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कैंपस किस्सा: जब एक सवाल के जवाब ने ज़िंदगी के मायने तक पहुंचा दिया

मालूम नहीं सच में सात बज गए थे, या बदमाशी थी किसी की, पर मुझे लग रहा था मैं अभी घंटे भर पहले ही तो सोया था. मैंने अलार्म बंद किया और दोबारा सो गया. मैंने टाइम देखने की भी जहमत नहीं उठाई. थोड़ा ही वक़्त गुजरा होगा कि फोन फिर से बज उठा. ये टोन अलार्म का नहीं था, ये कॉल आ रही थी किसी की. पहले तो खुद पे गुस्सा आया कि मैंने फोन बंद क्यों नहीं किया या फिर कहीं फेंक ही क्यों नहीं दिया विज्ञान की इस महान खोज को. फिर मन मसोसते हुए हाथ बढ़ाकर फोन टटोलने लगा. स्क्रीन पर किशोर का नाम चमक रहा था. ख़ुदा कसम अगर दुनिया का कोई भी दूसरा नाम होता तो मैं फोन उठाने के बारे में सोचता भी नहीं. पर इस लीचड़ आदमी को इग्नोर नहीं किया जा सकता. मैंने फोन उठाते ही कहा, “अगर मॉर्निंग वॉक के लिए फोन किए हो तो चुप चाप रख दो, दिल बहुत बड़ा है हमारा माफ़ कर देंगे तुमको.” पर आज चक्कर कुछ और ही था. दूसरी तरफ से हड़बड़ाहट भरी आवाज आई, “भाई मेन गेट आजा जल्दी प्रॉब्लम हो गई है थोड़ी.” इतना कहकर उसने फोन काट दिया. कुछ पौने आठ बजे होंगे. सुबह-सुबह ये मेन गेट क्यों गया है, मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा था. वैसे जब बात किशोर की होती है, तो मैं जादा समझने बूझने की कोशिश भी नहीं करता हूं. इस आदमी को समझने के लिए शायद कोई इसके बराबर का ही समझदार चाहिए होगा.

किशोर उन कुछ लोगों में से है, जिन्हें मैं कॉलेज के पहले से जानता था और फिर यहां भी साथ आ गए. इसे मैं जानता तो क्या ही था, बस पहचानता था. अपन कोचिंग के बाद रुककर डाउट्स डिसकस किया करते थे. मजे की बात तो ये थी कि हम दोनों में से किसी ने भी कभी एक दूसरे का नाम जानने की कोशिश नहीं की थी. वहां हमारी दोस्ती केवल पढ़ाई तक ही सीमित थी. मुझे आज भी याद है, कॉलेज के पहले दिन जब अपन एडमीशन की लाइन में मिले थे तो उसने मेरे नाम से पहले मेरी रैंक पूछी थी. और फिर पूरे स्वैग के साथ हाथ बढ़ाते हुए अपना नाम बताया था, “किशोर.” उस दिन से लेकर आज तक एक भी पल चैन से नहीं रहने दिया इस आदमी ने. खैर ये सब तो दोस्ती करने से पहले सोचना चाहिए था. आखिर कौन सा नया कांड किया होगा इसने आज, यही सोचते हुए मैं हॉस्टल से निकलकर मेन गेट की तरफ जा रहा था. छोटे मोटे पंगे तो किशोर की रूटीन में थे. बातों-बातों में ही किसी से भी उलझ जाता, और फिर फैंटम बनने की आदत तो बचपन से थी ही.

गेट से बाहर निकलते ही किशोर दिख गया, वो एक फल की दुकान पे खड़ा था, कुछ दो-चार लौंडे और दिख रहे थे आस पास. वहां पहुंचा तो मालूम पड़ा कि किशोर के वहां पहले आने के बावजूद फल वाले ने उन लड़कों का जूस पहले बना दिया था. और इतनी बड़ी बेइज्जती सह पाना किशोर के बस की बात नहीं थी, ये मैं जानता था. वो पहले तो फल वाले से उलझ गया, और फिर उन लड़कों से भी कहा सुनी हो गई. अंत में जब कोई सुनवाई नहीं हुई तो मुंह फुलाए उसी दुकान के बाहर खड़ा हुआ था. पहले तो मैंने किशोर को समझाकर वहां से चलने के लिए कहा. लेकिन जब वो नहीं माना तो मजबूरन मुझे उन लड़कों के पास जाना पड़ा. उनमें से एक ने मुझे अपनी ओर आते देखकर कहा, “तो तू मारेगा हमें”. “अरे, मैं तो बस समझाने आ रहा था.” “समझाने आ रहा था? तू है क्या बे?” सवाल मेरी समझ में नहीं आया, “क्या?” उसने दोबारा कहा, “तू है क्या बे?” ये क्या सवाल हुआ, मैं क्या हूं. मैंने नहीं सोचा कभी कि मैं क्या हूं, और वो होता कौन है पूछने वाला. इस सवाल के लिए तैयार नहीं था मैं, इससे अच्छा तो वो गाली दे लेता, कम से कम उसका जवाब तो पता है मुझे. अब इसके जवाब में क्या बोलना होता है कभी किसी ने बताया ही नहीं और ना ही मुझे कुछ सूझ रहा था. मैं कुछ देर चुप चाप खड़ा रहा. फिर पलटकर बस इतना कहा, “मुझे तुम लोगों के मुंह नहीं लगना.” और किशोर का हाथ खींचते हुए वहां से निकल गया.

