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मुस्लिम देशों में चल रहे #BoycottFrenchProducts कैंपेन का फ़्रांस पर कितना असर पड़ेगा?

‘फ्रांस के सफ़ीर को मुल्क बदर करो’, किक आउट द फ्रेच एंबेसेडर. ऐसी लाइनें लिखे पोस्टर्स के साथ कल पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में लोग सड़कों पर थे. फ्रांस मुर्दाबाद के नारे लग रहे थे. फ्रांस का झंडा जलाया जा रहा था. पाकिस्तान की संसद ने भी कल एक प्रस्ताव पास कर सरकार से मांग की है कि फ्रांस से पाक राजदूत को वापस बुलाया जाए. इसी तरह के प्रदर्शन बांग्लादेश में भी हुए. ईरान, तुर्की, फिलिस्तीन, सऊदी अरब, जॉर्डन, यानी आप जिस मुस्लिम देश का नाम लेंगे वहां फ्रांस के खिलाफ़ प्रदर्शन हो रहे हैं. दुनिया के ज्यादातर मुस्लिम देशों ने फ्रांस के खिलाफ मुहिम छेड़ दी है और इस लड़ाई में फ्रांस अकेला है.

फ्रांस ने भी तुर्की से अपना राजदूत वापस बुला लिया है. फ्रांस ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि तुर्की के राष्ट्रपति तैय्यप अर्दोगन ने कहा कि फ्रांस के राष्ट्रपति को अपनी मानसिक हालत की जांच करानी चाहिए, उन्हें दिमागी इलाज की ज़रूरत है. इसके साथ ही अर्दोगन ने अपने देश के लोगों से फ्रांस के सामान का बायकॉट करने के लिए भी कहा. इसके बाद तुर्की समेत कुवैत, जॉर्डन, क़तर जैसे देशों में फ्रांस के सामान का बायकॉट शुरू हो गया. कई बड़े स्टोर्स ने फ्रांस का सामान खाली कर दिया. ट्विटर पर भी बायकॉट फ्रेंच प्रोडक्ट्स और #NeverTheProphet हैशटैग चलाए जा रहे थे. इतने बड़े स्तर पर विरोध के बाद थोड़े से दवाब में फ्रांस की सरकार भी दिखी. फ्रांस सरकार ने बायकॉट खत्म करने की अपील भी की लेकिन मामला इतने भर से शांत नहीं हुआ. ये झगड़ा और बढ़ता ही जा रह है. मुस्लिम देशों के तीखे विरोध के बीच ही फ्रांस सरकार ने राजधानी पेरिस में एक मस्जिद पर ताला लगवा दिया है.

पाकिस्तान में फ़्रांस के राजदूत को बाहर भेजने की मांग हो रही है.
पाकिस्तान में फ़्रांस के राजदूत को बाहर भेजने की मांग हो रही है.

तो सवाल ये उठता है कि आखिर मुस्लिम देश फ्रांस को किस बात के लिए झुकाना चाहते हैं ? क्या मुस्लिम देशों के दबाव में आकर फ्रांस झुक जाएगा ? ये पूरा झगड़ा क्या है ?

फ्रांस में 16 अक्टूबर को एक स्कूल टीचर सेमुएल पैटी की गला काटकर हत्या कर दी गई थी. हत्यारा चेचन मूल का एक कट्टर मुस्लिम था. हत्या से पहले स्कूल टीचर सेमुएल पेटी के खिलाफ फ्रांस के मुस्लिम संगठन ऑनलाइन कैंम्पेन चला रहे थे क्योंकि उसने अपने क्लास में पैगम्बर मोहम्मद के वो कार्टून दिखा दिए थे जो कुछ साल पहले फ्रांस की एक मैग्जीन शार्ली हेब्दो ने छापे थे. मुस्लिम संगठन कार्टून दिखाने का विरोध कर रहे थे इसलिए टीचर की हत्या को भी कुछ ने जायज़ बताया. इस हत्या से पहले भी फ्रांस के राष्ट्रपति कट्टर मुस्लिम संगठनों के ख़तरे की बात कर रहे थे. उन्होंने कहा था कि इस्लाम ख़तरे में है. और एनलाइटन इस्लाम (englighten) बनाने की ज़रूरत है.

