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क्या ब्लूटूथ से हैक हो सकता है आपका स्मार्टफोन?

कमला हैरिस. अमेरिका की उपराष्ट्रपति हैं और भारतवंशी भी, लेकिन आजकल बहुत ही विचित्र बात के लिए खबरों में हैं. कमला हैरिस का खबरों में रहना वैसे आम बात है, लेकिन अभी वो जिस बात के लिए चर्चा में हैं वो तकनीक में सबसे आगे रहने वाले देश अमेरिका के लिए चौंकाने वाला है. सोशल मीडिया का जमाना है तो आपको खबर लग ही गई होगी कि कमला हैरिस अपने मोबाइल में ब्लूटूथ हेडसेट या ईयरबड्स इस्तेमाल नहीं करतीं. इसे लेकर अब दावे किए जा रहे हैं कि शायद कमला हैरिस को अपने मोबाइल के हैक होने का डर है. इसलिए वायरलेस डिवाइस से उन्होंने दूरी बना रखी है. कमला हैरिस को ज्यादातर फोटो में अपने मोबाइल के साथ वायर वाले ईयरफोन्स का इस्तेमाल करते देखा जा सकता है.

कमला हैरिस ऐसा क्यूं करती हैं? ये उनका निजी मसला है लेकिन उनके ऐसा करने से एक बात जो उठ खड़ी हुई है वो ये कि क्या ब्लूटूथ से मोबाइल हैक किया जा सकता है? यदि किया जा सकता है तो कैसे? और नहीं तो क्या सच में ब्लूटूथ तकनीक फुलप्रूफ है.

ब्लूटूथ तकनीक का इस्तेमाल एक निश्चित दूरी तक एक डिवाइस को दूसरे डिवाइस से वायरलेसली कनेक्ट करने के लिए होता है. फिर इसी तकनीक के ज़रिए फाइल शेयर की जाती है. ये दूरी 30 फीट से 120 फीट तक हो सकती है. ब्लूटूथ से आपका पाला हेडफोन, ईयरबड्स, स्पीकर्स, स्मार्टफोन या कई अन्य इलेक्ट्रानिक डिवाइस में पड़ जाएगा. अब ये कम्युनिकेशन्स का सबसे सरल तरीका बन गया है. एक बात और. कनेक्शन दो तरीके के होते हैं. एक पासवर्ड डालने पर कनेक्ट होने वाले और दूसरे सीधे-सीधे. आप एक मोबाइल से दूसरा मोबाइल कनेक्ट करेंगे या फिर अपनी कार के ब्लूटूथ से तो आपको एक पासवर्ड डालना होगा. स्पीकर्स और हेडफोन आमतौर पर सीधे कनेक्ट हो जाते हैं.

ब्लूटूथ 79 अलग-अलग फ्रिक्वेंसी (चैनल्स) पर सिग्नल भेजता और रिसीव करता है जो 2.45 गीगाहर्ट्ज के आसपास केंद्रित हैं. ये फ्रिक्वेंसी रेडियो, टीवी, मोबाइल, मेडिकल गैजेट्स से थोड़े अलग होते हैं. अलग-अलग फ्रिक्वेंसी या चैनल्स में कम्युनिकेशन्स बनाने से एक दूसरे से टकराव की संभावना लगभग खत्म हो जाती है. Wi-Fi और कनेक्टिविटी के अन्य तरीकों से इतर ब्लूटूथ छोटी दूरी पर काम करता है और इस बात का ध्यान रखना बेहद जरूरी है.

ब्लूटूथ सुरक्षित हैं या नहीं? यदि हम वायर की तुलना में किसी भी वायरलेस तकनीक की तुलना करें तो निश्चित तौर पर वायर वाली तकनीक ज्यादा सुरक्षित होती है. ब्लूटूथ हैकिंग जिसको ब्लूबगिंग (Bluebugging), ब्लूजैकिंग (Bluejacking) या ब्लूस्नरफिंग (Bluesnarfing) कहा जाता है. ऐसे बहुत ज्यादा केस तो रिपोर्ट नहीं हुए हैं. लेकिन ऐसा कभी न हुआ हो, ये कहना भी सही नहीं होगा. ब्लूबगिंग मतलब आपकी जानकारी के बिना आपके डिवाइस से कनेक्ट हो जाना. ब्लूजैकिंग मतलब किसी दूसरे डिवाइस पर कोई लुभावना मैसेज भेजकर उससे जुड़ जाना. ब्लूस्नरफिंग का मतलब है किसी के डिवाइस से जानकारी डाउनलोड करना. इन तीनों तरीकों से आमतौर पर हैकर्स ऐसी किसी वारदात को अंजाम देते हैं. ऐसे ही एक ब्लूबगिंग की घटना इंग्लैंड में समुंद्र के किनारे बसे एक शहर बोर्नमाउथ में हुई थी. स्थानीय लोगों का दावा था कि शहर से गुजरने के दौरान उन्हें ऑटोमेटेड मैसेज और अनजान सेंडर से फाइल रिसीव हो रहे थे. फिर मामले की जांच हुई तो पता चला कि अनजान सोर्स से आने वाले फाइल्स मालवेयर थे जिनका मकसद रिसीवर के फोन को एक्सेस करना और डेटा चुराना था.

आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि ऐसी हैकिंग से क्या होता है? एक बात जान लीजिए हैकिंग कैसी भी हो और किसी भी तरीके से हो, उसका उद्देश्य आपकी निजी जानकारी चुराना. आपके डिवाइस पर एक तरह से कब्जा करना या फिर रियल टाइम में आपके ऊपर नजर रखना होता है.

ब्लूटूथ तकनीक क्या है? कैसे हैकिंग होती है? ये तो जान लिया लेकिन सवाल अब भी वही है कि क्या ऐसा करना संभव है. इस सवाल का जवाब देने से पहले आपको शतरंज से जुड़ी एक कहानी सुनाते हैं. ये कहानी हमारे सवाल का जवाब खोजने में मदद करेगी.

शतरंज का खेल दो इंसानों के बीच खेला जाता है लेकिन IBM ने 1985 में डीप ब्लू के नाम से एक सुपर कंप्यूटर बनाया जो शतरंज खेल सकता था. शुरुआती रिसर्च के तकरीबन 11 साल बाद 1996 में कंपनी ने इसको बाजार में उतारा और दावा किया कि उनका बनाया सुपर कंप्यूटर सिर्फ एक सेकेंड में शतरंज के 20 करोड़ चालें सोच सकता है. एक सेकेंड में 20 करोड़ चाले. जाहिर है कि इसका किसी इंसान से हारना तो नामुमकिन था. खैर मुकाबला हुआ तत्कालीन विश्व चैंपियन और ग्रैंडमास्टर गैरी कास्परोव के साथ. फिर जो हुआ उसने सबके चौंका दिया. एक सेकेंड में 20 करोड़ चाल सोच लेने वाला डीप ब्लू नाम के सुपर कंप्यूटर को कास्परोव ने 4-2 से हरा दिया.

अब तो समझ गए होंगे. तकनीक की अपनी सीमाएं हैं. डीप ब्लू के अंदर एक सेकेंड में 20 करोड़ चाल सोचने की ताकत थी लेकिन उसके बाद क्या? मशीन है जितना बताओगे उतना करेगी. वहीं इंसानी दिमाग इस सब से परे है. गैरी कास्परोव के दिमाग ने वो चाल सोची जो सुपर कंप्यूटर नहीं सोच पाया और हार गया.

हमारे सवाल का जवाब इसी कहानी में निहित है. तकनीक अपनी सीमा में काम करती है और इंसान के लिए कोई सीमा नहीं है. इंसान जब किसी भी तकनीक में लूप होल तलाश लेता है तो उसके लिए उस तकनीक के अंदर घुसना. उसका गलत इस्तेमाल करना संभव हो जाता है. ऐसा ही हैकिंग के केस में होता है.

कंपनियां रोज नए एंटी-वायरस बनाती हैं, लेकिन उतने ही वायरस भी रोज पैदा हो जाते हैं. आखिरकार Bluetooth भी एक तकनीक ही है जिसको हैक किया जा सकता है. इसका मतलब ये नहीं है कि कोई भी कहीं से भी आपके मोबाइल को हैक कर लेगा. ऐसा करने वाले इस प्रकार की कारगुजारी में माहिर होते हैं और इनको ऐसा करने का मौका भी हम ही मुहैया कराते हैं.

आमतौर पर ब्लूटूथ हैकिंग सार्वजनिक जगहों, भीड़-भाड़ वाले इलाके, व्यस्त रहने वाले मार्केट्स में होती है. लेकिन एक बात कभी मत भूलिए. ये तकनीक सिर्फ कुछ दूरी पर काम करती है तो हैकर्स को आपके नजदीक आना पड़ेगा ताकि वो आपके डिवाइस से कनेक्ट हो सके.

आप इससे कैसे बच सकते हैं?

थोड़ी सावधानी और पूरी तकनीक का इस्तेमाल. बचने के दो तरीके हैं. पहला डिवाइस लेवल और दूसरा सर्विस लेवल. डिवाइस लेवल से मतलब मोबाइल की ब्लूटूथ कनेक्टिविटी को लिमिटेड करिए अपने कनेक्ट किये प्रोडक्टस के लिए. आपके मोबाइल में इसकी सेटिंग होती है जिसके बाद मोबाइल का ब्लूटूथ ओपन सोर्स नहीं रहेगा और उससे कनेक्ट करने के लिए आपके अप्रूवल की ज़रूरत होगी. सर्विस लेवल का मतलब है किसी भी ब्लूटूथ डिवाइस को दूसरे डिवाइस को कंट्रोल करने का विकल्प नहीं देना.

यदि जरूरत न हो तो कम से कम सार्वजनिक जगहों पर अपने मोबाइल का ब्लूटूथ बंद रखिए. ब्लूटूथ हैकिंग अभी बहुत कॉमन नहीं है, लेकिन सावधान रहने में ही भलाई है.


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