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ISM Dhanbad Campus. Photo by: Ayush Parasar

“तू भी डर गया ना उन लोगों से”, किशोर ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा. “अरे भाई कीचड़ में पत्थर मारेगा तो छींटे तुझपे ही पड़ेंगे, ऐसे लोगों से जितना दूर रहा जाए उतना अच्छा.” इसके अलावा मेरे पास और कोई जवाब था भी नहीं. थोड़ी दूर चलने के बाद किशोर ये सब भूल गया और अपनी क्लासेस और असाइमेंट की बातें करने लगा. लेकिन मेरे मन में अभी भी वही सवाल तैर रहा था, आखिर मैं हूं क्या. मैंने किशोर की बात काटते हुए सीधे ही पूछ लिया, “तुझे क्या लगता है, मैं क्या हूं.” “इंसान है, और क्या है”, उसने तपाक से जवाब दिया. “इंसान तो तू भी है, और ऐसे सात सौ करोड़ इंसान हैं इस दुनिया में, पर मैं क्या हूं.” उसने और भी कई तरह के जवाब दिए पर मेरे मन को एक ना भाया. अंत में उसने हार मानते हुए इतना ही कहा कि छोड़ ये सब फ़ालतू की बातें, और शाम में याद से फुटबॉल खेलने आ जाना.

अब मैं अपने कमरे में आ गया था, लेकिन वो सवाल मेरे दिमाग़ में घर कर गया था. मैं क्या हूं? मैं और कुछ सोच ही नहीं पा रहा था. मैंने अपने बचपन से लेकर आजतक की सारी घटनाएं फ्लैशबैक में जी लीं, और सब में अपना अस्तित्व खोजता रहा. इन्हीं ख़यालों में कब शाम हो गई पता ही नहीं चला. इस बीच मुझे कई ऐसी चीजें मालूम हो गईं थीं, जो मैं नहीं था और ना ही हो सकता था. पर मैं जो था उसकी खोज अभी भी जारी थी.

इसी उहापोह के बीच मुझे वो बात याद हो आई जो हमें कॉलेज के पहले दिन बताई गई थी. कहीं भी कोई भी परेशानी आए तो बिना किसी झिझक के अपने सीनियर्स के साथ शेयर करो. बस फिर क्या था, मैं उठा और चल दिया पांडे सर के कमरे की ओर. पांडे सर फाइनल इयर के सबसे धाकड़ सीनियर थे. उनका भौकाल था पूरे कॉलेज में, और जूनियर्स के बीच गजब का फैनबेस. इन सबके अलावा वो मुझे अपना फेवरेट जूनियर भी बोलते थे. मैंने उनसे सुबह वाले कांड के बारे में सबकुछ बता दिया. औेर फिर वो सवाल भी जो मुझे लगातार परेशान कर रहा था. “चिल्ल है बे, इतना लोड मत ले. अब से तुझसे कोई भी ये सवाल करे तो बोल देना सिविल वाले पांडे सर का जूनियर है तू. बाकी सब मैं सम्हाल लूंगा. अब टेंशन लेना बंद कर.” पांडे सर के आश्वासन के बाद मेरे मन को थोड़ी शान्ति मिली. मुझे लगा कि शायद मुझे मेरे सवाल का जवाब मिल गया है.

मैं कैन्टीन में चाय पी रहा था, तभी अमर मिला. “क्यों भाई आज बड़ा खुश दिख रहा है”, उसने दूर से ही कहा. “क्यों ना होऊं खुश, आखिर पांडे सर का जूनियर हूं”, मैंने अकड़ते हुए कहा. “पांडे सर का जूनियर है तो फिर फेयरवेल की तैयारी भी कर ले, ज्यादा दिन के मेहमान नहीं हैं अब तेरे सर.” “ज्यादा दिन के मेहमान नहीं हैं, मतलब?” “अरे एक महीने में सारे फाइनल इयर वाले तो पासआउट हो जाएंगे, फिर पता नहीं कभी मिलेंगे भी या नहीं”, उसने हल्के फुल्के अंदाज में कहा. ये बात मुझे जैसे चुभ गई, मैं तुरंत उठा और वहां से चल दिया. “अरे क्या हो गया”, अमर ने आवाज दी. “बस कुछ काम याद आ गया, बाद में मिलता हूं”, मैंने बिना पीछे मुड़े ही जवाब दिया. वहां से मैं सीधे अपने हॉस्टल आ गया.

