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क्या वाॅट्सऐप चैट को सबूत के तौर पर कोर्ट में पेश किया जा सकता है?

सुशांत सिंह राजपूत मौत मामले के बाद ‘बॉलीवुड में ड्रग्स’ का मुद्दा भी चर्चा में आ गया है. इसकी जांंच के क्रम में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने अभिनेत्री दीपिका पादुकोण, सारा अली खान, श्रद्धा कपूर और रकुलप्रीत सिंह को समन भेजा था. 26 सितंबर को दीपिका, सारा और श्रद्धा NCB के सामने पेश हुईं. ये सब तब हो रहा है, जब कुछ कथित वॉट्सऐप चैट वायरल हो रहे हैं, जिनमें ड्रग्स को लेकर बात हो रही है. NCB भी इन चैट्स पर पूछताछ कर रही है. इससे पहले ड्रग्स मामले में ही रिया चक्रवर्ती की गिरफ्तारी नशीली दवाओं और मादक पदार्थ निरोधक अधिनियम (NDPS Act), 1985 की धारा 8C, 20B, 27A, 28 और 29 के तहत हुई.

अब सवाल उठता है कि क्या वाॅट्सऐप चैट को सबूत के तौर पर कोर्ट में पेश किया जा सकता है? क्या किसी चैट को लीक करना या पढ़ना निजता के अधिकार का उल्लंघन है?

क्या कहता है एविडेंस एक्ट (Evidence Act), 1872?

एविडेंस ऐक्ट, 1872 की धारा- 65B के तहत वाॅट्सऐप चैट (इलेक्ट्राॅनिक रिकाॅर्ड) को सबूत के तौर पर पेश किया जा सकता है. लेकिन इसको एक हलफ़नामे के साथ पेश करना ज़रूरी है. इस हलफनामे में इस बात का ज़िक्र करना जरूरी है कि सबूत के साथ किसी भी तरह से छेड़छाड़ नहीं की गई है.

एविडेंस ऐक्ट की धारा-65B के मुताबिक, वीडियो रिकाॅर्डिंग, वाॅट्सऐप चैट, एसएमएस, सीसीटीवी फुटेज और मोबाइल से क्लिक की गई तस्वीरों को एक हलफनामे के साथ कोर्ट में साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है.

कानून के जानकार और मुंबई हाई कोर्ट के वकील दीपक डोंगरे का कहना है कि जो वाॅट्सऐप चैट (इलेक्ट्राॅनिक रिकाॅर्ड) कोर्ट में पेश किया जाता है, वह केस से संबंधित होना ज़रूरी है. सबूत के साथ हलफनामा लगाना अनिवार्य है. बिना हलफनामे के कोर्ट में कोई भी सबूत (इलेक्ट्राॅनिक रिकाॅर्ड) मान्य नहीं किया जाएगा.

आगे वो कहते हैं,

“वाॅट्सऐप चैट को एविडेंस के तौर पर स्वीकार किया जाएगा. लेकिन इसके लिए यह ज़रूरी है कि जिन वाॅट्सऐप चैट की बात हो रही है, वह अभिनेत्री के मालिकाना हक वाले मोबाइल से हुई हो.”

क्या है निजता का अधिकार?

निजता यानी प्राइवेसी. अंग्रेज़ी में इस अधिकार को ‘राइट टू प्राइवेसी’ कहते हैं. संविधान के भाग-3 के अनुच्छेद-14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद-19 (अभिव्यक्ति की आज़ादी) और अनुच्छेद-21 (जीवन जीने का अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत यह अधिकार नागरिकों को मिला है.

इन तीनों में अनुच्छेद-21 राइट टू प्राइवेसी के सबसे करीब है. ये अधिकार नागरिकों की व्यक्तिगत जानकारी जैसे उनका नाम, फोन नंबर, पता, उनका बायोमेट्रिक डिटेल आदि की सुरक्षा सुनिश्चित करता है. निजता के अधिकार का हनन संविधान के अनुच्छेद-21 का उल्लंघन माना जाता है.

इसके तहत किसी की निजी जानकारी को सार्वजनिक करना गैर-कानूनी है. इन्फाॅर्मेशन टेक्नोलाॅजी एक्ट (IT Act), 2000 की धारा-72 के मुताबिक, किसी व्यक्ति या कंपनी को किसी के इलेक्ट्राॅनिक डेटा को रखने की शक्ति दी जा सकती है.

जिस व्यक्ति का डेटा है, बिना उसकी सहमति के उसकी निजी जानकारी किसी और को नहीं दी जा सकती है. लेकिन जांच एजेंसियों को दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 के तहत जांच के लिए किसी की निजी जानकारी हासिल करने का अधिकार है.

केएस पुट्टास्वामी बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया (अगस्त, 2017)

2016 में मोदी सरकार ने कहा कि सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए आधार कार्ड होना अनिवार्य है. आधार कार्ड के लिए नागरिकों की बायोमेट्रिक जानकारी यानी उनकी आंखों की पुतलियों की इमेज और फिंगर प्रिंट लिए जाते हैं. सरकार के इस फैसले पर खासा बवाल हुआ. कहा गया कि यह निजता के अधिकार का उल्लंघन है. नागरिकों की इतनी पर्सनल डिटेल का ग़लत इस्तेमाल भी किया जा सकता है.

सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज केएस पुट्टास्वामी ने सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज कर दिया. सुनवाई हुई. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को लताड़ दिया. 24 अगस्त, 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “निजता का अधिकार, लोगों का मूलभूत अधिकार है.” कुल मिलाकार बात ये है कि किसी भी व्यक्ति की निजी जानकारी को लीक करना या पढ़ना निजता के अधिकार का उल्लंघन है.


ये स्टोरी हमारे साथ इंटर्नशिप कर रहे बृज द्विवेदी ने की है. 


NCB ने ड्रग्स मामले में दीपिका पादुकोण और इन तीन एक्ट्रेस को समन जारी किया है

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