टीचर की हत्या के बाद राष्ट्रपति मैक्रों ने कहा कि फ्रांस में कार्टून दिखाए जाएंगे और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कमज़ोर नहीं होने दिया जाएगा. मुस्लिम देश इसी बात का विरोध कर रहे हैं. मुस्लिम देशों का कहना है कि पैगंबर मोहम्मद के कार्टून दिखाने का समर्थन करना इस्लामोफोबिया है. पाकिस्तान के पीएम इमरान खान ने इसी बात को इस्लाम पर हमला बताया है. और राष्ट्रपति मैक्रों के इसी तरह के बयानों को लेकर तुर्की के अर्दोगन ने कहा है कि उन्हें इलाज की जरूरत है. ईरान का रिएक्शन ये आया है कि फ्रांस की ऐसी कवायदों से चरमपंथ बढ़ेगा.

तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन के साथ इमैनुएल मैक्रों.
तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन के साथ इमैनुएल मैक्रों.

अब यहां दो बात औऱ समझने वाली हैं. एक तो ये कि क्या फ्रांस वाकई इस्लामोफोबिया को बढ़ावा दे रहा है ? और दूसरी बात ये कि क्या मुस्लिम देश वाकई आहत हैं या फ्रांस का विरोध किसी बड़ी राजनीतिक साजिश के तहत कर रहे हैं ?

मुस्लिम देश भले ही फ्रांस का विरोध कर रहे हों लेकिन फ्रांस की सरकार को लगता है कि वो अपने संविधान की हिफाज़त कर रही है. वो संविधान जिसकी बुनियाद 1789 की क्रांति में है. लिबर्टी, इक्विलिटी, फ्रैटरनिटी. ये तीन शब्द नहीं फ्रांस के समाज का विज़न है जो 1789 की क्रांति से अर्जित किया गया था. और फ्रांस का ये विज़न दुनिया के कई और संविधानों में अडोप्ट किया गया. तो ये कहने में गुरेज़ नहीं होना चाहिए कि एक लिबरल और बराबरी वाले समाज की नींव फ्रांस ने बहुत पहले ही डाल दी थी. 1905 में लाइसिते का कानून लागू किया गया. लाइसिते यानी सेक्यूलरिज्म जिसके तहत सरकार में चर्च के दखल पर रोक लगा दी गई. वही चीजें आज भी फ्रांस में चलती आ रही है. 

2004 में फ्रांस ने स्कूलों में बुर्का पहनने पर रोक लगा दी थी और ऐसा करने वाला फ्रांस शायद दुनिया का पहला देश था. फ्रांस में शिक्षक या मेयर्स जैसे पब्लिक सर्वेंट ऐसा कोई प्रतीक अपने पास नहीं रख सकते जिससे उनकी धार्मिक पहचान मालूम चल सके. यानी फ्रांस का सेक्युलरिज्म सरकारी संस्थानों में किसी भी तरह के धार्मिक जुड़ाव की पाबंदी लगाता है. और यहीं दिक्कत शुरू होती है. फ्रांस में करीब 60 लाख मुस्लिम हैं. कुल आबादी का 9 फीसदी. पश्चिमी यूरोप में सबसे ज्यादा मुस्लिम फ्रांस में ही रहते हैं. उन मुस्लिम्स का फ्रांस के सेक्यूलरिज्म से टकराव है. इसलिए स्कूलों में बुर्का बैन करने का भी विरोध हुआ था और ये चीजें काफी वक्त से होती आई हैं.

फ़्रांस की एक मस्जिद. (सांकेतिक)
फ़्रांस की एक मस्जिद. (सांकेतिक)

इस तरह की पाबंदियों के बहाने फ्रांस में कट्टर मुस्लिम संगठन भी पनपे. पिछले एक दशक में फ्रांस में कट्टरपंथियों ने 50 से ज्यादा हमलों को अंजाम दिया है. जिसमें सबसे बड़ी घटना 2015 में चार्ली हेब्दो के दफ्तर पर हमला था. इसके बाद से फ्रांस में कट्टरपंथ चुनावी मुद्दा भी बन गया और सिक्योरिटी के वादों पर चुनाव लड़े जाने लगे. और यहीं बात आती है फ्रांस के मौजूदा राष्ट्रपति इमनुऐल मैक्रों की. 2017 में जीत के बाद मैक्रों ने ज्यादातर हिजाब पर पाबंदियों जैसे शब्दों पर चुप्पी रखी. वो इस तरह के विवाद में नहीं पड़े.