अगर एक महीने बाद किसी ने मुझसे पूछ लिया कि मैं क्या हूं तो मैं क्या जवाब दूंगा, मैं अपने बिस्तर पे लेटकर पंखे को निहारते हुए सोच रहा था. मैं वापस वहीं पहुंच गया था जहां से मैंने शुरुआत की थी. तभी घर से फोन आ गया. मैंने थोड़ी देर तक तो बिना मन के बात की और फिर मां से भी घुमा फिरा के वही सवाल पूछा, “मैं क्या हूं.” जवाब मिला कि तू हमारा लाडला बेटा है. अब ऐसे जवाबों से मुझे खीझ होने लगी थी. मैं मात्र किसी का जूनियर, किसी का दोस्त या किसी का बेटा नहीं हो सकता हूं. मैं कुछ और ही हूं, जो इनमे से किसी को नहीं पता. मैं वो सब नहीं हूं जो मैं हूं, या जो मैं सोचता हूं कि मैं हूं. मैं फिर से उलझता जा रहा था. रात मैंने इसी उलझन में करवट बदलते हुए काट दी.

अब चिड़ियों की आवाज़ आने लगी थी, सुबह के पांच बज गए थे. मैं मन बहलाने के इरादे से बाहर टहलने निकल गया. सामने गार्डन में नवीन दिखा, अपना पढ़ाकू नवीन. वो योग कर रहा था. मैं उसके सामने वाली बेंच पे जाकर बैठ गया. उसने मुझे देखकर पूछा, “रात भर सोए नहीं क्या.” “तुझे कैसे मालूम”, मैंने जवाब के बदले सवाल दाग दिया. “तेरी आंखें सब बता रही हैं”, उसने बड़ी सहजता से जवाब दिया. इसके बाद मैंने अपनी सारी आपबीती उसे सुना दी. और उससे भी वही पूछा, “तुझे क्या लगता है, मैं क्या हूं.” वो थोड़ी देर कुछ सोचता रहा. फिर उसने बोलना शुरू किया, “हम सब अपने साथ एक अदृश्य झोला लेकर पैदा होते हैं, हमारे हर दिन के एक्सपीरिएंस से वो झोला भरता जाता है और किसी भी समय पे हम वो सब कुछ होते हैं जो उस झोले के अंदर होता है. और हम भविष्य में वैसे ही होंगे, जैसी चीजें उस झोले के अंदर डालते जाएंगे.” इतना कहकर वो चुप हो गया. मुझे उसकी बात कुछ अच्छी लगी. मैंने तुरंत पूछा, “ये सब तुझे किसने बताया.” “मैंने पढ़ा था किसी किताब में शायद”, उसने ज़रा सोंचते हुए जवाब दिया. मैंने अपनी ज़िंदगी में कोर्स के अलावा और कोई किताब नहीं पढ़ी थी. “कहां मिलती हैं ऐसी किताबें, और क्या इन किताबों में सारे जवाब होते हैं”, मैंने उत्सुकता से पूछा. “हां सारे जवाब होते हैं, पर ढूंढना हमें ख़ुद ही पड़ता है. मेरे पास हैं ऐसी किताबें, मैं दे सकता हूं तुझे”, उसने मुस्कुराते हुए कहा.

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ठीक तुम्हारे पीछे

नवीन की दी हुई कई किताबों में से मानव कौल साहब की एक किताब की इस लाइन ने मुझे मेरे जवाब के बेहद करीब लाकर खड़ा कर दिया.
“मेरा पूरा जीवन उस दृश्य की तलाश में निहित है जिस दृश्य में पहुंचते ही वह चित्र पूरा हो जाएगा, जिस चित्र को पूरा करने के लिए मैं बना हूं.”

शायद मैं भी किसी अधूरे चित्र का एक हिस्सा ही हूं.


ये किस्सा लिखा है प्रणव ने. IIT धनबाद से पढ़े हैं. दी लल्लनटॉप के साथ इंटर्नशिप करने आए हैं. लॉकडाउन के चक्कर में लिटरली नहीं आ पाए हैं. अपने घर से काम करते हैं. बस अपने फोन से सुबह की मीटिंग में आ धमकते हैं. इनको साहित्य में खूब दिलचस्पी है. खूब पढ़ते हैं, लिखते भी हैं. फिलहाल हमारे साथ लिख रहे हैं.


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