाजी जर्मनी में यहूदियों के लिए कॉन्सनट्रेशन कैंप्स थे, वैसे ही चेचन्या में समलैंगिकों के लिए यातना शिविर हैं.

ये मुनाज के समर्थक हैं. उनके हारने की खबर बाहर आई, तो कई समर्थक रोने लगे.
ये मुनोज के समर्थक हैं. उनके हारने की खबर बाहर आई, तो कई समर्थक रोने लगे. ये चुनाव बस राजनैतिक विचारधारा के अंतर का नहीं था. ये चुनाव था डेमोक्रेसी के सबसे बड़े वादे, सबसे बड़े आदर्श को लेकर. ये चुनाव था सबके लिए आजादी, सबके लिए बराबरी जैसी बुनियादी और खूबसूरत सोच को लेकर. इसीलिए मुनोज के हारने की खुशी मनाई जानी चाहिए.

स्माइल फ्रॉम ईयर टू ईयर
कार्लोस ने बड़ी समझदार बातें कही हैं. ऐसी बातें, जिनको सुनकर अच्छा लगता है. जिसको अंग्रेजी में ‘स्माइल फ्रॉम ईयर टू ईयर’ कहते हैं, वैसी ही खुशी होती है. चुनाव से पहले कार्लोस ने वोटर्स को आगाह किया था. कहा था कि मुनोज वो ही बोल रहे हैं, जो दुनिया के कई हिस्सों में हो रहा है. दक्षिणपंथ लगातार मजबूत हो रहा है. वैरायटी के खिलाफ, अल्पसंख्यकों के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है. सहिष्णुता और लोकतांत्रिक मूल्यों की मंजूरी कम हुई है. कोस्टा रिका की जनता ने सहिष्णुता को चुना. उसने अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए जिम्मेदारी समझी. दंगे-फसाद, मार-काट और नफरत की खबरों के बीच कोस्टा रिका ने दुनिया को एक खूबसूरत उम्मीद दी है. ये भरोसा दिया है कि इंसानियत और मुहब्बत के ठिकाने कम नहीं हुए हैं. इंसानियत पर यकीन करने के मौके कम नहीं हुए हैं.


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