लेकिन अब फ्रांस में 18 महीने बाद ही राष्ट्रपति का चुनाव है और उनका मुकाबला दक्षिणपंथी नेताओं से है. हाल ही के ओपिनियन पोल के मुताबिक दक्षिणपंथी नेता मैरिन ले पेन को आतंक के खिलाफ लड़ने में फ्रांस की जनता ने सबसे भरोसेमंद नेता माना है. पोल में मैक्रों पिछड़ रहे हैं. और हो सकता है कि अगले चुनाव में मैक्रों और मैरिन ले पेन की टक्कर हो. तो कट्टरपंथियों पर लगाम औऱ सिक्योरिटी को लेकर मैक्रों फ्रांस की जनता का भरोसा जीतना चाहते हैं और इसलिए वो अपनी विचारधारा में सेंटर से राइट की तरफ जा रहे हैं. कुछ जानकारों का कहना है कि टीचर की हत्या पर मैक्रों ने ओवररिएक्ट किया. और ये आग में घी की तरह काम करेगा. जो भी हो मैंक्रों कह रहे हैं वो अपने इरादे से पीछे नहीं हटेंगे.

 चार्ली हेब्दो पर हुए अटैक ने पूरे फ़्रांस को हिलाकर रख दिया था.
चार्ली हेब्दो पर हुए अटैक ने पूरे फ़्रांस को हिलाकर रख दिया था.

अब दूसरे पक्ष पर आते हैं. फ्रांस के ख़िलाफ जंग छेड़ने वाले मुस्लिम देशों की अगुवाई कर रहा है तुर्की. तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोगन ने मुस्लिम देशों की नेतागीरी का ये बड़ा मौका हाथ से जाने नहीं दिया. और इस विरोध में भी राजनीति है. राजनीति इसलिए क्योंकि उइगर मुस्लिमों के खिलाफ चीन की सरकार हर तरह की ज्यादती करती है लेकिन कोई भी मुस्लिम देश मुखर होकर चीन का विरोध नहीं करता. वजह ये है कि मुस्लिम देशों के साथ चीन के कारोबारी रिश्ते हैं और कोई भी अपना नुकसान नहीं करना चाहता. लेकिन फ्रांस वाले मामले में बात दूसरी है. फ्रांस और तुर्की की अदावत लंबी है. दोनों नैटो यानी  North Atlantic Treaty Organization (NATO) के सदस्य होने के बावजूद एक दूसरे के दुश्मन हैं.

सीरिया में जब तुर्की कुर्द सेना के खिलाफ अभियान चला रहा था तो फ्रांस उसके विरोध में था. लीबिया में फ्रांस और तुर्की एक दूसरे के खिलाफ थे. एक और झगड़ा मेडिटेरेनियन सी में चल रहा है. साइप्रस के पास समंदर से गैस निकालने को लेकर ग्रीस और तुर्की में झगड़ा है. इस झगड़े में ग्रीस को सीधा सीधा फ्रांस का समर्थन है. तो ये बात तुर्की को अखरती है. अज़रबैजान और आर्मेनिया वाले युद्ध में भी फ्रांस ने तुर्की के दखल का विरोध किया था. तुर्की ने सीरियाई लड़ाके अज़रबैजान में भेजे हैं ये बात भी फ्रांस ने कही थी. तो कुल मिलाकर तुर्की के राष्ट्रपति कई दिनों से फ्रांस के खिलाफ अपना गुस्सा दबाए बैठे थे. और जब मौका मिला तो मुखर होकर फ्रांस का विरोध शुरू कर दिया, सामान के बायकॉट की बात कह दी. और पाकिस्तान सरीखे जो मुस्लिम देश तुर्की की रहनुमाई कबूल कर चुके हैं उन्होंने भी फ्रांस का विरोध शुरू कर दिया.

अब सवाल ये है कि क्या मुस्लिम देश फ्रांस को झुका पाएंगे. अर्थशास्त्रियों के मुताबिक बायकॉट से फ्रांस का ज्यादा नुकसान नहीं होने वाला है. ऐसी मुहिम पहले भी चलाई गई हैं लेकिन अल्पकालीन ही रही हैं. लगता नहीं है कि फ्रांस के राष्ट्रपति इस तरह के दबाव में आएंगे. इसलिए ये झगड़ा अभी और लंबा खिंचता दिख रहा है. जो भी नए डेवलपमेंट होंगे, हम इस शो में आपको जरूर बताएंगे.


वीडियो: मुस्लिम देशों ने फ्रांस के खिलाफ क्यों छेड़ दी मुहिम जिसमें अकेला पड़ गया है फ्रांस?

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